आवश्यक है आधुनिक ऋषियों का सम्मान

आवश्यक है आधुनिक ऋषियों का सम्मान

पहले तो आज कल इतिहास पढऩे वाले लोगों के मन में भारत का गौरव होता ही नहीं है, यदि किसी प्रकार उन्हें अपने श्रेष्ठ पूर्वजों की परंपरा और प्राचीन भारत के उन्नत ज्ञान-विज्ञान की जानकारी दी जाए तो सीधा सा जवाब होता है कि पुरानी बातें मत कीजिए। अभी क्या है आपके पास ये बताइए अधिकांश लोग इसके उत्तर में चुप हो जाते हैं। ऐसा लगता है कि अतीत में तो चाहे जो भी रहा हो, लेकिन वर्तमान में तो प्राचीन ज्ञान-विज्ञान की उपयोगिता पर कोई विमर्श अथवा शोध नहीं हो रहा। क्या यह सच है?
सच इसके एकदम विपरीत है। देश की ज्ञान-विज्ञान की परंपरा न केवल जीवित है, बल्कि फल-फूल भी रही है। पराधीनता के काल में भी ज्ञान-विज्ञान की इस परंपरा में शोध और लेखन जारी था आज स्वाधीनता के बाद भी वह धारा प्रवाहित है। समस्या केवल यह है कि सरकारी स्तर पर यूरोप की अंधी नकल के कारण इस तरह के काम को पूरी तरह उपेक्षित किया जाता रहा है। बावजूद इसके भारत की महान परम्पराएँ आज भी जीवित हैं। लोग उन्हें अपनी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बनाकर रखे हुये हैं। इतना ही नहीं इन परम्पराओं के शोधकर्ता जिन्होंने शोध किया उनको प्रयोग करने योग्य बनाया ताकि मानवता का भला हो सके, उन्हें भी लोग जानते हैं। हालाँकि पश्चिमी संस्कृति की आँधी ने बहुत कोशिश की है कि भारत की संस्कृति, परम्पराएँ, महान ऋषि-मुनि, वैज्ञानिक सबका अस्तित्व समाप्त हो जाए। किन्तु ऐसा न हो सका क्योंकि संस्कृत भाषा में यह प्रवाह बहता रहा है जिसे दुनिया श्रेष्ठ भाषा के रूप में अब स्वीकार करने लगी है। यद्यपि उसे भी दीन-हीन बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी गई। फिर भी वह जीवित है। जिन महान विभूतियों के कारण हम अपनी महान धरोहरों को समझ पा रहे हैं, उनका उपयोग कर पा रहे हैं और जो आज की विपरीत परिस्थितियों में भी भारत को बचाने में अपना जीवन होम कर रहे हैं, उनको स्मरण करना बहुत ज़रूरी है। नहीं तो इतिहास हमें कभी क्षमा नहीं करेगा।
आयुर्वेद में चरक, सुश्रुत और वाग्भट्ट का नाम तो तो यदा-कदा लोग याद करते हैं पर उनकी धरोहर को जो मनीषी आज भी संजोने में लगे हैं, उन्हें हम भूल जाते हैं जैसे भारतीय गणित को जिन्दा रखने वाले गणितज्ञ आज भी गुमनाम हैं। भौतिकी, रसायन, जीव विज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान, कृषि विज्ञान, अर्थ शास्त्र जैसे मानव जीवन या संपूर्ण प्रकृति की रक्षा के लिए प्राचीन भारत में ऋषि वैज्ञानिकों ने काम किया है, उनके द्वारा प्रदत्त धरोहर को आज भी पश्चिम की आँधी से बचाने और जन जीवन के लिए उपयोगी बनाने में जो लोग संलग्न हैं, उन्हें केवल स्मरण ही नहीं तो उन्हें सम्मानित करने की आवश्यकता है।
भारतीय धरोहर संस्थान ने यह संकल्प किया है कि इस दुरूह कार्य को वह करेगा। हम अपने आधुनिक ऋषियों को सम्मानित भी करेंगे और साथ ही उनके कार्य को विस्तार देने की व्यवस्था भी करेंगे। पश्चिमी विज्ञान केवल उनके लिए है जिनके पास धन है पर भारतीय विज्ञान सबके लिए है। यही कारण था कि भारत विश्व अर्थव्यवस्था में सबसे आगे था। इस इतिहास को फिर से दोहराया जा सकता है। पहली शताब्दी में विश्व व्यापार और उत्पादन में भारत का भाग 31 प्रतिशत था तो आज क्यों नहीं हो सकता? अगर अपनी धरोहर के रूप में मिले ज्ञान विज्ञान को उपयोग में लाया जाए तो ऐसा होना सम्भव है। इसको उपयोग में लाने के लिए इन पर काम करने वाले लोगों को उनका उपयुक्त स्थान मिलना चाहिए। इसी चिंतन के साथ धरोहर ने यह अभियान प्रारंभ किया है।