आवश्यक है अपने इतिहास पर विश्वास करना

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री विप्लव कुमार देव ने पिछले दिनों कहा कि इंटरनेट और सैटेलाइट कोई नई चीज नहीं हैं ये महाभारत काल में भी थे। उनके ऐसा कहते ही विवाद प्रारंभ हो गया। उनके इस बयान को बेतुका बता दिया गया। इससे पहले भी ऐसा कई बार देखा गया है कि जब भी किसी नेता या सार्वजनिक व्यक्तित्व ने किसी तकनीक के प्राचीन भारत में होने संबंधी बयान दिए, उनकी काफी खिल्ली उड़ाई गई। यदि किसी ने कह दिया कि प्राचीन भारत में शल्य चिकित्सा होती थी तो लोगों ने उसका मजाक उड़ाया। किसी ने कहा कि पुष्पक विमान भी एक विमान ही तो था, तो उसे मूर्ख ठहराया गया। दो वर्ष पहले राष्ट्रीय विज्ञान कांग्रेस में भारतीय विमानशास्त्र पर विषय प्रस्तुत करने को लेकर काफी विवाद किया गया था। ज्योतिष का तो नाम लेना ही आजकल विवाद को जन्म देने के समान है। प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों है? आखिर आज के भारतीय समाज को अपने इतिहास के प्रति इतनी ग्लानि क्यों है कि वह उसके किसी उज्ज्वल पक्ष की चर्चा तक को सहन नहीं कर पाता और चर्चा करने वाले को धिक्कारने में जुट जाता है?
निश्चित रूप से यह एक बड़ी विडंबना है कि आज भारत के समाज का एक बड़ा वर्ग आत्मनिंदा में डूब गया है। उसे अपने ही देश और समाज की निंदा सुनने में ही मजा आने लगा है। इस प्रवंचना में वह इतना डूब गया है कि उसे अपने देश के गौरव की बात असहनीय प्रतीत होने लगती है और वह अपनी सामान्य समझ भी खो देता है।
इस बात को समझना हो तो हमें यह विचार करना चाहिए कि भले ही गणेश की कहानी हमें गप प्रतीत होती हो, परंतु यह एक सच्चाई तो है ही कि सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा का विशद वर्णन कर रखा है और उसमें जिन उपकरणों का उल्लेख है, वे आँखों और मस्तिष्क जैसे जटिल शल्य कर्म में उपयोगी हैं। इस बात को चिकित्साशास्त्र के आधुनिक इतिहासकार भी स्वीकार करते हैं कि प्राचीन काल में भारत में शल्य चिकित्सा काफी उन्नत अवस्था में थी, परंतु बीच में उसकी उपेक्षा की गई और वह भारतीय वैद्यों के अभ्यास से बाहर हो गई। हालांकि यह बात भी पूरी तरह सच नहीं है, परंतु इस इतिहास को मानने पर भी हमें यह मानना पड़ता है कि प्राचीन भारत में शल्य चिकित्सा होती थी।
इसी प्रकार विमान शब्द का प्रयोग ही इस बात को साबित करता है कि इसकी ठीक कल्पना भारतीयों को थी। यह केवल मन की उड़ान नहीं थी। इस पर एक वैमानिकी शास्त्र भी मिलता ही है। अब बात इतनी भर रह जाती है कि इस शास्त्र के आधार पर कोई विमान बनाना संभव है या नहीं। इस बात का उत्तर हम इससे समझ सकते हैं कि यदि आज इंजीनियरिंग की कोई पुस्तक एक बिल्कुल ही अनपढ़ व्यक्ति के हाथ लग जाए तो क्या उस पुस्तक को पढ़ कर वह विमान या अन्य कोई यंत्र जो उसमें वर्णित हो बना लेगा? कदापि नहीं। पुस्तक में केवल सिद्धांतों का वर्णन होता है। उसके अनुसार निर्माण करना व्यवहार का विषय है। आज तो कोई विज्ञानी संस्कृत ही नहीं समझता है। जो संस्कृत समझते हैं, वे विज्ञान से अपरिचित हैं, ऐसे में इन शास्त्रों की परीक्षा करने का अधिकारी व्यक्तित्व तो कोई है ही नहीं, फिर इन पर प्रश्न खड़े करने का अधिकार किसी को कैसे मिल सकता है?
यह ठीक है कि इंटरनेट और सैटेलाइट जैसे शब्द महाभारत काल में नहीं रहे होंते, परंतु वह तकनीकी तो अवश्य ही रही होगी। इंद्रजाल शब्द आखिर क्या था? क्या हमने कभी इन शब्दों को समझने का प्रयास किया है? यदि हम जादू और चमत्कारों पर विश्वास नहीं करते और विज्ञान पर विश्वास रखते हैं तो महाभारत में जिस प्रकार की घटनाओं का वर्णन किया गया है, वे बिना उच्च तकनीक के संभव नहीं हैं। बात केवल इतनी सी है कि जब आज तक महाभारत में वर्णित घटनाओं को मिथक मानने का कोई स्पष्ट और वैज्ञानिक कारण या प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं तो हम उसे इतिहास क्यों न मानें। इसके उलट यूरोपीय लोग अपने ग्रीक मिथकों को इतिहास मानते हैं और हरेक सिद्धांत या ज्ञान का जनक एक ग्रीक मिथकीय पात्र को बता देते हैं, भले ही वे उसका कोई ऐतिहासिक साक्ष्य प्रस्तुत न कर पाएं तो हम भारतीयों को तो अपने ऐतिहासिक ग्रंथों को मिथक बताने से बचना ही चाहिए।