आवश्यक नहीं है वैराग्य शिवमय होने के लिए

जवाहर लाल कौल

अचानक कश्मीर शैव दर्शन और अभिनव गुप्त की अपने देश में भी खोज होनी आरम्भ हो गई। यह खोज हमें अभिनव गुप्त से पहले की शैव दर्शन की एक विस्तृत परंपरा से साक्षात्कार करवाती है। यदि आठवीं शताब्दी में वसु गुप्त को शैव दर्शन के पहले गंभीर व्याख्याता मान लें तो अभिनव गुप्त उसके सबसे ऊंचे शिखर माने जाएंगे। वसु गुप्त और अभिनव गुप्त के बीच का डेढ़ सौ वर्ष का कालखण्ड शैव दर्शन के विभिन्न आयामों के विकास और अनेक दार्शनिक बिंदुओं की परिभाषा का युग था। वास्तव में यही युग कश्मीर में राजनैतिक वैभव और पराक्रम का भी युग था और इसी युग में कला संस्कृति के भी शिखर छू लिए गए।

इस युग के आरम्भ में प्रतापी राजा ललितादित्य मुक्तापीड़ ने कश्मीर के राज्य का विस्तार ही नहीं किया, अपितु कश्मीर की परिचित सीमाओं से बाहर बहुत दूर तक अपना विजय रथ घुमाया। दक्षिण में विंध्यांचल पार और पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक ललितादित्य की सेनाएं पहुंची। ललितादित्य शायद रघु के पश्चात पहले राजा थे जिन्होंने उत्तर पश्चिम की सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए अफगानिस्तान और चीन तक के बहुत से क्षेत्रों को अपना आधिपत्य स्वीकार करने के लिए विवश कर दिया था। कश्मीर में शैव दर्शन के पुनरोत्थान की कहानी भी ललितादित्य कीे इसी दिग्विजय गाथा से आरम्भ होती है। राजतरंगिनी के यशस्वी लेखक कल्हण के अनुसार ललितादित्य अपनी विजय यात्रा के दौरान कन्नौेज राज्य जा पहुंचे। कन्नौज के साथ युद्ध में वहां के राजा हार गए और ललितादित्य को राजाधिराज स्वीकार करने के अतिरिक्त कुछ भेंट देनेे की भी बारी आई। ललितादित्य ने कन्नौज के राजदरबार में विद्यमान दार्शनिकों और विद्वानों को मांगा। राजा ने अत्रिगुप्त नाम के एक शैव शास्त्री को ललितादित्य के साथ भेजने का निर्णय कर लिया।

अत्रिगुप्त के पूर्वज गंगा और यमुना नदियों के दुआब मे अंतर्वेदी नामक ग्राम के मूल निवासी थे। ललितादित्य स्वयं तो भागवत थे, वे विष्णु के अनन्य भक्त थे लेकिन उन्होंने शैव शास्त्री को अपना आश्रम बनाने की छूट दी और हर प्रकार की सहायता भी की। इसी अत्रि गुप्त के वंशज थे अभिनव गुप्त। अत्रि गुप्त के पश्चात कई पीढिय़ां निकल चुकी थीं जबकि उनके वंश में एक प्रतिभवान दार्शनिक उत्पन्न हुआ जिसकी ख्याति न केवल कश्मीर अपितु पूरे भारत में फैेल गई। अत्रिगुप्त अैर अभिनव गुप्त के अंतराल में कश्मीर में शैव धर्म के विविध आयामों को प्रकाशित करने वाले बहुत से आचार्यों का उदय हो चुका था। अभिनव गुप्त का महत्त्व इस बात में है कि उन्होंने सब शाखाओं का समन्वय करते हुए एक समग्र दर्शनशास्त्र का विकास किया जिसे त्रिक क्रम और कौल दर्शनों का संगम माना जाता है। इसको ही लोक में कश्मीर शैव दर्शन के नाम से भी जाना जाता है। जिस समय ललितादित्य के साथ अत्रि गुप्त ने श्रीनगर में अपना आश्रम खोला, लगभग उसी समय यानी आठवीं शती के आरम्भ में भारत भर में घूमते घूमते एक शैव शास्त्री संगमादित्य भी कश्मीर आ गए थे जहां उन्होंने शैव धर्म की साधना आरम्भ की। उन के प्रपौत्र सोमानंद का यह सौभाग्य था कि उस समय कश्मीर में शैव मत के प्रखर आचार्य वसु गुप्त की दार्शनिक प्रतिभा की ओर देश भर के विद्वानों का ध्यान चला गया था। सोमानंद को वसु गुप्त जैसे आचार्य का शिष्य बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

यह महत्वपूर्ण है कि शैव धर्म के ये सभी आचार्य उस कालखण्ड में हुए जबकि कश्मीर में शक्तिशाली राजाओंं का दौर था, जिन्होंने देश के विभिन्न भागों से विद्वानों, लेखकों और वास्तुशिल्पियों के लिए भी कश्मीर को एक अनुकूल कर्मभूमि बना दिया था। राजा स्वयं विभिन्न कलाओं और दार्शनिक मार्गों को प्रोत्साहन देते थे और अपने से इतर दार्शनिक और साम्प्रदायिक मार्गों को भी उसी उत्साह से विकास करने का अवसर प्रदान करते थे। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि एक ही समय में और एक ही राजा के शासन में विपरीत धाराओं के दार्शनिक मतों और विश्वासों को समान रूप से फलने फूलने दिया जाता था। बौद्ध, शैव और वैष्णव धर्मों के मठ मंदिर लगभग साथ बनते रहे। ललितादित्य के कुछ समय पश्चात ही एक और महान राजा हुए थे अवंतीवर्मन।

श्रीनगर के पास ही अवंतीपुरा नामक स्थान पर अवंतीवर्मन के राजप्रासाद और मंदिरों के अवशेष आज भी दर्शकों को चकित करते हैं। वास्तव में कला और दर्शन की जिस धारा का श्रीगणेश ललितादित्य के समय हुआ, वही अवंतीवर्मन के समय तक अपनी पराकाष्ठा तक पहुंच गई थी। वसु गुप्त और उनके शिष्य यदि इसके आरम्भ में अवतरित हुए तो अभिनव गुप्त इसके अंत पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे थे। वसु गुप्त के प्रतिभावान शिष्य कल्लट भट्ट अवंतीवर्मन के समकालीन थे। इसी के तीन पीढ़ी पश्चात अभिनव गुप्त हुए। स्मरण रहे कि अत्रिगुप्त के कश्मीर आने से पहले भी कश्मीर में शैव मत का प्रचार था लेकिन यह मत दार्शनिकता की ऊंचाइयों सेे गिर कर केवल तंत्राचार तक ही सीमित हो गया था। तांत्रिक विद्या को व्यक्तिगत और कभी कभी राजनैतिक हितों के लिए भी इस्तेमाल किया जाने लगा था। लोक में तंत्र का अभिप्राय एक प्रकार की जादुई विद्या ही था जिससे व्यक्ति को असाधारण शक्तियां प्राप्त होती है। कल्हण ने अपने वृतांत में इस प्रकार की कई घटनाओं का वर्णन किया है जिसमें तंत्र का उपयोग करके राजनैतिक षड्यंत्र किए गए थे। शैव या शाक्त के नाम पर उस समय भी कश्मीर में बहुत कुछ था लेकिन अगर अभाव था तो इनको फिर से दार्शनिक धरातल पर स्थापित करने वाले आचार्यों की परंपरा का। संभवत: इसीलिए ललितादित्य को कन्नौज से धन दौलत से अधिक एक विद्वान में ही बहुमूल्य रत्न दिखाई दिया हो। इसी घटना के साथ शैव आचार्यों का आना आरम्भ हुआ।

संगमानंद जो अपनी परिव्राजक अवस्था में ही कश्मीर आए थे, स्वयं शैव आचार्यों की एक लम्बी परंपरा से थे। विश्वास किया जाता है कि दुर्वासा ़ऋषि की उस परंपरा से संगमानंद भी जुड़े थे जो ऋषि ने शैव दर्शन के प्रसार के लिए पंद्रह पीढ़ी पूर्व स्थापित की थी। संगमानंद की चौथी पीढ़ी में सोमानंद को वसुगुप्त का मार्गदर्शन मिला। यद्यपि अभिनव गुप्त ने अपने जीवन में अनेक आचार्यों से ज्ञान पाया लेकिन आरंभिक शिक्षा उन्हें अपने ही परिवार में मिली। उनके पिता नरसिंहगुप्त ने बालक अभिनव को संस्कृत साहित्य, व्याकरण और तर्कशास्त्र सिखाया। इसी ने अभिनव गुप्त में गहन अध्ययन की भूख और ज्ञान पिपासा भर दी। अपना बाल्यकाल और यौवन का भी बड़ा भाग उन्होंने विभिन्न मतों के आचार्यों से ज्ञान अर्जित करने में लगाया। इस ज्ञान यात्रा में वे कश्मीर ही नहीं, देश के विभिन्न भागों में गए जहां आचार्यों की परंपरा थी। हालांकि उनके मूल गुरु लक्ष्मण गुप्त ही थे लेकिन कुछ दार्शनिक धाराओं का ज्ञान उन्हें दूसरों से मिला। शैव दर्शन की एक प्रमुख शाखा कौल दर्शन की शिक्षा उन्हें जालंधर के एक शक्तिपीठ के आचार्य शम्भूनाथ से मिली। अभिनव गुप्त का मानना था कि भले आप को कोई योग्य गुरु मिल जाए, फिर भी अन्य आचार्यों से ज्ञान पाने का प्रयास नहीं छोडऩा चाहिए। अपनी यायावरी में उन्होंने उन्नीस आचार्यों से शिक्षा प्राप्त की।

अभिनव गुप्त की दार्र्शनिक पहुंच को समझने के लिए हमें पहले वसुगुप्त की भूमिका को समझने का प्रयास करना चाहिए। लगभग 800 ईस्वी में वसुगुप्त को शिव सूत्र का बोध हुआ। कुछ अनुयायियों की मान्यता है कि यह बोघ वसुगुप्त को सीधे शिव से ही हुआ था। वसुगुप्त ने शिव सूत्र के ही आधार पर शिव और शक्ति की असाधारण धारणा को प्रतिपादित किया। अपनी स्पंद कारिका में उन्होंने शिव और शक्ति के अंतर को स्पष्ट किया। अनंत और शुद्ध ज्ञान का नाम ही शिव या ईश्वर है और इस अनंत क्षमता का आभास और उसे कार्यान्वित करने को ही शक्ति कहते हैें। शिव शांत, स्थिर, अनंत और चैतन्य है तो शक्ति उसका क्रिया रूप है। वसुगुप्त मानते थे कि अनंत शिव को तब तक नहीं पाया जा सकता है जब तक हम उसके द्वारा रचे इस विश्व, ब्रह्मंाड को उसी के रूप में स्वीकार न करें। वे जगत को नकारने के रास्ते को स्वीकार नहीं करते थे।

उस युग में वसुगुप्त के सूत्रों को समझने वाले बहुत नहीं थे। लेकिन उन्होंने योग्य शिष्यों की एक लम्बी परंपरा तैयार की जिन्होंने उनके विचारों को आगे बढ़ाया। लेकिन उस समय के सभी आचार्यों द्वारा प्रतिपादित दार्शनिक मतों को एक सूत्र में बांध कर एक समग्र शैव दर्शन का रूप देने का काम अभिनव गुप्त ने ही किया। अभिनव गुप्त असाधारण प्रतिभा के धनी थे इसलिए उन्होंने उन सभी आयामों का गहन अध्ययन किया जो उस समय प्रचलित थे। ईश्वर शुद्ध चेतना है यह तो बहुत पहले से ही वेदांत कहता आया था। लेकिन योग सूत्र यह भी मानते हेैं कि जो विश्व हमारे चारों और व्याप्त है वह इस महेश्वर से बाहर एक अवास्तविक आभास मात्र है, माया है जो सच नही मिथ्या है। लेकिन अभिनव गुप्त इसे स्वीकार नही कर सकते क्योंकि वे मानते हैें कि जो कुछ है भले ही माया हो, आभास मात्र हो, शिव की ही रची लीला है और इसलिए शिव का ही रूप है। केवल मैं शिव का रूप नहीं हूं, मेरे चारों ओर का विश्व भी शिव रूप ही है। यदि ऐसा नहीं होता तो शांतचित्त ब्रह्म को विश्व की रचना करनी ही क्यों पड़ी? मनुष्य भीतर से उसी आत्मन् का रूप है, शुद्ध है, लेकिन बाहर वह हर प्रकार की क्रिया में रत है, क्रियाशील है और वह विभिन्न प्रकार के अनुभवों को महसूस करता है, वैसे ही ईश्वर भी अपनी क्रियाशीलता के कारण अपने रचे प्रपंच या सृष्टि का अनुभव करता है। उसकी यह सृष्टि मिथ्या कैसे हो सकती है?

शिव चैतन्य है जो अपने चारों ओर होने वाली गतिविधि को शांत और अकर्मन्य भाव से हीं नहीं देखता रहता है अपितु उसमें सम्मिलित होता है, क्योंकि वह भी उसी का काम है। शिव अपनी चैतन्य अवस्था में नितांत शांत रहता हो तो भी वह अपने क्रिया रूप में, शक्ति रूप में सक्रिय होता है। इसलिए जो हो रहा है उसमें भी वही विद्यमान है। शिव का आत्म चैतन्य असीम आनंद का स्रोत है और यही आनंद क्रिया का स्रोत है। यह ब्रह्मंाड तभी विकसित होता है जब शिव अपनी अनुभूति का विस्तार करता है या अपना ही फैलाव करता है जिसमें हम मानव उन्हीं के अंशमात्र इस जगत में विचरण करने लगते हैं। जब शिव अपने विस्तार को समेट लेता है तो विश्व का अंत होता है। वैसे ही जैसे हमारा मन गहन निद्रा में पूर्ण शांति को प्राप्त होता है।

अपने भीतर शिव को देखने का मार्ग अवरोधों से भरा होता है। चैतन्य कई परदों अथवा कंचुकाओं में लिपटा होता है। अवरोधों को पार करके ही हम शिव अथवा परम चैतन्य के साथ एकाकार हो सकते हैें। शिव के साथ एकाकार होने के लिए पांच प्रकार के उपायों का सुझाव दिया गया है। ये वास्तव में आरोहन की सीढिय़ां ही है। पहला क्रिया उपाय कहलाता है। पूजा, प्राणायाम, आसन आदि इस उपाय के रूप हैं। दूसरा उपाय है शाक्त उपाय अथवा मानसिक ऊर्जा का साधन। इसमें शरीर से अधिक मन पर केंद्रित साधनों का उपयोग किया जाता है। तीसरा उपाय है शम्भवा अथवा इच्छा शक्ति से चैतन्य को लक्ष्य करके आगे बढऩा। हम जागृति, सुसुप्त या स्वप्न अवस्थाओं से आगे निकल कर तुरीया अवस्था में पहुंच जाते हेैं। अंतिम सीढ़ी है अनुपाय है जहां किसी उपाय की आवश्यकता ही नहीं रहती। मनुष्य धीरे धीरे शिवमय होने लगता है और उसे ऐसे लगता है कि वह स्वयं समस्त ब्रम्हांड में ही लय हो गया है। यही चैतन्य अवस्था है।

अपनी असाधारण प्रतिभा के दम पर अभिनव गुप्त न केवल तब के सभी आचार्यों के मतों और दृष्टिकोणों को एक तर्कसंगत दर्शन में बांधने में सफल हुए बल्कि उनकी प्रतिभा की झलक ज्ञान के अन्य कई आयामों में भी दिखाई पड़ती है। अपने विश्वकोशीय आकार और विस्तार के ग्रंथ तंत्रालोक के अतिरिक्त उन्होंने काव्य और नाटक आदि पर भी भाष्य लिखे। उनकी उपलब्धि कश्मीर में शैव दर्शन को सशक्त आधार और तर्कसंगत धरातल पर खड़ा करने में है। जिस समय अभिनव गुप्त कश्मीर में शैव मत का अध्ययन कर रहे थे, उस समय शैव दर्शन की चार पद्धतियां प्रचलित थीं। क्रम, कुल, स्पंद और प्रतिभिज्ञान। इनमें से दो तो वसुगुप्त से भी पहले से प्रचलित पद्धतियां थीं। कौल पद्धति और प्रतिभिज्ञान शाखा क्रमश: सुमतिनाथ और सोमानंद के नाम से जानी जाती थी। स्पंद पद्धति का श्रेय तो वसु गुप्त को ही दिया जाता है। लेकिन अभिनव गुप्त ने इन चारों को इस तरह एक दूसरे के साथ पिरोया कि वे अलग न रह कर एक विराट दर्शन के विभिन्न आयाम ही दिखते है। अभिनव गुप्त का लौकिक अंत एक रहस्यमय ढ़ंग से हुआ जब 1016 ई के आसपास कृष्ण पक्ष की रात में वे श्रीनगर के पास ही एक गुफा में अपने अनेक शिष्यों के साथ प्रवेश कर के शिवमय हो गए।