आयुर्वेद और होम्योपैथी

डॉ. देवी दत्त जोशी
लेखक चेयरमैन हैं नवयोग होम्योपैथी शोध संस्थान, रनकपुर, उत्तराखण्ड
आधुिनक युग में भारतीय चिकित्सा विज्ञान की ओर विश्व का ज्ञान आकर्षित हो रहा है। आयुर्वेद से लेकर योग, ध्यान,एक्यूप्रथर एक्यूपंचर, सुजोग, रेकी, न्यूरोथेरेपी, रिफलेक्शोलोजी आदि आदि कहीं न कहीं प्राचीन ऋषि मुनियों (जो वैज्ञानिक व चिकित्सक हुआ करते थे) के अनुभव और शोध के परिणाम थे। विदेशी आक्रमणकारियो ने भारत की धन सम्पदा को ही नहीं लूटा यहॉ के ज्ञान को लेटा भी है और नष्ट भी किया है। नालंदा और तक्षशिला जैसे नौ श्रेष्ठ विश्वविद्यालय भारत में थे जिन्हें नष्ट भी किया और आग के हवाले भी किया। इतने विश्व विद्यालय बनने में कितने वर्ष लगे होगें इसका आकलन करने की आवश्यकता है। उ स समय के ऋषितुल्य वैज्ञानिकों व चिकित्सकों में भौतिक विकास से अधिक ज्ञान,विज्ञान के साथ आध्यत्म की ओर अधिक ध्यान दिया जिसके परिणाम स्वरूप वसुधैव कुटम्बकमश् व श्सर्वे सन्तु निरामयश् का भाव जगे व शन्ति का मार्ग प्रशस्त हो, जन-जन में सहिष्णुता पनपे। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान जहॉ रोग का कारण वाहय कीटाणु, विषाणु अथवा भौतिक रसायन पर ध्यान केन्द्रित करता है वहीं भारतीय चिकित्सा विज्ञान मन, विचार, कर्म, काम, क्रोध, लोभ, मोह को रोग का कारण मानता है। मन के विचलित होने से विचारों के दूषित होने से, काम क्रोध, लोभ,मोह से शरीर के पाचन तंत्रा, कोशिका आदि में उत्पन्न विकार के परिणामस्वरूप अनेक प्रकार के मल के भक्षण के लिये कीटाणु व विषाणु उत्पन्न होते है जिन्हें हम रोग का कारण मान बैठते है।
अपनी बात मन से आरम्भ करते हैं। विश्व में सबसे गतिमान मन है, मन में विचार उत्पन्न होते हैं, विचार अच्छे भी हो सकते हैं बुरे भी जैसे विचार होंगे वैसे कर्म होंगे अच्छे कर्म मन में शान्ति और बुरे कम मन में अशान्ति का भाव जगायेंगे। शान्ति से प्राण ऊर्जा में सकारात्मक विचार उत्पन्न होंगे और अशान्त से नकारात्मक। नकारात्मक उर्जा ही शरीर में रोग का मूल कारण है। यह आध्यात्मिक विचार है, प्रयोगशाला में इसे सिद्ध करना कठिन है। भारतीय संस्कृति में विज्ञान के साथ आध्यात्म को जोड़ा गया अतः मन पर संयम का चिन्तन अधिक किया गया। संयम अर्थात् अनुशशन, संयम नहीं होगा तो काम क्रोध, लोभ-मोह में वृद्धि होगी ऐसे में शान्ति प्राप्त नहीं हो सकती परिणामस्वरूप लोग सदैव दुःख, क्लेश और तनाव से ग्रसित रहेंगे। प्राचीन काल से आधुनिक काल तक रोगों का मूल कारण यही है। वर्तमान में मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक इस पर गम्भीर चिन्तन कर रहे है।
हमारे दुष्कर्म हमारे दुःख को सबसे बड़ा कारण है। यदि हम सुख शान्ति चाहते हैं तो दूसरों को सुख देना सीखना होगा। हम अपने दुःख से उतने दुःखी नही होते जितना दूसरों को सुखी देखकर दुःखी होते है। प्रयास, साहस संयम और ईश्वर की कृपा से दुःख सुख में बदल सकता है। हमारे मन में किसी के प्रति ईष्यों का भाव जगता है, हमारे मन में उसके प्रति बरे विचार उत्पन्न होते है, जैसे विचार होंगे वैसे कर्म होंगे, हम जानते है हमारे विचार गलत है, कर्म गलत है फिर भी स्वार्थवस हम ऐसा करते है वहीं से रोग आरम्भ हो जाता है क्योंकि हमारी जीवन शक्ति, प्राण उर्जा कमजोर पड़ती है तब बाहरी कारण को हम रोग का कारण मान बैठते है। ऐसे में रोग शरीर के किस अंग को प्रभावित करेगा कहा नहीं जा सकता। सामान्य सिर दर्द से लेकर गम्भीर हदय रोग, रक्तचाप मधुमेह, पेट के अल्सर आदि आदि अनेक रोगों का कारण हमारा मन है। मन विचलित है, मन में अवसाद है, चिन्ता है दुःख है, ईष्यों है आदि आदि गम्भीर रोग के कारण है। तुलसीदास जी ने कहा है पर उपदेश कुशल बहुतेरे, विचारों की क्रियान्वय करना कितना कठिन है यह इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है यही कटु सत्य है कि उपदेशक स्वयं इसका पालन नहीं करता तो वह रोगी ही है। इस भौतिकतावादी युग में क्या हम शरीर को भौतिक रयासन का अंग मान सकते हैं, क्योंकि मन, प्राण कोई भौतिक वस्तु नही, विचार कोई भौतिक वस्तु नहीं जो शरीर को प्रभावित करते है इसलिये विज्ञान के साथ आध्यात्म की आवश्यकता है।
आधुनिक युग में होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति काफी प्रचलित है जिसकी खोज जर्मन के एक श्रेष्ठ एलोपैथिक चिकित्सा डा. सेम्यूल हेनिमेन ने लगभग दो सौ वर्ष पूर्व किया। यदि आज के युग में यह शोध हुआ होता तो हेनिमेन चिकित्सा के क्षेत्रा में नोबुल पुरस्कार के हकदार होते क्योंकि उन्होंने मात्रा एक रोग विशेष पर नहीं वरन एक पूर्व नई चिकित्सा पद्धति की खोज की। उनके द्वारा बनाई गयी। औषधियां आज भी उतनी ही कारगर है, जिनके काई दुषप्रभाव शरीर में नही पड़ते। उनके शोध पत्रा जब प्रकाशित होते थे तो अनेक चिकित्सक उनका विरोध करते परिणामस्वरूप उन्हें जर्मन छोड़ना पड़ा फ्रांस में नेपोलियन ने उन्हें शरण दी और पेरिस में रहकर उन्होंने जीवन पर्यन्त शोध करके एक नयी चिकित्सा पद्धति को जन्म दिया। उनके घोर विरोधी अमेरिका के डा. केन्ट आगे चलकर उनके शिष्य बन गये और होम्योपैथी में डा. हेनिमेन के बाद सर्वश्रेष्ठ शोधकर्ताओं में उनका नाम है।
होम्योपैथी सिद्धान्त के अनुसार शरीर में कृत्रिम रोग जो मूल रोग से अधिक शक्तिशाली हो, को प्रवेश करा कर रोग समाप्त किया जाता है। पुरानी कहावतें भी है लोहे को लोहा काटता है, जहर को जहर मारता है , विष विषस्य औषधम्। आयुर्वेद में समः यम समयति का सिद्धान्त वर्णित है होम्पोपैथी में यही लॉ ऑफ सिमिलर्स बना जिसे डॉ. सेम्यूल हेनिमेन ने प्रतिपादित किया। कुनैन जो कभी मलेरिया की रामबाण औषधि के रूप में प्रचलित थी, उसमे हेनिमेन को यह लक्षण दिखाई दिेये जो मलेरिया बुखार में प्रकट होते है अर्थात् यदि कुनैन को स्वरूप व्यक्ति को दिया जाय तो उसे जाडा, बुखार और पसीने के लक्षण प्रकट होंगे। उन्होंने इसे अपने में आजमाया और लग गये नये शोध में जिसका परिणाम होम्पपौथिक चिकित्सा पद्धति है। अभी दिनों पूर्व मुझे गोरखपुर गीता प्रेस से प्रकाशित कल्याण का पुराना अंक अपने मित्रा श्री धीरेंद्र खर्कवाल जी के यहाँ पढ़ने को मिला जिसमें से एक लेख का कुछ अंश इस प्रकार हैः-
मनुष्य यदि अविधिपूर्वक किसी पदार्थ का सेवन करे तो उससे उसे रोग होने की सम्भावना होती है परन्तु विधि पूर्वक आयुर्वेद के अनुसार उसे ग्रहण किया जाय तो वही वस्तु रोगनाशक होती है इसी सिद्धान्त को प्रतिपादन श्रीमदभागवत 1-5-33 मे नारद व्यास संवाद के इस प्रसंग मे हुआ-
अमयो पश्य भूतानां जायते येन सुब्रतः
तदेव हचामयं द्रव्यं न पुनाति चिकित्सितम्।।
अर्थात्- प्राण्यिों को जिस पदार्थ के सेवन से जो रोग हो जाता है वही पदार्थ चिकित्सा विधि के अनुसार प्रयोग करने से क्या उस रोग को दूर नही करता अर्थात करता है।श्श्
क्या यही होम्पोपैथिक सिद्धान्त है? आयुर्वेद में यह सिद्धान्त कब से प्रतिपादित है? खरल में औषधि को घर्षण रगड़ से शक्तिकृत करने की आयुर्वेद की पद्धति क्या होम्योपैथिक सिद्धान्त पर औषधि निर्माण की प्रक्रिया का आरम्भ नहीं था? इससे तो यही लगता है कि होम्योपैथिक सिद्धान्त का प्रतिपादन अत्यन्त प्राचीन काल से था परन्तु वर्तमान में होम्योपैथिक औषधि के निर्माण व शोध का श्रेय निश्चित रूप से डा. सेम्यूल हेनिमेन को ही जाता है।
एक समय में भारतीय संस्कृति, मन, विचार, कर्म, काम, क्रोध, लोभ-मोह के परिणामस्वरूप रोग का आरम्भ और उसके पश्चात विषाणु-कीटाणु का शरीर में प्रवेश की बात करती है। डा. हेनिमेन ने भी होम्योपैथिक औषधि के शोध में मन, विचार और कर्म को महत्वपूर्ण स्थान दिया है। स्वयं पर और अपने मित्रो, शिष्यों आदि पर औषधि का प्रयोग कर शरीर में उत्पन्न लक्षणों को भिन्न भिन्न व्यक्तियों में मित्रा प्रकार के लक्षणों का संग्रह कर मेटीरिया मेडिका तैयार की। रोग के लक्षण शरीर में जो थे वह थे परन्तु उससे महत्वपूर्ण था उनके मन, विचार और क्रियाओं के लक्षणों का भिन्न भिन्न होना।
यही कारण है कि कोई भी होम्योपैथ रोग के साथ रोगी के मानसिक लक्षणों पर विशेष ध्यान देता है। आज चिकित्सा विज्ञान कितना ही विकसित हुआ हो रोग, सदैव चुनौती के साथ खड़ा दिखता है। अतः मतभिन्नता के पश्चात भी इस लेख के माध्यम से मेरा सुझाव है कि उपरोक्त चिकित्सा पद्धतियों जिनका आरम्भ मे उल्लेख किया गया है, के अलग-अलग मडिकल कालेजों में अलग अलग विभाग आरम्भ कर इन्हें भी शोध का अवसर दिया जाना चाहिये। अन्त में पागल कुत्ते के काटे से उत्पन्न रोग रेबीज में होम्योपैथिक औषधि हाइड्रोफोवबनम लाभ पहुँचा सकती है।