आज के युग में महर्षि दयानंदका जीवन-दर्शन

Maharishi Dayanand Saraswati_Arya samajपं. राजेन्द्र जिज्ञासु
लेखक आर्यसमाजी विद्वान हैं।
झुग्गी झोपड़ी में रहने वाला सर्वथा निरक्षर व्यक्ति भी विज्ञान तथा विज्ञान के आविष्कारों से लाभान्वित होने की उत्कट इच्छा रखता है। विज्ञान की सामान्य सी जानकारी रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति, भले ही वह किसी देश व जाति से सम्वंध रखता हो, यह जानता व मानता है कि विज्ञान के नियम नित्य, अनादि व सार्वभौमिक हैं। पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण का सिद्धान्त तभी से है जबसे पृथ्वी है। न तो इसेे किसी ने बनाया, न इसका कभी आविष्कार किया गया और न इसे किसी ने गढ़ा। यह सदा से है और सदा रहेगा। यह अजन्मा है, नित्य है और अनादि व सार्वभौमिक है। यह घिसेगा भी नहीं, न बूढ़ा होगा और न ही घटेगा और न ही बढेगा। यह तीनों कालों में रहने वाला सत्य है। इसे ही विज्ञान की भाषा में नित्य कहा जाता है।

सृष्टि को धारण करने वाले सभी नियम नित्य हैं। संसार के अन्य अन्य देशों व जातियों के लिये यह मान्यता एक नई खोज हो सकती है। वेदाभिमानी ऋषि सन्तान के लिए यह कोई नई खोज नहीं है। महर्षि दयानन्द के साहित्य में सृष्टि के नित्य, अनादि सार्वभौमिक नियमों की जितनी चर्चा है उतनी विश्व के किसी भी विचारक, सुधारक, वैज्ञानिक के ग्रन्थों में नहीं मिलेगी। मानव जाति के उत्थान, निर्माण और कल्याण की चर्चा के प्रसंग में महर्षि बारम्बार नित्य, अनादि व सार्वभौमिक शब्दों का प्रयोग करते हैं। यही उनके जीवन दर्शन की विशेषता व विलक्षता है। आज अतीत के महापुरुषों के विचारों की आधुनिक युग में प्रासंगकिता पर व्याख्यान करवाये जाते है, लेख लिखवाये जाते हैं। परंतु महर्षि दयानन्द के जीवन दृष्टिकोण की वर्तमान काल में प्रासंगिकता का प्रश्न उठाना ही अप्रासंगिक व निरर्थक है। क्या कभी किसी यक्ति ने यह प्रश्न उठाया है कि आज के युग में जल, वायु, अग्नि, सूर्य, भोजन, चन्द्र, आदि की क्या प्रासंगिकता है? किसी ने दो जोड़ दो चार होने, कार्य कारण सिद्धान्त, गति के सिद्धान्त की आज के युग में प्रासंगिकता को चर्चा का विषय बनाया है? जो जन्मा है सो मरेगा और जो बना है सो टूटेगा, इस नित्य सिद्धान्त की प्रासंगिकता पर कभी किसी ने कभी प्रासंगिक-अप्रासंगिक होने का विवाद छेड़ा है?

महर्षि दयानन्द ने बार बार इस बात को दोहराया है कि वे वेद की नित्य, अनादि, सार्वभौमिक विचारधारा को मानते हैं। यह बात पुरानी होने पर भी नित्य नई है। संसार में दो प्रकार के नियम कार्य करते हैं। एक वे नियम हैं जिन्हें ईश्वर ने बनाया है। जिन्हें सृष्टि-नियम या प्रकृति का नियम कहा जाता है। इसमें अदल-बदल या घटने, मिटने व बढ़ने का प्रश्न ही नहीं उठता। दूसरे वे नियम हैं जो मनुष्य अपने लिये बनाता हैं। मनुष्यकृत नियम कितने भी सोच समझ कर बनाये जायें वे बदलते व निरस्त होते रहते हैं। परमात्मा पूर्ण है। वह सर्वज्ञ है। उसका ज्ञान उसके कर्म, उसकी कृतियाँ भी निर्दोष हैं। मनुष्य अल्पज्ञ है अतः उसके ज्ञान व कर्म में न्यूवता व दोष के कारण सुधार की सदा आवश्यकता रही है व रहेगी।

महर्षि दयानन्द के जीवन दृष्टिकोण की प्रासंगिकता का प्रश्न उठाने वाले यह जान लें कि उनके विचार के अनुसार ईश्वर पहले आविष्कार करता है, फिर आवश्यकता पड़ती है। जैसे, सूर्य पहले बना, देखने वाले प्राणियों के शरीर बाद में बनाये गये। अन्न, फल, दूध देने वाले पशु, जल, वायु, व अग्नि पहले बनाये गये। इनका सेवन व प्रयोग करने वाले बाद में बनाये गये। प्राणियों के निवास के लिये भूमि पहले बनाई गई, इनमें रहने वाले मनुष्य व प्राणी जगत बाद में उत्पन्न किये गये।

परन्तु मनुष्यों के लिये जलयान व वायुयान आदि मनुष्यकृत अविष्कार सब मनुष्यों की आवश्यकता को देखकर मनुष्य ने आविष्कृत किये। सब मशीनें, सब औषधियाँ और ब सुख सुविधायें जो मनुष्य के उपयोग प्रयोग में आती हैं, उनका अविष्कार आवश्यकता पड़ने पर होता है। महर्षि दयानन्द के जीवन-दर्शन के महत्व को जानने के लिये यह जानना आवश्यक है।

सारा विश्व यह मानता था ग्रह, उपग्रह, सूर्य, भूमि आदि गति नहीं करते। महर्षि दयानन्द ने बलपूर्वक कहा कि ग्रह, उपग्रह गति न करें तो आकाश में टिक ही न सकें। मेरे बाल्यकाल में हमें रटाया जाता था ‘दि सन इज स्टेशनरी’ अर्थात सूर्य निश्चल है। महर्षि दयानन्द जी ने वेद ऋचाओं के प्रमाण देकर यह सिद्ध किया कि सूर्य व पृथ्वी आदि सब गति करते हैं। अब सारा विश्व यह नित्य सत्य स्वीकार कर रहा है। ‘दो कुरान‘ ग्रन्थ के लेखक मूर्धन्य इस्लामी विद्वान र्दाशनिक ने इस ग्रन्थ के पृष्ठ 284 पर डंके की चोट से लिखा है कि यह तो कुरान में भी स्वीकार किया गया है।

महर्षि दयानन्द ने लिखा व कहा कि ईश्वर, जीव व प्रकृति तीनों अनादि हैं। यह सदा से हैं। इन्हें किसी ने पैदा नहीं किया। कुछ विचारक जगत को मिथ्या मानते थे कुछ ईश्वर को नहीं मानते थे और कुछ जीव की सत्ता को नहीं मानते थे। अब विज्ञान की घोषणा है ‘मैटर कैन नाइदर बी क्रिएटेड नॉर बी डिस्ट्रायड’। यह महर्षि का दिग्विजय है कि विज्ञान ने प्रकृति को अनादि मान लिया है। प्रकृति नष्ट नहीं होती। विज्ञान की यह घोषणा महर्षि के दृष्टिकोण को नमन नहीं तो और क्या है? महर्षि ने कार्य कारण सिद्धान्त को जगत के सामने रखा। अब सब यह मानते हैं कि प्रत्येक कार्य का एक कारण है और प्रत्येक कारण का एक कार्य। यही कर्म फल सिद्धान्त है। तीर्थ यात्रा, नदी स्नान से, गुरू कृपा से, पैगम्बरों की सिफारिश से पाप क्षमा होने या स्वर्ग में जाने व मुक्ति पाने की बात भी गई। जो कर्मफल सिद्धान्त, व पाप क्षमा न होने की महर्षि दयानन्द ने घोषणा की, वह भी संसार को अब माननी पड़ रही है। डा. गुलाम जेलानी ने लिखा है कि पाप क्षमा नहीं होते, सृष्टि नियम विरुद्ध कोई चमत्कार नहीं होते। ईश्वर की दया व न्याय का प्रयोजन एक ही है। इस युग में महर्षि दयानन्द व उसके शिष्यों को इन सिद्धान्तों के लिए मौखिक व लिखित शास्त्रार्थ करने पडे़।

प्रभु सर्वव्यापक है। वह कण कण में है। हर मन में है। हर जन में है। लोग उसे सागर में, कैलाश पर्वत पर, तूर पर्वत पर, स्वर्ग में मानते थे। अब उसे हाजिर नाजिर माने वाले सारे विश्व में मिलेंगे। विज्ञान प्रकृति को जड़ व गतिहीन मानता है। गति का सिद्धान्त यह कहता है कि बाहर से गति दिये बिन जड़ पदार्थ गति नहीं करते परन्तु कण कण में गति है। सारा जगत ग्रह उपग्रह सब गति करते है। इन्हें कौन गति देता है? महर्षि ने कहा वेद के जगत शब्द से सिद्ध है कि यह गति करता है। ईशावास्य मन्त्रा में कहा गया है – प्रभु जगत के भीतर बाहर व्यापक है वही उसे गति देते है परन्तु स्वयं गति नहीं करता। क्यों गति नहीं करता? गति एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने को और जहाँ न हो वहां आने को कहा जाता है। यह विज्ञान की मान्यता है। सर्वव्यापक ईश्वर जायेगा कहां और आयेगा कहां? यह ऋषि की घोषणा है।

संसार में परमात्मा के आने की कल्पना भी मिथ्या सिद्ध हो गई। क्षण भर में होरोशिमा व नागासाकी में ंलाखों का संहार हो गया। भगवान क्या कहीं जन्मा? कहीं आया? वह तो सर्वत्रा है सो आने जाने की बात मिथ्या सिद्ध हो गई।

जहाँ क्रिया है, वहां कर्ता अवश्य होगा और जहाँ कर्ता होगा वहीं क्रिया होगी। सारे ब्रहाण्ड में क्रिया व गति ईश्वर की सत्ता को सिद्ध कर रहे हैं। जहाँ नियम हैं वहां नियन्ता होगा। विश्व नियमों में बँधा है। नियमों मे बंधा न हो तो विज्ञान में शोध का क्या अर्थ? अमरीका की वैज्ञानिक खोज का भारत व भारत के वैज्ञानिकों की खोज का लाभ पश्चिम उठाता है। जो नियम यहां हैं, वही चीन में व जापान मंें हैं। ईश्वर के अटल सृष्टि नियमों से सन्ध्या पद्धति में ऋषि ने बताया कि प्रभु के वश में विश्व है। जो कहते हैं, भक्तों के वश में भगवान हैं, वे भूकम्प व सुनामी अथवा महामारी रोक के तो दिखा दें। जब ईश्वर के नियम अटल है तो चमत्कार सम्भव ही नहीं।

जगत को मिथ्या मानकर जगत के उद्धार की विश्व शन्ति, विश्व कल्याण की बात का क्या अर्थ? फिर जगद्गुरु शब्द का क्या अर्थ हुआ? जब जगत ही मिथ्या है तो जगद्गुरु कैसे सच्चा हो सकता है। वह झूठ का गुरु मानना पडे़गा। महर्षि का दृष्टिकोण सिर पर चढ़कर बोल रहा है। विभिन्न प्रकार के विश्व सम्मेलन – विश्व हिन्दू परिषद्, विश्व पंजाबी सम्मेलन, यही सिद्ध करते हैं कि विश्व का अस्तित्व है। भले ही यह परिवर्तनशील है परन्तु, इसे मिथ्या कोई नही मानता। यह आज के युग में महर्षि दयानन्द की वैचारिक विजय है।

ऋषि ने कहा कि जीव कर्म करने में स्वतंत्रा है, फल भोगने में ईश्वर की व्यवस्था के अधीन है। पाणिनि मुनि का सूत्रा है स्वतंत्राः कर्ता। महर्षि दयानन्द जी ने पूरे विश्व से पाणिनि ऋषि का यह सिद्धान्त मनवा दिया है। पूरे विश्व में न्यायपालिका कर्ता को स्वतंत्रा मानकर फांसी आदि दण्ड देती है। कभी मदीना में, करांची में, काहिरा में, लंदन में किसी अपराधी ने कहा है कि शैतान को फांसी दण्ड दो या कारागार में भेजो। वही पाप करवाता है। मैं तो स्वतंत्राः कर्ता नहीं हूँ। यह है महर्षि दयानन्द की वैचारिक विजय।

स्वर्ग, नरक, दोजख, बहिश्त कहां चले गये? महर्षि दयानन्द ने बताया जहाँ प्रेम है, सत्य है, न्याय है वहां स्वर्ग है और जहाँ द्वेष है, क्लेश है, दाह है, दुष्कर्म हैं वहां नरक है।

महर्षि ने वेद आदि के आधार पर घोषणा की कि आदि सृष्टि के मनुष्य युवा पैदा हुए। अनेक स्त्रिायाँ व पुरुष बिना माता पिता के (भूमि के गर्भ से) जन्मे। आज अमैथुनी सृष्टि का सिद्धान्त विश्व मान रहा है। आदम हौआ के माता पिता कौन थे? अमरीका से प्रकाशित बाइबल के नये संस्करण में अनेक स्त्राी पुरुषों के पैदा होने की बात मानी गई है। वे सब युवा थे, तभी तो स्वर्ग में विचरण कर रहे थे। वे शिशु नहीं थे तभी तो उनके नंगेपन पर लज्जा आई। बच्चे तो नंगे घूमते रहे हैं।

ईश्वर ने उद्यान में मनुष्य को बनाया। यह बाइबल की मान्यता है। वहां बूचड़ों की दुकानें नहीं थी। न ही होटल थे। उन्हें दूध, फल व वनस्पतियों के सेवन का आदेश था। मनुष्य मांसाहारी प्राणी के रूप में नहीं बनाया गया था। इससे शाकाहार के सिद्धान्त को भी चुपके से संसार मानने पर विवश हो रहा है।

संसार में सूर्य, चन्द्र, जल, वायु व अग्नि सब पुराने हैं। क्या इनके पुरानेपन से इनकी उपयोगिता समाप्त हो गई या घट गई? महर्षि दयानन्द का सन्देश-उपदेश यह है कि ईश्वरीय सन्देश-उपदेश, सृष्टि नियम, आत्मा के लिये सद्ज्ञान कभी पुराना नहीं होता। अहिंसा सत्य, सन्तोष, अपरिग्रह आदि यम, नियम कभी पुराने व अनुपयोगी नहीं हुए, न होंगे। सृष्टि का एक भी नियम आज तक नहीं टूटा। अनादि नियम कभी भूतकाल का विषय नहीं होते। चर्म चक्षुओं के लिए ईश्वर का दिया सूर्य आज भी प्रासंगिक है। ठीक इसी प्रकार भीतरी आँख अर्थात् बुद्धि के लिए दिया सदज्ञान वेद भी आज और आगे भी मनुष्यों का कल्याण करता रहा। ईश्वर ने मनुष्यों की प्रत्येक आवश्यकता की पूर्ति के लिए यह विशाल जगत दिया तो क्या इस जगत की उपयोगिता बताने के लिए, इसके प्रयोग की विधि सिखाने के लिए अपना विधान, अपना ज्ञान नहीं देना था? महर्षि दयानन्द की यह मान्यता है कि प्रभु ने आदि सृष्टि में वेद ज्ञान दिया। बाइबल भी यही मानता है कि शब्द ज्ञान आदि सृष्टि में था। वेद आदि शास्त्रों में तथा भारतीय ऋषियों के दर्शन ग्रन्थों में इस सिद्धान्त को प्रतिपादित किया गया है कि अभाव से भाव नहीं हो सकता और भाव से अभाव नहीं हो सकता। महर्षि दयानन्द जी ने इस युग में इस आर्ष मान्यता का अकाट्यों तर्कों से व शास्त्राीय प्रमाणों से प्रबल समर्थन किया।

आपने मानव समाज को यह समझाया कि घड़ा जब फुटता है तो मिट्टी में मिल जाता है और मिट्टी से फिर नया घड़ा बनाया जाता है। पुराने मकान ढहते हैं तो मिट्टी बन जाते हैं उसी मिट्टी उपादान कारण से फिर नये मकान बनाये जाते हैं। नया उपादान कारण कहीं से नहीं आता। इसी प्रकार जीवों का भी मरण व पुनर्जन्म होता रहता है। जीव अमर है। नये नये जीव कहीं से नही आते। यह आवागमन का चक्र चलता रहता है। रात से प्रभात व प्रभात से रात हो जाती है। सूर्य अस्त होता है, चाँद तारे निकल आते हैं। फिर सूर्य चाँद क्या नहीं निकलते? बर्फ से जल व जल से बर्फ बनती रहती है। क्या यह जड़ पदार्थों का पुनर्जन्म नहीं है? पश्चिमी विद्वान् भी खुलकर मृत्यु के उपरान्त जन्म का सिद्धान्त मान रहे हैं। छह दिन से सृष्टि रची गई। चौथे दिन सूर्य बनाया गया। इन बातों को अब कौन सत्य सिद्ध कर सकता है? छह दिन में तो टमाटर भिण्डी भी पैदा नहीं होती। महर्षि दयानन्द के दर्शन ने, चिन्तन ने लोगों की सोच बदल दी।