अहिल्याबाई : जिन्होंने कराया मंदिरों का जीर्णोद्धार

आनंद कुमार
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।


दिल्ली के प्रमुख स्थलों में से एक नेहरु प्लेस के प्रसिद्ध बाजार का इलाका कालकाजी नाम से भी जाना जाता है। वहाँ मौजूद एक मंदिर की वजह से इस इलाके का नाम कालकाजी है। सम्राट अशोक के काल में भी इस इलाके में मंदिर के होने का जिक्र मिलता है लेकिन औरंगजेब के फरमान पर सितम्बर 1667 में इसे तोड़ दिया गया था। इस्लामिक कट्टरपंथी औरंगजेब की मौत के फौरन बाद 1707 में इसे फिर से स्थानीय लोगों ने बनवाना शुरू किया था। जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पड़े इस मंदिर को मराठाओं ने फिर से बनवाया। मराठा दस्तावेज 1738 में इसके जीर्णोद्धार का सबूत देते हैं। इसे फिर से बनवाने वाली थीं राजमाता अहिल्याबाई होल्कर।
उनके सम्बन्धी-रिश्तेदार और उन्हें जानने वाले उनके बारे में क्या कहते थे, वहां से शुरू करें, उनके दौर के कवि और लेखक उनके बारे में क्या कहते थे वो बताएं, या विदेशियों की उनके बारे में क्या राय थी, इसपर गौर करें? राजमाता अहिल्याबाई होल्कर की बात हो तो बात शुरू कहाँ से हो, ये भी एक बहुत बड़ा सवाल होता है। मुगल साम्राज्य का अंतिम दौर वो काल था जब हिन्दुओं पर होते अत्याचार अपने चरम पर थे। मुगलों की अपनी पारिवारिक लड़ाइयाँ, विदेशों से आते मलेच्छ हमलावर और भारत के राजाओं के परस्पर युद्ध, इन सबने भारत की दुर्दशा कर दी थी।
ऐसे ही दौर में कई मराठा सरदार, राजा शिवाजी के सपनों के हिन्दू-पादशाही को कदम दर कदम आगे बढ़ा रहे थे। जामखेड (महाराष्ट्र) के इलाके में जब राजमाता अहिल्याबाई होल्कर का जन्म हुआ (31 मई 1925) तब मालवा प्रान्त में मल्हार राव होल्कर का सामथ्र्य बढ़ रहा था। मल्हार राव होल्कर बाजीराव पेशवा की सेवा में एक बड़े सरदार थे और राजमाता अहिल्याबाई होल्कर के पिता मानकोजी शिंदे एक छोटे से गाँव के पाटिल (प्रधान)। पुणे जाने के रास्ते में उनके गाँव चूंदी से गुजरते मल्हार राव होल्कर की नजर मंदिर में पूजा करने आई अहिल्याबाई पर पड़ी और उसी समय मल्हार राव ने अपने पुत्र के लिए अहिल्याबाई को वधू चुन लिया।
इंदौर को एक छोटे से गाँव से बढ़ा कर आज जैसा स्वरुप देना हो या करीब तीस साल के शांतिपूर्ण शासन की व्यवस्था, राजमाता अहिल्याबाई होल्कर को कई चीजों के लिए याद किया जा सकता है। मल्हार राव होल्कर को उनपर जैसा भरोसा था, वो भी आश्चर्यजनक लग सकता है। उनकी एक चिट्ठी के हिस्से कई जगह उद्धृत होते रहते हैं, इसमें वो अहिल्याबाई को चम्बल पार कर के ग्वालियर की तरफ बढऩे के आदेश दे रहे होते हैं। चिट्ठी में बड़ी तोपों और उनका पर्याप्त गोला-बारूद रखने के आदेश हैं। कितनी देर रास्ते में रुका जा सकता है, वो तो बताया ही गया है, साथ ही रास्ते की निगरानी चौकियों की व्यवस्था भी दुरुस्त करने के आदेश हैं।1
सन 1754 में राजा सूरजमल जाट के विद्रोहों को कुचलने के लिए मुगलों ने कई संधियाँ की थी। उसी के सिलसिले में मुग़ल बादशाह अहमद शाह बहादुर की सेनाओं के साथ मिलकर खांडेराव होल्कर भी भरतपुर के कुम्हेर किले की घेराबंदी कर रहे थे। घेराबंदी के दौरान खुली पालकी में सेना का निरिक्षण करते समय एक तोप का गोला उन्हें आ लगा। घायल खांडेराव बच नहीं पाए। उनकी मृत्यु के 12 साल बाद 1766 में मल्हार राव होल्कर की भी मृत्यु हो गई। मल्हार राव के बाद उनके पोते, यानि खांडेराव के इकलौते पुत्र मालेराव होल्कर का राजतिलक हुआ लेकिन अप्रैल 1767 उनकी भी मृत्यु हो गई और मालवा फिर से शासक विहीन हो गया।
बरसों पहले ही बालिका अहिल्याबाई की क्षमताओं को पहचान चुके मल्हारराव होल्कर अपने जीवन के अंतिम वर्षों में राजमाता अहिल्याबाई को शासन संभालने के लिए तैयार करते रहे थे। सेना संभालने और मोर्चों पर नेतृत्व का भी अब तक राजमाता को अच्छा अनुभव हो चुका था। लिहाजा उन्होंने पेशवा के दरबार में मालवा का शासन खुद देखने का पत्र भी भेज दिया। ऐसा नहीं था कि उनके शासन संभालने का कोई विरोध नहीं हुआ। जैसा कि राजनीति में होता है, उनके विरोधी भी मौजूद थे। मगर इतने दिनों में राजमाता ने सेना का समर्थन हासिल कर लिया था और मल्हारराव के गोद लिए हुए बेटे तुकोजीराव होल्कर को सेना की प्रमुख कमान सौंप कर उन्होंने राजगद्दी संभाल ली।
इंदौर को उन्होंने ही गाँव जैसी हालत से नगर बना दिया था इसलिए वहां का हवाई अड्डा भी उनके नाम पर है और विश्वविद्यालय भी। वे इंदौर से नहीं बल्कि माहेश्वर से शासन देखती थीं। अपनी राजधानी उन्होंने नर्मदा की ओर खिसका ली थी। आज जो उनकी तस्वीरें उपलब्ध होती हैं उनमें वे एक शिवलिंग हाथ में लिए नजर आ जाती हैं। उनके शिवभक्त होने का एक प्रमाण ये भी है कि उनके दस्तावेजों पर ‘श्री शंकर’ के साथ उनके हस्ताक्षर मिलते हैं। उनके काल के ही नहीं बाद के इतिहासकार भी उन्हें दार्शनिक प्रवृति का मानते हैं। जॉन कीय उन्हें ‘द फिलोस्फर क्वीन] यानि दार्शनिक रानी घोषित करते हैं।
उनकी तारीफ में एनी बेसेंट ने काफी लिखा है तो जवाहरलाल नेहरु भी अपनी डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया में उनकी प्रशंसा करते मिलते हैं। उनके दरबार में मराठी कवि मोरोपंत, संस्कृत के जानकार कौशली राम प्रश्रय पाते थे तो आनंदफंडी भी थे। अपने राज्य को शांतिपूर्ण शासन देने में उन्हें भले ही कामयाबी मिली हो, लेकिन ये दौर ऐसा था जब लगातार इस्लामिक आक्रमणों में मंदिर तोड़े गए थे। हिन्दुओं की स्थिति भारत में बहुत अच्छी नहीं थी। ऐसे दौर में राजमाता अहिल्याबाई होल्कर ने मंदिरों का पुन: निर्माण कराना शुरू करवाया। ये उनका राजकीय खर्च भी नहीं था, यानि प्रजा पर कर बढ़ा कर मंदिर नहीं बनवाए जा रहे थे। राजमाता की अपनी जमीनों से होने वाली आय से इन मंदिरों को बनवाया जाता था।
भारतीय संस्कृति कोश के मुताबिक उनके करवाए निर्माण काशी, गया, सोमनाथ, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, कांची, अवन्ती, द्वारका, बद्रीनारायण, रामेश्वर और जगन्नाथपुरी में हैं। महाराष्ट्र और मालवा के क्षेत्र में उनके बनवाये सैंकड़ो तालाब और धर्मशालाएं भी हैं। शेरशाह सूरी की ही तरह कलकत्ता को काशी से जोडऩे वाली सड़क की मरम्मत भी उन्होंने करवाई थी। आज के तथाकथित इतिहासकार ग्रैंड ट्रंक रोड बनवाने का मुफ्त का श्रेय शेरशाह को दे देते हैं, जिसे उसने बनवाया भी नहीं था और महिला होने के कारण विदेशी परंपरा के निर्वाह के लिए राजमाता अहिल्याबाई होल्कर का नाम लेते समय हकलाने लगते हैं। भारत में तीन-चार सौ वर्ष पुराने जो भी मंदिर इस्लामिक आक्रमणों के बाद आज बचे दिखते हैं, करीब करीब हरेक के निर्माण में रानी अहिल्याबाई होल्कर का योगदान है।
जिस इकलौते क्षेत्र में उन्हें अपने शासन काल में पूरी कामयाबी नहीं मिली, वो थी भील-गोंडो की समस्या। अपनी शासन व्यवस्था में वो बिना दमन के भीलों और गोंड समुदाय के लोगों को कृषि से जोड़कर मुख्य धारा में लाने में पूरी तरह कामयाब नहीं हुई थीं। हाँ ये जरूर हुआ था कि उनका एक बड़ा वर्ग कृषि से जुड़ गया और अपने क्षेत्र से पार होने देने के लिए कर लेकर उन्होंने व्यापारियों को लूटना लगभग बंद कर दिया था। इस एक क्षेत्र को छोड़ दें तो उनके राज्य में कोई अव्यवस्था नहीं रही थी। वे हर रोज स्वयं दरबार में होतीं, मिलने आये फरियादियों की ही नहीं, विरोधियों की बात भी सुनती थीं।
इंदौर के निवासियों ने रानी अहिल्याबाई होल्कर के नाम पर एक पुरस्कार भी गठित किया है जो सबसे पहले नानाजी देशमुख को 1996 में दिया गया था। भारत सरकार ने भी इसी साल रानी अहिल्याबाई होल्कर के सम्मान में एक डाकटिकट जारी किया था। रानी योद्धा भी थीं और निर्मात्री भी। उनके प्रशासनिक सुधारों की गिनती भी उनके बनाये लोकहित के भवनों जैसी ही है। इन सबके बावजूद रानी अहिल्याबाई होल्कर को हमारे स्कूल-कॉलेज की इतिहास की किताबों में एक पन्ना भी नहीं मिला है। सत्तर वर्ष की अवस्था में जब उनका देहावसान हुआ तो वो आस पास के दूसरे शासकों को अंग्रेजों की धूर्तता के बारे में भी सचेत कर चुकी थीं।
राजमाता का नाम भारत में रानियों के शासन के आम होने के लिए ही नहीं, हमारे इतिहास में क्या गायब किया गया है, वो दर्शाने के लिए भी याद किया जाना चाहिए। बाकी जब अगली बार किसी पुराने तीर्थ, किसी मंदिर में जाएँ तो पूछकर देखिएगा, पूरी संभावना है कि जिस मंदिर का आप पूछेंगे, उसे भी राजमाता अहिल्याबाई होल्कर ने ही बनवाया हो।
1. मल्हार राव होल्कर का 1765 के एक पत्र से (//www.indiatogether.org/manushi/issuevwy/holkar.htm)
2. जवाहरलाल नेहरु की डिस्कवरी ऑफ इंडिया (2004), पृष्ट 304 से