अंग्रेजों की लिखी पराजय गाथा

अंग्रेजों की लिखी पराजय गाथा

बनवारी
लेखक गांधीवादी विचारक हैं।
ग्यारह जून को लखनऊ के एक समारोह में बोलते हुए गृहमंत्राी राजनाथ सिंह ने कहा कि ग्यारहवीं शताब्दी में बहराइच की लडाई में राजा सुहेलदेव पासी ने महमूद गजनवी के भतीजे को हराया था। अपने ऐसे नायकों को केंद्र बनाकर हमारे इतिहास को फिर से लिखा जाना चाहिए। इसी भाषण में उन्होंने यह भी कहा कि हमें अपने इन नायकों को जातीय दृष्टि से नहीं देखना चाहिए, बल्कि उनका राष्ट्रीय नायकों के रूप में स्मरण किया जाना चाहिए। पर क्या हम राजा सुहेलदेव पासी को एक जातीय नायक, एक क्षेत्राीय नायक और एक राष्ट्रीय नायक के रूप में एक साथ नहीं देख सकते?
अंग्रेज इतिहासकारों ने भारत के इतिहास को पराजय गाथा बना दिया है। इस इतिहास लेखन की राजनाथ सिंह ने ठीक ही आलोचना की। लेकिन अंग्रेज विद्वानों ने राष्ट्र को केंद्रीय राज्य का पर्याय बनाते हुए उसे जाति और क्षेत्रा से काटने की कोशिश की, उसकी भी आलोचना होनी चाहिए। अंग्रेज इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास को जिस तरह की पराजय गाथा में बदल दिया है उसने हमारे बौद्विक ही नहीं राजनैतिक जगत में भी गहरी स्वीकृति बना ली है। पिछले लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्राी नरेन्द्र मोदी ने कहा कि हम लगभग 1200 वर्ष गुलाम रहे हैं। किसी विद्वान या इतिहासकार ने उनकी इस गलत जानकारी पर उंगली नहीं उठाई। 1200 साल पहले सिंध हमारे हाथ से निकल गया था। पर इससे भारत की गुलामी तो किसी तरह सिद्ध नहीं हो जाती। नरेन्द्र मोदी कोई इतिहासविद् नहीं है। उन्होंने तो वही कहा जो वे यहां-वहां सुनते रहे होंगे। अंग्रेज इतिहासकारों ने जो लिख दिया वही भारतीय इतिहासकारों की लीक बन गया। उसमें यत्रा-तत्रा संशोधनों के अलावा उन्होंने कभी उनकी इतिहास-व्याख्या या इतिहास-दृष्टि को अपनी दृष्टि से, भारतीय दृष्टि से नहीं देखा।
भारत का इतिहास लिखते हुए अंग्रेज लेखक केवल षड्यंत्रा नहीं कर रहे थे। वे अपनी इतिहास दृष्टि को भारतीय इतिहास पर आरोपित कर रहे थे। अगर आप ब्रिटिश इतिहास को देखेंगे तो पाएंगे कि वह बाहरी विजेताओं से बने राजतंत्रा का ही इतिहास है। पहले वह रोमन साम्राज्य के अधीन था। रोमन साम्राज्य के बिखरने के बाद सैक्सनी से जर्मन योद्धा आए और अधिकांश स्थानीय जनसंख्या को समाप्त करके उन्होंने एक मिश्रित एंग्लो-सैक्सन जाति बनाई । फिर ग्यारहवीं शताब्दी में नार्मंडी से दस हजार सैनिक फ्रांक विलियम के नेतृत्व में आए और स्थानीय आबादी इस नये विजेता समूह की दास हो गई। उसके बाद का ब्रिटिश इतिहास इन विजेताओं से बने राजतंत्रा और समय-समय पर दूसरे क्षेत्राीय राजवंशों के संघर्ष का ही इतिहास है। लगभग ऐसी ही घटनाएं समूचे यूरोप में हुई और उन्हीं से उनका इतिहास-बोध बना है जिसे उन्होंने शेष विश्व का इतिहास लिखते हुए बाकी सब जातियों के आधुनिक शिक्षा तंत्रा से निकले लोगों की बुद्धि में आरोपित कर दिया है।
इस इतिहास-बोध को एकमात्रा लेकिन सबसे सशक्त चुनौती महात्मा गांधी ने हिंद स्वराज में दी। हिंद स्वराज के चौदहवें अध्याय में उन्होंने लिखा है, ’’फिर कोई सारा हिंद (गुलामी में) घिरा नहीं है। जो पश्चिमी शिक्षा पा गए हैं और उसके पाश में आए हुए हैं वे ही गुलामी से घिरे हैं।’’ हिंद स्वराज में ही अन्यत्रा वे भारत के किसानों की निर्भयता का उल्लेख करते हैं। जो बात गांधी जी को अपनी जातीय स्मृति के कारण सहज ही दिख गई और जो अंग्रेजों ने जानबूझकर नहीं देखी तथा हमारे अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोग जिसे देखना भूल गए हैं, वह यह है कि भारत के लोग सदा से एक स्वतंत्रा जाति रहे हैं। वे कभी यूरोपीय लोगों की तरह राजतंत्रा के गुलाम नही रहे। इसलिए सब हमारे कुछ राजाओं की पराजय के बाद देश के एक बड़े भाग में विदेशियों ने कुछ शताब्दियों के लिए अपना राजतंत्रा आरोपित कर दिया तो भी भारत के सभी लोग गुलाम नहीं हो गए।
भारतीय इतिहास को पराजय गाथा के रूप में चित्रित करने के लिए अंग्रेज इतिहासकारों ने दिल्ली में मुस्लिम राज्य के स्थापना को भारतीय इतिहास की धुरी बना दिया। इतना ही नहीं उन्होंने यह तथ्य भी ओझल रहने दिया कि भारत के कुछ राजाओं पर विजय से पहले तुर्क योद्धा, अरबों ने इस्लाम के आवेश में उत्तरी अफ्रीका से लगाकर ईरान तक जो साम्राज्य खड़ा किया था, उसे नियंत्रित कर चुके थे। उधर चीन के उत्तर में बसे खानाबदोश समूहों ने 907 में ही चीन की सेनाओं को पराजित कर दिया था और चीन का हान राज्य उत्तर से दक्षिण की ओर पलायन कर गया था। अगर आप इस व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो पाएंगे कि अरबों या चीनियों के मुकाबले भारत में इस आंधी का अधिक साहस और शौर्य से सामना किया गया।
राजनाथ सिंह का यह कहना बिल्कुल सही है कि अंग्रेज इतिहासकारों द्वारा भारतीय इतिहास का पराजय गाथा के रूप में किया गया चित्राण अनुचित है। इतिहास लेखन की इस विकृति को दूर करने के लिए नये सिरे से भारतीय इतिहास लिखा जाना चाहिए। हम भारतीय दृष्टि से इतिहास लिखेंगे तो पाएंगे कि हमारा इतिहास वृत्त पराजय से अधिक शौर्य, जय और राजधर्म की पुनर्स्थापना का वृत्त है। उसे किसी भी स्थ्तिि में बारह सौ वर्ष की या हजार वर्ष की गुलामी के वृत्त में निरूपित नहीं किया जा सकता। पिछले सात-आठ सौ वर्ष का काल देश के एक बड़े भाग के क्रमशः विदेशी आक्रांताओं के नियंत्राण में चले जाने का काल अवश्य है लेकिन इसी कालखंड में निरंतर ऐसे नायक पैदा होते रहे जो अपने समाज को और अपने क्षेत्रा को ही नहीं, वृहत्तर भारत को भी विदेशी आक्रांताओं से मुक्त करके राजधर्म की पुनर्स्थापना करते रहे।
जिस मोहम्मद गौरी की 1192 की विजय ने दिल्ली में मुस्लिम राज्य की नींव डाली उसकी उससे पहले की अनेक पराजयों का वृतांत इतिहासकारों को उल्लेखनीय नहीं लगा। मेरूतुंग ने प्रबंध चिंतामणि में विवरण दिया है कि राज्य के उत्तराधिकारी अपने शिशु पुत्रा को गोद में लिए महारानी नेकी देवी ने चालुक्य सेना का नेतृत्व करते हुए मोहम्मद गौरी को पराजित किया था। न यह शौर्य गाथा याद रखी गई, न सन् 1191 के युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को मोहम्मद गौरी पर विजय और क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए रण से भागतेे मोहम्मद गौरी को पीछे से आक्रमण कर नष्ट कर देने से इंकार कर देने का उनका शौर्य। 1192 की पृथ्वीराज चौहान की पराजय एक ऐतिहासिक मोड़ अवश्य थी, लेकिन उस पराजय से पूरा देश मुस्लिम आक्रांताओं का गुलाम हो गया हो, यह कल्पना करने लगना मूर्खता ही है।
मोहम्मद गौरी की मृत्यु के बाद 1206 में गुलाम वंश के नेतृत्व में दिल्ली सल्तनत की नींव पड़ी। पर मुस्लिम राज्य का विस्तार खिजली और तुगलक वंश के शासन के दौरान 14वीं शताब्दी के उनके विजय अभियान से ही हुआ। खिलजी वंश ने परंपरा से चले आ रहे छठे भाग को बदलकर किसानों का आधा उत्पादन सुल्तान का भाग घोषित कर दिया था। खिलजी और तुगलक सेनाओं के लौटते ही अनेक जगह भारतीय राजाओं ने फिर अपने राज्य स्थापित कर लिए। इसी क्रम में दक्षिण में श्रृंगेरी आचार्य विद्यारण्य स्वामी के मार्गदर्शन में विजयनगर राज्य की नींव पड़ी, जिसने दक्षिण के एक बड़े भाग को 1336 से लेकर 1646 तक और बाद में उससे निकले नायक-शासकों ने विदेशी अधिपत्य और उत्पीड़न से बचाए रखा। मुस्लिम इतिहासकारों द्वारा वर्णित अलाउद्दीन खिलजी की तथा कथित दिग्विजय रावल रतन सिंह के शौर्य और रानी पद्यावती के नेतृत्व में चितौड़गढ की सभी वीरांगनाओं के जौहार के सामने हीन ही सिद्ध होती है।
यह स्मरण रखना चाहिए कि मुस्लिम आक्रमणकारियों को मध्य एशिया से लगाकर अफगानिस्तान तक से निरंतर योद्धा प्राप्त हो रहे थे। इन निरंतर आक्रमण के कारण 1324 में बंगाल सल्तनत, 1347 में बहमनी सल्तनत, 1350 में अवध मुस्लिम शासन और 1349 में कश्मीर के मुस्लिम शासन की नींव पड़ी। ओडिशा में तो 1568 में जाकर मुस्लिम राज्य स्थापित हो पाया। इस तरह चौदहवीं शताब्दी के मध्य से सत्राहवीं शताब्दी के अंत तक लगभग 350 वर्ष भारत के दो तिहाई भाग से कुछ कम पर मुस्लिम शासन रहा। उसके बाद तो भारत की प्रधान राजनैतिक शक्ति मराठा हो गए थे जिनका उदय शिवाजी के नेतृत्व में 1674 में हो गया था, पर 18वीं शताब्दी तो उनके राजनैतिक वर्चस्व की गाथा ही है। इस पूरे काल में धुर दक्षिण, असम, बंगाल का एक भाग, मणिपुर आदि पूर्वोत्तर के क्षेत्रा और कश्मीर को छोड़कर अन्य पहाड़ी क्षेत्रा व बनवासी क्षेत्रा हिंदू व स्थानीय राजाओं के शासन में ही रहे। मध्य देश में राजपूत और बुंदेलों को मुस्लिम शासकों से संधियां करनी पड़ी पर अपनी प्रजा को उन्होंने मुस्लिम शासकों के नियंत्राण और उत्पीड़न से बचा लिया।
अंग्रेजों ने भारत का इतिहास लिखते हुए सिर्फ इतना याद रखा कि दिल्ली में मुस्लिम शासन स्थापित हुआ और वह चाहे बढ़ता-घटता रहा हो पर भारत के लोग उसे पलट नहीं पाए। इस पराजय गाथा से उत्पन हुए विषाद से ऊपर उठने के लिए ही अधिसंख्य भारतीय अपने घरों में महाराणा प्रताप और शिवाजी के चित्रा टांगते रहे हैं। इसी कारण से महात्मा गांधी के प्रति असीम श्रद्धा होने के बावजूद भारतीय घरों में चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह के चित्रा ही अधिक टंगे दिखाई देते हैं। इन सब नायकों के शौर्य की गाथा सुदीर्घ काल तक गाये जाने योग्य है। लेकिन हमारे इतिहास की शौर्य गाथांएं इतनी सीमित नहीं है। इन गाथाओं की सूची बहुत लंबी और बड़ी है। इतना ही नहीं जिन भारतीय राजाओं को मुस्लिम शासकों से संधि करने और अन्य हिंदू राजाओं पर चढाई करने वाली मुगल सेनाओं का अंग होने के लिए निंदित किया गया है उनके साथ भी न्याय नहीं हुआ। इस सिलसिले में सबसे अधिक अपवाद आमेर के कुशवाहा राजवंश को भुगतना पड़ा है।
राजा मान सिंह को मुगलों की ओर में महाराणा प्रताप से युद्ध करने के लिए और राजा जय सिंह को शिवाजी से युद्ध करने के लिए लांछित किया जाता रहा है। अकबर ने महाराणा प्रताप से लड़ने के लिए राजा मान सिंह के नेतृत्व में 10000 की जिस सेना को भेजा था उसमें केवल 4000 राजपूत थे और उनमें से केवल 1000 का नेतृत्व हिंदू सरदार कर रहे थे।
राजा मान सिंह पर घातक आक्रमण करने के बावजूद घायल होने पर महाराणा प्रताप युद्ध क्षेत्रा से सकुशल निकल गए, इसमें मान सिंह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहायक न हुए होते तो अकबर ने युद्ध के बाद उनसे बात करना बंद न कर दिया होता। मान सिंह या बाद में जय सिंह को लगता था कि उस समय मुगल सेनाओं से लड़कर नहीं सन्धि करके ही अपनी प्रजा की रक्षा की जा सकती है। याद रखिए कि शिवाजी से लड़ने के लिए औरंगेजब ने अपने अनेक योद्धा भेजे थे, लेकिन राजा जय सिंह को छोड़कर कोई शिवाजी पर पार नहीं पा सका था। इसलिए जय सिंह का शौर्य कम नहीं थां। राजपूतों ने मुगलों से संधि की, अपनी बेटियां भी दीं, पर अपनी प्रजा को बचा लिया। उनका राज्य भारतीय योद्धाओं और व्यापारियों की शरणस्थली तो था ही, उसका संचालन भारतीय राजधर्म की परंपरा से ही होता रहा। भारतीय इतिहास को समझने के लिए राजधर्म के महत्व को समझना आवश्यक है। राजा का सबसे बड़ा धर्म अपनी प्रजा की रक्षा ही है। भारत के लोगों ने मुस्लिम शासकों को अवज्ञा और तिरस्कार से देखा तो केवल इसलिए नहीं कि वे विदेशी या विधर्मी थे। बल्कि इसलिए कि उन्होंने राजधर्म की सभी मर्यादाओं का उल्लंघन किया था। इसने न केवल मराठा राज्य को पैदा किया, बल्कि बाद के जाट आदि राज्य भी राजधर्म की पुनर्स्थापना के लिए ही उत्पन्न हुए।