वासंती उल्लास और वाग्देवी की आराधना

पूनम नेगी
लेखिका स्वंतत्र पत्रकार हैं।


वसंतोत्सव भारत की सर्वाधिक प्राचीन और सशक्त परम्पराओं में शुमार है। प्रेम, उमंग, उत्साह, बुद्धि और ज्ञान के समन्वय के इस रंगबिरंगे पर्व का अभिनंदन प्रकृति अपने समस्त श्रृंगार के साथ करती है। ऋतुराज वसंत के स्वागत में प्रकृति का समूचा सौंदर्य निखर उठता है, समूची प्रकृति जीवंत हो जाती है। इस पर्व को सद्ज्ञान की अधिष्ठात्री मां सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में मनाये जाने के विस्तृत उल्लेख हमारे पुरा साहित्य में मिलते हैं। कहा जाता है कि सृष्टि की रचना के उपरान्त जीव जगत को स्वर देने के लिए प्रजा पिता ब्रह्मा के आह्वान पर इसी शुभ दिन वीणा, पुस्तक के साथ वरमुद्राधारी माँ सरस्वती अवतरित हुईं और अपने वीणा के तारों को झंकृत कर सम्पूर्ण सृष्टि में वाणी की शक्ति से भर दिया। इसीलिए इस पर्व को वाग्देवी जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। वैदिक ऋषि कहते हैं कि सरस्वती की साधना से कण्ठ से सोलह धारा वाले विशुद्ध शाम्भवी चक्र का उदय होता है जिसका ध्यान करने से वाणी सिद्ध होती है। पद्मपुराण कहता है-
कण्ठे विशुद्धशरणं षोड्शारं पुरोदयाम्। शाम्भवीवाह चक्राख्यं चन्द्रविन्दु विभूषितम्।।
अर्थात् सरस्वती साधना से कण्ठ से सोलह धारा वाले विशुद्ध शाम्भवी चक्र का उदय होता है वह चन्द्र बिन्दु से विभूषित रहता है। सोलह स्वरों की आत्मा चन्द्रामृत से दीप्त रहती है। इसी को शिवसंहिता में देदीप्यमान स्वर्ण वर्ष कमल की सोलह पंखुडिय़ों के रूप में प्रदर्शित किया गया है। इस चन्द्र पर ध्यान करने से वाणी सिद्ध होती है। सरस्वती साधना का यही स्वरूप वाल्मीकि का मूल स्वर बना तथा महाभारत में व्यासजी ने भी आराध्य सरस्वती को इसी तरह स्मरण किया है।
ऋग्वेद में कई स्थलों पर सरस्वती को पवित्रता, शुद्धता, समृद्धता और शक्ति की देवी माना गया है। हमारा जीवन सद्ज्ञान और विवेक से संयुक्त होकर शुभ भावनाओं की लय से सतत संचरित होता रहे, इन्हीं दिव्य भावों के साथ की गयी माँ सरस्वती की भावभरी उपासना हमारे अंतस में सात्विक भाव भर देती है। वीणा, पुस्तक, कमल पुष्प, हंस और जल के समायोजन से सुशोभित देवी सरस्वती का श्रुति महती धीमताम् स्वरूप संगीत कला के समृद्ध रूप को चरितार्थ करता है। कमल- माधुर्य, सौंदर्य, अनासक्त भाव तथा सरोवर का जल ह्रदय के भाव और सरोवर में उठने वाली लहरें हृदय रूपी भाव सागर में प्रतिपल-प्रतिक्षण उठने वाली उत्साह एवं उमंग को प्रदर्शित करती हैं। जीवन इसी उमंग और भावनाओं के लय से सतत संचरित होता रहे; इन दिव्य भावों के ध्यान से देवी सरस्वती की उपासना प्रखर स्वरूप को प्राप्त कर मानव के रग-रग में वासंती उल्लास बिखेर देती है। यह वासंती उल्लास प्रकृति के साथ मानव के अंतस में घुलकर सतत प्रवाहमान होता रहे, यही इस पर्व का मूल दर्शन है।
सोलह कलाओं के पूर्णावतार योगेश्वर श्रीकृष्ण को वसंत का अग्रदूत माना जाता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार वसंत के अग्रदूत श्रीकृष्ण ने सर्वप्रथम सरस्वती पूजन किया था –
आदौ सरस्वती पूजा श्रीकृष्णेन् विनिर्मित: ,
यत्प्रसादान्मुति श्रेष्ठो मूर्खो भवति पण्डित: ।
सरस्वती विद्या और संगीत की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। श्रीमद्भागवत ने भी कृष्ण के सरस्वती पूजन की बात को स्वीकारा है। कहते हैं तभी से भारतवर्ष में वसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजन का क्रम चल पड़ा। सरस्वती की उपासना-आराधना वैदिक धर्मावलम्बियों तक ही सीमित नहीं है। जैन मतावलम्बी भी इनकी उपासना करते हैं। बौद्ध धर्म ने भी सरस्वती पूजन की मान्यता प्रदान की है। बौद्ध ग्रन्थ साधनमाला के अनुसार सरस्वती अपने भक्तों को ज्ञान और समृद्धि देती है। तिब्बत में सरस्वती को महासरस्वती, वज्रशारदा और वज्रसरस्वती आदि रूपों में देखा जाता है। तिब्बतवासी इन्हें वीणा सरस्वती के रूप में मानते हैं।
वैष्णव धर्मावलंबी वसंत पंचमी को श्रीपंचमी के रूप में मनाते हैं। मान्यता है कि सर्वप्रथम इसी दिन राधा-कृष्ण का मिलन हुआ था। आज भी इस दिन वृंदावन के श्रीराधा श्यामसुंदर मंदिर में राधा-कृष्ण महोत्सव का भव्य आयोजन होता है। कुछ अन्य पौराणिक मान्यताएं वसंत पंचमी पर रति-काम पूजन की बात भी कहती हैं। भविष्य पुराण में वसंत का चैत्रोत्सव के रूप में अत्यन्त सुंदर और सजीव वर्णन मिलता है। इस विवरण के अनुसार वसंत ऋतु में शुक्ल त्रयोदशी के दिन वाग्देवी के पूजन के उपरान्त उल्लास के देव काम और सौंदर्य की देवी रति की मूर्तियों को सिन्दूर से सजाकर सामूहिक रूप से पूजन कर मदन महोत्सव मनाया जाता था। इस अवसर पर सभी जन नये एवं सुंदर वस्त्राभूषणों से सज-धजकर समारोह पूर्वक नृत्य गायन करते थे। प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में वसन्त ऋतु में मदनोत्सव एवं सुवसन्तक नामक दो महत्वपूर्ण उत्सवों का वर्णन मिलता है। वात्स्यायन ने अपने सूत्र-ग्रन्थ कामसूत्र में तथा इसके अनेक टीकाकारों ने वसन्त पर्व का विशद् वर्णन किया है। वसन्त पंचमी के दिन वसन्तावतार नामक ऋतु उत्सव मनाया जाता था। भोज ने अपने ग्रन्थ सरस्वती कण्ठाभरण में इस उत्सव का बड़ा ही सुन्दर ढंग से चित्रांकन किया है। कालिदास ने ऋतु संहार में प्रकृति और मानव सौंदर्य के अनेक पहलुओं का वर्णन किया है। रत्नावली में इसका ‘वसन्तोत्सव एवं मदनोत्सव दोनों नामों से उल्लेख हुआ है। उन दिनों वसन्तोत्सव पर सारा गांव-नगर आमोद-प्रमोदमय हो जाता था। राजपथ केशरमिश्रित अबीर से नहा उठता था। महाकवि भवभूति के मालती माधव में वसन्तोत्सव का शान्त सुन्दर चित्र प्रस्तुत किया गया है। इस दिन काम देव की पूजा और सभी लोग अबीर कुंकुम से उत्सव मनाया जाता था।
वसंत प्रकृति और मानव के संवेदनशील सम्बन्धों का साकार रूप है। यही वजह है कि साहित्य के हर विधा में वसंत का वर्णन मिलता है। अश्वघोष, कालिदास, माघ और भारवि जैसे प्रख्यात् संस्कृत कवियों से लेकर वर्तमान युग के कवियों का प्रिय विषय है वसंत। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी प्राचीन काल में वसन्तोत्सव की लोकप्रियता को सहर्ष स्वीकार कर लिखते हैं, वसंतागमन से शीतकालीन जड़ता समाप्त हो जाती है। प्रकृति के रंग में प्रकृतिस्थ होकर मानव भी उल्लसित हो उठता है। मनुष्य के अन्दर का यह उल्लास समाज में आह्लादमय उत्सव के रूप में प्रकट होता है। प्रकृति और मानव परिवर्तन के स्वरूप को स्वीकारते हैं। मन की इसी प्रसन्नता से कलाकार अपनी तूलिका में नया रंग भरता है तो कवि भावनाओं को शब्द में गूंथते हैं। ऋतुराज वसंत के बारे में सुमित्रानन्दन पन्त लिखते हैं, लो चित्रशलय सी पंख खोल, उडऩे को है कुसुमित घाटी, यह है अल्मोड़े का वसंत, खिल पड़ी निखिल पर्वत घाटी।
पं. रामनरेश त्रिपाठी वसंत के अनुसार प्रकृति जब तरंग में आती है तब वह गान करती है। उसके गीतों में प्रकृति इस प्रकार प्रतिबिम्बित होती है जैसे कविता में कवि और तपस्या में त्याग, प्रेम में आकर्षण, श्रद्धा में विश्वास और करुणा में कोमलता। भक्ति और श्रृंगार के अद्भुत कवि विद्यापति ने वसंत को शिशु माना है एवं इसके जन्म का सुन्दर चित्रण किया है – माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को प्रकृति पूर्णगर्भा हुई। नौ माह और पांच दिन व्यतीत होने पर प्रकृति के आंचल में नवजात वसंत किलकारी करने लगा। सर्वत्र उत्साह और उमंग छा गया। कबीर ने अपने बीजक में वसंत राग को बड़े ही सरस एवं सहज ढंग से गाया है, जाके बारहमास वसंत हो, तरके परमारथ बूझे विरला कोय, मैं आपऊ मेस्तर मिलन तोहि, रितु वसंत पहिरावहु मोहि।


प्रेम को समर्पित वसंत पर्व

दिलचस्प तथ्य यह है कि वसंत पंचमी और वेलेंटाइन डे ये दोनों ही एक ही मौसम में मनाये जाने वाले प्रेम व मानव मन की उमंग उल्लास के पर्व हैं। मगर दोनों की मूल अवधारणा में व्यापक अंतर है। हमारा भारतीय वसंत पर्व जहां प्रेम की उदात्तता का पोषक है वहीं पाश्चात्य सभ्यता के रंग में रंगा वेलेंटाइन डे एन्द्रिक सुख तक सीमित। हमारे यहां प्रेम को जीने व पुष्पित व पल्लवित करने की पूरी एक ऋतु है; जबकि विदेशी संस्कृति में प्रेम के प्रदर्शन के लिए महज एक दिन। हां! विगत कुछ सालों में बाजारवाद के वैश्विक फैलाव ने इसे एक दिन से बढ़ाकर वेलेंटाइन वीक तक विस्तृत कर दिया है। रोज डे, प्रपोज डे, हग डे, किस डे आदि आदि के नाम पर प्रेम जैसे गहन आत्मिक भाव का खुला व निर्लज्ज दैहिक प्रेम प्रदर्शन भारतीय संस्कृति के अनुयायियों को कतई मान्य नहीं हो सकता।
हमारे वसंत पर्व का शुभारम्भ बसंतपंचमी से होता है और होलिकोत्सव पर उल्लास की चरम परिणति के साथ वंसतोत्सव का आनन्द परिपूर्ण होता है। चूंकि वसंत ऋतु का मौसम अपने आप में एक अजब-सी खुमारी लिए होता है। इस अवधि में मन में काम भाव प्रेम की उमंगें जागृत होती हैं। नयी आशाओं एवं कामनाओं का जन्म होता है। ऐसे कामोद्दीपक काल में हमारे मनों में उमड़ती भावनाएं अनियंत्रित- उच्श्रृंखल न हों, उन पर विवेक का अंकुश लगा रहे, सम्भवत: इसलिए हमारे मनीषियों ने इस पर्व पर ज्ञान व विवेक की देवी मां सरस्वती की आराधना का विधान बनाया।
प्राचीनकाल से आज तक वसंत का यही तत्वदर्शन भारत की देवभूमि को अपनी भावधारा से आबाध रूप से सिंचित करता आ रहा है। सरस्वती एक ओर जहां विलुप्त नदी के रूप में जन संस्कृति का प्रतीक है तो दूसरी ओर हमारी देवभूमि की सांस्कृतिक चेतना के विकास का भी। ज्ञान-ध्यान, संयम व विवेक के साथ सरस्वती पूजन का यह पर्व कला संस्कृति के रूप में जनमानस की आध्यात्मिक जिज्ञासा की प्यास तो बुझाता ही है, हर्षोल्लास के साथ मन की कोमल भावनाओं को भी तरंगित करता है।