थाईलैण्ड की अयोध्या

डॉ. जितेन्द्रकुमार सिंह संजय
लेखक साहित्य, कला, संस्कृति एवं इतिहास के अध्येता हैं।


अयोध्या का नाम लेते ही स्मृति-पटल पर सरयू के किनारे अवस्थित सूर्यवंश के चक्रवर्ती सम्राटों की उस राजधानी का भव्य चित्र मुखरित होता है, जिसकी स्थापना वैवस्वत मनु ने की है। वस्तुत: सरयू के किनारे बसी अयोध्या केवल सूर्यवंशी सम्राटों की राजधानी ही नहीं है, अपितु प्रत्येक हिन्दू के हृदय में बसे भगवान् श्रीराम की जन्मभूमि भी है। अथर्ववेद ने आठ चक्रों एवं नौ इन्द्रियोंवाले मनुष्य-शरीर को ही अयोध्या कहा है-
अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या।
तस्यां हिरण्मय: कोश: स्वर्गो ज्योतिषावृत:।।

अर्थात् देवपुरी अयोध्या सदृश इस पावन शरीर में एक हिरण्यमय कोश है, जो ज्योति से आवृत स्वर्ग है। यह मस्तिष्क ही स्वर्ग है, जो ज्योति का लोक है और देवों का स्थान है। हिरण्य प्राण, वीर्य और सोम का पर्याय है। इन सब तत्त्वों का वास्तविक कोश मस्तिष्क ही है। मस्तिष्क संकल्पों का स्थान है। संकल्प की सर्वप्रथम चेतना मन में ही स्फूर्त होती है। अथर्ववेद की इस अवधारणा के अनुसार जहाँ कहीं भी शुद्ध-बुद्ध मनुष्य है, वहीं अयोध्या है। जहाँ अयोध्या है, वहीं राम हैं। जहाँ राम हैं, वहीं अयोध्या है। यही बात वनवास के समय माता सुमित्रा लक्ष्मण से कहती हैं-

रामं दशरथं विद्धि मां विद्धि जनकात्मजाम्।
अयोध्यामटवीं विद्धि गच्छ तात यथासुखम्।।
अर्थात् हे पुत्र! राम को ही पिता दशरथ समझो, जनकनन्दिनी सीता को ही माता सुमित्रा मानो। वन को ही अयोध्या मानते हुए सुखपूर्वक यहाँ से प्रस्थान करो। गोस्वामी तुलसीदास इसे और अधिक सरल शब्दों में कहते हैं-
तात! तुम्हारि मातु बैदेही।
पिता राम, सब भाँति सनेही।।
अवध तहाँ जहँ राम-निवासू।
तहँइ दिवस जहँ भानु-प्रकासू।।
राम के वन-गमन के समय अयोध्यावासी भी यही कहते हैं-
कीन्ह बिचार सबहिं मन-माहीं।
राम-लखन-सिय-बिनु सुख नाहीं।।
जहाँ राम, तहँ सबइ समाजू।
बिनु-रघुबीर, अवध नहिं काजू।।
वस्तुत: महर्षि वाल्मीकि की उक्ति अयोध्यामटवीं विद्धि के माध्यम से जहाँ राम हैं वहीं अयोध्या है की अवधारणा युगों युगों से चली आ रही है। इसी अवधारणा को थाईलैण्ड-नरेश महाराज रामातिबोधि प्रथम (1350-1369 ई.) ने सन् 1350 ई. में थाईलैण्ड में अयोध्या नगर की स्थापना करके चरितार्थ किया। सरयू तट पर अवस्थित अयोध्या से 3607 कि.मी. दूर छोप्रया, पालाक एवं लौपबुरी नदियों के संगम तट पर बसी अयोध्या थाईलैण्डवासियों की भगवान् श्रीराम के प्रति अप्रतिम निष्ठा की परिचायक है। दक्षिण-पूर्व एशिया में अवस्थित थाईलैण्ड की प्राक्तन पहचान हिन्दू-संस्कृति के ध्वजवाहक के रूप में है। वस्तुत: थाईलैण्ड में केवल अयोध्या और रामकथा ही नहीं, अपितु वहाँ की पूरी सांस्कृतिक परम्परा ही भारतीय है। थाईलैण्ड तथा उसकी राजधानी के नामों का मूल स्रोत केवल भारतीय वाङ्मय में ही उपलब्ध है। तत्त्वत: यह प्राचीन भारत का पूर्वी भाग था। पूर्वी भारत का महावाक्य है- अहं ब्रह्माऽस्मि। भारत में वेद के शब्दों के अनुसार विभिन्न संस्थाएँ बनीं थीं। मनुस्मृति में इसका स्पष्ट उल्लेख है। भारत के पूर्वी भाग की भौगोलिक संस्था बृहदारण्यकोपनिषद् के उपर्युक्त महावाक्य के अनुसार ही है। अहम् से असम या वहाँ के निवासी अहोम। ब्रह्म से ब्रह्म देश यानी बर्मा। सम्प्रति म्यांमार भी ब्रह्मा का ही पर्याय है – महा + अमर = देवों में मुख्य। अस्मि शब्द एक व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होता है। देश के निवासियों के लिए इसका बहुवचन होगा – स्याम:, जो थाईलैण्ड का प्राचीन नाम है। हर काल के लिए अस्मि या स्याम: का यह अर्थ स्थायी या सनातन है, जो भारत का धर्म है। स्थायी का ही अपभ्रंश थाई है, जिससे देश का वर्तमान नाम निष्पन्न हुआ है। थाईलैण्ड की वर्तमान राजधानी बैंकॉक का आधिकारिक नाम विश्व के स्थान-नामों में सर्वाधिक बड़ा है। बैंकॉक का पूरा नाम क्रुंग देवमहानगर अमररत्नकोसिन्द्र महिन्द्रायुध्या महातिलकभव नवरत्नराजधानी पुरीरम्य उत्तमराजनिवेशन महास्थान अमरविमान अवतारस्थित्य शक्रदत्तिय विष्णुकर्मप्रसिद्धि है। वस्तुत: बैंकॉक का यह नाम उसकी पूरी परम्परा और इतिहास का द्योतक है। बैंकॉक शब्द का मूल वैकंक अथवा विकंक नामक पर्वत है, जिसका उल्लेख वायुपुराण में किया गया है।

11 मई, 1949 ई. के पूर्व तक थाईलैण्ड का आधिकारिक नाम स्याम था। स्याम अथवा सियाम देश के स्वतन्त्र राज्य के रूप में अस्तित्व में आने के शताब्दियों पूर्व ही इस भूभाग में रामकथा की प्रतिष्ठा हो चुकी थी। अधिकांश थाईलैण्डवासी परम्परागत रामकथा से परिचित थे। सन् 1238 ई. में स्वतन्त्र थाई राष्ट्र की स्थापना हुई। उस समय इसका नाम स्याम था। बृहत्तर भारत के सांस्कृतिक इतिहास पर कार्य करनेवाले भारतविद्याविदों की मान्यता है कि 13वीं शती ई. में स्याम देश की जनता के महानायक के रूप में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम प्रतिष्ठित हो चुके थे। थाई-नरेश ब्रह्म त्र्यलोक्यनाथ (1448-1488 ई.) की राजभवन-नियमावली में रामलीला का उल्लेख है, जिसकी तिथि 1458 ई. है। थाई-नरेश ब्रह्मकान्त महाधर्मराज द्वितीय (1737-1758 ई.) के राजत्वकाल की रचनाओं में रामकथा के पात्रों तथा घटनाओं का उल्लेख हुआ है। थाई-रामायण को रामाख्यान के अर्थ से रामकियेन कहा जाता है। इसे थाईलैण्ड के राष्ट्रीय महाकाव्य का सम्मान प्राप्त है। मूल रामकियेन 1767 ई. में अयुध्या में नष्ट हो गया। बाद में जब तासकिन थाईलैण्ड के सम्राट् बने, तब उन्होंने सन् 1797 ई. से सन् 1807 ई. के मध्य थाईभाषा में रामकियेन नामक रामायण को छन्दोबद्ध किया, जिसके चार खण्डों में 2012 पद हैं। पुन: सम्राट् राम प्रथम (1782-1809 ई.) ने अनेक कवियों की सहायता से जिस रामकियेन रामायण का प्रणयन किया, उसमें 50188 पद हैं। यही थाईभाषा का पूर्ण रामायण है। यह विशाल रचना नाटक के लिए उपयुक्त नहीं थी। इसलिए सम्राट् फ्रेंडिन-क्लांग राम द्वितीय (1809-1824 ई.) ने एक संक्षिप्त रामायण की रचना की, जिसमें 14300 पद हैं। तदुपरान्त सम्राट् महामोंगकुट राम चतुर्थ (1851-1868 ई.) ने स्वयं पद्य में रामायण की रचना की जिसमंा 1664 पद हैं। सम्राट् महावाजिरवुध राम षष्ठ (1910-1925 ई.) ने भी वाल्मीकीय रामायण के आधार पर एक रामलीला लिखी। इसके अतिरिक्त थाईलैण्ड में रामकथा पर आधारित अनेक कृतियाँ हैं। थाईलैण्ड का शिल्पतोनू (शिल्पाधिकरण) नामक राजकीय ललित कला संस्थान विशेष अवसरों पर इन राजन्यकृत रामकथाओं का मंचन करवाता है।

यद्यपि भारतीय रामकथा और रामकियेन में तत्त्वत: कोई अन्तर नहीं है, तथापि भौगोलिक दूरी के कारण कतिपय पात्रों और चरित्रों का निर्माण अपने तरीके से किया गया है। रामकियेन का आरम्भ राम और रावण के वंश-विवरण के साथ अयोध्या और लंका की स्थापना से होता है। तदुपरान्त इसमें बालि, सुग्रीव, हनुमान्, सीता आदि की जन्म-कथा का उल्लेख हुआ है। विश्वामित्र के आगमन के साथ कथा की धारा सम्यक् रूप से प्रवाहित होने लगती है, जिसमें राम-विवाह से सीता-त्याग और पुन: युगल जोड़ी के पुनर्मिलन तक की समस्त घटनाओं का समावेश हुआ है। रामकियेन वस्तुत: एक विशाल कृति है, जिसमें अनेकानेक उपकथाएँ सम्मिलित हैं। रामकियेन में अनेक ऐसे भी प्रसंग हैं जो थाईलैण्ड को छोड़कर अन्यत्र अप्राप्य हैं। इसमें विभीषण पुत्री वेंजकाया द्वारा सीता का स्वाँग रचाना, ब्रह्मा द्वारा राम और रावण के बीच मध्यस्थ की भूमिक निभाना आदि प्रसंग विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

वस्तुत: रामकियेन केवल रामकथा ही नहीं है, अपितु थाईलैण्ड की अयोध्या का सांस्कृतिक इतिहास भी है। थाईलैण्ड में रामकथा और रामलीला इतनी लोकप्रिय है कि यहाँ के बहुसंख्य लोगों का विश्वास है कि रामायण के पात्र मूलत: इसी क्षेत्र के निवासी थे और रामायण की सारी घटनाएँ इसी क्षेत्र में घटित हुई थीं। इसलिए थाईलैण्ड की धरती पर ही राम की अयोध्या भी बसा ली गयी। अयोध्या को यहाँ की भाषा में अयुध्या लिखा जाता है। सन् 1350 से 1463 तक एवं 1488 से 1767 ई. तक अयोध्या को थाईलैण्ड की राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। अयोध्या पर पाँच राजवंशों के 33 राजाओं ने शासन किया है। थाईलैण्ड पर सन् 1782 ई. से आज तक चक्री राजवंश का शासन है। इस राजवंश के शासक अपने आपको भगवान् श्रीराम का प्रतिनिधि मानते हैं।

थाईलैण्ड में अयोध्या (अयुध्या) नाम का एक नगर, एक जिला, एक प्रान्त और एक बैंक, जिसकी स्थापना 1945 में की गई थी, भी है। अयुध्या हिस्टोरिकल पार्क में प्राचीन अयोध्या नगर के भग्नावशेष संरक्षित हैं। थाईलैण्ड के इतिहास में अयोध्या का उल्लेख स्याम देश की राजधानी के रूप में किया गया है। अयोध्या नगरी की स्थापना एवं इसके इतिहास में यहाँ के पास-पड़ोस की जगहों का अत्यधिक महत्त्व और योगदान है। छोप्रया, पालाक एवं लौपबुरी नदियों के संगम से निर्मित द्वीप पर अवस्थित अयोध्या व्यापार, संस्कृति के साथ साथ आध्यात्मिक अवधारणाओं का भी केन्द्र रही है।

पुरातत्त्वविदों के अनुसार पत्थरों के ढेर में परिवर्तित हो चुकी अयोध्या नगरी का एक स्वर्णिम इतिहास रहा है। यहाँ के अवशेष इसके वैभव का गुणानुवाद करते हैं। इन्हीं अवशेषों के आसपास आधुनिक शहर बस जाने से अयोध्या थाईलैण्ड का प्रमुख पर्यटन केन्द्र हो गया है, जिसे देखने प्रति वर्ष लगभग दस लाख लोग आते हैं। अपने शिल्प-वैभव के कारण अयोध्या राजनीतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यन्त प्रभावशाली राज्य माना जाता रहा है। मठों, आश्रमों, नहरों एवं जलमार्गों के कारण उस समय इस शहर की तुलना धार्मिक, व्यापारिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से वेनिस और ल्हासा से की जाती थी।

सन् 1767 ई. में म्यांमार के नागरिकों ने अयोध्या पर आक्रमण करके इसे लूट लिया और तहस-नहस कर डाला। स्याम की राजधानी कहलानेवाली अयोध्या एक लुटे-पिटे शहर में परिवर्तित हो गयी। वहाँ केवल जंगल रह गये। सन् 1976 ई. में थाइलैण्ड की सरकार ने इस शहर के पुनर्निर्माण पर ध्यान दिया। यहाँ के जंगलों को साफ़ करके अवशेषों की मरम्मत की गयी और विश्व-पटल पर इसे पुन: स्थापित किया गया।

अयोध्या का मुख्य आकर्षण शहर के मध्य अवस्थित प्राचीन पार्क है। इसके बिना शिखरवाले स्तम्भों, दीवारों, सीढिय़ों एवं भगवान् बुद्ध की खण्डित प्रतिमा की ओर लोगों का ध्यान बरबस ही चला जाता है। यहाँ की बुद्ध-प्रतिमाओं में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण वह प्रतिमा है, जिसमें बलुहे पत्थर से निर्मित बुद्ध का सिर एक पीपल वृक्ष की जड़ों में जकड़ा हुआ है। यह पीपल वृक्ष अयोध्या में वट महाथाट अर्थात् 14वीं शताब्दी के प्राचीन साम्राज्य के स्मृतिचिह्नवाले मन्दिरों के अवशेषों में विद्यमान है। शहर में शेष बची बुद्ध-प्रतिमाओं में से कुछ को बेच दिया गया अथवा सफ़ाई के बाद तराश कर उन्हें दोबारा आकार देने की कोशिश की गयी, जिससे उनका मूल स्वरूप नष्ट हो गया।

अयोध्या का सबसे महत्त्वपूर्ण भवन तीन छेदी है, जिसमें तीन राजाओं की खाक मिली है। यह जगह महत्त्वपूर्ण लोगों को समर्पित की गयी है। यहाँ पूजा-अर्चना की जाती थी और समारोह आयोजित होते थे। विहार फ्रा मोंग खोन बोफिट एक बड़ा प्रार्थना स्थल है। यहाँ बुद्ध की एक बड़ी प्रतिमा है। यह पहले सन् 1538 ई. में बनायी गयी थी, परन्तु बर्मा द्वारा अयोध्या पर चढ़ाई के दौरान नष्ट हो गयी थी। यह प्रतिमा पहले सभागार के बाहर हुआ करती थी, बाद में इसे विहार के अन्दर स्थापित किया गया। जब विहार की छत टूट गयी, तब एक बार फिर प्रतिमा को काफ़ी नुकसान पहुँचा और राजा महावाजिरवुध राम षष्ठ (1910-1925 ई.) ने लगभग 200 वर्ष बाद इसे वहाँ से हटवा कर संग्रहालय में रखवा दिया। सन् 1957 ई. में फाइन आट्र्स विभाग ने पुराने विहार को फिर से बनवाया और सुनहरे पत्तों से ढँक कर बुद्ध की प्रतिमा को फिर से पुरानी जगह पर रखवाया।

थाईलैण्ड की वर्तमान राजधानी बैंकॉक से 150 कि.मी. पूर्वोत्तर में लौपबुरी (लवपुरी) नाम का भी एक प्रान्त है, जहाँ इसी नाम की नदी भी है। लौपबुरी प्रान्त के अन्तर्गत वांग-प्र नामक स्थान के सन्निकट फाली (बालि) नामक एक गुफा है। कहा जाता है कि बालि ने इसी गुफा में थोरफी नामक महिष का वध किया था। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि थाई-रामकथा रामकियेन में दुन्दुभि दानव की कथा में किंचित् परिवर्तन हुआ है। इसमें दुन्दुभि राक्षस के स्थान पर थोरफी नामक महाशक्तिशाली महिष है, जिसका वध बालि द्वारा होता है। बालि नामक गुफा से प्रवाहित होनेवाली जलधारा का नाम सुग्रीव है। थाईलैण्ड के ही नखोन-रचसीमा प्रान्त के पाक-थांग-चाई नामक स्थान के सन्निकट थोरफी पर्वत है, जहाँ से बालि ने थोरफी के मृत शरीर को उठाकर 200 कि.मी. दूर लैपबुरी में फेंक दिया था।

अ_ारहवीं शताब्दी में बनाए गए बैंकॉक में अवस्थित थाईलैण्ड के सर्वाधिक पवित्र बौद्ध-मन्दिर वट फ्रा की भत्तियों पर 178 चित्रों में सम्पूर्ण रामकियेन को चित्रित किया गया है। ऐसी मान्यता है कि इन चित्रों का निर्माण थाईलैण्ड के महान् सम्राट् फ्रा फ्रुट्ट योट फा चुलालोक राम प्रथम (1782-1809 ई.) के शासनकाल में हुआ था। थाईलैण्ड के पाँचवें सम्राट् चुलालोंगकोर्न राम पंचम (1868-1910 ई.) तथा उनके साहित्य-मण्डल के सदस्यों ने समवेत रूप से इन भित्तिचित्रों में रूपायित रामकथा को काव्यबद्ध किया था। बैंकॉक के राजभवन-परिसर के दक्षिणी किनारे पर वाट-पो या जेतुवन विहार है। इसके दीक्षा-कक्ष में संगमरमर के 152 शिलापट्टों पर रामकथा के चित्र उत्कीर्ण हैं। जे. एम. कैडेट की पुस्तक रामकियेन में उनके चित्र हैं और उनका अध्ययन भी किया गया है। इस ग्रन्थ में उन शिलाचित्रों को 9 खण्डों में विभाजित कर उनका विश्लेषण किया गया है- 1. सीताहरण, 2. हनुमान् की लंका-यात्रा, 3. लंकादहन, 4. विभीषण-निष्कासन, 5. छद्म सीता-प्रकरण, 6. सेतु-निर्माण, 7. लंका-सर्वेक्षण, 8. कुम्भकर्ण तथा इन्द्रजीत-वध और 9. अन्तिम युद्ध।

वस्तुत: एवं तत्त्वत: थाईलैण्ड का सांस्कृतिक इतिहास राम से सम्पृक्त है। दक्षिणी थाईलैण्ड और मलेशिया के रामलीला-कलाकारों का ऐसा विश्वास है कि रामायण के पात्र मूलत: दक्षिण-पूर्व एशिया के ही निवासी थे और रामायण की सारी घटनाएँ इसी क्षेत्र में घटी थीं। वे मलाया के पश्मिमोत्तर में अवस्थित एक लघु द्वीप को लंका मानते हैं। इसी तरह उनका विश्वास है कि दक्षिणी थाईलैण्ड के सिंग्गोरा नामक स्थान पर सीता-स्वयंवर रचाया गया था, जहाँ राम ने एक ही बाण से सात ताल-वृक्षों को बेधा था। सिंग्गोरा में आज भी सात ताल-वृक्ष विद्यमान हैं। जिस प्रकार भारत और नेपाल के लोग जनकपुर के निकट अवस्थित एक प्राचीन शिलाखण्ड को राम द्वारा तोड़े गये शिव-धनुष का टुकड़ा मानते हैं, उसी प्रकार थाईलैण्ड और मलेशिया के लोगों को भी विश्वास है कि राम ने उन्हीं ताल-वृक्षों को बेधकर सीता को प्राप्त किया था। थाईलैण्ड में रामकथा जनमानस में इतने गहरे तक समायी हुई है कि किसी की आँखों की सुन्दरता की उपमा सीताजी की आँखों से दी जाती है, जबकि सूर्पणखा भद्देपन की प्रतीक है।