प्राचीन भारत में भी होते थे सर्जिकल स्ट्राइक

प्रो. लल्लन प्रसाद
लेखक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री हैं।


पिछले दिनों भारतीय सेना ने पड़ोसी देश पाकिस्तान के इलाके में घुस कर आतंकवादियों के अड्डों पर हमला किया। हालाँकि भारत सरकार ने इसे गैरसैनिक कार्रवाई और आतंकवादविरोधी गतिविधि बताया। भारत में आतंकवाद एक प्रकार का परोक्ष युद्ध के रूप में ही चल रहा है और भारत सरकार की यह कार्रवाई उसका ही उत्तर थी। परोक्ष या कूट युद्ध प्राचीन काल से ही लड़ा जाता रहा है। हालांकि आज इसे गुरिल्ला युद्ध कह कर इसे एक नई तकनीक के रूप में प्रचारित किया जाता है, परंतु कौटिलीय अर्थशास्त्र में पाए जाने वाले वर्णन से यह साफ हो जाता है कि कूट युद्ध की विधा काफी पुरानी है।

कौटिल्य अर्थशास्त्र में कूट युद्ध को प्रकाश युद्ध (ओपन वारफेयर) के विकल्प के रूप में प्रस्तावित किया गया है। प्रकाश युद्ध छेडऩा तभी हितकर माना जाता है जब अपनी स्थिति हर तरह से मजबूत हो, दुश्मन कमजोर हो। प्रकाश युद्ध की अवधारणा धर्म युद्ध के समान है जिसमें युद्ध कुछ नियमों से बंधा होता हैं जिसे दोनों पक्ष मानते हैं। उदाहरण के लिये सूर्यास्त होने पर युद्ध बन्द कर देना, निहत्थे पर हमला न करना आदि। कूट युद्ध इस प्रकार के नियमों से मुक्त होता है। युद्ध का समय, स्थान एवं सेना का संचालन दोनों पक्ष अपनी रणनीति के आधार पर निर्धारित करते हैं। अपना सैन्य बल और अपनी शक्ति को आंकते हुए अपना लक्ष्य निर्धारित करते हैं।

छद्म युद्ध कूट युद्ध का महत्वपूर्ण अंग है। विश्व भर में युद्ध का इतिहास कूट युद्धों से भरा पड़ा है। भारत में प्राचीन काल में धर्म युद्ध की परम्परा थी। राम-रावण युद्ध, महाभारत का महासमर धर्म युद्ध थे, किन्तु उनमें भी कुछ अनैतिक तरीके अपनाये गये थे। राम के बाण रावण को मारने में असफल देख विभीषण ने राम को रावण की नाभि में तीर मारने के संकेत दिये। सूर्यास्त के ठीक पहले युधिष्ठिर द्वारा अश्वत्थामा हतो, नरो वा कुंजरों कहवाकर कृष्ण ने द्रोणाचार्य को भ्रमित कर दिया और धृष्टद्युम्न द्रोणाचार्य को मारने में सफल हुए। कौरवों ने युद्ध के दौरान कई बार अनैतिक व्यवहार किये जिनमें अभिमन्यु वध शामिल है। मुगलों, यवनों और हूणों ने जो आक्रमण किये उनमें नैतिकता नाम की कोई चीज ही नहीं थी। राजघरानों में फूट डालकर राजाओं को आपस में लड़ाकर, प्रलोभन देकर, हत्या बर्बरता का नग्न प्रदर्शन करके उन्होंने भारत भूमि को निर्दोष नागरिकों की लाशों से पाटकर अपने शासन की नींव डाली। मुगलिया शासन में पिता को जेल में डालकर या मारकर गद्दी हासिल करने के अनेक उदाहरण हैं।
कूट युद्ध में हमारे पड़ोसी देश हमसे कहीं अधिक आगे नजर आते हैं। उदाहरण के लिए चीन अपनी सीमाओं के विस्तार के लिए कूट युद्ध का प्रयोग करने से कभी नहीं चूकता। तिब्बत का विशाल भू-भाग भारत की नादानी से उसने अपने कब्जे में कर लिया। भारत ने चीन को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, किन्तु उसके कुछ ही वर्षों बाद चीन ने भारत पर हमला कर दिया। जब चीनी प्रधानमंत्री चाओ एन लाई पंडित नेहरू के साथ हिन्दी चीनी भाई-भाई कह रहे थे उनकी सेनाएं भारत में कूच की तैयारी कर रही थीं। विभाजन के बाद पाकिस्तान ने कबाइलियों के भेष में अपनी सेना कश्मीर में भेजी और एक बड़े भू-भाग को भारत से छीनने में सफल हुआ। कूट युद्ध में माहिर पाकिस्तान की सेना आंतकी हमलों और सीमाओं पर गोलाबारी से अब तक भारत के हजारों सैनिकों और सीमावासियों के खून बहा चुकी है, मुम्बई और दिल्ली जैसे शहरों में दहशत फैला चुकी है। सैन्य बल में भारत पाकिस्तान से कहीं आगे है, आर्थिक दृष्टि से पाकिस्तान लगभग दिवालिया है, फिर भी वह अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। कूट युद्ध में यह हमारी कमजोरी का द्योतक है। चाणक्य की कूट नीति और अपने युद्ध कौशल से चन्द्रगुप्त मौर्य ने जिस भारत का निर्माण किया था वह पिछले हजार वर्षों में आकार में आधा हो चुका है। मुगलों ने उसकी संस्कृति पर लगातार प्रहार किया, अंग्रेजों ने उसे विभाजित कर दिया। चाणक्य नीति भारत के लिए आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी ढाई हजार वर्षों पूर्व थी। विजिगीषु (विजय की आकांक्षा का शासक) की जो परिकल्पना चाणक्य ने दी थी वही हमें आगे ले जा सकती है नरम राज्य (साफ्ट स्टेट) की नहीं। लोहा ही लोहे को काट सकता है, कूट युद्ध का जवाब कूट नीति और कूट युद्ध से ही दिया जा सकता है।

कूट युद्ध की सफलता युद्ध प्रारंभ करने के समय और स्थान, सैन्यबल, अस्त्र शास्त्रों की मारक क्षमता, सैन्य शिविरों की व्यवस्था, कूट रचना, सेना का संचालन और उसके मनोबल पर निर्भर होती है। कौटिल्य अर्थशास्त्र में इनका विशद विवरण मिलता है। युद्ध कला पर पूर्ववर्ती मनीषियों के विचारों को भी चाणक्य ने उद्द्यृत किये हैं। कूट युद्ध का अधुनिक परिप्रेक्ष्य चाणक्य काल से भिन्न है, किन्तु युद्ध के सिद्धान्त एवं संचालन, कूट रचना एवं सैनिकों के मनोबल को ऊंचा रखने के जो उपाय अर्थशास्त्र में दिये गये हैं उनमें अधिकांश प्रासंगिक हैं। आधुनिक युग में सेना में पैदल सैनिकों के अतिरिक्त विनाशकारी तोपों, आग्नेय अस्त्रों और मिसाइलों से भरे वाहन, लड़ाकू जहाज, युद्धपोत आदि का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। प्राचीन युग में पैदल सैनिक अश्वारोही, हाथियों, ऊंटों और रथों पर सवार योद्धा होते थे। तलवार, धनुष-बाण, भाले, गदा, त्रिशूल आदि अस्त्रों का इस्तेमाल होता था। वाद्य यंत्रों और ध्वजा पताकाओं से युद्ध भूमि में सैनिकों को संदेश दिया जाता था। सेना के साथ युद्ध सामग्री, खाने-पीने, यूनिफार्म आदि के लिए लोग साथ होते थे। घायल सैनिकों के उपचार के लिए चिकित्सक और खाली समय में सैनिकों के मनोरंजन के लिए स्त्रियां भी रखी जाती थीं। सैनिकों के लिए शिविरों एवं रास्ता बनाने, झाडिय़ों तथा पौधों को काटने, हिंसक पशुओं को भगाने, मारने के लिए लोग साथ रखे जाते थे। छल-कपट से दुश्मन को घेरने और बेचैन करने में प्रशिक्षित लोग और ज्योतिषी भी साथ रखे जाते थे। सेना की कमान सेना नायक के हाथों में होती थी जिसके अंदर कई सेनापति और अनेकों पदिक होते थे। दस रथ और दस हाथियों के अधिकारी को पदिक, दस पदिकों के अधिकारी को सेनापति और दस सेनापतियों के अधिकारियों को नायक की संज्ञा दी गई है। राजा या राजकुमार जब स्वयं रणभूमि में जाते थे और युद्ध करते थे तो सेना की कमान उनके हाथों में होती थी। उनकी सुरक्षा के लिए विशेष तरह की घेराबंदी की जाती थी।

युद्ध स्थल और समय को अर्थशास्त्र में सत्र की संज्ञा दी की गई है। रेगिस्तान का दुर्ग (धान्वन), जंगल का दुर्ग, कंटकाकीर्ण झाडियों वाले स्थान (संकट), दलदल भूमि, पहाड़ी इलाके, तराई क्षेत्र, ऊबड़-खाबड़ भूमि, नौकाएं, गायों के झुण्ड, शटक व्यूह, कुहरा और रात्रि प्रहर सत्र में सम्मिलित है। रण भूमि और आक्रमण का समय कूट युद्ध में निर्णायक साबित हो सकते हैं इसलिए उनके चुनाव में सावधानी बरतने की आवश्यकता है। पैदल सेना के लिए मोटे पेड़ों के ठूंठ, मोटे-मोटे पत्थर, कंकड, वृक्ष, लता, बाबी तथा झुरमुर आदि से युक्त भूमि, छोटे-छोटे कंकड़ तथा वृक्षों से युक्त, छोटे-छोटे लांघने युक्त गड्ढों से युक्त और इधर-उधर छोटे-छोटे दर्रो से युक्त भूमि अश्वारोहियों के लिए, समतल, दलदल रहित ठोस आदि। साफ-सुथरी, चिकनी, घनी बेलों से आच्छादित, खाई-खंदक से रहित भूमि, रथ सेना के लिए, एवं हाथियों के चढ़ सकने योग्य पहाड़, ऊंची-नीची जमीन, हाथियों के खुजलाने योग्य वृक्षों से युक्त, दरारों से रहित भूमि हस्तारोही सेना के लिए उपयुक्त मानी जाती थी। सुविधाजनक स्थानों का चयन और उन पर कब्जा पहले से ही कर लेना चाहिये। शत्रु सेना पर पहले चढ़ाई करना, उनके शिविरों में घुसकर चौंका देना, घेरना, शत्रु के कोश पर कब्जा कर लेना, पीछे या सामने जैसे भी हो आक्रमण करना, अश्वारोही सैनिकों द्वारा करायी जाय। इसे अश्वकर्म की संज्ञा दी गई है। हस्तारोही सेना को आगे रखकर शत्रु सेना को तितर-बितर करने का प्रयास, शत्रु सेना को कुचलना, मद विह्वल होकर शत्रु को विचलित करना, उनके योद्धाओं को पकडऩा, उनके परकोटे, प्रधान द्वार, अटारी आदि नष्ट करने को हस्ति कर्म कहा गया है। आक्रमण से अपनी सेना की रक्षा करना, शत्रु को रोकना, उसके सैनिकों को खदेडऩा, तितर-बितर करना, भयंकर आवाज कर शत्रु को दहलाना रथ सेना द्वारा सम्पादित कराये जाने को रथकर्म की संज्ञा दी गई है। सम विषम सभी स्थानों और सभी ऋतुओं में युद्ध के लिये पैदल सेना तैयार रखी जानी चाहिये।

युद्ध भूमि के चुनाव के बाद छावनी निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिये। सेना नायक कारीगरों, भवन निर्माण के विशेषज्ञों और ज्योतिषियों से सलाह कर छावनी का निर्माण कराये। भूमि जैसी हो छावनी भी उसी प्रकार की बनायी जाय गोलाकार, लम्बी या चौकोर। चारों दिशाओं में दरवाजों, मार्गों और विभागों (डिवीजंस) की व्यवस्था हो। छावनी निर्माण में युद्ध के सम्भावित समय का भी ध्यान रखना चाहिए। लम्बी अवधि तक युद्ध चलने की स्थिति हो तो छावनी के चारों ओर खाई, दीवाल, मुख्य द्वार आदि का निर्माण कराया जाय। कौटिल्य अर्थशास्त्र में छावनी को स्ंकंधावार की संज्ञा दी गई है। छावनी के बीच में राजा यदि युद्ध भूमि में जाता है तो उसके रहने की विशेष व्यवस्था हो। राजगृह से कुछ दूर चार बाड़े बनाए जायं, बाडियों की घेराबंदी, राजा, सेनापतियों, मंत्रियों, कर्मचारियों, सैनिकों, आदि की सुरक्षा एवं रसोई, अस्त्र शस्त्र रखने के स्थान आदि को ध्यान में रखकर की जाय। पहली बाड़ की घेराबंदी झाडियों, दूसरी की झाडियों और कांटेदार तारों, तीसरी की मजबूत खम्भों और चौथी की दीवारी से होनी चाहिए। राजगृह से लगे पहली बाड के बीच में और सामने की ओर मंत्रियों और पुरोहितों के स्थान हो, दाहिनी ओर रसोई और भण्डारा, बांई ओर लोहा, लकड़ी, धातु की चीजें के स्थान और अस्त्रागार हो। दूसरे बाड़े के बीच में मुख्य सेना, सेनापतियों, घोड़ों के रहने की व्यवस्था, तीसरे में हाथियों, सैनिकों, डिवीजनों तथा प्रशास्त्रा (प्रशंसकों) का स्थान एवं चौथे बाड़े में कर्मचारियों, सेना नायक और विश्वस्त अधिकारियों से संरक्षित मित्र सेना आदि के स्थान हों। चौथे बाड़े के बाहर बहेलियों, शिकारियों, ग्वाले के वेष में जासूसों और अग्नि प्रज्ज्वलन की व्यवस्था हो। शत्रु के आने वाले सम्भावित मार्गों में खाई, गड्ढे कांटेदार तार, कीलें आदि बिछाई जाय ताकि मार्ग अवरूद्ध हो। चौबीस घंटे पहरे की व्यवस्था हो। गुप्तचरों को रात-दिन शत्रु की खबर के लिए लगाया जाय। सैनिक आपस में मारपीट न करें, छावनी के अंदर प्रवेश के लिए राजकीय मुहर के परिपत्र की व्यवस्था हो। युद्ध से भागकर आने वाले सैनिकों को गिरफ्तार किया जाय। प्रशासकों की जिम्मेदारी है कि राजा और सेना को प्रस्थान करने के पहले खाने की सामग्री, पानी और रास्ते में जिन चीजों की जरूरत पड़े उससे दुगनी की व्यवस्था रखे, मार्ग रक्षा के सभी उपाय करें।

युद्ध का नेतृत्व सेना नायक करता है, उसे आगे रहना चाहिय। राजा यदि युद्ध में जा रहा है तो उसे बीच में, अगल-बगल शत्रु को आघात करने वाले घोड़े हों, पिछले भाग में हाथी, अन्न घास भूसा आदि। मार्ग का चुनाव ऐसे करना चाहिये जो चतुरंगी सेना के लिए अनुकूल हो। सेना की चाल तेज, मध्यम या धीमी मार्ग की स्थिति पर निर्भर करती है। उबड़-खाबड़ मार्ग या ऋतु अनुकूल न होने पर गति धीमी रखनी पड़ सकती है। प्रतिदिन एक योजन (चार कोस) सबसे धीमी गति, डेढ़ योजन मध्यम और दो योजन उत्तम गति मानी जाती है। सेना को नदी पार करने के लिये हाथियों, लकड़ी के खम्भों, बांस के बेड़ों, नौकाओं आदि को साथ रखना चाहिये। नदी यदि दुश्मन के कब्जे में हो तो रात्रि में दूसरे रास्ते से सेना निकालने की कोशिश करनी चाहिये। जहां पानी का संकट हो, साथ में प्रचुर मात्रा में पानी साथ ले जाना चाहिये। रास्ते में सेना पर आने वाले सभी संकटों से उसकी रक्षा के उपाय करने चाहिये। शत्रुसेना की हलचलों का अपने जासूसों से बराबर खबर लेते रहना चाहिये। व्यूह रचना के सिद्धान्त प्रतिपादित करते हुए कौटिल्य ने लिखा है कि सामने की ओर से शत्रु के आक्रमण की आशंका हो तो ‘मकराकार’ व्यूह बनायें। आक्रमण यदि पीछे से सम्भावित है तो शकट व्यूह (मालगाड़ी वाहन जैसा), यदि अगल-बगल से आक्रमण की आशंका हो तो चक्रव्यूह और यदि मार्ग बहुत तंग हो तो सूची व्यूह बनाकर आगे बढऩे का प्रयत्न करना चाहिये।

आक्रमण शत्रु और अपनी स्थिति के आकलन के हिसाब से करना चाहिये। जो परिस्थितियां शत्रु के विपरीत हों आक्रमण के लिए वह श्रेष्ठ है। शत्रु पक्ष के आमान्य, राजद्रोहियों को अपनी ओर करने की कोशिश करनी चाहिये, युद्ध जीतना इससे आसान हो जाता है। शत्रु सेना को भ्रम में रखकर जैसे उनमें यह विश्वास पैदा करने कि वे जीत के करीब हैं, हम तो हार चुके है, उनको शिथिल किया जा सकता है, फिर सहसा आक्रमण करके उनको हराया जा सकता है। सामने के आक्रमण से तितर-बितर सेना को पीछे की ओर से हाथियों और घोड़ों से रौंदा जा सकता है। आगे से पीछे या अगल-बगल जैसे भी अपनी सेना सशक्त हो आक्रमण करना चाहिये। रात में लूटपाट, डाका चोरी आदि के भय से शत्रु सेना को जगाने को मजबूर करके दिन में उन पर चढ़ाई की जा सकती है। अपनी सेना का मनोबल हमेशा ऊंचा रखना चाहिये। राजा और सेनानायक दोनों को इसके लिए हर सम्भव प्रयास करने चाहिये।

धन का प्रलोभन, शास्त्रों की मान्यता का प्रचार, जैसे युद्ध में वीर गति प्राप्त करने वाला स्वर्ग जाता है, भागने वाला नर्क जाता है का विश्वास जीत का आदि सैनिकों को उत्साहित करने के तरीके हो सकते हैं। सैनिकों के स्वास्थ्य और मनोरंजन की भी अच्छी व्यवस्था करनी चाहिये। विजिगीषु का लक्ष्य होना चाहिये कि शत्रु को ऐसी मार मारें कि फिर कभी सर न उठा सके।