विजय के प्रतीक हैं कलात्‍मक स्‍तंभ

श्रीकृष्ण ”जुगनू”
लेखक इतिहासविद् हैं।


शिल्प का एक वातायन स्तंभों की ओर भी खुलता है। अच्छे-अच्छे स्तंभ यानी खंभे। लकड़ी से लेकर पाषाण तक के खंभे। वेदों से लेकर पुराणों और शिल्पशास्त्रों तक में जिक्र-दर-जिक्र। शासकों ने यदि विजय के दिग्घोष के रूप में करवाए तो आराधकों ने देवताओं के यशवर्धन के उद्देश्य से स्तंभों का निर्माण करवाया। मीनार भी उसका एक रूप है। अशोक के स्तंभ, हेलियोडोरस का विष्णुध्वज, जीजाक का कीर्तिस्तंभ, कुंभा का विजय स्तंभ भारत में सबसे कलात्मक स्तंभ है कैलास मंदिर अलोरा का। जब देखो तब अपनी कला के कौशल का स्मारक सा लगता है।

इन स्तंभों का निर्माण निरंतर होता रहा है, अहमदाबाद में हाल ही एक विजयस्तंभ बना है। अन्यत्र रोम की तर्ज पर क्लॉक टावर भी बनाए गए। इनका उदय या उन्नत स्वरूप यश के विस्तार का सूचक है। यूं तो ऐसे देव स्तंभों के निर्माण का प्रारंभिक जिक्र अल्पज्ञात वह्निपुराण में आता है जिसमें विष्णु को समर्पित गरुड़ और वराह ध्वज बनाने की विधि बताई गई है। अन्य ग्रंथ दीपार्णव, वास्तुविद्या आदि बाद के हैं। अपराजितपृच्छा में भी एकाधिक देवस्तंभों के निर्माण का संक्षिप्त विवरण है।

महाराणा कुंभा (1433-68 ई.) ने ऐसे स्तंभों के निर्माण पर एक पुस्तक ही लिखी थी। इसको विश्वकर्मा और जय संवाद के रूप में लिखा गया। नाम था ”स्तम्भराज”। यह दुनिया का कदाचित पहला शिल्पशास्त्र था जिसको पाषाण पर उत्कीर्ण करवाया गया था। इससे पहले नाटक, काव्यशास्त्र जैसे ग्रंथ पाषाणों पर उत्कीर्ण करवाए गए थे। परमारों के शासनकाल में धार में और चौहानों के शासनकाल में अजमेर में।

कुंभा के शासनकाल में स्तंभराज को पाषाण पर उत्कीर्ण करने का श्रेय संभवत: सूत्रधार जयता को है, उसी ने चित्तौड दुर्ग पर विष्णुध्वज का निर्माण किया, जिसे ”विजय स्तंभ” या ”कीर्तिस्तंभ” के नाम से ख्याति मिली। इसमें इन्द्रध्वज, ब्रह्मस्तंभ, विष्णुस्तंभ आदि की ऊंचाई और उनमें जड़ी जाने वाली मूर्तियों का विवरण था, लिखा गया था –
श्रीविश्वकर्माख्य महार्यवर्यमाचार्य
गुत्पत्ति विधावुपास्य।
स्तम्भस्य लक्ष्मातनुते नृपाल:
श्रीकुंभकर्णे जय भाषितेन।। 3।।

यह ग्रंथ आज अनुपलब्ध हैं, इसकी एक शिला मौजूद है जिसमें इसका संक्षिप्त संकेतित है। जिस कुंभा ने इस कला को अक्षुण्ण रखने का प्रयत्न कर शिलोत्कीर्ण करवाया, वे शिलाएं ही पूरी तरह नदारद है। मगर, केवल अवशेष कह रहे हैं कि ये कला बेमिसाल थी और अनेक प्रकार के लक्षणों वाले स्तंभों का निर्माण होता था। कालिदास ने जिस तरह उजड़ी हुई अयोध्यापुरी में खुर्द-बुर्द जयस्तम्भ का जिक्र किया है, अब वहां क्या कोई अवशेष है ?

यहां यह भी खास संकेत है कि पुरानी बस्तियों की पहचान स्तम्भ से होती है। स्तम्भ के आधार से किसी वापी, कूप, तालाब के पुरातन प्रमाणों को भी खोजा जा सकता है।