मलेरिया से बचाए शरद पूर्णिमा

शरद पूर्णिमा की रात खीर बनाकर अस्थमा रोगियों को खिलाने की प्रथा से तो सब परिचित हैं, लेकिन यहां हम बात कर रहे हैं खीर से मलेरिया का सामना करने की। वास्तव में हमारी हर प्राचीन परंपरा में वैज्ञानिकता का दर्शन होता है, अज्ञानता का नहीं। यह बात हमें बाद में समझ में आती है। श्राद्ध से लेकर शरद पूर्णिमा तक जो खीर हम खाते हैं वह हमें कई तरह के फायदे पहुंचाती है।
जैसे हम सब जानते है मच्छर काटने से मलेरिया होता है वर्ष मे कम से कम 700-800 बार तो मच्छर काटते ही होंगे अर्थात 70 वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते लाख बार मच्छर काट लेते होंगे। लेकिन अधिकांश लोगों को जीवनभर में एक-दो बार ही मलेरिया होता है। सारांश यह है मच्छर के काटने से मलेरिया होता है, यह बात पूरी तरह सत्य नहीं है।
जानिए विज्ञान क्या कहता है। वर्षा ऋतु के बाद शरद ऋतु आती है। आकाश में बादल धूल न होने से कडक धूप पड़ती है जिससे शरीर में पित्त कुपित होता है। इसी समय गड्ढो मे जमा पानी के कारण बहुत बड़ी मात्र मे मच्छर पैदा होते है। इससे मलेरिया होने का खतरा सबसे अधिक होता है। वैज्ञानिक दृष्टि से शरद पूर्णिमा की रात स्वास्थ्य के लिहाज से बहुत गुणकारी मानी जाती है। इस दिन चंद्रमा धरती के बहुत समीप होता है और इस वजह से इसकी किरणें सीधे धरती तक पहुंचती हैं। इस खास दिन चन्द्रमा की किरणों में खास तरह के विटामिन आ जाते हैं जिससे इसकी रोशनी में रखी गई खीर और भी ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक बन जाती है।
सभी जानते है बैक्टीरिया बिना उपयुक्त वातावरण के नहीं पनप सकते। जैसे दूध में दही डालने मात्र से दही नहीं बनता। दूध हल्का गरम होना चाहिए और उसे ढंककर गरम वातावरण में रखना होता है। बार-बार हिलाने से भी दही नहीं जमता। ऐसे ही मलेरिया के बैक्टीरिया को जब पित्त का वातावरण मिलता है, तभी वह चार दिन में पूरे शरीर में फैलता है नहीं तो थोड़े समय में खत्म हो जाता है। सारे मच्छरमार प्रयासो के बाद भी मच्छर और रोगवाहक सूक्ष्म कीट नहीं काटेें, यह हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन पित्त को नियंत्रित रखना हमारे हाथ में तो है? अब हमारी परम्पराओं का चमत्कार देखिये। खीर खाने से पित्त का शमन होता है। गाय के दूध की हो तो अतिउत्तम, विशेष गुणकारी (आयुर्वेद में घी से अर्थात् गौ घी और दूध गौ का)। इसके सेवन से मलेरिया होने की संभावना नहीं के बराबर हो जाती है।

शरद पूर्णिमा की रात चन्द्रमा अमृत वर्षा करता है। इसलिए इस रात में खीर को खुले आसमान में रखा जाता है और सुबह उसे प्रसाद मानकर खाया जाता है। माना जाता है कि इससे रोग मुक्ति होती है और उम्र लंबी होती है। निरोग शरीर के रूप में स्वास्थ्य का कभी न खत्म होने वाला धन दौलत से भरा भंडार मिलता है। शरद पूर्णिमा को रातभर चाँदनी के नीचे चाँदी के पात्र में रखी खीर सुबह खाई जाती है (चाँदी का पात्र न हो तो चाँदी का चम्मच खीर में डाल दे, लेकिन बर्तन मिट्टी या पीतल का हो, क्योंकि स्टील जहर और एल्यूमिनियम, प्लास्टिक, चीनी मिट्टी महा-जहर हैं)। यह खीर विशेष ठंडक पहुंचाती है।
खीर बनाने की विशेष विधि

शरद पूर्णिमा को देसी गाय के दूध में दशमूल क्वाथ, सौंठ, काली मिर्च, वासा, अर्जुन की छाल चूर्ण, तालिश पत्र चूर्ण, वंशलोचन, बड़ी इलायची और पिप्पली, इन सबको आवश्यक मात्रा में मिश्री मिलाकर पकाएं और खीर बना लें। खीर में ऊपर से शहद और तुलसी पत्र मिला दें। ध्यान रहे, इस ऋतु में बनाई खीर में केसर और मेवों का प्रयोग न करे। अब इस खीर को साफ बर्तन में डालकर रात भर शरद पूर्णिमा की चांदनी रात में खुले आसमान के नीच रखें, ऊपर से जालीनुमा ढक्कन से ढक कर छोड़ दें। अपने घर की छत पर बैठ कर चंद्रमा को अघ्र्य देकर, अब इस खीर को रात्रि जागरण कर रहे दमे के रोगी को प्रात: काल ब्रह्म मुहूर्त (4-6 बजे प्रात:) में सेवन कराएं।

इससे रोगी को सांस और कफ दोष के कारण होने वाली तकलीफों में काफी लाभ मिलता है। रात्रि जागरण के महत्व के कारण ही इसे जागृति पूर्णिमा भी कहा जाता है, इसका एक कारण रात्रि में स्वाभाविक कफ के प्रकोप को जागरण से कम करना है। इस खीर को मधुमेह से पीडि़त रोगी भी ले सकते हैं, बस इसमें मिश्री की जगह प्राकृतिक स्वीटनर स्टीविया की पत्तियों को मिला दें।

उक्त खीर को स्वस्थ व्यक्ति भी सेवन कर सकते हैं, बल्कि इस पूरे महीने मात्रा अनुसार सेवन करने से साइनोसाईटीस जैसेे उध्र्वजत्रुगत (ई.एन.टी.) से सम्बंधित समस्याओं में भी लाभ मिलता है। कई आयुर्वेदिक चिकित्सक शरद पूर्णिमा की रात दमे के रोगियों को रात्रि जागरण के साथ कर्णवेधन भी करते हैं, जो वैज्ञानिक रूप सांस के अवरोध को दूर करता है।
तो बस शरद पूर्णिमा को पूनम की चांदनी का सेहत के परिप्रेक्ष्य में पूरा लाभ उठाएं। बस ध्यान रहे दिन में सोने को अपथ्य माना गया है।