सांस्कृतिक सीमाएं और शांति की संभावनाएं

सांस्कृतिक सीमाएं और शांति की संभावनाएं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्र बलोचिस्तान की बात कह कर बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया है। कई लोग प्रधानमंत्री के इस बयान की आलोचना कर रहे हैं। परंतु प्रधानमंत्री ने कोई अनोखी बात नहीं की है। उन्होंने भारत की सांस्कृतिक सीमाओं के अनुकूल बात ही की है। भारत की सांस्कृतिक सीमाओं की अगर चर्चा करें तो सामान्यत: हम पाकिस्तान, बांग्लादेश और बहुत अधिक हुआ तो अफगानिस्तान के बारे में सोचते हैं। परंतु वास्तव में देखा जाए तो भारत की सांस्कृतिक सीमाएं इससे कहीं अधिक विस्तारित रही हैं। यह एक विडम्बना रही है कि भारत की सरकारें अपनी इस सांस्कृतिक सीमाओं की उपेक्षा करती रही हैं। प्रधानमंत्री मोदी इतिहास की उन्हीं गलतियों को सुधारने की कोशिश कर रहे हैं। इसका एक बड़ा उदाहरण तिब्बत है।
वर्ष 1951 से पहले तक तिब्बत एक अलग राज्य था जो सांस्कृतिक रूप से पूरी तरह भारत का अंग था। तिब्बतनिवासी बौद्ध मत को मानते थे जोकि एक भारतमूलक मत है और तिब्बती भाषा में संस्कृत और पाली के बड़ी संख्या में अनुवादित ग्रंथ पाए जाते हैं जिनमें से कई तो अभी मूल रूप में अप्राप्य हो चुके हैं। दुखद बात यह है कि जब चीन ने तिब्बत पर कब्जा किया तो भारत की तत्कालीन सरकार ने तिब्बत का सहयोग नहीं किया। इस मुद्दे पर तत्कालीन समाजवादी नेता स्व. जयप्रकाश नारायण ने सरकार की नीति की आलोचना करते हुए लिखा था, ”यहां अक्सर यह प्रश्न उठाया जाता है कि क्या तिब्बत को बचाने के लिए भारत कुछ कर सकता था? मुझे पूरा विश्वास है कि कर सकता था। स्मरण रहे कि अकेला पड़ जाने के बावजूद तिब्बत चीनी आक्रमण का प्रश्न संयुक्त राष्ट्रसंघ असेंबली में नवंबर 1950 में अल सल्वाडोर द्वारा उठवाने में सफल हो सका था। लेकिन जब जनरल कमेटी ने इस प्रस्ताव पर विचार करना आरंभ किया, तब भारत के प्रतिनिधि जाम साहब की प्रेरणा तथा इंग्लैंड के प्रतिनिधि केनिथ यंगर के कारण प्रस्ताव पेश कराने वाले ने उसे वापस ले लिया। यह इसलिए हुआ कि भारत ने कमेटी को आश्वासन दिया था कि इस समस्या का शांतिपूर्वक हल हो जाएगा। भारत ने तब यदि इस प्रस्ताव का समर्थन किया होता तो इसमें शक नहीं कि असेंबली ने प्रस्ताव पास कर लिया होता। उस समय चीन कोरिया के मामले में उलझा हुआ था। चीन-विषयक जानकार बताते हैं कि तिब्बत को तब थोडे भी शस्त्र दिए जाते तो चीन ठिठक जाता और तिब्बत को चीन का मुकाबला करने के लिए आवश्यक समय मिल जाता। यदि यह प्रस्ताव पारित हो जाता तो तिब्बत स्वतंत्र देश के तौर पर मान्य भी हो जाता।
जयप्रकाश नारायण ने आगे लिखा है कि इससे न केवल भारत का नैतिक कद और अधिकार कमजोर हुआ, बल्कि शांति की संभावनाएं भी कमजोर हुईं। इससे अंतत: भारत को वर्ष 1962 में चीन से युद्ध झेलना पड़ा। तिब्बत की भांति बलोचिस्तान का प्रश्न केवल एक प्रदेश का प्रश्न नहीं है। यह प्रश्न है एक पूरी सांस्कृतिक अस्मिता की, जिसपर खतरा मंडरा रहा है और जिसकी रक्षा के लिए वहां के लोग सन्नध हो रहे हैं। भारत की विदेशनीति इस सांस्कृतिक सीमा को ठीक से समझ कर बनाई जाए तो इससे न केवल भारत का अंतरराष्ट्रीय कद ऊंचा होगा, बल्कि भारत के आस-पड़ोस में शांति की संभावनाएं भी बढ़ेंगी।