साबरमती-गुरुकुलम् भारतीय विद्याओं का सर्वोत्तम केंद्र

गुंजन अग्रवाल
लेखक इतिहास के विद्बान तथा वरिष्ठ पत्रकार हैं।


यह जान कर आप हैरान हो सकते हैं कि भारत का एक स्कूली छात्र कम्प्यूटर से भी तेज गणित कर सकता है। परंतु आपकी हैरानी तब और बढ़ जाएगी, जब आप यह जानेंगे कि वह छात्र किसी आधुनिक कान्वेंट का नहीं है, बल्कि पिछड़ा माने जाने वाले गुरुकुल का है। यह कमाल करके दिखाया है हेमचंद्राचार्य गुरुकुल के छात्र तुषार ने। उसने वर्ष 2015 में दो-दो बार केवल तीन मिनट तथा सत्तर सेकेंड तथा तीन मिनट दस सेकेंड में गणित के 70 प्रश्नों को हल करके दिखा दिया। हेमचन्द्राचार्य संस्कृत पाठशाला, गुजरात के साबरमती, अहमदाबाद में स्थित एक प्रसिद्ध संस्कृत पाठशाला है। गुरुकुलम् का वातावरण प्राचीन गुरुकुल-पद्धति के अनुसार बनाने का प्रयास किया गया है। यहाँ पर कुल 72 विद्याएं 64 कलाएं हैं, जिनका अध्ययन बालक की क्षमता और रुचि के अनुसार उसे कराया जाता है। इस पाठशाला के सभी वर्ग की दीवारें, भूमि इत्यादि गोबर से लिपी हुई हैं तथा ऐसा प्रतीत होता कि विद्यार्थी इस वातावरण में शिक्षा का आनन्द ले रहे हैं। पाठशाला की वास्तु ऐसी है कि गर्मी में भी ठड़ प्रतीत होती है।

गुजरात के साबरमती में स्थित हेमचन्द्राचार्य संस्कृत पाठशाला प्रचलित नाम साबरमती-गुरुकुलम् आर्य शिक्षा पद्धति का एक विश्वविख्यात नि:शुल्क आवासीय शिक्षा केन्द्र है। मात्र 13 विद्यार्थियों के साथ 30 दिसम्बर, 2008 को इसका शुभारम्भ किया गया था। इस गुरुकुल की प्रेरणा से सूरत, मुम्बई, जोधपुर, बंगलुरू, चेन्नई, कनेरी (महाराष्ट्र) आदि कई स्थानों पर भारतीय संस्कृति को प्रकाशमान करनेवाले अन्य गुरुकुलों का शुभारम्भ हुआ है। श्री उत्तमभाई जमानमल शाह इस गुरुकुल के संस्थापक-कुलपति हैं।
इ स गुरुकुल में छोटे-छोटे बच्चे आधुनिकता से कोसों दूर पारम्परिक गुरुकुल जैसे वातावरण में शिक्षा पा रहे हैं, पर उनकी मेधाशक्ति किसी भी महंगे पब्लिक स्कूल के बच्चों की मेधाशक्ति को बहुत पीछे छोड़ चुकी है। ये सभी बच्चे संस्कृत में वार्ता करते हैं, आर्य शास्त्रों का अध्ययन करते हैं, देशी गाय का दूध-घी खाते हैं, बाजारू सामानों से बचकर रहते हैं, यथासंभव प्राकृतिक जीवन जीते हैं। घुड़सवारी, ज्योतिष, शास्त्रीय संगीत, चित्रकला आदि विषयों का इन्हें अध्ययन कराया जाता है। बच्चों की अभिरुचि के अनुसार उनका पाठ्यक्रम तैयार किया जाता है। परीक्षा की कोई निर्धारित पद्धति नहीं है। पढ़कर निकलने के बाद कोई डिग्री भी नहीं मिलती। यहाँ पढऩेवाले अधिकतर बच्चे 15-16 वर्ष से कम आयु के हैं।

इस गुरुकुल के संस्थापक उत्तम भाई ने यह निर्णय किया कि उन्हें योग्य, संस्कारवान्, मेधावी व देशभक्त युवा तैयार करने हैं जो जिस भी क्षेत्र में जाएँ, अपनी योग्यता का लोहा मनवा दें और आज यह हो रहा है। दर्शक इन बच्चों की बहुआयामी प्रतिभाओं को देखकर दाँतोंतले अंगुली दबा लेते हैं। स्वयं डिग्रीविहीन उत्तम भाई का कहना है कि उन्होंने सारा ज्ञान स्वाध्याय और अनुभव से अर्जित किया है। उन्हें लगा कि भारत की मौजूदा शिक्षा-प्रणाली, जोकि मैकाले की देन है, भारत को पुन: दास बनाने के लिए लागू की गई थी। इसीलिए भारत दास बना और आज तक बना हुआ है। इस दासता की जंजीरें तब टूटेंगी, जब भारत का हर युवा प्राचीन गुरुकुल-परम्परा से पढ़कर अपनी संस्कृति और अपनी परम्पराओं पर गर्व करेगा। तब भारत फिर से विश्वगुरू बनेगा, आज की तरह कंगाल नहीं।

प्रमुख विशेषताएँ : एक दृष्टि में
<  नि:शुल्क आवासीय प्रशिक्षण।
<  बोझरहित शिक्षा।
<  मैकाले-शिक्षा का प्रभावशाली विकल्प।
<  सक्षम, सशक्त, अडिग, सौम्य, प्राज्ञ, नीडर, विनम्र, विवेकी, धैर्यवान् एवं चरित्रवान् व्यक्तित्व का निर्माण।
<  विद्या, कला व कौशल का त्रिवेणी संगम।
<  समग्र और सर्वांगीण विकास।
<  शुद्ध, विष से मुक्त (रसायनों और कीटनाशकों से रहित) सम्पूर्ण निर्दोष बल एवं स्वास्थ्यदायक आहार।
<  खान-पान के लिए वर्षा ऋतु में प्राप्त दिव्य जल, वर्षाकालीन जल संचयन के लिए एक लाख लीटर क्षमता की टंकी।
<  पात्र, वस्त्र, आसन, बैठक, शिक्षा, शयन, आदि सभी की सम्पूर्ण भारतीय पद्धति से सुव्यवस्था।
<  घुड़सवारी, घोड़ा गाड़ी इत्यादि की प्रशिक्षण।

गुरुकुलम् में सिखाई जाने वाली कलाएँ
<  चित्रकला: रेखाचित्र, आकृतियाँ, वास्तविक चित्र, चार्ली चित्र, व्यंग्य-चित्र, छायाचित्र, रंगीन चित्र।
<  संगीतकला: गायन-विभिन्न रागों का ज्ञान व प्रशिक्षण।
<  वादन: सितार, ढोलक, तबला, पखवाज, हारमोनियम, डफ, मंजीरा, संतूर, वेणुवादन, वायलिन, सारंगी, जलतरंग, इत्यादि।
<  अभिनय/नाट्यकला: नृत्य (कत्थक, रास, दीवानृत्य, बांबुनृत्य, भांगडानृत्य, चामरनृत्य, झांझनृत्य इत्यादि) नाटक, एकांकी नाटक, संवाद मुखमुद्राएँ और शारीरिक चेष्टाएँ।
<  सम्भाषण: वक्तृत्व, भाषण, कथन।
<  जादूकला: मूलभूत सिद्धांत व विभिन्न खेल।
<  पाककला: उबालना, तलना, सेंकना, तड़का लगाना, स्वास्थ्य-अनुकूल भोजन बनाना।
<  सृजनकला: विविध चीज-वस्तुएँ बनाना एवं सर्जन करना।
<  सिलाई : विविध टाँकों का ज्ञान, कातना, चरखा चलाना।
<  शाृंगार : शरीर-शाृंगार, मंडप-शाृंगार, गृह-शाृंगार, मंच-शाृंगार।
<  पठन: शीघ्र और प्रभावी पठन का अ•यास।
<  लेखन: हस्तलेखन, लेख, निबन्ध, कहानी, अहेवाल, योजनापत्र, भाषण, काव्य, नाटक, संवाद।
<  अन्य कला: गहूली, रंगोली, अल्पना, अतिथि-सत्कार।

गुरुकुलम् में प्रदान की जानेवाली कुशलताएँ
< साक्षरता-विषयक कुशलता: लेखन, पठन, श्रवण
< शरीर-संतुलन व प्रशिक्षण और क्रियाएँ: लाठीदाव, कुस्ती, जूडो, कराटे। रोप-मलखम, पोल-मलखम, जिम्नास्टिक क्रीडा।
< सवारी: घुड़सवारी, बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी इत्यादि चलाना।
< सुश्रूषा-विषयक: उपचार करना, मालिश करना, सेंक करना, पट्टी बांधना, लेपन करना, पगचंपी, शरीर दबाना।
< बंधन-विषयक: विभिन्न किस्म की गाठ बाँधना, फंदा बनाना, नाड़ा बाँधना, बक्सा या बण्डल बाँधना, पैकेट बाँधना, दवाई का पैकेट मोडऩा, इत्यादि।
< रोज-ब-रोज की बातें: वस्त्र धोना। आसन बिछाना, आलमारी-पेटी को सजाना इत्यादि।
< गौ-विषयक: गौ दोहन, गौबर-थोपन को थेपना इत्यादि।

< भक्ति-विषयक: आरती उतारना, दीया तैयार करना, दीया जलाना, धूप करना, भगवान की अंगरचना करना, इत्यादि।
< आयोजन/संचालन विषयक: नेतृत्व, खरीदना, देखभाल करना, यात्रा-प्रवास, कार्यक्रम-महोत्सव इत्यादि का आयोजन करना।
< अन्य कुशलताएँ : स्वयंसेवक के लिए प्रशिक्षण (आपदा, भूकम्प-आग-बाढ़-बीमारी-मृत्यु के समय) आपातकालीन उपचार का प्रशिक्षण, विविध राष्ट्रीय-सामाजिक-धार्मिक पर्वों की जानकारी-समझ, बाल-मेलों का आयोजन, अख़बारों की जानकारी, उद्यापन-कार्य, मिट्टी-कार्य, जल-संचय, ऐतिहासिक स्मारकों का प्रवास।

गुरुकुलम् में प्रदान की जानेवाली विद्याएँ
< भाषाएँ : संस्कृत, प्राकृत, गुजराती, हिंदी, अंग्रेजÞी।
< जैन दर्शन और जैनाचार : षट् दर्शन, तव ज्ञान, आवश्यक सूत्र-अर्थ-रहस्य एवं क्रिया।
< गणित : गणना की सरल और शीघ्र पद्धतियाँ, व्यावहारिक गणनाएँ।
< आयुर्वेेद: स्वस्थवृत्त (दिनचर्या-ऋतुचर्या-जीनवचर्या), चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता, अष्टांगहृदय, भावप्रकाश, इत्यादि ग्रंथों का अध्ययन।
< ज्योतिषशास्त्र : ऋतु ज्ञान, पंचांग, राशि काल, मुहूर्त, चौघडिय़े, होरा, प्रहर, चन्द्र, योगिनी, सन्मुख काल, कुण्डली, फलादेश, शगुन-स्वप्न संकेतविद्या, शारीरिक मुद्राओं का

प्राथमिक ज्ञान, अष्टांग निमित्त इत्यादि का अध्ययन।
< कौटिल्य का अर्थशास्त्र: संचालन (मैनेजÞमेन्ट) और नेतृत्व का प्रशिक्षण।
< इतिहास: रामायण, महाभारत, जैन-धर्म का इतिहास विभाग 1 से 4 सहित और विश्व की सर्व परम्पराओं का ज्ञान।
< आन्वीक्षिकीविद्या : न्यायविद्या (बुद्धि कथाएँ, शतरंज की क्रीड़ा, पहेलियाँ)
< नीतिशास्त्र: चाणक्य का नीतिशास्त्र एवं विभिन्न नीतिकथाएँ।
< वास्तुशास्त्र : गृहवास्तु, नगरवास्तु, मन्दिरवास्तु, आधारवास्तु।
< पदार्थ ज्ञान और सामान्य ज्ञान: द्रव्य, परमाणु, स्कन्ध, द्रव्य और स्कन्ध का रूपांतरण, द्रव्य के विभिन्न गुण और विश्व की वर्तमान गम्भीर समस्याएँ।
< विविध शास्त्र : शिल्पशास्त्र, वनस्पतिशास्त्र, रत्नशास्त्र, भूगर्भ-जलविद्या, तन्त्रशास्त्र, मन्त्रशास्त्र, यन्त्रशास्त्र, धातुशास्त्र, कृषि व पशुशास्त्र, कृषि इत्यादि 100 शिल्प,

क्षेत्रविद्या (विश्व दर्शन-भूगोल) बृहद्क्षेत्र समास।
< अध्यात्मविद्या : पतञ्जलि योगदर्शन, अन्य योग-दर्शन, ध्यान, आत्मा का विकास क्रम, सम्यक्त्व व मुक्ति।
< व्यवसायविद्या : लेखांकन (हिसाब), लेन-देन, क्रय-विक्रय, उत्पादन व निर्माण, व्यवस्था व संचालन, प्रचार-प्रसार।

संपर्क:
साबरमती-गुरुकुलम्
हीराजैन सोसाइटी के पास, रामनगर, साबरमती, अहमदाबाद-380005
दूरभाषः : 9898099066, 8866020402, (079) 27501944, 7046186517