रागों में छुपा है स्वास्थ्य का राज

नेहा जैन
लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।


भारतीय संस्कृति को अपनी परम्पराओं, विशालता, जीवन्तता के कारण सर्वत्र सराहा गया है व विश्वभर में विद्यमान संस्कृतियों में श्रेष्ठतम माना गया है। भारतीय संस्कृति ने प्राचीन काल से ही विदेशियों को प्रभावित किया है। भारतीय चिन्तन के अनुसार भारतीय सभ्यता व संस्कृति की संवाहक हैं कलाएं। जीवन में सकारात्मक प्रवृत्ति, उल्लास व उत्साह भरने के लिए कलाएं मनुष्य को सदैव प्रेरित करती आई हैं जिनमें से सबसे उत्कृष्ट ललित कलाओं को माना गया है। इन ललित कलाओं में संगीत का स्थान सर्वोपरि है। संगीत एक ऐसी विधा है जो मानव चित्त पर विशेष व अमिट छाप छोड़ती है। भारतीय शास्त्रीय संगीत को विश्व के अन्य देशों के संगीतों से श्रेष्ठ माना गया है। भारतीय शास्त्रीय संगीत का जन्म वैदिक युग में हुआ। उस समय संगीत ईश्वर प्राप्ति का सोपान था। देश के प्रमुख ग्रंथ गीता को श्रीकृष्ण ने बोलकर नहीं गाकर सुनाया, इसीलिए उसका नाम गीता पड़ा। ऋग्वेद में भी कहा गया है कि तुम यदि संगीत के साथ ईश्वर को पुकारोगे तो वह तुम्हारी हृदय गुहा में प्रकट होकर अपना प्यार प्रदान करेगा। संगीत में ईश्वर बसा हुआ है।

भारतीय शास्त्रीय संगीत की विशेषता राग पद्धति है जो किसी कलाकार की व्यक्तिगत प्रतिभा को सामने लाती है। स्वर तथा ताल किसी न किसी रूप में विश्व के सभी संगीतों में विद्यमान हैं लेकिन राग पद्धति केवल भारतीय शास्त्रीय संगीत की विशेषता है। राग का मूल अर्थ रंगना है, अर्थात रंग देने की प्रक्रिया। राग मानव चित्त को अपने रंग में रंग देता है,जिससे मानव चित्त प्रसन्न हो उठता है।

भारतीय शास्त्रीय संगीत केवल जन मनोरंजन का ही साधन नहीं है, इसका सम्बन्ध प्रकृति व मानव शरीर से भी रहा है। भारत के प्राचीन वेदों में भारतीय संस्कृति व जीवन के तौर-तरीकों का वर्णन किया गया है। उसी में संगीत को सबसे बेहतर माना गया है। भारतीय शास्त्रीय संगीत का मानव स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। संगीत के सातों सुरों सा, रे, गा, मा, पा, धा, नि का शरीर पर विशेष प्रभाव पड़ता है। योग में शरीर के सात चक्रों का वर्णन किया गया है जो मानव शरीर के विभिन्न भागों का संचालन करते हैं। संगीत के सात सुरों का इन सात चक्रों पर विभिन्न प्रभाव पड़ता है। सा मूलाधार, रे स्वाधिष्ठान, गा मणिपुर, मा अनाहत, पा विशुद्ध, धा आज्ञा और नि सहस्र चक्र को सुचारू रखने में मदद करते हैं। वेदों में संगीत को योग माना गया है जिससे मानव शरीर स्वस्थ रहता है। शरीर रचना विज्ञान के अनुसार सभी बीमारियां वात, पित्त व कफ दोषों के कारण होती है। इन दोषों के निवारण में राग विशेष भूमिका निभाते हैं।

रागों से आत्मिक सुख की अनुभूति होती है जिसके कारण इसे रोग निवारण में उपयुक्त माना गया है। रागों से चिकित्सा को लेकर कुछ प्रयोग भी हुए हैं। 20वीं सदी में पं. ओंकारनाथ ठाकुर ने राग पूरिया के चमत्कारिक गायन से इटली के शासक मुसोलिनी को अनिद्रा रोग से मुक्ति दिलाई थी। राग को अल्जाइमर के इलाज में भी लाभकारी माना गया है। अल्जाइमर रोग भूलने की बीमारी से सम्बन्धित है जो गंभीर अवस्था में रोगी के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। प्रसिद्ध न्यूरोलॉजिस्ट डां. आलिवर स्मिथ के अनुसार राग शिवरंजनी सुनने से स्मरण शक्ति बढ़ाई जा सकती है। वर्तमान में वैज्ञानिकों और चिकित्सकों ने प्रमाणित किया है कि 80 प्रतिशत बीमारियां मानसिक कारणों जैसे तनाव, चिंता, अवसाद आदि से होती है और संगीत एक ऐसी विधा है जिससे मानसिक संतुलन बना रहता है। रागों द्वारा चिकित्सा संगीत चिकित्सा कहलाती है। आज संगीत चिकित्सा पर शोध हो रहे हैं और इसके सकारात्मक परिणाम निकलकर सामने आए हैं। रागों को सुनने के लिए विशेष समय निर्धारित किए गए हैं। यूं तो संगीत किसी भी समय सुना जा सकता हैं लेकिन स्वस्थ रहने के लिए इसको समयानुसार सुनना चाहिए। आयुर्वेद के अनुसार वात, पित्त और कफ दोष दिन के 24 घंटों के दौरान चक्रीय क्रम में कार्य करते है। सभी राग अलग-अलग मनोवृत्ति से जुड़े हुए है जिसके कारण रागों का स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है। समयानुसार रागों को सुनकर रोगों पर नियंत्रण करके विशेष लाभ उठाया जा सकता है।

इसके अलावा राग मारवा और भोपाली सुनने से आंतें मजबूत होती है। वहीं मोबाइल, चलचित्र व खानपान प्रभावित होने के कारण विश्व में नपुंसकता के रोग बढ़ गए है। राग वसंत और राग सुरख नपुसंकता को दूर भगाते है। आसावारी, भैरवी व सुहानी राग सुनने से मस्तिष्क संबंधी रोगों व सिरदर्द से छुटकारा पाया जा सकता है।

इन रागों को सुनकर रोगों का उपचार किया जा सकता है। रागों को यदि ईश्वर की स्तुति में मिला दिया जाए तो इसका विशेष लाभ होता है। इससे आत्मिक शांति तो मिलती ही है साथ ही ईश्वर को भी प्राप्त किया जा सकता है। संगीत के सात स्वरों द्वारा ईश्वर की अराधना होती है। सा द्वारा ब्रह्मा, रे द्वारा अग्नि, गा द्वारा रूद्र, मा द्वारा विष्णु, पा द्वारा नारद, धा द्वारा गणेश और नि द्वारा सूर्य की उपासना की जाती है।

संगीत और प्रकृति के बीच संबंध
भगवान श्री कृष्ण जब बांसुरी बजाते थे तो गाय ज्यादा दूध देती थी। संगीत का प्रकृति के साथ घनिष्ठ संबंध रहा है। संगीत के सात स्वरों की उत्पत्ति भी प्रकृति से हुई है। सा की उत्पत्ति मोर के स्वर से, रे की उत्पत्ति ऋषभ जैसे बैल, गाय आदि। ग की उत्पत्ति अज यानि भेड़, बकरी, म क्रौंच पक्षी का स्वर है। प की उत्पत्ति कोयल से हुई है। कहा भी जाता है कि पंचम स्वर में कोयल बोले। ध धैवत है यानि घोड़ा और नि की उत्पत्ति हाथी के स्वर से हुई है। उल्लेखनीय है कि पक्षी, जीव-जन्तु केवल एक ही स्वर में बोल सकते हैं जबकि मनुष्य सारे स्वरों में गा सकता है।

भारतीय शास्त्रीय संगीत के महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अकबर के दरबार में नवरत्नों में शामिल तानसेन राग मल्हार गाकर वर्षा ला देते थे और राग दीपक गाकर दीप जला देते थे। रागों के स्वर का प्रकृति पर विशेष प्रभाव पड़ता है। हाल ही में मध्यप्रदेश के वन विभाग में एक शोध हुआ जिसमें वृक्ष प्रजातियों को मशहूर सितार वादक रविशंकर की राग भैरवी में निबद्ध रचना सुनाई गई। राग से आंवला और सीताफल सरीखी फल प्रजातियों के बीजों में अंकुर फूटने की दर में 9 प्रतिशत का इजाफा हुआ। रागों से पशुओं के कठोर व्यवहार पर भी काबू पाया जा सकता है।