प्रार्थना के बहाने देश पर चोट

धरोहर की चर्चा करने पर हमारे मन में केवल कुछ पुराने भवनों या उनके खंडहरों का चित्र उभरता है। क्योंकि स्वाधीनता के बाद से यही स्थापित किए जाने का प्रयास किया गया। इसके कारण हम अपनी वास्तविक धरोहर यानी उस विशाल ज्ञानराशि की उपेक्षा कर बैठे, जिसे हमारे पूर्वजों ने बड़ा संभाल कर हम तक पहुँचाया है। यह ज्ञानराशि जो कि हमारे वेदों, उपनिषदों, ब्राह्मण ग्रंथों, स्मृतियों आदि में सुरक्षित है, किसी संप्रदाय, मजहब या रिलीजियन के लिए नहीं है, वह पूरी मानवता के लिए है। इसके असंख्य उदाहरण दिए जा सकते हैं कि वेदों की शिक्षा पूरी मानवता के लिए है और उनमें किन्हीं देवी-देवताओं की उपासना की बात नहीं कही गई है। इस बात को सर्वोच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई करते हुए रेखांकित किया था और इसलिए उन्होंने हिंदुत्व को एक रिलीजन मानने की बजाय एक जीवन पद्धति की संज्ञा दी थी।

इसके बाद भी केवल चुनावी चालों, सत्ता समीकरणों और आज की घटिया चुनावी नीति के कारण देश की इस अमूल्य धरोहर पर प्रश्नचिह्न खड़ा किया जाने लगा है। दुर्भाग्य यह भी है कि इस पर प्रश्नचिह्न खड़े करने वाले इस धरोहर तथा परंपरा से बाहर के लोग यानी पारसी, यहूदी, ईसाई अथवा मुसलमान नहीं हैं, वे उसी सनातन परंपरा के लोग हैं, जिन पर इस धरोहर की रक्षा और उसको आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी है। एक विदेशी विचार के वशीभूत हो, स्वयं के जड़ों से कटे ये लोग अपने पूर्वजों के साथ धोखा तो कर ही रहे हैं, वे अपनी भावी पीढ़ी के साथ भी घोर अन्याय कर रहे हैं और इसमें गर्व का अनुभव भी कर रहे हैं।

इस बार यह मामला केंद्रीय विद्यालय की प्रार्थना को लेकर खड़ा किया गया है। मध्य प्रदेश के एक वकील ने एक जनहित याचिका दायर की थी कि केंद्रीय विद्यालय की प्रार्थना एक धर्म विशेष को बढ़ावा देती है और वह देश की सेकुलर नीतियों के विरुद्ध है। इस पर न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि चूँकि यह मामला काफी गंभीर है, इसलिए इसकी सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ करेगी। यह प्रश्न देश के हजारों कान्वेंटों में की जा रही ईसाई प्रार्थना पर आज तक किसी ने नहीं किया, जबकि कान्वेंट न तो ईसाई मत के केंद्र हैं और न ही वहाँ केवल ईसाई बच्चे पढ़ते हैं। कांन्वेंटों में तो अधिकांशत: हिंदू बच्चे ही पढ़ते हैं तो यह प्रश्न उठाया जाना चाहिए कि आखिर एक सेकुलर देश में ईसाई प्रार्थना स्कूलों में क्यों करवाई जाती है। इसके विपरीत केंद्रीय विद्यालयों की प्रार्थना पर आक्षेप किया गया है जो कि केवल संस्कृत में ही है, वह किसी मत-पंथ से जुड़ी हुई नहीं है।

इतना ही नहीं, यह प्रार्थना साठ के दशक से चली आ रही है। केंद्रीय विद्यालयों में पढऩे वाले लाखों मुस्लिम बच्चों के परिवारों को इससे कोई कठिनाई नहीं हुई, देश के राष्ट्रपति, केंद्रीय मंत्री, शिक्षा मंत्री आदि प्रतिष्ठित शासकीय पदों पर रहे मुस्लिम नेताओं को इससे कोई तकलीफ नहीं हुई, इससे तकलीफ हुई एक स्वयं को कम्युनिस्ट कहने वाले हिंदू नामधारी व्यक्ति को। इससे संदेह होता है कि कहीं यह कांग्रेस की कोई चुनावी चाल तो नहीं है कि इस मामले को ठीक लोकसभा चुनावों के पहले न्यायालय ने संज्ञान में ले लिया है। एक ओर न्यायालय के पास अयोध्या जैसे गंभीर और जनमन से जुड़े मामले की सुनवाई के लिए समय नहीं है, दूसरी ओर उसकी संविधान पीठ देश की अमूल्य धरोहर को एक मिथ्या यूरोपीय सिद्धांत के नाम पर न्योछावर करने के मामले की सुनवाई करेगी। इसे दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है।