लोकतंत्र बनाम चुनावतंत्र कल, आज और कल



रवि शंकर

कार्यकारी संपादक


हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में जाने जाते हैं। निश्चय ही यह पद बड़ा ही गौरवपूर्ण जान पड़ता है। इतिहास की बात करें तो कहा जाता है कि वैशाली और लिच्छिवी गणराज्यों को छोड़ कर तो भारत में हमेशा राजतंत्र रहा है। चूँकि आज राजतंत्र को शासन की एक निकृष्ट व्यवस्था माना जाता है। इसलिए बताया जाता है कि भारत में इस लोकतंत्र का होना हमारे लिए बड़े ही लाभ और गौरव का विषय है। भारत में लोकतंत्र के भूतकाल यानी कि इतिहास और भविष्य पर चर्चा आरंभ करने से पहले हम वर्तमान की चर्चा शुरू करते हैं।

लोकतंत्र आज
भारत में आज इंग्लैंड के नकलवाली संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था है। इसमें हर पांच वर्ष में चुनाव होते हैं और उसमें जनता सरकार बनाती है। इसे लोकतंत्र की खुबसूरती माना जाता है कि हरेक पाँच वर्ष में जनता को यह अधिकार होता है कि वह चाहे तो अपनी सरकार बदल दे। इससे सरकार पर एक दबाव बना रहता है कि वह जनता के हित में काम करे। हैरत की बात यह है कि अपने देश में ऐसा होता दिखता नहीं है। पाँच वर्ष या इससे पहले भी सरकारें तो बदलती हैं, जनता द्वारा ही चुनी जाती हैं, परंतु उसके बाद भी उनके कार्य करने का तरीका बिल्कुल एक जैसा ही होता है। जनता द्वारा चुने जाने और बनाये जाने के बाद कोई भी सरकार वे काम तो बिल्कुल भी नहीं करती, जिसके लिए जनता ने उसे चुना होता है। उदाहरण के लिए आपात्काल के बाद जनता ने कांग्रेस को हराकर जनता पार्टी की सरकार बनाई। परंतु क्या जनता पार्टी की सरकार ने कांग्रेस को उसके राजनीतिक पापों के लिए दंडित किया? इसके विपरीत वह स्वयं स्वार्थ में ऐसी लिप्त हुई कि पाँच वर्ष भी नहीं चल पाई और अगले चुनावों में तो जनता पार्टी का ही खात्मा हो गया। इसके अलावा भी हम अक्सर यह देखते हैं कि विपक्ष में रहने वाले जनप्रतिनिधि जिन मुद्दों पर सरकार का विरोध कर रहे होते हैं, सरकार में आने पर वे स्वयं ठीक वही निर्णय ले रहे होते हैं। इसका सीधा अर्थ है कि भले ही सरकार का चुनाव होता होगा, परंतु उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जनता की इच्छा का उनके लिए कोई महत्त्व नहीं होता।

इस पंचवर्षीय चुनाव प्रणाली का एक और गंभीर परिणाम है – अस्थिर सरकारें। आज हम गठबंधन या अल्पमत की सरकारों को अस्थिर सरकार मानते हैं, परंतु देखा जाए तो पूर्ण बहुमत से बनी सरकारें भी अस्थिर सरकारें ही होती हैं। वर्ष 2009 से 2014 तक की मनमोहन सिंह की सरकार पूर्ण बहुमत की सरकार थी, परंतु वह केवल पाँच वर्ष ही तो रही। पाँच वर्ष बाद मनमोहन सिंह की सरकार चली गई। उसके स्थान पर नरेंद्र मोदी की सरकार आ गई। क्या स्थिर शासन के लिए पाँच वर्ष पर्याप्त होते हैं? जिन्होंने भी इंग्लैंड तथा यूरोपीय देशों से यह व्यवस्था उधार ली, क्या उन्होंने यह विचार किया था कि इतने बड़े देश में पाँच वर्ष के शासन को स्थिर शासन माना जाना चाहिए? यह सही है कि प्रारंभ के तीस वर्षों तक देश में एक ही राजनीतिक दल और विचारधारा के लोगों का शासन रहा, और इसलिए हमें उस समय राजनीतिक नीतियों में एक स्थिरता दिखती है, परंतु उसके बाद से भारत में न तो कभी शासन स्थिर रहा और न ही नीतियों में स्थिरता दिखती है। दिखता है तो केवल वोट पाने के लिए लोकलुभावन नारे, लोकलुभावन घोषणाएं, शासन में आने पर उन नारों तथा घोषणाओं की उपेक्षा और फिर से अगली बार शासन में आने के लिए फिर से लोकलुभावन नारों का प्रचार।

यदि हम अपने पड़ोसी देशों को देखें तो वहाँ इसके विपरीत स्थिति नजर आती है। पाकिस्तान में भले ही चुनाव होते हों, परंतु वहाँ चुनी हुई सरकारें भी सेना के अनुसार ही चलती हैं। इस अर्थ में वहाँ सरकार बदलने से शासन में कोई खास बदल नहीं होता। चीन में तो चुनाव आंतरिक ही होते हैं। वहाँ साम्यवादी व्यवस्था होने के कारण एक ही दल का शासन चला आ रहा है। एक स्थिर सरकार होने के कारण वहाँ भी हमें स्थिर नीतियाँ दिखाई देती हैं। देखा जाए तो जिन भी देशों में इंग्लैंड की संसदीय प्रणाली है, वहाँ-वहाँ सरकारें स्थिर नहीं हैं। जिन लोकतांत्रिक देशों में कार्यपालिका और विधायिका का चुनाव अलग-अलग होता है, वहाँ भी समस्याएं कुछ कम हैं। परंतु भारत जैसे देश में जहाँ कार्यपालिका और विधायिका की ताकतें एक संसद में ही समाहित कर दी गई हैं, पँचवर्षीय चुनाव की प्रणाली जनता के लिए लाभप्रद होने की बजाय नुकसानदेह ही साबित हो रही हैं। इस लोकतंत्र के दो प्रमुख आधार हैं। पहला है चुनाव और दूसरा है संविधान। अब दोनों की परीक्षा करते हैं कि ये दोनों कितने लोकतांत्रिक हैं।

चुनाव
भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की परीक्षा की जाए तो पता चलता है कि वह चुनावतंत्र तो है, पर लोकतंत्र नहीं। यहां हर पांच वर्ष में चुनाव होते हैं। चुनावों के द्वारा जनता अपनी सरकार चुनती है। जब सरकार जनता ने स्वयं चुनी और बनाई है तो उसे अपनी सरकार पर भरोसा होना चाहिए और उससे प्रसन्न भी। परंतु ऐसा नहीं है। पूर्वोत्तर में बोडोलैंड की मांग, जम्मू-कश्मीर में स्वायत्तता की मांग, पंजाब में खालिस्तान की मांग जैसी अनेक प्रदेशों में जो मांगें हैं, वे इस लोकतंत्र से अलग होने के लिए व्याकुल हैं। इसी प्रकार देश के 50 से अधिक जिलों में नक्सल आंदोलन और कब्जे भी इस लोकतंत्र की सार्थकता पर सवाल खड़े करते हैं। इसका अर्थ क्या यह माना जाए कि वहां की जनता इस शासन को नहीं चाहती? यदि चाहती है तो अलगाववादी आंदोलन व्यर्थ हैं और यदि नहीं चाहती तो लोकतंत्र का कोई अर्थ नहीं।

दूसरी बात है प्रतिनिधित्व की। अधिकांश चुने गए प्रतिनिधियों को कठिनाई से 15 से 20 प्रतिशत मत मिले होते हैं। इस प्रकार 80 प्रतिशत जनता ने उस प्रतिनिधि को चुना ही नहीं होता है। मनोज अग्रवाल ने अपनी पुस्तक ‘इलेक्टोरल रिफाम्र्स इन इंडिया’ में दिखाया है कि किस प्रकार न्यूनतम मत प्रतिशत पाने के बावजूद जनप्रतिनिधि चुने जा रहे हैं। ऐसे में उसे जनता का वास्तविक प्रतिनिधि कैसे माना जाए?

तीसरी बात है उत्तरदायित्व की। चुने जाने के बाद जनता के प्रति उसकी जवाबदेही सुनिश्चित करने का कोई भी उपाय इस तंत्र में नहीं है। ऐसा अक्सर देखा गया है कि जन-प्रतिनिधि जिन मुद्दों पर चुने जाते हैं, वे उन पर बिल्कुल भी काम नहीं करते। चुनावी दल भी अपने चुनावी घोषणा-पत्र को सत्ता में आने के बाद खोल कर नहीं देखते। उत्तरदायित्व तो काफी दूर की बात है, स्थिति इतनी खराब है कि संसद और विधानसभा में सांसदों और विधायकों का आचरण, व्यवहार और वक्तव्य कानून के दायरे में ही नहीं आते। ऐसे में इसे लोकतंत्र कैसे कहा जाए? अब विचार करते हैं इस लोकतंत्र की तांत्रिक व्यवस्था पर।

पहले तो हमें यह समझ लेना चाहिए कि देश में चल रही संसदीय प्रजातंत्र की व्यवस्था भारत को गुलाम बनाने वाले इंग्लैंड की व्यवस्था की नकल है। दूसरी बात संसद के कार्य करने का तरीका कहीं से भी लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता। संसद में सामान्यत: वे मुद्दे उठाए ही नहीं जाते, जो उनको चुनने वाली जनता के मन में होते हैं। वहाँ वे निर्णय नहीं लिये जाते, जो जनता चाहती है। वहाँ अक्सर कुछ वर्गों जो कि मत देकर जिताने या हराने की क्षमता रखते हैं, के मनोनुकूल निर्णय ही लिये जाते हैं। यदि मुद्दों के ऊपर चुनाव करवा दिए जाएं और उस पर जनता की राय ले ली जाए, तो आज संसद द्वारा लिए गए अधिकांश निर्णय जनविरोधी साबित हो जाएंगे।

संविधान
संविधान के विधानों से संसद की रचना की गई है परंतु उसी संसद को संविधान में संशोधन का भी अधिकार दे दिया गया है। तानाशाही इसे ही कहते हैं। इतना ही नहीं, संविधान में कई संशोधन तो बिना संसद में बहस कराए, सीधे-सीधे राष्ट्रपति के अध्यादेश से शामिल कर दिए गए। इसका उदाहरण है धारा 35्र। यह धारा एक राज्य जम्मू-कश्मीर पर से भारतीय संविधान के शासन को ही समाप्त कर देती है। ऐसे असंवैधानिक धारा को संविधान के अंदर ही घोर असंवैधानिक तरीके से डाल दिया जाना इस नकली लोकतंत्र में ही संभव है। यहां यह ध्यान भी रखा जाना चाहिए कि यह संविधान अंग्रेजों द्वारा लिखित 1935 के विधानों का विस्तार भर ही है। इसमें मौलिक और भारतीय कुछ भी नहीं है।

ऐसे में सवाल उठता है कि इसका समाधान क्या है? अक्सर इसके समाधान के लिए कह दिया जाता है कि इस ब्रिटेन की वेस्टमिनिस्टर संसदीय प्रणाली से अच्छी अमेरिका की राष्ट्रपति प्रणाली है। हमें उसे अपना लेना चाहिए। सवाल उठता है कि दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यता के वारिस हमलोगों के पास क्या नकल करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है? क्या हम अपने देश की प्राचीन व्यवस्थाओं के अवगाहन से इसका समाधान नहीं निकाल सकते? क्या समाधान के लिए यूरोप और अमेरिका के रास्तों पर चलना ही अनिवार्य है? यह सवाल उठाते ही आपत्ति उठा दी जाती है कि क्या हम फिर से राजतंत्र की ओर चले जाएं? हालांकि इसमें कोई बहुत बुराई नहीं है, लेकिन आज तो यह संभव नहीं है कि फिर से राजा बनाए जाएं। वैसे, देखा जाए तो आज के सांसद भी एक प्रकार से राजा ही हैं। इसलिए प्रकारांतर से 600 राजाओं को समाप्त करके हमने कुछेक हजार राजा तो पिछले साठ सालों में बना ही दिए हैं। फिर भी यदि हम अपने देश के इतिहास का अवलोकन करते हैं तो पता चलता है कि यहां जो शासन प्रणाली थी, उसमें पदों के नाम भले ही भिन्न रहे हों परंतु उसकी कार्य प्रणाली पूरी तरह से लोकतांत्रिक ही थी।

लोकतंत्र कल (इतिहास)
भारत में राज्य व्यवस्था का एक सुदीर्घ इतिहास है। इसमें अनेक प्रकार के राजनीतिक सिद्धांत भी पैदा हुए। भारतीय राजनीतिक चिंतन में भी लोकतंत्र का चिंतन हुआ है। वह चिंतन यहां गणपति के रूप में प्रकट हुआ है। परंतु भारतीय मनीषी राज्य को लोकमत से चलाने की बजाय धर्म द्वारा संचालित रखने को ही श्रेष्ठ मानते थे। धर्म शब्द में परिभाषा का संकट यूरोपीय और उनकी परंपरा के भारतीय विद्वानों ने खड़ा कर रखा है। वे धर्म को ईश्वर उपासना और उसकी विधि से जोड़ते हैं, जबकि भारतीय परंपरा और शास्त्रों में धर्म आचरण और नैतिकता से जुड़ा विषय है। इसलिए शासन को धर्म आधारित होना श्रेयस्कर भी है और लोकतांत्रिक भी। महात्मा गांधी भी यही मानते थे। इसलिए वे राज्य को धर्माधारित ही देखना चाहते थे। भारतीय चिंतन के अनुसार जो व्यवस्था लोक में धर्म की व्यवस्था स्थापित कर सके, वही लोकतांत्रिक व्यवस्था है।

पाश्चात्य चिंतन में राज्य व्यवस्था की शुरूआत की अनेक कल्पनाएं की गई हैं, परंतु वे कल्पनाएं परिस्थिति विशेष में पैदा हुई हैं। यूरोपीय विशेषकर चर्चशासित यूरोपीय परिस्थितियों के कारण जो संकल्पनाएं जन्मी हैं, वे न तो सहज हैं, न ही शासन की नैसर्गिक प्रकृति के अनुकूल हैं। चर्च के शासनकाल को आज का यूरोप काले अध्याय के रूप में देखता है। वहां की राजनीतिक स्थापनाएं उसी काले अध्याय की प्रतिक्रिया में पैदा हुई थीं। इसलिए वे अपने मूल उद्देश्यों से भटक गईं और मनुष्य के लिए कल्याणकारक नहीं रहीं। लिबर्टी, स्त्री-अधिकार, सेकुलरिज्म, वेलफेयर स्टेट (अंग्रेजी शब्दों का उपयोग जानबूझ कर किया गया है, उनका हिंदी अनुवाद भ्रमोत्पादक होता है।) आदि सिद्धांत परिस्थितिविशेष से पैदा होने के कारण देश-काल सापेक्ष हैं और सभी स्थानों के लिए उपयुक्त या कल्याणकारी नहीं हैं।

राज्य की शुरूआत और उसके कर्तव्य
न राज्यं, न वै राजाह्यह्यसीत्, न दंडो न च दांडिक:। धर्मेणैव प्रजा: सर्वं रक्षन्ति स्म परस्परम्।।

महाभारत,शांतिपर्व
प्रारंभ में न तो कोई राजा था, न राज्य, न कोई दंड व्यवस्था थी और न कोई दंड देनेवाला। सभी लोग परस्पर धर्मपूर्वक व्यवहार करते हुए एक दूसरे के हितों की रक्षा किया करते थे।
सामान्यत: समझा जाता है कि महाभारतकार ने समाज की आदर्श व्यवस्था का चित्र खीचा है, परंतु वास्तव में यह समाज की प्रारंभिक अवस्था का वर्णन है। प्रारंभ में मानव समाज ऐसा ही था। उसमें लोभ, मद, मोह, मत्सर, ईष्र्या, चोरी, लूट जैसे अवगुण नहीं थे। अपने परिश्रम से अर्जित संपत्ति से वे संतुष्ट थे क्योंकि वे यजुर्वेद के निर्देश मा गृध: कस्यस्विद्धनम् का पालन करते थे। परंतु महाभारतकार के अनुसार धीरे-धीरे लोगों में लोभ, मद, मोह, मत्सर, ईष्र्या आदि बढऩे लगे और परिणामस्वरूप समाज में अव्यवस्था फैलने लगी। गम्य-अगम्य, वाच्य-अवाच्य, भक्ष्य-अभक्ष्य और दोष-अदोष कोई भी बात उनकी दृष्टि में त्याज्य न रही। इस प्रकार मानव समाज में धर्मक्षय हो जाने से वेद भी लुप्त होने लगा और वेद का लोप होने से मर्यादा ही नष्ट हो गयी। इससे देवताओं को बड़ा दुख हुआ और वे ब्रह्माजी की शरण में गये। ब्रह्माजी से उन्होंने हाथ जोड़कर कहा भगवन्! मनुष्य लोक में जो सनातन वेद था, उसको लोभ मोह आदि दूषित भावों ने नष्ट कर डाला है, इसमें हमें बडा भय हो रहा है। वेद का नाश होने से धर्म भी नष्ट हो गया है। मनुष्यों ने यज्ञ यागादि सभी शुभकर्म छोड़ दिये हैं इसलिए हम बडे संशय में पड़ गये हैं। आप हमारे लिए जो हितकर हो ऐसा कोई उपाय सोचिये। तब ब्रह्मा ने एक नीतिशास्त्र रचा। उसमें अर्थ, धर्म काम-इन त्रिवर्ग का वर्णन था। वह ग्रन्थ त्रिवर्ग नाम से विख्यात हुआ।

महाभारत में ही इसके बाद बताया गया है कि कालांतर में उसी त्रिवर्ग शास्त्र को सरल करके धर्मशास्त्र की रचना की गई और उसके अनुसार व्यवस्था को लागू करने के लिए एक राजा भी नियुक्त किया गया। इसप्रकार पहला राजा हुआ अनंग। राजा अनंग के बेटे अतिबल को भी राजा बनाया गया जोकि उससे कमजोर प्रशासक सिद्ध हुआ और उसका बेटा वेन बिल्कुल ही विलासी और देवताओं को कष्ट पहुंचाने वाला हो गया। प्रसिद्ध विचारक वैद्य गुरूदत्त अपनी पुस्तक प्रजातंत्र और वर्ण-व्यवस्था में लिखते हैं – वेन तो न केवल सुख भोग करता रहा वरन् अपने अधिकार से देव जनों को कष्ट भी देने लगा। इसके अत्याचार को देखकर तत्कालीन ऋषि एकत्रित हुए और उन्होंने मंत्र पूत कुशों द्वारा (मन्त्रपूतै: कुशैर्जध्नुऋषयो ब्रह्मवादिन:) वेन को मार डाला। उसका अभिप्राय यह कि मन्त्र अर्थात शुभ सम्मति देकर कुशों अर्थात प्रजा जनों को प्ररेणा देकर प्रजा से वेन राजा की हत्या करवा दी। वेन के कई पुत्र थे। उनमें से पृथु को ऋषियों ने राजा बनने के लिए निर्वाचित किय और कुछ शर्तों पर उसे राज्य गद्दी पर बिठा दिया गया। शर्तों में मुख्य यह थी:
1. जिससे नियत धर्म की सिद्धि हो उसको निर्भय होकर करना।
2. प्रिय और अप्रिय का विचार छोड़कर अभिप्राय यह कि अपने और पराये का विचार न करके काम, क्रोध लोभ मोह और मान को दूर हटाकर सब प्राणियों में समभाव रखना।
3. लोक में जो कोई मनुष्य भी धर्म से विचलित हो, उसे परास्त कर सनातन धर्म के विचार से दण्ड देना। सनातन धर्म धृति इत्यादि दस हैं।
4. मैं मन वाणी और कर्म से वेद की आज्ञा का निरन्तर पालन करुँगा।
इस से यह स्पष्ट हो जाता है कि राजाओं से शपथ लिवाने की प्रथा का प्रारंभ भी भारत से ही हुआ है लेकिन राजाओं को कभी भी धर्म यानी नियम बनाने का अधिकार नहीं दिया गया। उसे केवल धर्म का पालन करना था, उसके नियम नहीं बनाने थे।

विकेंद्रित व्यवस्थाएं
बहुमत की बजाय सर्वसहमति से शासन चलाया जाना ही वास्तविक लोकतंत्र है। सर्वसहमति बने, इसके लिए देश के शिक्षाविदों और विद्वानों को प्रयास करने होते हैं। अपने देश के इतिहास में इसके कई उदाहरण मिलते हैं। वेदों में सभा और समितियों की पर्याप्त चर्चा है जो शासन के लोकतांत्रिक होने का संकेत है। इसी प्रकार मनु स्मृति में दस गांवों पर एक प्रमुख, ऐसे दस प्रमुखों पर एक और प्रमुख फिर इसी क्रम में केंद्र तक की व्यवस्था खड़ा करने की बात कही गई है। यह दशमलव प्रणाली भी लोकतंत्र का ही एक प्रकार है। विख्यात राजनीतिशास्त्री और इतिहासविद् केपी जायसवाल ने अपनी पुस्तक हिंदू पॉलिटी में इसका विस्तार से उल्लेख किया है।

देखा जाए तो प्राचीन व्यवस्थाएं इस अर्थ में भी लोकतांत्रिक थीं कि वे नागरिकों के दैनंदिन कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करती थीं। सामान्य व्यवहारों में लोक अपने मसले स्वयं ही सुलझाने के लिए स्वतंत्र हुआ करता था। सुरक्षा और न्याय के अलावा शासन और कोई विषय नहीं देखता था। शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार, उद्योग, पर्यटन, सेवा (कुंए, प्याऊ, धर्मशाला जैसी सार्वजनिक सुविधाएं) आदि कार्य समाज के ही जिम्मे हुआ करते थे। शासन इनमें केवल सहयोगी की भूमिका में होता था, कर्ता की भूमिका में नहीं।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय मनीषियों ने राजा के चयन के तरीके (चुनाव प्रक्रिया) की बजाय राजा के गुणों और उसकी कार्य प्रणाली पर अधिक ध्यान दिया है। उनके लिए महत्व इस बात का अधिक नहीं है कि राजा जनता के मत से चुना गया है या नहीं, महत्व इस बात का है कि राजा धर्म के अनुसार शासन कर रहा है या नहीं। वेदों से लेकर मनु, महाभारत और कौटिल्य अर्थशास्त्र तक में राजा के गुणवान और चरित्रवान होने पर विशेष जोर दिया गया है। साथ ही इन सभी व्यवस्थाओं में राजा कानून का निर्माता नहीं है। इसलिए राजतंत्र होते हुए भी वह निरंकुश या तानाशाह नहीं है। उसके ऊपर धर्मदंड की व्यवस्था है। इन कुछेक मौलिक सिद्धांतों को ध्यान में रखकर हम भविष्य के लोकतंत्र की युगानुकूल रचना कर सकते हैं।

लोकतंत्र कल (भविष्य)
तो सवाल उठता है कि भविष्य का लोकतंत्र कैसा हो? भारत में विकसित राज्य की परिभाषा और कर्तव्यों के आधार पर कुछ सर्वमान्य सिद्धांत निश्चित किए जा सकते हैं। इन सिद्धांतों के आधार पर आज की राजनीतिक समस्याओं के समाधान निकाले जा सकते हैं। उदाहरण के लिए राजा का गुणवान और चरित्रवान होना आवश्यक है। इस आधार पर आज निर्वाचित किए जाने वाले प्रतिनिधियों के चरित्र और गुणों की परीक्षा अनिवार्य की जा सकती है। इसके और भी तरीके निकाले जा सकते हैं। इसी प्रकार संसद की तानाशाही को समाप्त करने के लिए संविधान सभा का पुनर्गठन किया जा सकता है। इसी प्रकार अन्य समस्याओं पर विचार किया जा सकता है। मुख्य बात राजनीति के मौलिक सिद्धांतों की है। यदि राजनीति के मौलिक सिद्धांतों का पालन सुनिश्चित किया जा सके तो अधिकांश समस्याओं का समाधान संभव है। इस पर गंभीर काम किए जाने की आवश्यकता है।
इसलिए आज आवश्यक हो गया है कि राजनीतिक प्रक्रियाओं में सुधार किया जाए। मेरे विचार से 2-3 बिंदुओं से प्रारंभ किया जाना अच्छा हो सकता है।
1. पहला बिंदु है प्रत्याशियों का चयन। सबसे पहले प्रत्याशियों का चयन और उनके नामों की घोषणा चुनाव से कम से कम एक वर्ष पहले हो जाना चाहिए। उन प्रत्याशियों से जो शपथ पत्र भरवाया जाता है, इस एक वर्ष में उसकी जांच ठीक ढंग से की जा सकेगी। साथ ही प्रत्याशी अपने क्षेत्र को और जनता अपने प्रत्याशी को ठीक से समझ पाएगी।
2. चुनाव में खर्च की कोई सीमा निर्धारित नहीं की जानी चाहिए। केवल मदों का निर्धारण किया जाए। किए गए खर्च की कड़ाई से जांच हो और एक भी गलती पाए जाने पर राजनीतिक दल का पंजीकरण को 10 वर्षों के लिए रद्द करने जैसे कड़े दंडों का प्रावधान हो।
3. चयनित प्रत्याशियों का पांच वर्ष का कार्यकाल बढ़ा कर 10 वर्ष किया जाए। इसमें पहला एक वर्ष उनके प्रशिक्षण का हो। न्यूनतम दो तथा अधिकतम छह महीने का सैनिक प्रशिक्षण भी अनिवार्य किया जाए।
4. सरकार बनाने की प्रक्रिया को भी सुधारा जाए। संविधान में सरकार बनाने की जो प्रक्रिया दी गई है, वह कुछ हद तक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, परंतु उस लोकतांत्रिक प्रक्रिया को चुनावी दलों ने अपनी सुविधा के लिए एक अधिनियम बनाकर समाप्त कर दिया है। इसलिए चुनावी दलों की सुविधा के लिए बनाए गए जन-प्रतिनिधि अधिनियम को समाप्त किया जाना चाहिए।
5. शासन में विपक्ष नाम की कोई चीज नहीं होनी चाहिए। संविधान में दी गई प्रक्रिया में भी विपक्ष का कोई उल्लेख नहीं है। सिद्धांतत: भी जो भी प्रतिनिधि चुना गया है, उसे जनता ने शासन करने के लिए चुना है। वह शासन की प्रक्रिया में रहेगा ही नहीं तो वह उसमें बाधक ही बनेगा। विपक्ष कभी सकारात्मक नहीं हो सकता, पूरी दुनिया का उदाहरण देखा जा सकता है। इसकी बजाय सभी राजनीतिक दलों को उन्हें मिली सीटों के अनुपास में शासन में भागेदारी दी जानी चाहिए। केवल एक प्रधानमंत्री का चुनाव करवाया जाना चाहिए। वह चुनाव भी गुप्त मतदान द्वारा सारे सांसद करें। इसमें बहुमत प्राप्त दल या किसी भी दल कोई वरीयता नहीं दी जाए।
6. एक स्थायी संविधान सभा बनाई जाए। यदि वर्तमान संसद इस काम को करती है, तो फिर उससे विधायिका वाले अधिकार वापस ले लिए जाएं। कुल मिलाकर कार्यपालिका और विधायिका को अलग-अलग होना चाहिए। शासक को कानून बनाने की अनुमति देना ही तानाशाही कहलाती है।
7. वेलफेयर स्टेट के नाम पर राज्य की तानाशाही समाप्त की जाए। जैसा कि हम ऊपर देख आए हैं, राज्य का मुख्य काम केवल न्याय और कानून-व्यवस्था का पालन करवाना भर है। यही उसका सच्चा कल्याणकारी स्वरूप है। आज वह इस काम को न्यायपालिका के सुपुर्द कर स्वयं बिजली, सड़क नाली, विद्यालय, अस्पताल, उद्योग, विपणन जैसे कामों में उलझ गया है। सीएसआर के नाम पर समाजसेवा के कामों को भी वह स्वयं करने लगा है। इनके लिए उसे ढेर सारे धन की आवश्यकता होती है, जिसके लिए जनता को लूटने जैसे कर लगाए जा रहे हैं। इसलिए वेलफेयर स्टेट की संकल्पना को सुधार कर राज्य के कर्तव्य निश्चित किए जाएं और उसे उसी अनुसार कर लेने की छूट दी जाए। समाज के कामों को समाज को करने दिया जाए।

विचार के और भी बिंदु हो सकते हैं। जो ऊपर लिखा है, उसमें भी बहुत कुछ सुधारने की आवश्यकता हो सकती है। परंतु मुख्य मुद्दा राजनीति में ही सुधार की है। तभी हम देश में सजायाफ्ता अपराधियों, बड़बोलों, भ्रष्टाचारियों और सामाजिक अपराधियों को शासन में आने से रोक सकेंगे और देश में अच्छी शासन व्यवस्था बना पाएंगे।