वेदों की श्रम व्यवस्था

सुबोध कुमार
लेखक गौ एवं वेद विशेषज्ञ हैं।


भारतवर्ष में केवल 10 प्रतिशत ही श्रमिक ही संगठित क्षेत्र में काम कर रहे हैं। लेकिन श्रमिक संघों के प्रभाव से इन मात्र 10 प्रतिशत श्रमिकों ने भारत वर्ष की आर्थिक नस पकड़ रखी है। इन श्रमिक संघों के नेतृत्व में श्रमिकों के हितों की सुरक्षा के नाम पर श्रमिकों द्वारा हड़ताल, काम रोको, अनुशासनहीनता और हिंसा तोडफ़ोड़ का व्यवहार न्यायोचित बताया जाता है। राजनीतिक दल भी अपने स्वार्थ के लिए श्रमिक संघों को हिंसा-तोडफ़ोड़ के लिए प्रेरित करते हैं।

हमें यह जान कर आश्चर्य हो सकता है कि सारी दुनिया में श्रमिक संगठनों का जन्मदाता अमेरिका का पूंजीवाद है। पूंजीवाद में सर्वप्रथम सब उत्पादों कृषि,पशुपालन, उद्योगों का केंद्रीयकरण आरम्भ किया गया। एडम स्मिथ अपनी पुस्तक वेल्थ ऑफ नेशन में एक फैक्ट्री का उदाहरण देते हैं जिसमें उत्पाद की प्रक्रिया को अनेक छोटी-छोटी प्रक्रियाओं में तोड़ दिया गया है। प्रत्येक उत्पादक केवल अपने उत्पाद की प्रक्रिया के बारे में जानता है। इस प्रकार फैक्ट्री मालिक उत्पाद पर अपना वर्चस्व बनाता है। लेकिन कामगार के लिए इस प्रकार काम करना बहुत उबाऊ और तनावपूर्ण होता है। वहां के इन्हीं उद्योगपतियों द्वारा अपने स्वार्थ में किए गए श्रमिकों के शोषण और दुव्र्यवहार की प्रतिक्रिया ने श्रमिक संघों को जन्म दिया। हमारे देश के वामपंथी जो अपने को श्रमिकों का सर्वश्रेष्ठ हितैषी होने का दावा करते हैं, वे तो केवल अमेरिका की पूंजीवादी असमाजिक व्यवस्था से उत्पन्न परिस्थितियों के प्रतिक्रियावाद का ही भारतवर्ष की पुण्यभूमि में प्रसार कर रहे हैं, जो न देश के और न श्रमिकों के हित में है।

भारतवर्ष की प्राचीन सनातन परम्परा का आदर्श तो विश्व में समाजवाद का सर्वोच्च कीर्तिमान स्थापित करता है। व्यक्ति की उन्नति और समृद्धि को उसकी आर्थिक संपन्नता, दिखावटी भोगवादी जीवन शैली से नहीं मापा जाता। एक स्वस्थ मानसिकता, स्वस्थ शरीर, सादा जीवन, सब से बांट कर जीना भारतीय आदर्श माना जाता था। धनवान सरल तरीके से रहें। गांधी जी इसे स्वेच्छा से स्वीकार की गई गऱीबी कहते थे। यही भारतीय संस्कृति का आदर्श है।

भारतीय आदर्श सांस्कृतिक परम्परा के अनुसार एक व्यक्ति केवल अपने निकट परिवार के लोगों से ही नहीं, बल्कि पूरे समाज, सब जीव जन्तुओं और प्राकृतिक तत्वों के साथ एक जीवित संबंध के अनुभव से प्रेरित है। पूंजीवाद की भोगवादी भव्य जीवनशैली, धन के अभद्र प्रदर्शन से समाज में ईष्र्या से अव्यवस्था और हिंसा को जन्म देते हैं। अमीरों द्वारा खुद पर ही केवल अपने धन को खर्च करना पश्चिमी उपभोक्तावादी संस्कृति है। भारतीय आदर्श ईशा वास्यमिदँ सर्वं यत्किञ्च जगत्यं जगत के अनुसार तो मनुष्य अपने को केवल धन का संरक्षक समझें और अपनी आर्थिक समृद्धि को समाज के साथ साझा ,बांट कर, दान वृत्ति से जीना चाहिए। यही कारण है कि भारतीय समाज में प्राचीन काल से अपने धन को परमेश्वर की कृपा समझने की परम्परा रही है। वेदों ने इसी भाव को समाज में विकसित करने पर जोर दिया है। वेद के कई सूक्तों में इस प्रकार के निर्देश पाए जाते हैं। ऋग्वेद के प्रथम अध्याय का पाँचवाँ सूक्त इस पर ही केंद्रित है। यही सूक्त थोड़े परिवर्तन के साथ अथर्ववेद में भी आया है।

आओ, आप सब प्रशंसनीय गुणयुक्त कार्य करने में प्रवीण विद्वानों से मित्रभाव से सब मिल कर परस्पर स्नेहपूर्वक शिल्प विद्या को सिद्ध करने में, एकत्रित हों, इंद्र के गुणों का उपदेश करें और सुनें कि जिससे वह अच्छी रीति से सिद्ध की हुई शिल्प विद्या सब को प्रकट हो जाए और उससे तुम सब लोग के सभी प्रकार के सुख प्राप्त हों। ऋ. 1.5.1; अथर्व. 20.68.11
आकाश से लेकर पृथिवी तक के सब असंख्य पदार्थों के साधक अत्यंत उत्तम वरण करने योग्य सद्गुणों को रचने में समर्थ, परन्तु दुष्ट स्वभाव वाले जीवों के कर्मों के भोग के निमित्त और जीवमात्र को सुख दु:ख देने वाले पदार्थों के भौतिक गुणों का उपदेश करो। और जो सब प्रकार की विद्या से प्राप्त होने योग्य पदार्थों के निमित्त कार्य हैं, उन को उक्त विद्याओं से सब के उपकार के लिए यथायोग्य युक्त करो। ऋ. 1.5.2, अथर्व. 20.68.12

सब पदार्थ विद्याओं के ज्ञान के उपयोग से निश्चय ही सुख प्रदान करने के लिए उत्तम समृद्धि के धन अन्न और आवागमन के साधन प्राप्त होते हैं। ऋ. 1.5.3, अथर्व. 20.69.1
भौतिक पदार्थों और उनकी प्रक्रियाओं के सम्भावित दुष्परिणामों के रोकथाम के लिए सुरक्षा के साधनों का प्रचार करो। ऋ. 1.5.4 , अथर्व. 20.69.2
अनुसंधान के ज्ञान से उत्पन्न हो कर सुख समृद्धि के साधनों की नदियां बह चलती हैं। ऋ. 1.5.5, अथर्व. 20.69.3
संसार के पदार्थों के सुख को ग्रहण करने ले लिए विद्या आदि उत्तम ज्ञान से प्रेरित हो कर श्रेष्ठ अत्युत्तम कर्म करने वाले पूज्य जनों का अनुसरण करो। ऋ. 1.5.6, अथर्व. 20.69.4
जीवन को सुखदायी बनाने के लिए तुझमें उत्तम व्याख्यान से ज्ञान तथा प्रशिक्षण से अतितीक्ष्ण बुद्धि और कर्मठ प्रवृत्ति जागृत हो। ऋ. 1.5.7 , अथर्व. 20.69.5
उन्नति के लिए उत्तम ज्ञान और उपदेश की शिक्षा द्वारा तुम सैंकड़ों काम करने का यश प्राप्त करो। ऋ. 1.5.8, अथर्व. 20.69.6
संसार का समस्त भौतिक ज्ञान प्राप्त करके प्रकृति की असंख्य उपलब्धियों को सबके साथ बांट कर ग्रहण करो। ऋ. 1.5.9 , अथर्व. 20.69.7
राग, द्वेष, भेदभाव तथा स्वार्थ से प्रेरित हम अपनी वाणी और व्यवहार से किसी भी जीवधारी का शोषण और अहित न करें। ऋ. 1.5.10, अथर्व. 20.69.8

कौशल विकास
वेदों का आदेश है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने कौशल को बढ़ाए। ऐश्वर्य की वृद्धि के लिए समाज का विभिन्न प्रकार के कार्यों के ज्ञान का सामथ्र्य बढ़ाया जाए और प्राकृतिक प्रतिभाओं का विकास हो। इस पर ऋग्वेद के नौवें अध्याय के 112वें सूक्त में काफी विवेचन मिलता है। वहाँ यह भी बताया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति की प्रवृत्ति और रूचि भिन्न-भिन्न होती है, इसलिए उन्हें उनकी रूचि और प्रवृत्ति के अनुसार ही काम मिलना और करना चाहिए।

सभी मनुष्य भिन्न भिन्न प्रकृति के होते हैं। कोई शिल्पकार वस्तुओं के स्वरूप को सुधारने वाला बनना चाहता है; तो कोई वैद्य – भिषक बन कर प्राणियों के स्वास्थ्य मे सुधार लाना चाहता है; तो अन्य ज्ञान का विस्तार कर के समाज में दिव्यता की उपलब्धियों के लिए शिक्षा यज्ञादि अनुष्ठान कराना चाहता है। इन सब प्रकार की वृत्तियों के विकास के अवसर उपलब्ध कराने चाहिएं। ऐश्वर्य की वृद्धि के लिए समाज का विभिन्न प्रकार के कार्यों के ज्ञान का सामथ्र्य बढ़ाओ। ऋ. 9.112.1

भिन्न भिन्न जड़ी बूटियों, भिन्न भिन्न प्राणियों के अवयवों से अनेक ओषधियां प्राप्त होती हैं। इनके उपयोग के प्रशिक्षण तथा अनुसंधान के साधन उत्पन्न करो। खनिज पदार्थों इत्यादि से ज्ञान कौशल द्वारा धनोपार्जन सम्भव होता है। इन विषयों पर प्रशिक्षण अनुसंधान के साधन उपलब्ध कराओ। ऐश्वर्य की वृद्धि के लिए समाज का विभिन्न प्रकार के कार्यों के ज्ञान का सामथ्र्य बढ़ाओ। ऋ. 9.112.2

मैं संगीतज्ञ हूं, मेरे पिता वैद्य हैं, मेरी माता अनाज को पीसती है. हम सब इस समाज के पोषण में एक गौ की भांति अपना अपनाअपना योगदान करते हैं। ऋ. 9.112.3
साधारण व्यक्ति एक घोड़े की भान्ति एक संवेदनशील स्वामी की सेवा में अपना भार वहन करने में सन्तुष्ट है। अन्य व्यक्ति मित्र मंडली में बैठ कर हंसी मज़ाक में सुख पाता है। कोई अन्य व्यक्ति अधिक कामुक है और स्त्री सुख की अधिक इच्छा करता है।। ऐश्वर्य की वृद्धि के लिए सभी लोगों में समाज के विभिन्न प्रकार के कार्यों के ज्ञान का सामथ्र्य बढ़ाओ। ऋ. 9.112.4

वेद और सामाजिक दायित्व
ज्ञान-विज्ञान से समृद्धि आती है, परंतु यदि वह समृद्धि सुखदायक न हो तो, व्यर्थ ही है। इसलिए वेदों का स्पष्ट निर्देश है कि ज्ञान-विज्ञान और कौशल के विकास से हम समृद्धि तो प्राप्त करें परंतु उसे केवल अपने भोग के लिए प्रयोग न करें। उसका उपयोग अपने सामाजिक दायित्वों को पूरा करने में करें। आज शासन सीएसआर के द्वारा देश के व्यवसायी वर्ग को सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करने के लिए बाध्य कर रहा है। वेद इसे बाध्यता नहीं, प्रेरणा द्वारा करवाने की बात कहते हैं। वे यह भी बताते हैं कि यदि हम अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन नहीं करते हैं, तो समाज में न केवल अनाचार और हिंसा फैलती है, बल्कि उसके कारण हमारा जीवन भी अशांत हो जाता है। ऋग्वेद के दसवें अध्याय का 1155वाँ सूक्त इस बारे में निम्न निर्देश देता है।

स्वार्थ और दान न देने की वृत्ति को सदैव के लिए त्याग दो। कंजूस और स्वार्थी जनों को समाज में दरिद्रता से उत्पन्न गिरावट, कष्ट, दुर्दशा दिखाई नहीं देते। परंतु समाज के एक अंग की दुर्दशा और भुखमरी आक्रोश बन कर महामारी का रूप धारण कर के पूरे समाज को नष्ट करने की शक्ति बन जाती है और पूरे समाज को ले डूबती है। ऋ 10-155-1
अदानशीलता समाज में प्रतिभा विद्वत्ता की भ्रूणहत्या करने वाली सिद्ध होती है। तेजस्वी धर्मानुसार अन्न और धन की व्यवस्था करने वाले राजा, परमेश्वर इस दान विरोधिनी संवेदना विहीन वृत्ति का कठोरता से नाश करें। ऋ 10-155-2

ऐसे स्वार्थी प्रजाजन इस संसार रूपी समुद्र में बिना किसी लक्ष्य के जल पर बहते काठ जैसे हैं। उस तत्व का सदुपयोग करके समाज के संकट को दूर करो। ऋ10-155-3
यह अलक्ष्मी एक लोहे के दाने छर्रे दागने वाली तोप जैसी है जो अनेक जनों को हिंसित करती है। इसके चलते शूरवीर जनों के सब प्रयास जल के बुलबुलों के समान नष्ट हो जाते हैं। ऋ10-155-4

समाज में अभावग्रस्त, दरिद्रता की आपदा से निपटने के लिए समस्त देवताओं द्वारा गौ को वापस ला कर, यज्ञाग्नि के द्वारा भिन्न भिन्न स्थानों पर स्थापित किया गया। गोपालन से प्राप्त पौष्टिकता और जैविक अन्न से प्राप्त समृद्धि को कौन पराभूत कर सकता है। ऋ 10-155-5

पूंजीवादी समाज में केवल अमीरी और अभद्र अमीर जीवन शैली के प्रदर्शन को ही आदर्श माना जाता है। भारतीय परम्परा में अपने स्वामी को एक कर्मचारी, भृत्य, सेवक अपने और अपने परिवार के दैनिक जीवन में दु:ख, सुख, प्रगति के लिए एक अभिभावक के रूप में देखता है। एम्पलॉयर शब्द का हिंदी में कोई पर्यायवाची नहीं है। वेदों के इन निर्देशों का यदि देश का व्यवसायी वर्ग पालन करेगा, तो निश्चित है कि उनका विकास तो होगा ही, समाज भी समृद्ध, सुखी और प्रगतिशील बनेगा।