कृषि, मौसमविज्ञान और कवि घाघ

मंजू श्री
लेखिका कवियित्री तथा साहित्यकार हैं।


मनुष्य के जीने के लिए प्रकृति ने जो संसाधन उपलब्ध कराये हैं, उसे उसने अपने ढंग से कृषि के रूप में विकसित तो किया, किन्तु निर्भर रहा उस अदृश्य पर जिसे उसने ईश्वर नाम दिया। जीविका के लिए प्रकृति या मौसम सहायक है, वहीं वह आदमी को असहाय भी कर देती है। उदाहरणस्वरूप समय से वर्षा न होना या असमय वर्षा होना दोनों खेती के लिये हानिकारक हैं। वर्षा के साथ साथ खेती कब की जाये और खेती करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिये, इस विषय में घाघ ने बहुत सी जानकारियां दी हैं। खेती और मौसम के सम्बंध को न जानने के कारण जो विषम हालात उत्पन्न होते हैं, उन विषम हालात का हल ढूँढने का काम लोक कवि एवं सिद्ध ज्योतिषी घाघराम दूबे ने किया है। उसकी कुछ बानिगी देखें –

असनी गलिया अन्त् विनासै, गली रेवती जल को नासे।

भरनी नासे तृनौ सहूतौ, कृतिका बरसै अंत बहुतौ।।
घाघ कहते हैं – यदि चैत्र के अश्विनी नक्षत्र में बरसा हो गई तो बरसात में सूखा पड़ेगा। रेवती में बरसा हुई तो आगे नहीं होगी, भरणी में वर्षा हुई तो तृण का भी नास हो जाएगा, लेकिन अगर कृतिका में पानी हुआ तो अंत तक अच्छी बरसात होगी।

असुनी गल, भरनी गल, गलियो जेष्ठाहमूर।

पूरबा आषाढा़ धूल, कित उपजै सातो तूर।।
अर्थात अगर वर्षा अश्विनी, भरणी एवं मूल नक्षत्र में हो गई और पूर्व आषाढ़ में नहीं भी हुई तब भी सातो प्रकार के अन्न होंगे।

अद्रा बरसै पुनर्वसजाय, दीन अन्न कोऊ नहीं खाय।

मतलब यह कि अगर आद्रा से पुनर्वस तक पानी बरसता रह जाए तो उसमे उपजे अनाज को नहीं खाना चाहिए, क्योंकि वह विषाक्त हो जाता है।
सावन पहली पंचमी गरभे उदेभान, बरखा होगी अति घनी, उँचो जान धान।
अर्थात सावन कृष्णर पंचमी को यदि सूर्योदय बादलों के बीच हो तो उस वर्ष खूब बारिश होगी और धान की फसल भी अच्छीक होगी।

साँझे धनुष सकारे मोरा, ये दोनो पानी के बौरा।

यानी संध्यारकाल में इंद्रधनुष दिखे और प्रात:काल में मोर बोले तो निश्च य ही पानी बरसेगा।

खेती पाती बिनती औ घोड़े की तंग, अपने हाथ सवाँरिये लाख लोग हों संग।

अपनी जीविका, किसी को चिठ्ठीष लिखना, प्रार्थना करना और घोड़े की जीन कसना अपने हाथ से करना चाहिए, चाहे आपके संग लाखों लोग क्योंी न हों।

उत्तम खेती आप सेती, मध्यलम भाई, निकृष्टन खेती चाकर सेती जो आई सोआई ।

कोई भी काम जब हम स्व यं करेगें तो अपनी सम्पूीर्ण क्षमता से करेगें, भाई करेगा पर हमारे मन से कम ही कर पाएगा और यदि नौकर से कराएंगे तो तय है कि निम्न स्तणरीय ही होगा।

आकर कोदो नीम जवा, गाडर गेंहूँ , बेर चना।

जिस साल आकर यानी मदार खूब खिले, तब समझें उस वर्ष कोदो की फसल अच्छीन होगी, नीम फूले-फले तो जौ की पैदावार अच्छीख होगी, खस घास खूब होगी तो तय है कि गेहूँ की रेकॉर्ड तोड़ फसल होगी तथा जब बेर की फसल भरपूर होती है, तब चना भी भरपूर होता है।

आस पास रबी बीच में खरीफ, नोन मिर्च डाल के खा गया हरीफ।

चारों ओर रबी की फसल लगी हो और अगर बीच में कोई खरीफ की फसल लगा दे तो फसलों के शत्रु कीड़े मकोड़े फसल को चट कर जाएगें।

आधा खेत बटाई देके, उँची दीह किआरी। जो तोरलरिका भूखे मरिहे, घघवे दीह गारी।

अगर खेत है पर संगहा नहीं तो किसान को आधा खेत बटाई देना चाहिए और आधे खेत में ऊँची क्याँरी बाँध कर खेती करनी चाहिए। इससे अन्नख-व्यएवस्थां ठीक न हो जाए तो घाघ को भरपूर गरियाना।

इतवारी करै धनवंतरी हो, सोम करे सेवाफल होए।

बुध बियफैसुक्रे भरे बखार, सनि मंगल बीज न आवेद्वोर।
खेती आरम्भभ करते हुए घाघ कहते हैं जो किसान रविवार को खेती का शुभारंम्भ करता है, वह धनवान होगा, सोमवार को करेगा तो मेहनत का फल मिलेगा और बुध, बृहस्पाति और शुक्रवार को कार्य आरंम्भक करने पर बखार भर जाएगा, किन्तु शनिवार, मंगलवार को शुरू की गई खेती पर शुरु करने वाले का बीज भी लौट कर नहीं आता।

ऊँख करै सब कोई, जो बीच में जेठ न होई।

गन्नेभ की खेती सभी कर लेते अगर साल के बीच में जेठ का जलता महिना न होता।

उर्द मोथी की खेती करिहौं, कुँडिय़ाँ फोर उसर मेधरिहौ।

उड़द और मोथ उसर खेत में करना चाहिए।

कपास चुनाई, खेत खनाई।

कपास के फूल चुनने और खेत कोडऩे से लाभ होता है।

कामिनी गरभ औ खेती पकी,ये दोनों हैं दुर्बल बदी।

गर्भवती स्री और तैयार फसल नाजुक होते हैं।

खेती तो थोड़ी करे मेहनत करे सवाय, राम करै वही मानुष को टोटा कभी न आए।

भले खेती कम हो पर भरपूर मेहनत करने वाले को कभी कमी नहीं होती।

गेंहूँभवा काहे आसाढ़ के दो बाहे, गेंहूँभवा काहें, सोलह बाहे नौ गाहे।

आषाढ़ मास में खेत की भली-भाँति जोताई हुई गेंहूँ की अच्छी उपज के लिए खेत की सोलह बार जोताई और नौ बार हेंगाई हुई अर्थात् खेत की मिट्टी् आटे के समान कर दी गई।

कातिक मास रात हर जोतौ, टाँग पसारे घर मतसूतौ।

कार्तिक महीना किसान के लिए परिश्रम का महीना है, इसमें उसे रात दिन मेहनत करना चाहिए, घर में पैर फैला के आराम नहीं फरमाना चाहिए।

गहिर न जोते बोवे धान, सो घर कोठिला भरै किसान।

अर्थात् धान के खेत की जोताई हल्की करनी चाहिए, तभी उपज बढिय़ा होती है

चिरैया में चीर फार, असरैखा में टार-टार, मघा में काँदो सार।

पुष्या नक्षत्र में खेत की हल्की जुताई कर धान लगा देने पर फसल अच्छी होती है, अश्लेषा में खूब जुताई करनी होती है और यदि मघा नक्षत्र में रोपाई करनी है तो जोताई और खाद देना पड़ेगा, तब धान होगा।

उपरोक्त उदाहरणों से हम समझ सकते हैं कि घाघ का साहित्य सागर है जो एक से बढ़ एक मोतियों से भरा है, चाहे मौसम की बात हो, चाहे समाज जीवन या जीने की कला की, खानपान या पशुधन की, सबके बारे में उनका निर्देश अकाट्य है। इस प्रकार के अनगिनत आख्यान घाघ के दोहों में मिलते हैं जिनमें अधिकांश कृषि और पर्यावरण के सम्बंधों को जोडते हैं। साफ है कि घाघ के दोहों का समुचित उपयोग कृषि को और लाभकारी बना सकता है।