चंगेज खाँ मिथकों को तोड़ता एक अप्रतिम नायक

changej_khanरवि शंकर
कार्यकारी संपादक

इतिहास और मिथक का अंतर समझना हो तो केवल भारत का इतिहास पढ़ने से काम नहीं चलेगा। इसके लिए थोड़ा बहुत दुनिया का भी इतिहास पढ़ना पड़ेगा। इतिहास लिखते.लिखते व्यक्ति कब मिथक लिखने लगता है और और मिथक लिखते.लिखते कब इतिहासए यह घालमेल समझना कई बार काफी कठिन होता है और विशेषकर तब तो और भी अधिक कठिन जब इतिहास लिखने वालों का अपना स्वार्थ उससे जुड़ा हो। भारत और एशिया के इतिहास के संबंध में इसे हम पूरी तरह सच पाते हैं। एक ऐसा ही इतिहास चंगेज खाँ का है जो इतिहास के रूप में मिथक है। चंगेज खाँ जिसे वास्तव में चिनगिज खाँ कहा जाना चाहिए के बारे में यदि हम मौलिक स्रोतों को खंगालना प्रारंभ करें तो उसका आज का लिखा इतिहास पूरी तरह मिथक साबित होने लगता है।
सवाल उठता है कि हम भारत के लोगों को चंगेज खाँ का इतिहास पढ़ना ही क्यों चाहिएघ् चंगेज खाँ के बारे में उपलब्ध इतिहास के अनुसार भारत से उसका संबंध तो केवल एक आक्रांता लूटेरे और एक पीड़ित देश का ही था। चंगेज खाँ वैसा कोई बहुत आदर्श व्यक्तित्व भी नहीं है। वह तो एक खानाबदोश कबीले का व्यक्ति था जिसने अत्यंत क्रूरता और नृशंसता ही दिखाई है। लूटेरा और हत्याराए यही उसकी प्रमुख पहचान हैं। भारत की इतिहास की पाठ्यपुस्तकें हमें इतना ही पढ़ाती हैं। ऐसे क्रूरए नृशंस लूटेरे के जीवन वृत्त में ऐसा फिर खास क्या है जिसे जानना हमारे लिए आवश्यक है।

silk-roadpb-copyलूटेरा या नायक
सबसे पहली बात तो यह जानना रोचक है कि कुछेक वर्ष पहले मंगोलिया ने चंगेज खाँ को अपना राष्ट्रीय नायक स्वीकार किया है। वहां चंगेज खाँ की स्मृतियों को सहेजने का काम शुरू हो गया है। यह थोड़ी हैरत की बात हो सकती है कि एक क्रूरए नृशंस हत्यारेए लूटेरे को कोई देश अपना राष्ट्रीय नायक बना लेए उसकी बड़ी.बड़ी मूर्तियां चौक.चौराहों पर लगाई जाएं। तो मंगोलिया ऐसा क्यों कर रहा हैघ् क्या वह अपने सभी नागरिकों को चंगेज खाँ की ही भांति लूटेरा और हत्यारा बनाना चाहता हैघ् निश्चित ही कोई भी राष्ट्र ऐसा नहीं चाहेगा। फिर मंगोलिया जिसने बौद्ध जैसे अहिंसक मत को इतनी अधिक प्रतिष्ठा दी है कि वह वहां के प्राचीन मत शामिवाद के समान लोकप्रिय हैए हिंसा फैलाने वाले व्यक्ति को अपना आदर्श कैसे स्वीकार सकता है
यह सवाल और गहरा जाता है यदि हम एक और तथ्य की ओर ध्यान देते हैं। यह तथ्य वर्ष 2003 में एक जेनेटिक अध्ययन में सामने आया था कि पूरे यूरेशियाए यूरोप और एशिया को मिलाकर यूरेशिया कहा जाता हैए के लोगों के एक विशेष वर्ग में एक साझा डीएनए पैटर्न है। इस अध्ययन के अनुसार यूरेशिया के सोलह समूहों के आठ प्रतिशत लोगों में यह पैटर्न पाया जाता है जिसका अर्थ है कि यूरेशिया में लगभग एक करोड़ साठ लाख लोग एक ही डीएनए पैटर्न के हैं जिसका सीधा.साधा सा अर्थ है कि वे किसी एक ही गोत्रा ;अंग्रेजी में इसके लिए फैमिली शब्द का प्रयोग है जिसका परिवार अर्थ कर देने पर भ्रामक स्थिति बनती हैए इसलिए गोत्रा शब्द का प्रयोग किया है।द्ध का हिस्सा हैं। अध्ययन करने वाले इसकी और गहराई में गए तो पता चला कि यह पैटर्न मंगोलिया के चंगेज खाँ के डीएनए पैटर्न से मिलता है।
इसका अर्थ है कि एक समय चंगेज खाँ का इतना व्यापक प्रभाव रहा होगा कि वह पूरे यूरेशिया में लोगों के डीएनए पैटर्न को बदलने में सक्षम था। हालांकि पाश्चात्य विज्ञानियों का मानना है कि चंगेज खाँ जहां जाता होगाए वहां वह केवल स्त्रिायों के साथ संबंध बनाता फिरता रह होगाए क्योंकि डीएनए संरचना जन्मजात होती है और उसमें बाद में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं किया जा सकता। दूसरी बात यह है कि यूरोप और मध्यपूर्व में विशेषकर ईसाई और मुस्लिम पंथ के क्रूसेडर और जिहादी युद्ध में स्त्रिायों को कब्जाने और उन्हें दासी बनाकर अपने मनोरंजन के प्रयोग करने का काम करते रहे हैंए इसलिए उन्होंने यही बात चंगेज खाँ के लिए भी सोच ली कि वह भी ऐसा ही करता रहा होगा। इसलिए यूरेशिया के हर 200 पुरुषों में से एक पुरुष का डीएनए पैटर्न चंगेज खाँ से मिलता है। परंतु चंगेज खाँ के जीवन का अध्ययन करने से यह बात साबित होती है कि वह ऐसा कोई यौनकुंठित शासक नहीं थाए इतना ही नहींए वह अपनी पत्नी से इतना अधिक प्रेम करता था कि जिसका उदाहरण इतिहास में मिलना कठिन है। चंगेज खाँ के जीवन में अन्य स्त्रिायां होतीं तो मुस्लिम बादशाहों के समान उसके भी दासियों से कई बच्चे होते जो फिर उसके मरने के बाद सत्ता की लड़ाई में दिखाई पड़ते। परंतु ऐसा कहीं भी कुछ भी नहीं था।
फिर एक ऐसे साझे डीएनए पैटर्न का मतलब क्या निकलता हैघ् इसका मतलब निकलता है कि चंगेज खाँ ने यूरेशिया में अपना जो विशाल साम्राज्य स्थापित किया थाए उस साम्राज्य के संचालन उसने इतनी कुशलता से किया था कि वह लोगों का आदर्श बन गया था। हर माँ अपने बच्चे को आदर्श बनाना चाहती है। आज यह साबित हो चुका है कि गर्भावस्था में माँ के चिंतन से बच्चे के डीएनए पैटर्न बदल जाते हैं। समझने की बात है कि चंगेज खाँ का प्रभाव कितना व्यापक और गहरा रहा होगा कि कैस्पियन सागर से लेकर प्रशांत महासागर तक माताएं अपने बच्चे को चंगेज खाँ जैसा बनाना चाहती होंगी। इससे ऐसा लगता है कि चंगेज खाँ उनके लिए कोई लूटेराए नृशंस हत्यारा आदि नहीं रहा होगाए कोई वीर योद्धाए कुशल शासक आदि रहा होगा। चंगेज खाँ के जीवन के अध्ययन से यह बात साबित भी होती है।

स्त्राीवादी चंगेज
चंगेज खाँ का जीवन किसी हीरो की भांति चित्ताकर्षक और रोमांचकारी है। उसका बालपन अत्यंत ही कष्टमय और संघर्षपूर्ण रहा है। चंगेज खाँ की माँ जब विवाह के बाद अपने पति के साथ ससुराल जा रही थीए तो रास्ते में उसके पति के दुश्मन समुदाय के लोगों ने उसका अपहरण कर लिया। अपहरणकर्ताओं में से एक ने उसको अपनी दूसरी पत्नी के रूप में रख लिया। चूंकि वह दूसरे समुदाय से लाई गई थीए इसलिए चंगेज खाँ की माँ और चंगेज खाँ को कभी भी उसके परिवार में उचित स्थान नहीं मिला। उनके साथ गुलामों जैसा ही व्यवहार किया जाता रहा। कम आयु में ही चंगेज खाँ का विवाह उससे एक वर्ष बड़ी बोर्टी खाँ से हो गया। एक बार जब चंगेज खाँ अपनी पत्नी के साथ कहीं जा रहा था तो उसकी माँ के पुराने समुदाय के लोग मिल गए। उन्होने उसकी माँ के अपहरण का बदला चुकाने के लिए चंगेज खाँ की पत्नी का अपहरण कर लिया।
उन दिनों मंगोल समुदायों में इस प्रकार स्त्रिायों का अपहरण कर लेना आम बात थी और कोई भी अपनी स्त्राी को छुड़ाने का प्रयास नहीं करता था। उसे पता होता था कि जितने दिन में वह उसे छुड़ा कर लाएगाए उसकी स्त्राी को कोई और अपनी पत्नी बना चुका होगा। परंतु चंगेज खाँ ने इस परंपरा को तोड़ने का साहस किया। उसे अपनी माँ का हुआ अपमान याद था और वह स्त्रिायों के अपहरण की घटनाओं को रोकना चाहता था। इस समय तक उसे एक गुलाम के रूप में बेचा जा चुका था। अपनी गुलामी के दिनों को जीते हुए भी उसने शक्ति संचय करना शुरू किया ताकि अपनी पत्नी को छुड़ा कर ला सके। भाग्य ने उसका साथ दिया और उसे कुछ अत्यंत विश्वसनीय साथी भी मिले। उसकी सहायता से वह अपनी पत्नी को वापस ला पाने में सफल हुआ।
यहां यह जानना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है कि अपहरण किए जाने के बाद बोर्टी खाँ के साथ बलात्कार भी किया गया था और जब चंगेज खाँ उसे छुड़ा कर लाया तो वह उस समय गर्भवती थी। बलात्कार द्वारा गर्भवती होने पर भी चंगेज खाँ ने न केवल अपनी पत्नी को उसी अवस्था में स्वीकार कर लियाए बल्कि उसके बच्चे को भी उसने जन्म लेने दिया। उस बच्चे को पिता के रूप में उसने अपना नाम दिया और उसे अपने बड़े बेटे के रूप में ही पाला। चंगेज खाँ के वृद्ध हो जाने के बाद जब उसके बेटों में उत्तराधिकार की लड़ाई प्रारंभ हुई तो उसके बेटों ने यह तर्क दिया कि जोची खाँ में तो चंगेज खाँ का रक्त ही नहीं है। इस पर चंगेज खाँ ने जो बात कही हैए वह आज के बड़े.बड़े सभ्य और मानवतावादी उदार लोगों को बोलने में कठिनाई हो जाएगी। चंगेज खाँ ने अपने बेटों से कहा कि वे यह नहीं सोचें कि वे किस रक्त से पैदा हुए हैंए बल्कि वे यह याद करें कि वे किस कोख से पैदा हुए हैं। पितृसत्तात्मक और मातृसत्तात्मक के विवादों में उलझे आज के नारीवादियों के लिए भी चंगेज खाँ का यह वक्तव्य विशेषरूप से पठनीय है। पितृसत्ता और मातृसत्ता परस्पर विरोधी नहीं होते। वे परस्पर के सहयोगी होते हैंए यह चंगेज खाँ के व्यवहार से साबित होता है।
चंगेज खाँ का यह स्त्राीवादी व्यवहार केवल अपनी पत्नी के साथ ही रहा होए ऐसा नहीं है। इसके बाद चंगेज खाँ ने यह राज्याज्ञा निकाल दी कि उसके राज्य में कोई भी किसी स्त्राी का अपहरण नहीं करेगा। स्त्रिायों के अपहरण करने वालों के साथ वह बड़ी क्रूरता के साथ पेश आता था। यह भी एक बड़ा कारण है कि चंगेज खाँ को हम पूरे यूरेशिया में स्त्रिायों के साथ बलात्कार करने वाला नहीं माना जा सकताए जैसा कि कुछेक यूरोपीय इतिहासकार उसे चित्रित करना चाहते हैं।

खानाबदोश लूटेरा नहीं विश्वविजेता सम्राट
चंगेज खाँ के विजय अभियानों और दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्य खड़ा करने की कहानी काफी बड़ी है। परंतु इस कहानी की विशेष बात यह है कि यह उन मिथकों को तोड़ डालती है जो चंगेज खाँ के बारे में आज के इतिहासकारों ने गढ़ रखे हैं। चंगेज खाँ और अन्य मंगोल समुदायों को खानाबदोश कबीलों के रूप में चित्रित किया जाता है। इसका एक बड़ा कारण है कि मंगोल समुदाय आमतौर पर खेती करने की बजाय पशुपालन द्वारा जीवन निर्वाह करते थे। इसके कारण वे अक्सर अपना स्थान बदलते रहा करते थे। यह भी सच है कि मंगोल छोटे.छोटे गुटों में भी बंटे हुए थे। इन सभी बातों के बाद यह भी सच है कि मंगोल एक बड़े भूभाग में फैले हुए थे और वह पूरा इलाका उनसे ही पहचाना जाता था। कोई एक केंद्रीय राज्यसत्ता का वहां अभाव था और इसके कारण गुटों के परस्पर संघर्ष भी काफी हुआ करते थेए परंतु इसके बाद भी उनके पास एक व्यवस्थित समाज रचना थीए जिसके कारण उन्हें खानाबदोश कहा जाना उचित प्रतीत नहीं होता। जीवन के संघर्ष में उन्हें अपना स्थान छोड़ने के लिए विवश होना पड़ता था और वे इस कारण अकसर लूटमार भी किया करते थे। परंतु यदि वे केवल खानाबदोश होते तो उनका आतंक इतना अधिक नहीं हो सकता था कि चीन जैसे व्यवस्थित देशों को अपनी रक्षा के लिए दीवाल बनानी पड़ती। चीन में उनके आतंक से साबित होता है कि यह केवल लूटेरों को रोकने का प्रयास नहीं थाए यह सुसंगठित सेनाओं को रोकने का प्रयास था। हालांकि दीवालें कभी भी चीन की रक्षा नहीं कर पाईं।
मंगोलों का एक सुसंबंद्ध समाज होना इससे भी साफ होता है कि चंगेज खाँ के प्रयास से बड़ी ही सरलता से न केवल एक केंद्रीय मंगोल शासन का निर्माण किया जाना संभव हुआए बल्कि उस मंगोल राज्य ने कुछ ही वर्षों में अपना विस्तार सुदूर यूरोप तक कर लिया। खानाबदोश कबीले लूटमार तो कर सकते हैंए परंतु वे इतने सुव्यवस्थित साम्राज्य का निर्माण नहीं कर सकते। इस साम्राज्य की विशेषता थी इसके द्वारा पूरे यूरेशिया का किया गया विकास जिसे देख कर इतालवी यात्राी मार्को पोलो अचंभित रह गया था और उसके किए गए वर्णनों को पढ़ कर पूरा यूरोप चीन और भारत आने के लिए उन्मत्त हो उठा।
बहरहालए चंगेज खाँ के कई काम ऐसे हैंए जो उसकी एक नकारात्मक छवि बनाते हैं। जैसे कि उसने जहां भी आक्रमण कियाए उस शहर को पूरी तरह नेस्तनाबूत कर दिया। लोगों को गुलाम बनाया। नृशंसतापूर्वक हत्याएं कीं। परंतु क्या केवल शहरों को नष्ट करने और लोगों की हत्याएं करने से कोई साम्राज्य खड़ा कर सकता हैघ् क्या चंगेज खाँ श्मसान पर शासन कर रहा थाघ् यदि हां तो उसने सिल्क रूट का निर्माण क्यों किया थाघ् यदि उसे शहरों को लूट कर जला ही देना था तो उसे एक व्यापार मार्ग बनाने की क्या आवश्यकता थीघ् इसलिए यह समझने की आवश्यकता है कि चंगेज खाँ ने किन शहरों को नष्ट किया और क्यों नष्ट किया। यह भी देखा जाना चाहिए कि शहरों को लूटनेए ध्वस्त करने और लोगों की हत्याएं करने के अलावा वह और क्या कर रहा था। चंगेज खाँ की शासन पद्धति क्या रही है और उसने अपनी प्रजा के लिए क्या.क्या काम किएघ्
नए विश्व का निर्माता
यह जानना आश्चर्यजनक हो सकता है कि चंगेज खाँ एक नए विश्व का निर्माता था। जी हाँए चंगेज खाँ द्वारा साम्राज्य स्थापित किए जाने से पहले मध्य तथा दक्षिण.पूर्व एशिया विशेषकर चीन और भारत और यूरोप को एक.दूसरे के बारे में न्यूनतम जानकारी थी। यूरोप में यहाँ के बारे में जो भी जानकारी थीए वह अफवाहें मात्रा थीं। यही स्थिति मध्य.पूर्व यानी कि अरब जगत और शेष एशिया के संबंध में भी कही जा सकती है। पहली बार चंगेज खाँ ने न केवल पूरे विश्व को एक सूत्रा में जोड़ाए बल्कि उनके बीच में तकनीक और ज्ञान का आदान.प्रदान भी प्रारंभ करवायाए साथ ही परस्पर व्यापार को बढ़ावा देने के लिए उसने एक सड़क मार्ग स्थापित किया जिसे आज हम सिल्क रूट यानी कि रेशम मार्ग के रूप में जानते हैं।
स्वाभाविक सी बात है कि एक लूटेरे की रूचि कभी भी कोई व्यापारिक मार्ग स्थापित करने की नहीं होती। परंतु चंगेज खाँ को जैसा कुछेक मुसलमान और ईसाई इतिहासकार चित्रित करना चाहते हैंए वह उस तरह का कोई लूटेरा नहीं था। इसका एक बड़ा उदाहरण है बगदाद पर चंगेज खाँ का आक्रमण। अधिकांश इतिहासकार बगदाद पर चंगेज खाँ के आक्रमण और बगदाद शहर को ध्वस्त किए जाने की कहानी कहते हैं। परंतु इसके पीछे के कारण की मीमांसा कम लोग करते हैं।
चंगेज खाँ ने पहले व्यापारिक प्रस्ताव लेकर वहां 100 व्यापारियों का एक दल भेजा था। व्यापारियों का वह दल अपने साथ बड़ी मात्रा में कीमती सामान लेकर गया थाए ताकि अरब जगत के साथ व्यापार की शुरूआत की जा सके। परंतु बगदाद के खलीफा जो कि वास्तव में लूटेरा मानसिकता का थाए ने उस पूरे दल को लूट लिया और सभी व्यापारियों को मार डाला। उसमें से एक व्यापारी किसी तरह अपनी जान बचाकर भाग निकला। उसने वापस लौट कर चंगेज खाँ को सारी कहानी सुनाई। इस पर क्रोध से आग.बबूला होकर चंगेज खाँ ने बगदाद पर चढ़ाई कर दी।
समझने की बात यह है कि एक योद्धा के तौर पर इस समय चंगेज खाँ बूढ़ा हो रहा माना जा रहा था और तत्कालीन यात्रा संसाधनों के हिसाब से वह बगदाद से लगभग एक वर्ष की दूरी पर बैठा था। अरब जगत में जो व्यापारी और शासक माने जाते हैंए वे वास्तव में बड़े लूटेरे थे। उस समय भूमध्यसागर के व्यापारीए व्यापारी कम और लूटेरे अधिक थे। यह बात केवल अरब जगत के ही नहींए वरन् यूरोपीय व्यापारियों और खोजियों के लिए भी सच है। चंगेज खाँ कोई लूटेरा नहीं थाए वह पूरी दुनिया में वस्तुओं और तकनीक का आदान.प्रदान करना चाहता था। इसलिए उसने इन लूटेरों को दंडित करने की ठानी। उसने बगदाद पर आक्रमण किया और वहां के लूटेरों को चुन.चुन कर मार डाला। मुसलमान इतिहासकार इसके बारे में लिखते हैं कि चंगेज खाँ ने बगदाद के सभी युवा योद्धाओं को मार डालाए केवल स्त्रिायोंए बालकों और वृद्धों को छोड़ा।
इस कृत्य की तुलना आप अरब के मुसलमान व्यापारी.लूटेरों और यूरोप के ईसाई व्यापारी.लूटेरों के साथ करें तो वे इसका ठीक उलटा करते थे। वे बालकों और वृद्धों को मार डालते थेए युवाओं और स्त्रिायों को गुलाम बनाकर ले जाते थे। इससे एक शहर के लूटेरे ध्वंसकर्ता होने और एक महान शासक होने का अंतर पता चलता है। चंगेज खाँ एक महान शासक थाए वह विद्रोहियों को कठोर दंड दिया करता थाए परंतु सामान्य प्रजा पर वह अत्याचार नहीं करता था। समस्या यह थी कि तत्कालीन यूरोप और अरब जगत में घोर अराजकताए क्रूरता और मजहबी अत्याचारों का काल चल रहा था। ऐसे में चंगेज खाँ ने जिन्हें दंडित कियाए उन्होंने उसे लूटेरे के रूप में चित्रित किया।
चंगेज खाँ अपने विजय अभियानों में जीते हुए शहर से तकनीशियनोंए कलाकारों और विद्वानों को अपने साथ ले जाया करता था। इस प्रकार वह एक स्थान के तकनीशियनोंए कलाकारों और विद्वानों का दूसरे स्थान के तकनीशियनोंए कलाकारों और विद्वानों से संवाद स्थापित करवाता था। चंगेज खाँ ने ही पहली बार यूरोप और चीन की तकनीक का मेल कराया। इससे अनेक नए अनुसंधानों का जन्म हुआ।

सामाजिक.मजहबी विषमताओं का अंत

चंगेज खाँ ने अपने प्रारंभ के दिनों से ही सभी प्रकार की विषमताओं को समाप्त करना शुरू कर दिया था। उसने अपनी पत्नी को छुड़ाने के लिए जो सेना तैयार की थीए उसमें किसी प्रकार का गोरे.काले का कोई भेदभाव नहीं था। वह सभी से समान व्यवहार करता था। यह जानना महत्वपूर्ण है कि ठीक उसी समय यूरोप और अरब जगत में मजहबी आधार पर भेदभाव अपने चरम पर था। गैर ईसाइओं और गैर मुसलमानों को गुलाम बनाना और उनकी खरीद.बिक्री करने का काम वहां खुलेआम होता थाए बल्कि इसे मजहबी दृष्टि से काफी पवित्रा काम माना जाता था। गोरे.कालों में भी खूब भेदभाव किया जाता था। चंगेज खाँ ने अपनी राज्य को इन भेदभावों से मुक्त रखा था। उसके राज्य में मजहबी स्वतंत्राता भी पूरी थी। दूसरे अर्थों में हम चंगेज खाँ के साम्राज्य को पूरी तरह से सेकुलर स्टेट यानी कि पंथनिरपेक्ष राज्य मान सकते हैं। वह स्वयं मंगोलों की प्राचीन परम्परा के अनुसार प्रकृतिपूजक था परंतु उसने ईसाइतए इस्लाम और बौद्ध सभी मतों को अपने राज्य में फलने.फूलने दिया। उसके अपने परिवार के कई लोगों ने बाद में ईसाइयत और इस्लाम को स्वीकार कर लियाए बड़ी संख्या में उसके परिवार के लोग बौद्ध भी हो गए। यह उसकी मजहबी उदारता को ही दर्शाता है।
मंगोलों की यह मजहबी उदारता भारत की प्राचीन वैदिक उदारता से मिलती.जुलती है। चंगेज खाँ के बेटे मोंकी खाँ के पास पोप ने ईसाई बनने के प्रस्ताव के साथ कई पादरी भेजे थे। मोंकी खाँ ने उनसे पूछा कि आखिर वह ईसाई क्यों बने। उसे बताया गया कि यही एक मात्रा रास्ता है ईश्वर तक पहुँचने का। मोंकी खाँ ने उस समय उन्हें जो उत्तर दियाए वह पठनीय है। उसने कहा कि जिसप्रकार ईश्वर ने हमें अलग.अलग उँगलियां दी हैंए उसी प्रकार उस तक पहुँचने के अलग.अलग रास्ते भी दिए हैं। उसका यह कथन एकं सद्विप्राः बहुधा वदन्ति का ही मंगोल अनुवाद है। इसेक बाद उसने ईसाई पादरियोंए मंगोल शामी पुजारियों और बौद्धों के बीच शास्त्रार्थ भी करवाया। यह भी भारत की वैदिक परम्परा ही है। प्रसिद्ध अमेरिकी इतिहासकार जैक वेदरफोर्ड इस घटना का उल्लेख करते हुए लिखता है कि बिना शासन के सहयोग के इस प्रकार शास्त्रार्थ करना ईसाइयों का पहला अनुभव था और वे इसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थे। यहाँ पर यह जानना भी रोचक हो सकता है कि मुसलमान उस शास्त्रार्थ में ईसाइयों के पक्ष में बैठे थे। इस शास्त्रार्थ में पादरी कुछ भी साबित नहीं कर पाए और कालांतर में मोंकी खाँ के उत्तराधिकारी कुबलेई खाँ ने बौद्ध मत को स्वीकार कर लिया।

अत्याचारी नहींए अत्याचारों से मुक्तिदाता

चंगेज खाँ को हम अत्याचारों से मुक्ति दिलाने वाले के रूप में भी देख सकते हैं। उसके काल में अरब जगत और यूरोप दोनों ही स्थानों पर बड़ी संख्या में सार्वजनिक उत्पीड़न किया जाता था। सामान्य से दोषों पर संगसार यानी कि खंभे से बांध कर या फिर जमीन में गले तक गाड़ कर पत्थर बरसा कर मार डालनाए विचहंटिंग यानी कि डायन तथा चुड़ैल बात कर औरतों को जिंदा जलाना जैसी घटनाएं बड़ी संख्या में हो रही थीं। दुर्भाग्यजनक बात यह थी कि यह सारा काम मजहबी शासन द्वारा किया जा रहा था। इसलिए पीड़ित को न्याय दिलाने की कोई व्यवस्था नहीं थी। न्यायकर्ता ही अत्याचारी बना हुआ था। चंगेज खाँ इस तरह के सभी सार्वजनिक अत्याचारों को अपने राज्य में बंद करवा दिया था। उसका स्पष्ट कथन था कि जिसको भी दंड देना हैए वह शासन की निगरानी में दिया जाएए सार्वजनिक चौराहों पर नहीं। हालांकि वह कठोर दंड दिए जाने का पक्षधर था जिसके कारण अपराधियों में भय भी व्याप्त रहता थाए परंतु सार्वजनिक रूप से अत्याचार किए जाने की प्रथा उसने पूरी तरह बंद करवा दी थी।
इस प्रकार हम पाते हैं कि चंगेज खाँ का व्यक्तित्व प्रचलित मान्यताओं से एकदम विपरीत रहा है। उसके कार्य जैसे दिखाए जाते हैंए वैसे न होकर उसके ठीक उलट हैं। भारत का मंगोलों पर खासा प्रभाव रहा है। यह उनके अनेक कार्यों में परिलक्षित भी होता है। सांप्रदायिक पंथनिरपेक्षता के अलावा भी अनेक स्तरों पर यह प्रभाव साफ दिखता है। इसका एक और बड़ा उदाहरण है चंगेज खाँ द्वारा तैयार की गई सैनिक और नागरिक संरचना। चंगेज खाँ ने अपनी सेना का और बाद में प्रशासनिक व्यवस्था का निर्माण मनु की वैदिक व्यवस्था के अनुरूप दस.दस के समूहों में किया था। हालांकि पश्चिमी इतिहासकारों ने इस व्यवस्था को दश.दश की गणना पर आधारित तुर्कों की सैनिक रचना या फिर लगभग दो हजार वर्ष पुराने एथियन राजा क्लीथेनिस द्वारा बनाई गई सामाजिक व्यवस्था से प्रेरित बताया है। परंतु मनु की यह व्यवस्था इन सबसे प्राचीन है जो संभवतः बौद्ध प्रचारकों के साथ वहां गई होगी।
इस प्रकार हम चंगेज खाँ और मंगोलिया को भारत के स्वाभाविक मित्रा रूप में देख सकते हैं। दोनों की सांस्कृतिक समानताएं दोनों देशों के बीच मजबूत संबंध विकसित करने में सहयोगी हो सकती हैं। इन दोनों ही देशों के संयोग से दुनिया में एक बार फिर शांति और सद्भाव का प्रचार किया जा सकता हैए जोकि इन दोनों ही देशों का उद्देश्य रहा है।

गहरे संबंध थे भारत और मंगोलिया के 
मंगोलिया और भारत में गहरे सांस्कृतिक संबंध हैं। आमतौर पर माना जाता है कि मंगोलिया चीन के भी उत्तर में स्थित है भारत से काफी दूर है और इस भौगोलिक दूरी के कारण उसका भारत से सीधा संबंध नहीं है। मंगोलों के बारे में एक धारणा यह भी फैली हुई है कि ये भारत के लिए आक्रांता और लूटेरे थे। परंतु यदि इतिहास देखा जाए तो हैरान कर देने वाली बातें सामने आती हैं।
वैदिक आर्य और मंगोल
आज यह साबित हो चुका है कि अंग्रेजों ने आर्यों के भारत आने की एक मिथ्या कहानी रची थी। इस सिद्धांत का खंडन भारतीय विद्वानों ने तभी कर दिया था। उन्होंने आर्यों से अनेक विदेशी समुदायों की समानता का अधिक सटीक और वैज्ञानिक समाधान भी सुझाया था। भारतीय विद्वानों का मानना था कि मनुष्यों की उत्पत्ति भारत के उत्तर में हिमालय की उत्तरी ढलान के इलाके में हुई और उन्होंने अपनी पहचान आर्य के रूप में स्थापित की। वहां से आर्यों का समूह पूरी दुनिया में फैला। इस क्रम में एक समूह सुदूर उत्तर में मंगोलिया पहुंचा। पंडित रघुनंदन शर्मा अपनी पुस्तक वैदिक संपत्ति में लिखते हैं, ‘‘नेपाल में एक चपटे चहेरेवाली मंगोलियन जाति भी रहती है। यह जाति अति प्राचीन काल में आर्यों की ही एक शाखा थी। परन्तु यह दीर्घातिदीर्घ काल पूर्व ही आर्यों से पृथक होकर चीना नामक हिमालय के उत्तर ओर वाली गहराई में बस गई थी, इसलिए अब उसके आकार, रंग और भाषा आदि में बहुत अन्तर आ गया है। बाबू उमेशचन्द्र विद्यारत्न ने लिखा है कि किरात लोग नेपाल के उत्तर-पश्चिम में बसते थे और पतित क्षेत्राी थे और हमने बतलाया है कि चीना हिमालय के नीचे उत्तरपूर्व में रहते थे और ये भी क्षत्राी ही थे। इन्हीं दोनों के मेल से मंगोलिया जाति के पूर्वजों की उत्पत्ति हुई है। यही नेपाल निवासी चपटे मंुहवाली जाति है। यही जाति मंगोलियन विभाग की जननी है। उमेश बाबू कहते हैं कि इस नवीन जाति का रंग बाल्मीकि रामायण में सुवर्ण का सा लिखा है। जिस समय की यह बात हैं, उस समय जिस प्रकार जरा सांवले रंगवाले श्याम और श्यामा बडे़ सुन्दर समझे जाते थे, उसी तरह ये पीत अर्थात् सुवर्ण के से रंगवाले भी बहुत उत्तम समझे जाते थे। महाभारत मीमांसा में रावबहादुर चिन्तामणि विनायक वैद्य ने महाभारत के प्रमाणों से लिखा है कि कौरव पांडवों की गौरवर्ण स्त्रिायों का रंग तप्त सुवर्ण का सा था। यह उस समय के रंग की खूबी का बयान है।
दक्षिण के गुजराती और महाराष्ट्र आदि कों का भी प्रायः यही रंग है। वे न तो सफेद है और न सुर्खीमायल ही हैं। आदि काल में आर्यों ने जरा सांवले और जरा पीले रंग को ही अपने मन में उत्तम समझा था, इसीलिए माताओं के संस्कार प्रबल हुए और अधिक प्रजा इसी रंग की हो गई है। हम देखते हैं कि नेपाल में बसनेवालों का भी प्रायः यही रंग है। वहां चपटे चेहरे और पीतवर्ण वालों में कुछ ताम्रवर्ण के श्याम लोग भी पाये जाते है। अभी हमने जिस श्याम रंग का वर्णन किया है, ये लोग उसी रुचि के परिणाम हैं। कहने का मतलब यह है कि ये चपटे चेहरे और पीले तथा श्याम रंगवाले मंगोलियन आर्यों से भिन्न किसी अन्य जाति के मनुष्य नहीं है।
इसके आगे बाबू उमेशचन्द्र विद्यारत्न ने आर्यों का मूल वतन मंगोलिया के अलताई पहाड़ पर सिद्ध करने के लिए ‘मानवेर आदि जन्मभूमि‘ नामक ग्रन्थ लिखा है। उस ग्रन्थ के पढ़ने से अधिक तो नहीं, पर इतना अवश्य भासित होता है कि पूर्वातिपूर्व काल में आर्यलोग अलताई अर्थात् इलावृत में रहते थे और यह अलताई शब्द इलावृत का ही अपभ्रंश है। ‘मानवेर आदि जन्मभूमि‘ पृष्ठ 119 में वायुपूराण अघ्याय 38 के कुछ श्लोक उद्धृत किये गये हैं, जिनसे ऊपर की बात पृष्ठ होती है। इन श्लोकों में कहा है – ‘इलावृतवर्ष के दक्षिण हरिवर्ष, किम्पुरुषवर्ष और भारतवर्ष के ये तीन वर्ष है और उत्तर की ओर रम्यकवर्ष, हिरण्यवर्ष और उत्तरकुरुवर्ष ये तीन वर्ष है। इसके बीच में इलावृतवर्ष है।’ इस वर्णन से स्पष्ट हो जाता है कि मंगोलिया मंे आर्यलोगों ने ही अपना उपनिवेश बसाया था।’’
इसी प्रकार एक मत यह भी है कि विष्णु के बेटे मंगल के नाम पर मंगोलिया नाम पड़ा है। पुराणों में कथा आती है कि विष्णु का एक बेटा चीन के उत्तर में जा कर बस गया था। वही क्षेत्रा मंगोलिया का है। इन उद्धरणों से यह साबित होता है कि मंगोलिया भारत के लिए कोई अनजाना प्रदेश नहीं है। अति प्राचीन काल में मंगोलिया में आर्य लोगों का आना-जाना रहा ही है। यही कारण है मंगोलिया की संस्कृति और वैदिक आर्य संस्कृति में काफी अधिक समानताएं पाई जाती हैं। सभी संप्रदायों के प्रति समान आदर, स्त्रिायों का सम्मान, मानवीय मूल्यों को महत्व, प्रकृति का पूजन आदि ऐसी ही कुछ समानताएं हैं।
मंगोल और बौद्ध मत
मंगोल सामान्यतः प्रकृतिपूजक थे। जब एशिया और फिर मध्य-पूर्व तथा यूरोप में उनका प्रभाव फैलने लगा तो उन्हें ईसाई और मुसलमान बनाने के बड़े भारी प्रयत्न किए गए। पोप ने रोम से उनके पास कई पादरी भेजे। परंतु मंगोलों ने उनसे पूछा कि वे ही सर्वश्रेष्ठ कैसे हैं।
उनके उत्तरों से असंतुष्ट मंगोलों ने बाद में बौद्ध मत को स्वीकार कर लिया। चंद्रगुप्त विद्यालंकार अपनी पुस्तक वृहत्तर भारत में लिखा है, ‘मंगोलों ने उत्तरीय एशिया और पूर्वीय योरुप को जीत कर विशाल मंगोल-साम्राज्य की नींव डाली। 1232 ई. में सुङ्वंशीय राजाओं ने तातार लोगों के विरुद्ध मंगोलों से संधि कर ली। तातारों की शक्ति नष्ट कर चंगेज खां चीन का सम्राट् बन गया। 1280 ई. में कुबलेईखा राजा हुआ। 1280 से 1368 तक मंगोलों का प्रभुत्व रहा। इस मंगोलों को अन्य धर्मांे की अपेक्षा बौद्धधर्म अधिक प्रिय था। मंगोल सम्राट कुबलेई खां का बौद्धधर्म के प्रति बहुत अनुराग था। इसने विहार बनाने, पुस्तकें छपाने तथा त्यौहार मनाने में बहुत बड़ी धनराशि व्यय की। आज्ञा प्रचारित की गई कि विहारों में बौद्ध गन्थों का पाठ किया जाय। 1287 ई. में त्रिपिटक का नया संग्रह प्रकाशित किया गया। जब कुबलेई खां को उसके दरबारियों ने जापान पर आक्रमण करने की सलाह दी तो उसने पहली बार यह कहकर इनकार कर दिया कि वहां के निवासी महात्मा बुद्ध के उपदेशों का पालन करते है।’

Chinghis Khan_CK Tyagiमंगोल राष्ट्र का एक अद्भुत योद्धा

के.सी. त्यागी
लेखक राज्यसभा सांसद हैं।

लोकसभा की अध्यक्षा श्रीमती सुमित्रा महाजन के नेतृत्व में सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल में शामिल होकर मंगोलियाई गणराज्य के भूगोल, इतिहास और राजनीति को करीब से समझने का अवसर मिला। कोयला, खनिज उत्पादनो और प्राकृतिक खजानों, गैस आदि के साथ-साथ वहाँ के नायक चंगेज खान के रणकौशल एवं वहाँ के बढे हुए भूगोल के इतिहास को करीब से जानने का भी अवसर मिला।
आज भी हम इतिहास को जानने के लिए मुख्य रूप से यूरोपीय इतिहासकारों पर निर्भर रहते हैं। इनमे से अधिकतर ऐसे है जो एशियाई मूल के लोगों के प्रति भेदभाव रखते हैं। कई इतिहासकारों को तो ये बात हजम ही नहीं होती की चंगेज खान जैसा कोई एशियाई शासक इतना महान, प्रगतिशील और उदारवादी कैसे हो सकता था, वो भी उस दौर में जब पूरा यूरोपीय समाज पिछड़ेपन और बर्बरता की गिरफ्त में जकड़ा हुआ था। इन्ही वजहों से चंगेज खान की छवि एक ऐसे बर्बर शासक की बना दी गयी है जिसका मुख्य उद्देश्य लूट-पाट और हिंसा करना था।
इसके विपरीत चंगेज खान एक बेहद ही प्रगतिशील और कुशल शासक था। उत्तरी एशिया, दक्षिण एशिया और यूरोप में ही नही बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप में भी चंगेज खान का नाम प्रसिद्ध है। लोगों में एक और भ्रान्ति फैलाई गयी है कि चंगेज खान एक बर्बर मुसलमान शासक था, जो कि सरासर गलत है। चंगेज खान के तत्कालीन समाज में खान की उपाधि का अर्थ होता था महान नेता और यह उपलब्धि उसने अपने शौर्य, पराक्रम और कुशल नेतृत्व के आधार पर प्राप्त किया था। यह सच्चाई है कि मंगोल साम्राज्य के इस योद्धा ने इतिहास में एक ऐसे साम्राज्य की आधारशिला रखा जिसकी बुनियाद प्रगतिशीलता, धार्मिक सहिष्णुता और लोकहित के स्तम्भों पर टिकी थी। चंगेज खान ने मंगोल साम्राज्य के विस्तार में अहम भूमिका निभाई थी। वह अपनी संगठन शक्ति और साम्राज्य विस्तार के लिए इतिहास में प्रसिद्ध हुए थे। चंगेज खान के समकालीन मंगोलियाई समाज में ढेरों कबीले हुआ करते थे। चंगेज खान ने ना सिर्फ इन् युद्धरत रहने वाले कबीलों को एकजुट किया बल्कि इन्हे एक एकीकृत और अनुशासित सैन्य इकाई में ढाला। यह तथ्य चंगेज खान की दूरदृर्शी सोच का एक उदाहरण है।
चंगेज ने क्रांतिकारी सैन्य रणनीति और अस्त्रा-शस्त्रा के ऐसे नवीन प्रयोग किये जिसने युद्धकला की पूरी धारा ही बदल दी। अपने अदभुत रणनीतिक कौशल और प्रशिक्षित सेना के दम पर न ही सिर्फ मध्य एशिया में फैले इस्लामिक एकाधिकार को ध्वस्त किया बल्कि यूरोपीय ताकतों को भी घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। साइबेरिया से लेकर चीन तक, वियतनाम से हंगरी और कोरिया से लेकर बाल्कन तक एक ऐसे मंगोलियाई साम्राज्य का उदय हुआ जो भूक्षेत्रा के आधार पर अब तक का विश्व का सबसे बड़ा साम्राज्य है। अपने सबाब पर मंगोलियाई साम्राज्य, रोमन साम्राज्य का चार गुना और एलेग्जेंडर महान के साम्राज्य से दो गुना बड़ा था।
ताओइस्ट दार्शनिक क्वी चूजी को चंगेज खान ने अपने दरबार में आमंत्रित किया था। दोनों के बीच हुई चर्चा ‘क्सुअन फेंग क्विंग हुई लु’ नामक पुस्तक में लिपिबद्ध है। चूजी ने चंगेज खान को सलाह दी की वह अपनी सांसारिक भोग अभिलाषाओं को नियंत्रित करे और अपने लोगों के प्रति प्रेम भाव रखे तथा निरन्तर उनके कल्याण के लिए कार्यरत रहे । चंगेज खान पर इन बातों का इतना प्रभाव पड़ा की उसने भोग विलास की चीज़ों को अपने आगामी जीवन में पूरी तरह से त्याग दिया। यहाँ तक की जीवनभर चंगेज ने उन्ही वस्त्रों को धारण किया और वही भोजन ग्रहण किया जो चरवाहे खाया करते थे। इतिहास में ज्यादातर साम्राज्यवादी शासकों ने अपनी संस्कृति और सभ्यता को बल पूर्वक अपनी प्रजा पर थोपा है। चाहे बात प्राचीन रोमन शासन की करे, स्लाव राजवंश की या फिर आधुनिक कालीन ब्रिटिश, फ्रेंच या पुर्तगाली साम्राज्य की, सबने अपनी तहजीब को दूसरे मुल्कों की जनता पर बर्बरता से अधिरोपित किया है। इसके विपरीत चंगेज खान ने अपनी सभ्यता, धर्म, भाषा, रीति-रिवाज और जीवन शैली को दूसरों पर कभी भी नहीं थोपा। यहाँ तक कि पूरे मंगोलियन साम्राज्य में हर किसी को उनके धर्म और मान्यताओं के आधार पर जीने की संपूर्ण आजादी थी।

Chinghis Khan_Rajendra Agarwalभारत का मित्र है मंगोलिया
राजेन्द्र अग्रवाल
लेखक लोकसभा सांसद हैं।

चंगेज खान मंगोलिया के राष्ट्रीय नायक हैं। मंगोलियन संसद के मुख्य द्वार पर उनकी बहुत बड़ी प्रतिमा सर्वाधिक प्रमुखता तथा सम्मान के साथ स्थित है। यह बड़ा भ्रम है कि चंगेज खाँ इस्लाम को मानते थे। वास्तव में चंगेज खाँ प्रकृति की पूजा करते थे। आसमान पिता तथा पृथ्वी माता। मंगोलिया का अर्थ भी स्थानीय भाषा में नीला आकाष है।
चंगेज खाँ के समय अर्थात् 12वीं व 13वीं षताब्दी में यूरोप बहुत पिछड़ा था तथा एषिया में भारत-चीन आदि देषों की विकसित सभ्यताएं विद्यमान थी। दोनों क्षेत्रों को जोड़ने का काम चंगेज खान ने किया। प्रसिद्ध व्यापयरिक मार्ग सिल्क रूट को प्रारम्भ करने का श्रेय चंगेज खाँ को जाता है। इस प्रकार पूर्व व पष्चिम को जोड़ने का बड़ा काम चंगेज खाँ ने किया।
चंगेज खाँ ने अपने राज्य में स्त्रिायों की सुरक्षा और सम्मान का काफी महत्व दिया था। यही कारण था कि उसकी शासन व्यवस्थाओं में मंगोल रानियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका हुआ करती थी। चंगेज खाँ के बाद उत्तराधिकारी तय करने में भी मंगोल रानियों ने बड़ी भूमिका निभाई थी। स्त्रिायों को यह राजनीतिक महत्व चंगेज खाँ की ही देन थी।
दुनिया में पहली डाक सेवा तथा पेड़ की छाल को मुद्रा के रूप में प्रारम्भ करके भविष्य की कागजी नोट को जन्म देने का श्रेय भी चंगेज खाँ को जाता है। एक कबीले से निकले चंगेज खाँ ने 12वीं षतााब्दि में विभिन्न धार्मिक पद्धतियों को मानने वाले वर्गों को अपने साम्राज्य में आजादी के साथ रहने की व्यवस्था निर्माण की। मंगोलिया भारत का मित्रा देष है। चीन का पड़ोसी होने के बाद भी संयुक्त राष्ट्र संघ तथा अन्य अनेक मंचों पर मंगोलिया भारत का साथ देता है। केवल 32 लाख की आबादी का वर्तमान मंगोलिया प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर तथा सांस्कृतिक विविधताओं से भरा देष है। लगभग आधी आबादी बौद्ध है तथा बुद्ध की भूमि भारत के प्रति उनके ह्नदय में गहरा सम्मान है।
मंगोलिया में भारत और भारत की प्रतीकों के प्रति गहरी श्रद्धा है। चाहे वह गंगा नदी हो या फिर भगवान बुद्ध।भारत की भांति मंगोलियावासी भी अतिथियों को देवस्वरूप मानते हैं और उनका काफी आदर-सत्कार करते हैं। इस प्रकार यदि हम मंगोलियावासियों के सामान्य व्यवहार को देखें तो उसमें भी भारतीयता की सुगंध मिलेगी।