वर कन्हरा की चामुण्डा प्रतिमा

डॉ. जितेन्द्रकुमार सिंह संजय


सोनभद्र जनपद की घोरावल तहसील के शैवतीर्त शिवद्वार (सतद्वारी) के नैऋत्य कोण पर अवस्थित वर-कन्हरा नामक गाँव में भगवती चामुण्डा की एक दुर्लभ प्रतिमा है। दुर्गा के रौद्र रूप को चामुण्डा कहते हैं। चामुण्डा की शब्दशास्त्रीय व्युत्पत्ति चम् + ला + क, पृषो. साधु: है। दुर्गासप्तशती के अन्तर्गत देवीकवच में चमुण्डा के विषय में वर्णित है कि चामुण्डा प्रेत पर संस्थित हैं – प्रेत संस्था तु चामुण्डा। इसी तरह चण्डी कवच में चामुण्डा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि चामुण्डा का अवतरण चण्ड-मुण्ड का विनाश करने के लिए हुआ है। दुर्गाशप्तशती में वर्णित है कि देवी ने चण्ड-मुण्ड वध करने के पश्चात् स्वयं अपने आप को चामुण्डा कहा है।
मत्स्यपुराण के प्रतिमा-लक्षण-प्रकरण में चामुण्डा की प्रतिमा का लक्षण वर्णित करते हुए कहा गया है कि वे तीक्ष्ण धारवाली तलवार, लम्बी जिह्वा, ऊपर उठे हुए केश तथा हड्डियों के टुकड़ों से विभूषित रहती हैं। उन्हें विकराल दाढ़ों से युक्त मुखवाली, दुर्बल उदर से युक्त, कपालों की माला धारण किये और मुण्ड-मालाओं से विभूषित बनाना चाहिए। उनके बायें हाथ में खोपड़ी से युक्त एवं रक्त और मांस से पूर्ण खप्पर और दाहिने हाथ में शक्ति हो। वे गृध्र या काक पर बैठी हों। उनका शरीर मांसरहित, उदर भीतर घुसा हुआ और मुख अत्यन्त भीषण हो। उन्हें तीन नेत्रों से सम्पन्न घण्टा लिये हुए व्याघ्र-चर्म से सुशोभित या निर्वस्त्र बनाना चाहिए।

वस्तुत: चामुण्डा का यही मूल स्वरूप है। चामुण्डा विषयक ऐसा ही निर्देश विष्णुधर्मोत्तरपुराण में भी है। भारतीय मूर्तिशिल्प के प्रख्यात विश्लेषक श्री टी. ए. गोपीनाथ राव ने विष्णुधर्मोत्तरपुराण के भिन्न पाठ का उल्लेख किया है, जिसके अनुसार चामुण्डा रक्त वर्ण की विकृत मुखवाली हैं। ये प्रेतों के साथ रहती हैं तथा सर्पों के आभूषण धारण करती हैं। इनका रूप बड़ा भयानक है। पुराणों में वर्णित चामुण्डा-लक्षण की परम्परा का अनुसरण करते हुए श्रीभुवनदेवाचार्य ने अपराजितपृच्छा में चामुण्डा को लक्षण-लक्षित किया है – चामुण्डा-मूर्ति निर्मांस (मांसरहित कायावाली), क्रूर रूपा, उग्र नासिका, कृशकाय पेटवाली होती है। वह कपिल वर्ण के ऊँचे केशवाली, नीलांगी और लाल आँखोंवाली है। फड़कते नेत्रों, दाँतोंवाली और विकृत नख एवं मुखवाली है। वह सोलह भुजावाली और अपने हाथों में त्रिशूल, खङ्ग, खेटक, धनुष, बाण, पाश, अंकुश, घण्टा, दर्पण, वज्र, दण्ड, कुठार, शंख, चक्र, गदा और मुद्गर धारण किये हुए है। वह व्याघ्र के चर्म को परिधान बनाकर धारण करनेवाली और सर्पों के आभूषण से युक्त होती है। वह पुराकाल की घननाद की पुत्री और दैत्यों के संघ की काल है।

प्रतिमा-विज्ञान के अनुसार चामुण्डा प्रेत या शव पर सवार रहती हैं। उनका बायाँ हाथ ठुड्ढी पर और दाहिने हाथ में खप्पर होता है। अनेकशस्त्रहस्ता तो होती ही हैं। चमुण्डा की प्रतिमा गढ़ते समय शिल्पकार की सबसे बड़ी परीक्षा होती है नसों एवं अस्थियों को उत्कीर्ण करना। इस दृष्टि से वर-कन्हरा में विद्यमान इस चामुण्डा-प्रतिमा को भारतभूमि के अलग अलग स्थानों में अवस्थित अन्य चामुण्डा-प्रतिमाओं की तरह ही उत्कृष्टता प्राप्त है। सर्वाधिक प्रसिद्ध मैसूर की चामुण्डेश्वरी-प्रतिमा है। भारतीय मूर्तिकला के विशेषज्ञ श्री गोपीनाथ राव ने वेलूर तथा कुम्भकोणम् में अवस्थित चामुण्डा-प्रतिमाओं का उल्लेख किया है। हिमाचल प्रदेश में भी चमुण्डा-प्रतिमा है। ब्रिटिश संग्रहालय ओडिशा में 8वीं-9वीं शताब्दी की एक चामुण्डा-प्रतिमा है। इसी तरह राष्ट्रीय संग्रहालय दिल्ली में 11वीं-12वीं शताब्दी की एक चामुण्डा-प्रतिमा है।

चामुण्डा का अत्यन्त सुन्दर चित्रण चामुण्डास्तोत्र में किया गया है। चामुण्डा का मूल स्थान मैसूर के निकट चामुण्डी पर्वत है, जहाँ चण्ड-मुण्ड का वध हुआ था। सोनभद्र और शाहाबाद के मध्य में बने अनेक प्राचीन चामुण्डा मन्दिर सम्भवत: सम्राट् विक्रमादित्य की सेना से सम्बन्धित हैं। उनकी सैन्य-छावनी को मऊ कहा जाता था। इस नाम के अनेक स्थान मध्य तथा उत्तर भारत में विद्यमान हैं तथा उनमे कई स्थानों पर आज भी छावनी है। उनकी सबसे बड़ी छावनी ज्योतिर्विदाभरण के अनुसार 18 योजन (144 या 288 किलोमीटर) की थी। यह पलामऊ या पलामू (परला = परा या परे, बड़ा, प्रथम) है। यहाँ जंगल में सैनिक अभ्यास के लिए पर्याप्त स्थान होने तथा शस्त्र-निर्माण हेतु लोहा उपलब्ध होने के कारण इस स्थान का अत्यधिक महत्त्व रहा है।

सोनभद्र जनपद की पूर्वी सीमा पर भभुआ में अवस्थित मुण्डेश्वरी-मण्दिर का अभिलेख विक्रमादित्यकालीन है। मुण्ड का एक अर्थ लोहा है। इसलिए लोहे की खान में काम करनेवाले कारीगर मुण्डा कहे गये है। उसका चूर्ण या धातु मुर (मुर्रम) है। अत: भागवत में लोहे के घेरेवाले नगर के राजा को मुर कहा है, जिसे मारनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण मुरारि हैं। मुर का विशेषण मौर्य है। मौर्य (मोर्चा) के दो अर्थ हैं- युद्ध क्षेत्र या लोहे की सतह पर विकार। जंग के भी यही दो अर्थ हैं। मुण्डेश्वरी के निकट लोहा-ताम्बा का हथियार बनाने का दायित्व जिनके पास था, वे अपने को आज भी लोहतमिया राजपूत कहते हैं। घुड़सवार सेना का प्रमुख केन्द्र होने के कारण घोरावल का प्राचीनकाल में अत्यधिक महत्त्व रहा है। यहाँ की भूमि घुड़दौड़ के लिए उपयुक्त थी। वर-कन्हरा चामुण्डा-मन्दिर भी रण-प्रयाण से ही सम्पृक्त है।