कहीं कैंसर हो जाए…

स्कंद शुक्ला
लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।


नेहा की मम्मी उसके लिए बाज़ार से आइसक्रीम लायी हैं। वादीलाल, मदर डेयरी या जो चाहे नाम सोच लीजिए। उसका छोटा भाई जय बगल में ब्रेड पर मेयोनीज लगाकर खाते हुए उसे चिढ़ा रहा है। आइसक्रीम, मेयोनीज, बेकरी-उत्पाद जैसे ढेरों खाद्यों में इमल्सिफ़ायर डाले जाते हैं। इन्हीं के कारण वसा छोटी-छोटी बूँदों में टूटती है और पानी व वसा का ठीक से मिश्रण हो पाता है। पानी और वसा परस्पर घुलते नहीं हैं। इमल्सिफ़ायर उनमें मेलजोल कराते हैं।

अब आता है विज्ञान। वह बताता है इमल्सिफायर चूहों को खिलाने से होता है कैंसर। या फिर आँतों की कई दीर्घकालिक इंफ्लेमेटरी बीमारियाँ। फिर वैज्ञानिक एक पंक्ति जोड़ देते हैं कि ये नतीजे चूहों पर हैं, मनुष्यों पर इसे सत्य मानना अभी जल्दबाज़ी होगी। वैज्ञानिक रूप से यह बात सच है। लेकिन व्यावाहरिक तथा विवेकशील सोच क्या कहती है, मुझे आपको बताने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए। मेयोनीज कोई अपरिहार्य भोजन नहीं है, न आइसक्रीम के बिना बर्थडे व शादी की दावतें हो नहीं सकतीं। बीस साल पहले उत्सव मनते थे? तब लोग कैसे आनन्द मनाते थे?

समस्या यह है कि एक करोड़ लोग मेयोनीज-आइसक्रीम खाएँगे। सबका जेनेटिक मेकअप अलग-अलग। कैंसर या कोई भी रोग मात्र इमल्सिफ़ायर खाने से नहीं होगा। इमल्सिफ़ायर एक रसायन है जो आपकी आँतों का पर्यावरण बदलेगा। अब यह चूहों को कैंसर देता है, तो आपकी आँतों को अमृत देने से रहा। इस बदलते पर्यावरण का इन करोड़ लोगों के जीनों के साथ संपर्क होगा। जिसका यह जीन-वातावरण संपर्क बुरा किन्तु सटीक बैठ गया, उसे होंगे आँतों के रोग।

अब यह कैसे तय हो रामू आइसक्रीम खाएगा तो उसकी आँतों पर क्या प्रभाव पड़ेगा और श्यामू खाएगा तो क्या होगा? कितनी आईसक्री में खानी होंगी दुष्प्रभाव पडऩे के लिए? क्या आइसक्रीम तथा मेयोनीज का कोई डोज़-डिपेंडेंट-दुष्प्रभाव है? यानी अधिक आईसक्रीमों व मेयोनीज से आँतों की बीमारियाँ अधिक होंगी? या फिर यह केवल जीनों के पर्यावरण का केवल एक दुर्लभ बुरा संयोग है, जो एक आइसक्रीम खाने वाले को भी हो सकता है और एक लाख आइसक्रीम खाने वालों को भी। और यह सब खोजने व सिद्ध करने में कितने दशक बीत जाएँगे, जब हम चेतेंगे?

एक सज्जन से पूछा कि सभी आँतों के रोगी तो आइसक्रीम नहीं खाते थे। जवाब है कि बिलकुल नहीं खाते होंगे। लेकिन आँतों के रोग एक नहीं, ढेरों हैं। हर रोग में कई-कई जीन व अनेकानेक पर्यावरणीय रसायन कारक के रूप में भूमिका निभाते हैं। कई बार रोगरूपी दुर्घटनाएँ डोज़ डिपेंडेंट होती भी हैं और नहीं भी। चर्चिल जीवनभर सिगरेट फूँकते रहे, लेकिन लम्बा जिये। सब चर्चिल न होंगे। सबके जीन चर्चिल वाले जीन न होंगे। लड़का हेलमेट न लगाये, हो सकता है जीवन-भर गाड़ी सकुशल चलाता रहे। कुछ न हो। लेकिन हेलमेट लगाना चाहिए, क्योंकि सिर फूटने के कारण मृत्यु की आशंका इससे घट जाती है। यही बात मेयोनीज-आइसक्रीम जैसे बाज़ारू उत्पादों पर भी लगाइए। इन्हें अपरिहार्य न बनाइए। जहाँ तक हो सके, टालिए। कम-से-कम बार खाइए, न्यूनतम मात्रा तक।

छोटी नीतिका साढ़े चार महीने की है। अपने मम्मी-पापा के साथ उनके नये घर में अभी-अभी वह कुछ ही दिन पहले शिफ़्ट हुई है। उसके पास एक छोटा मछलीनुमा खिलौना है, जिसे वह मुँह में डालकर किसी बात पर आह्लादित है। नीतिका जिस खिलौने को मुँह में डाले खुश हो रही है, वह पीवीसी यानी पॉलीविनाइल क्लोराइड है। संसार में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक पॉलिमरों में तीसरा पॉलीथीन और पॉलीप्रोपीलीन के बाद इसी का नाम आता है। घर और आसपास की तमाम वस्तुएँ इस पीवीसी से निर्मित की जाती रही हैं।
पानी जिन पाइपों में बहता है, वे पीवीसी से बने हैं। बिजली के केबल, तमाम कपड़े, खिलौने और घरों में लगने वाली फ्लोरिंग-इत्यादि भी। इतनी व्यापक मात्रा में प्रयुक्त होने के बावजूद जो बातें जनता अमूमन नहीं जानती, वह यह कि पीवीसी कैंसरकारी तो है ही, प्रजनन-क्षमता घटाने व अन्य ढेरों स्वास्थ्य-समस्याओं में इसका बड़ा योगदान है।

कुछ ही दिन पहले हमने परसिस्टेंट ऑर्गैनिक पॉल्यूटेंट के बारे में बात की थी। ये वे रसायन होते हैं, जो प्लास्टिकों के विघटन के दौरान निकलते हैं किन्तु स्वयं आसानी से नष्ट नहीं होते। इनमें से सबसे आदिक ख़तरनाक डायॉक्सिन है, जिसका सम्बन्ध मानव-कैंसरों से पाया गया है। पीओपी के अलावा पीवीसी में थैलेट होते हैं, सीसा, कैडमियम व अन्य हानिकारक रसायन भी। इन सब का मानव-स्वास्थ्य पर अलग-अलग ढंग से प्रतिकूल प्रभाव पाया जाता रहा है।

नीतिका रह-रह कर पीवीसी के खिलौने को मुँह में रखकर चूस रही है। आपको लगता है कि यह हानिकारक नहीं होगा? या इसके लिए पहले हम एक लाख बच्चों पर किसी वैज्ञानिक रैण्डमाइज़्ड कंट्रोल ट्रायल की प्रतीक्षा करेंगे? घरों-अन्य बिल्डिंगों-स्कूलों में लगने वाली विनाइल फ्लोरिंग-रूफि़ंग-कारपेटिंग जिससे हम और हमारे बच्चे रोज़ रू-ब-रू हैं, आपको लगता है एकदम सुरक्षित हैं? खाने के डिब्बे (लंचबॉक्स), बैकपैक, रेनकोट, कम्प्यूटर-उत्पाद व मरीज़ों के लिए इस्तेमाल होने वाले अस्पताली उपकरण, इन सबमें मौजूद पीवीसी,हवा, धूप व पानी के सम्पर्क से कोई नुकसान नहीं पहुँचा रहा?

पीवीसी पर धूप पड़ती है, इससे हानिकारक रसायनों निकल कर हवा में फ़ैल जाते हैं। सोचिए अगर आपने झूठे दिखावे के चक्कर में घर की फर्श पर विनाइल-फ्लोरिंग लगवा ली, तो आप और आपका परिवार दिन-रात उसी प्लास्टिक के रसायनों को सूँघता घर में रहता रहेगा। स्कूलों में लगी यही फ्लोरिंग वहाँ छह-सात घण्टे रहने वाले बच्चों के स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव डालेगी? वहाँ युवा-प्रौढ़-वृद्ध स्टाफ़ भी कार्यरत है, जिनमें कई गर्भवती महिलाएँ भी हो सकती हैं। पीवीसी में मौजूद थैलेट गर्भ में विकसित हो रहे भ्रूण पर तरह-तरह के दुष्प्रभाव डालते हैं। नित्य थैलेट सूँघते बच्चों में साँस की बीमारियाँ अधिक पायी जाती हैं और युवाओं की प्रजनन-क्षमता तरह-तरह से घट जाती है। इतना सब होने के बाद भी लोग इन रसायनों में बारे में एकदम निरक्षर हैं।

कई कम्पनियाँ पीवीसी-मुक्ति का प्रण ले चुकी हैं या ले रही हैं। लेकिन क्या आप किसी कम्पनी के सीईओ से उम्मीद रखते हैं कि वह मानवता से अभिभूत आप और आपके परिवार को अपने मुनाफ़े से पहले रखेगा? मैं नहीं मानता। बिजनेसमैन की पहली श्रद्धा उसके निजी मुनाफा पर है, बस।

आप बच्चे के लिए स्कूल चुनने जाएंगे। शर्त लगा लीजिए, स्कूल के प्रिंसिपल से यह नहीं पूछेंगे कि स्कूल के भवन में पीवीसी का इस्तेमाल हुआ है अथवा नहीं। आपको यह बोध भी नहीं होगा कि कहाँ-कहाँ आप पीवीसी के साथ जीवन जीते आ रहे हैं और कब से। जब कुछ स्वास्थ-दुर्घटना होगी, तो सब-कुछ इतना गड्ड-मड्ड होगा कि कोई बता ही नहीं सकेगा कि अमुक उत्पाद के निरन्तर प्रयोग के कारण आपको या आपके किसी परिवार वाले को कैंसर हुआ।

इसका उपचार क्या है? दिखावे और आडम्बर का ढोंग बन्द कीजिए। विज्ञापनों को ठेंगा दिखाइए। बाजारवादी मौत के सौदागर हैं, इन्हें हमारी सेहत से कोई लेना-देना नहीं। यह सच है कि हर जगह आप रसायनों की हानियों से नहीं बच सकेंगे, लेकिन जितना बच सकें, उतनी कोशिश आपको, हमें और सभी को करनी चाहिए।