बुंदेलखण्ड का लोक कलाएं

बचाओ मित्रों लोक संगीत कला विलुप्त पलायन इसने कब, किसका, कहाँ, दिल दे ले लिया जाति, धर्म, गरीब, अमीर, सुख दुख, जन्म, मरण धर्म शांति युद्ध सबका साथी लोक संगीत वाद्य यंत्र विलुप्त हो गए क्यों, जाने युवा पीढ़ी अपने भारतीय संगीत को जिनका सम्मान महर्षि नारद जी ज्ञान की दायिनी माता सरस्वती, महाकाल महादेव डमरू रखते हैं, श्री हरि विष्णु शंख रखते हैं कुछ तो कारण होगा जब यह महान देवता अपने साथ वाद्य यंत्र रखते हैं। संगीत ब्रह्म ओम के नाद के महत्व को नासा एवं विज्ञान ने सिद्ध कर दिया ताकत है प्रत्यक्ष अगर इसमें कुछ रहस्य ना होता तो इन का आविष्कार ना किया गया होता चाहे बंसी हो, डमरू हो, वीणा हो, सितार, ढोल नगाड़ा, घंटा, घड़ियाल, ढोलक तबला मजीरा चिमटा।

बुंदेलखंड की संस्कृति समृद्धि का प्रारंभ से यह अनोखा संसार है और रहा है, पाश्चात्य संस्कृति की चकाचौंध में उन्माद का वातावरण सुसज्जित किया है। क्षणिक उत्तेजना प्रकट करने वाले पाश्चात्य संगीत के सामने हजारों वर्षों की प्राचीन लोक विधा है दम तोड़ रही है, लोक कलाओं के संरक्षण संवर्धन की जरूरत है लोक कलाकार दाने दाने के लिए मोहताज हैं, लोक कला के कलाकार पलायन कर गए हैं। पेट उसे परदेस से आने नहीं दे रहा, नाचने नहीं दे रहा, गाने नहीं दे रहा, बजाने नहीं दे रहा बुंदेलखंड के बड़े-बड़े लोक कलाकार महानगरों की सड़कों पर जी मार रहे कितने ही कलाकार अभाव में दम दम तोड़ चुके हैं। कुछ खटिया पर लगे हैं सरकार के पास केवल कागज में लोक कलाकारों के लिए योजना है यदा-कदा मिल भी रही हो जुगाड़ सिफारिश वाले को कह नहीं सकता। आज का युग बाजार युग है विज्ञापन का नंगे पन का युग है, लोक विधाओं का दम घुट रहा है बुंदेलखंड की लोक कला फाग, जगनिक का आल्हा, वीर पैदा करता था। गांव से गायब लोक विधाएं समाज के उन कमजोर समूहों के सुख दुख प्रीत प्रतिकार की अभिव्यक्ति है जिसके माध्यम से वह अपना दुख व्यक्त करते थे। बुंदेलखंड भारत वर्ष का हृदय है व्यास जी, भूषण जी, मतिराम, केशव, तुलसी, बिहारी, लक्ष्मी बाई, नाना, आल्हा, ऊदल जैसे महान राष्ट्र भक्तों का कर्म क्षेत्र है। लोक विधाओं के माध्यम से हम संस्कार गीत ऋतु गीत श्रम गीत को माध्यम बनाकर आपस में भाईचारा के संदेश देते थे। जनकवि ईश्वरी ने सारी रचनाएं वसंत गीतों को खेत खलियान गांव में लिखा है गांव पर आधारित है, लोक कलाएं संस्कृति की अभिव्यक्ति है कभी यह चित्रों और मूर्तियों में,आकाश पाती है और कभी गीत संगीत में मुखर होती, बुंदेलखंड की राई, निर्गुण लोक कलाएं हमारी धरोहर है लोक कलाकारों और कलाओं को एक मंच लोक कलाओं की पौध यदि हम बच्चों को दे सके तो कल ये विशाल वृक्ष बनेंगे। लोकगीतों में ना तो विषय की कमी है और ना ही उनके कथ्य की एक गीत की व्याख्या करने चलो तो हजारों पन्ने कम पड़ जाएंगे। लोक कला लोक संगीत लोकगीत अपनी माटी से माटी का मिलन करवाते हैं।

लोक संगीत लोक गीत लोक कथा बालक वृद्ध वर्ग सभी को आकर्षित करते हैं, सदैव नवीन रहते हैं। लोक कथा गाथा ओं का आधार बनाकर बड़े-बड़े साहित्य लिखे गए लोक में श्रद्धा और भक्ति परंपरा चिर काल से चली आ रही है जब आवागमन के साधन नहीं थे तब भी लोग तीर्थ यात्रा पर जाएं करते थे अनुमान है , तभी से लोक संगीत गीत का आदान-प्रदान हुआ भारत की रीढ़ है उसकी अध्यात्मिक शक्ति, सांस्कृतिक विरासत जो विरासत हमें अपने बाप दादाओं से मिली आपको पूरी दुनिया में लोकगीत संस्कार गीत, श्रम गीत, नारी गीत, जाति संबंधी, गीत रितु संबंधी, गीत बाल, गीत लोक कथाएं जोगिया गीत, लोकनाट्य, कठपुतली, नाच लोक नृत्य, अनंत देखने को नहीं मिलेगा। लोक साहित्य, लोक कलाएं आदिमानव की आवश्यकता रही होगी तभी तो हर व्यक्ति के खून में है जनकवि ईश्वरी प्रेम व मिलन के बसंत गीतों का वर्णन करते है कहते हैं

भौरा जात पराए बागे।
तनक लाज ना आई।।
आल्हा में लोक कवि जगनिक कहते हैं
बारह बरस लौ कुकुर जीवे।
तेरह लो जिए सियार।।
बीस बरस लौ छत्रिय जी बे।
आगे जीने को धिक्कार।।

कहां गई हमारी लोक संस्कृति की कजरी, बिराहा, चौमासा, बन्ना, सुहाग, गारी, विदाई, होरी, फगुआ, सोहर, बारहमासी, धोबिया, दादरा, देवी गीत, संगीत तो जीवन भर हलचल पैदा करता है। जन्म से मां की लोरी सुनी या अंतिम यात्रा में राम नाम सत्य का करुण स्वर हो संगीत को प्रयोगात्मक दृष्टि से यदि विभाजित करें तो शास्त्रीय उप शास्त्री है। लोक संगीत स्वरूप दिखाई देते हैं लोक संगीत लोक एवं ग्राम जीवन के जनमानस में पैदा होता है यह जानकारी हम तीन भागों में बांट सकते थे।

लोक संगीत, लोकगीत लोक कथा, लोक वाद्य यंत्र लेकिन एक साथ किसी वजह से, महोबा के लोक संस्कृति के संवाहक राजीव तिवारी बताते हैं कि आने वाली पीढ़ी शायद राई, लोरी, ढिमरिया, लांगुरिया, रसिया, फाग, लमटेरा, कजरी, देवी गीत, दादरा, आल्हा जैसे परंपरा गीतों से अनभिज्ञ रहेंगे कौन बताएगा साहित्य से सब गायब है।

छतरपुर के प्रसिद्ध तबला वादक तबले पर पीएचडी की है डॉ शिवपूजन अवस्थी कहते हैं कि पुराने वाद्य यंत्र गायब होते जा रहे हैं ज्यादातर लोक गीतों की लिपि नहीं रही लेकिन हजार साल से जिंदा है जब तक लोक है लोक परंपरा जिंदा रहे लोकगीत लोकनृत्य समाज जीवन को प्राण तत्व देते हैं। इनका संरक्षण संवर्धन हमारा दायित्व आज पुरानी वाद्य यंत्र वीणा, तानपुरा, हरमोनिया, नगाड़ा, ढोल, बांसुरी, शहनाई, सारंगी, गिटार, कहां चले गए भगवान कृष्ण ने बांसुरी बजाई भगवान शंकर ने डमरू बजाया, नारद जी ने इकतारा बजाया, आखिर देवता क्यों संगीत सुनते थे। पुराने जमाने में लकड़ी, मिट्टी, चमड़े लोहे के वाद्य यंत्र होते थे, कहां गए कौन पता करेगा सरकार को जरूरत नहीं समाज संवेदनशील नहीं।
वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य सिंह परिहार कहते हैं कोई सोच सकता है एक तार में जानवर की खाल में मिट्टी के बर्तन में जानवर के सींग से लकड़ी में कौन सा संगीत समाहित है, शायद नहीं लेकिन है जो भी लोक वाद्य यंत्र गीत कथाएं गाथाएं बच सकती हो बचाने होंगी हमने बचपन में देखा है। आदिवासी लोक नृत्य संस्कार, लोक नृत्य परिवारिक लोक नृत्य, सार्वजनिक लोक नृत्य लोक नृत्य की बुंदेलखंड में दो दर्जन परंपराएं रही हैं बुंदेलखंड की पशुपालक जातियों में दीपावली के समय यादव, पाल समाज के लोग दिवारी खेलते थे बरे दी नृत्य करते थे। इस नृत्य के माध्यम से एक संदेश होता था चरवाहा केवल पशु नहीं चलाता था कला आपको भी बचाता था।

बुंदेलखंड कनेक्ट के सामान्य अरुण निगम कहते हैं, बुंदेलखंड मैं पानी तथा मछली के व्यवसाय से जुड़ी ढीमर जाति की अपनी एक विशेषता थी कि अपने में एक बढ़ा लोक नृत्य जिंदा किए थे सारंगी, मृदंग, ढोलक, नगरिया, नगाडा, रमतूला, गायब जैसा है इन लोकगीतों में प्रकृति थी, स्वास्थ्य, ज्योतिष थी, नीति थी, व्यंग था, इतिहास थी, तुलनात्मक विवरण था, तीर्था खेल था, क्या नहीं था अब के गीतों में खुद देखो पहाड़ गाते थे, नदियां गाती थी फसलें गाती थी, उत्सव मेले ऋतु में परंपराएं गीत गाती थी। महाकवि घाघ ने लोक संगीत को ऊंचा स्थान दिया।

कालिंजर के अरविंद भाई कहते हैं गांव के भजन, सावन, मल्हार, आल्हा समूह, में बैठ कर सुनते थे। पुराने वाद्य यंत्र तबला, सारंगी , झिका, मजीरा सब बैठ कर बजाते थे। चंग काशी मटका, पखावज, मृदंग, युवा पीढ़ी ने देखा ही ना हो डफला एक शालीनता गंभीर प्रकृति का प्राचीन वाद्य यंत्र है, गांव की नौटंकी तमूरा कहां है, आधुनिक शैली उत्तेजना अश्लीलता परोसी रही है पुरानी परंपरागत ग्रामीण रोजगार देने वाले वाद्य यंत्र विलुप्त हो गए चंगेली गांव से खत्म गांव से प्राचीन वाद्य यंत्र डफला भी गायब है। नौटंकी सर्वाधिक लोकप्रिय लोक नाट्य रहा है गांव में बांसुरी डमरु तानपुरा बहुत पुराना वाद्य यंत्र रमतूला शायद ही कोई जानता हूं, कैसा होता था पुरानी कहावत है।

ओरी बाउ कबे बजे रमतूला।
मोहे देखने दूल्हा।।

रमतूला के स्थान पर शहनाई बजाई जाती संगीत से ईश्वर की आराधना होती है अध्यात्मिक वातावरण बनता है। मृदंग ढोल नगाड़ा ढोलक इन बिजली के उपकरणों के वजह से गायब हो गए इनके बनाने वाले मरम्मत करने वाले कारीगर बेकार हो गए वर्तमान के बाद यंत्रों मैं संगीत व सुर की आत्मा गायब सर्वोदय कार्यकर्ता गजेंद्र त्रिपाठी कहते हैं कि आधुनिक बाद यंत्रों की चकाचौंध में पुराने वाद्य यंत्रों के अस्तित्व को मिटा दिया। इनको बजाने वालों के सामने रोजी रोटी का संकट है, परंपरागत बाद यंत्रों की आवाज सुरीली कर्णप्रिय थी जबकि आज के बाद यंत्र मानसिक बीमार करने वाले आज की पीढ़ी अपनी सभ्यता संस्कृति गीत संगीत परंपरा वाद्य यंत्रों को ना जानती है। ना जानना चाहती लोक कला भारत का दिल है, आत्मा है, संगीत व्यक्ति को जीवंत बनाता है, दवा है, भक्ति है, साधना मिलन है, त्याग है, ईश्वर की प्राप्ति का माध्यम प्रेम जाति पाती ऊंच-नीच गरीब देश राज्य की सीमा तोड़ कर दो कलाकारों को जोड़ता है। संगीत और कला के सामने सीमा टूट जाती संगीत कला की वजह से हमारे देश के अनेकों व्यक्तियों को जिन्होंने साधना की है। उन्हें विभिन्न क्षेत्र में भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण, पद्मश्री, राज्य सभा राज्यपाल की पदों पर बैठाया गया है। वह सम्मान दिया गया और यह संवैधानिक बनाया गया कई वर्षों तक आजादी के बाद यह परंपरा रही भी है। वर्तमान में अंतिम सांसे गिन रहे चंग अलगोजा, नगाड़ा मृदंग, डफली, ढोलक, वीणा, ढाक, केवल किताबों मैं बचपन में मदारी बंदर लेकर आता था डमरू बजाता था अब नहीं मेरा मानना है। बुंदेलखंड की लोक विधाओं, लोक संगीत को बचाने के लिए बुंदेलखंड वासियों को पहल करनी होगी जिन के माध्यम से हम सब एक डोरी में बंधे रहे सामाजिक समरसता जिंदा रहे। देश की आजादी में इन लोक कलाकारों लोक विधाओं का योगदान है लोक विधाएं केवल गाना नहीं लोक विधाएं संगीत जगत की जननी है, संगीत परिवार समाज गांव विश्व को एकता के सूत्र में बांधा है। हमें गांव गली के उन कलाकारों को सम्मान देना होगा जिनके अंदर चलाएं छिपी हैं। कलाकार को केवल मान सम्मान चाहिए क्योकि वह स्वाभिमानी होता है हुनर होते हुऐ भी वह गरीबी में क्यों जी रहा है। वजह है हम सब की उपेक्षा की वजह से लोकगीत तथा लोक संस्कृति के माध्यम से राष्ट्रीय संतुलन तथा विश्व बंधु की भावना समाज में जागृत होती है। आओ हम सब मिलकर इन्हें बचाएं राजनीति ने राजनेताओं ने इनका भी पलायन कर दिया। सर्वोदय कार्यकर्ता होने के नाते मैंने जो देखा सुना समझा आपके साथ साझा कर रहा हूं। ठीक लगे तो अपनों में चर्चा करें गलत लगे तो माफ कर दे।

बुंदेलखंड की लोक कला को जो सम्मान मिलना चाहिए था फिल्म में साहित्य में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह राजस्थान लोक कला पंजाब लोक कला हरियाणा लोक कला गुजरात लोक कला की अपेक्षा कम मिला हम आभारी हैं लोक कला के कलाकार श्री देशराज पटेरिया जी, उर्मिला पांडे, चंद्रभूषण पाठक, बद्री खरे, अंतरराष्ट्रीय लोक गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी के जिन्होंने लोक कला के माध्यम से भारत ही नहीं दुनिया में नाम कमाया लोक वाद्य यंत्रों को विरासत के रूप में सजाने वाले प्रसिद्ध मृदंग आचार्य अवधेश द्विवेदी लल्लूराम शुक्ला गया प्रसाद जी तथा चंद्रशेखर तिवारी संस्थापक बुंदेलखंड कला संस्थान महोबा के आभारी हैं। जो लोग कला की कीमत जानते, डॉ शिव पूजन अवस्थी युवा पीढ़ी को निशुल्क लोकगीत लोक वाद्य यंत्रों की ट्रेनिंग देते हैं। रमेश पाल दिवारी लोक कला को आत्मसात करते हैं।

बांदा, हमीरपुर, महोबा, चित्रकूट जालौन, झांसी, ललितपुर छतरपुर, टीकमगढ़, दतिया, पन्ना के कई साथी लोक कला को जिंदा करने के लिए संघर्ष करते युवा पीढ़ी को चाहिए कि वे पढ़ाई के साथ साथ लोक कला लोक संगीत में रुचि ले पहचानें अपने वाद्य यंत्रों को परंपरा को मेरा उद्देश्य भी सूचना के पीछे यही है।