बौद्धिक संघर्ष के साथी बनें

कहा जाता है कि पुस्तकें मनुष्य की सबसे अच्छी मित्र होती हैं, इसमें मैं एक बात जोडऩा चाहुंगा कि पुस्तकें मनुष्य की सबसे बड़ी शत्रु भी हो सकती हैं। जो पुस्तकें व्यक्ति में झूठी बातों से आत्महीनता भरें, उन्हें निरुत्साहित करें और दूसरों के दास बनने के लिए प्रेरित करें, वे पुस्तकें मनुष्य की मित्र नहीं हो सकतीं। दुर्भाग्यवश आज देश में ऐसी ही पुस्तकें और ऐसे ही लेखकों की बाढ़ आई हुई है। यदि हम इतिहास का अवलोकन करें, तो यह अवस्था अंग्रेजों के आने के बाद प्रारंभ होती है। अंग्रेजों ने अपनी श्रेष्ठता को साबित करने के लिए भारत की हर चीज को पिछड़ा और हीन बताना प्रारंभ किया था। उन्होंने जो रास्ता बताया, उस पर चलने वाले सभी लोग भारत का ग्लानियुक्त इतिहास लिखने और भारतीय विज्ञान को पिछड़ापन और अंधविश्वास बताने में जुट गए। स्वाधीनता मिलने के बाद यह प्रक्रिया और तेज हो गई।

आज समाज में ऐसी पुस्तकों की भरमार है जो यह बताती हैं कि हमारे यहाँ सदियों से नीची जातियों पर अत्याचार हुआ है। सदियों से स्त्रियों को दबा-सता कर रखा गया है। शिक्षा को एक विशेष वर्ग के लिए सुरक्षित कर दिया जाता रहा है। परंतु इसके कोई प्रमाण देने के लिए कोई तैयार नहीं होता या जो प्रमाण दिए जाते हैं, वे अधिकांशत: झूठ और प्रोपैगेंडा पर आधारित होते हैं। ऐसी पुस्तकें समाज के मानस में आत्महीनता भर रही हैं। इन्हें पढ़ कर बड़ा होने वाले युवा यह नहीं कह पाते कि भारत एक श्रेष्ठ संस्कृति का उत्तराधिकारी है। वह यूरोप और अमेरिका को अपना आदर्श मानता है। वहां से ही प्रेरणा ग्रहण करता है।

इसका दुष्परिणाम हम नीतिनिर्माण में देखते हैं। इस आत्महीनता के कारण ही हजारों-लाखों वर्षों की कृषि परंपरा वाले देश में कृषि क्रांति करने के लिए यूरोपीय सिद्धांत अपनाए गए, जिससे न केवल भूमि जहरीली हो गई, बल्कि खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता समाप्त हो गई और भोजन पोषण की बजाय रोग देने लगा। इस आत्महीनता के कारण ही चिकित्सा के लिए उपलब्ध आयुर्वेद के प्राचीनतम तथा अनुभवसिद्ध ज्ञान को छोड़ कर यूरोपीय चिकित्सा के अविज्ञान को अपना लिया गया और सरकारी पैसे से उसका घोर प्रचार किया गया जिसके परिणामस्वरूप देश आज अधिक बीमार हुआ है और समाज के लिए चिकित्सा सुविधाएं अधिक दुर्लभ होती जा रही हैं। इस आत्महीनता का ही प्रमाण है कि हम देश की जाती और कुल की व्यवस्था को अवगुण समझते हैं और इसके कारण समाज में घोर वैमनस्य और हिंसक संघर्ष को बढ़ावा दिया जा रहा है।

यह सब कुछ हो रहा है ऐसी विषयुक्त पुस्तकों के प्रचार-प्रसार के कारण। दुर्भाग्य यह है कि एनसीईआरटी द्वारा विद्यालयों के लिए तैयार की गई पुस्तकें भी ऐसे ही मिथ्या तथ्यों तथा भ्रामक प्रचार से ही भरी हुई हैं। इसलिए आज आवश्यक हो गया है कि ऐसी पुस्तकों के बारे में लोगों को बताया जाए जो भारत के बारे में सही चित्र को प्रस्तुत करती हों। ऐसा नहीं हैं कि सरकारी प्रचार के पिछले सवा सौ वर्षों की आँधी में सब कुछ उड़ गया हो। इस आँधी से देश को बचाने के लिए धर्मपाल से लेकर भगवद्दत्त तक बड़ी सं या में विद्वानों ने घोरतम संघर्ष किया। उन्होंने भरपूर सं या में पुस्तकें लिखीं और उन्हें प्रकाशित करके आने वाली पीढिय़ों के हाथों में सौंप दिया। ऐसे सैंकड़ों प्रकाशन संस्थान खड़े हुए जिन्होंने तमाम आर्थिक चुनौतियों के बाद भी ऐसी पुस्तकों को प्रकाशित करने का बीड़ा उठाया। भारतीय धरोहर ऐसे प्रकाशनों, लेखकों और पुस्तकों के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार के लिए प्रतिबद्ध है। इसलिए समय-समय पर हम धरोहर के अंकों में ऐसी पुस्तकों से परिचय करवाते रहते हैं। साथ ही इससे पूर्व मार्च-अप्रैल 2017 का अंक ऐसी ही पुस्तकों के परिचय के विशेषांक के रूप में प्रकाशित किया गया था। तीन वर्ष बाद यह अंक एक बार फिर ऐसी ही पुस्तकों के परिचय के विशेषांक के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है।

अपेक्षा यही है कि इन पुस्तकों को अधिक से अधिक लोग पढ़ें, इनसे देश के बारे में सही जानकारी प्राप्त करें और देश के बारे में भ्रम और हीनता आदि फैलाने वालों को उत्तर दें। इन पुस्तकों में संदर्भ ग्रंथ दिए होते हैं। उन संदर्भ ग्रंथों को भी ढूंढ कर पढऩा चाहिए। भारत में जो बौद्धिक संघर्ष चल रहा है, ये पुस्तकें उसमें हथियार के रूप में काम आएंगी।