आर्य, वैदिक सभ्यता और इतिहास

पुस्तक का नाम – आर्य, ऋग्वेद और भारतीय सभ्यता
लेखक – डॉ. कृपाशंकर सिंह, मूल्य – 1100 रुपये मात्र, पृष्ठ – 640
प्रकाशन – किताबघर प्रकाशन, 4855-56/24, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली, 011-23266207


यह एक विडंबना ही कही जा सकती है कि भारत का आज का इतिहास यूरोपीय विद्वानों की कल्पनाओं के आधार पर लिखा और पढ़ाया जाता है। उदाहरण के लिए मैक्समूलर ने एक काल्पनिक कालखंड निर्धारित किया कि वेदों की रचना ईसा से 1500 वर्ष पहले हुई होगी। दुख और हैरानी की बात यह है कि उसके बाद से इतनी ऐतिहासिक अनुसंधानों और भारतीय विद्वानों द्वारा पर्याप्त से अधिक प्रमाणों के दिए जाने के बाद भी वह काल्पनिक तथ्य अभी तक ऐतिहासिक तथ्य की तरह पूरे भारत में पढ़ाया जाता है। ठीक इसी प्रकार सिंधु घाटी सभ्यता भी है। जब मैक्समूलर ने वेदों का काल निर्धारित किया था, तब सिंधु घाटी सभ्यता की खोज नहीं हुई थी। उस इलाके में उत्खनन काफी बाद में प्रारंभ हुआ परंतु वहाँ मिले साक्ष्यों के आधार पर यह सरलता से कहा सकता था कि वेदों का काल सिंधु घाटी सभ्यता के पहले का है, परंतु हुआ इसका उलटा। कहा गया कि सिंधु घाटी सभ्यता आर्यों से पहले की भारत की बसावट थी, जिसे आर्यों ने आक्रमण करके नष्ट कर दिया और बाद में वेदों की रचना की। इस प्रकार वेदों के 1500 वर्ष ईसा पूर्व में रचे जाने के एक झूठ को साबित करने के लिए आर्य आक्रमण का एक और झूठ रचा गया।

ऐसी परिस्थिति में दिल्ली विश्वविद्यालय में भाषाशास्त्र के प्रोफेसर रहे डॉ. कृपाशंकर सिंह की पुस्तक आर्य, ऋग्वेद और भारतीय सभ्यता आशा और संभावनाओं की एक नई किरण लाती है। पुस्तक की प्रस्तावना में ही प्रो. सिंह लिखते हैं, ” हमने इस पुस्तक में, जैसा कि अभी कहा गया, ऋग्वेद और सिंधु-सरस्वती सभ्यता को एक ही निरंतरता में देखा है, और ऋग्वेद को सिंधु-सरस्वती सभ्यता से पूर्ववर्ती माना है।” अपने इस कथन में प्रो. सिंह दो बातें स्थापित करते हैं, पहली यह कि सिंधु घाटी सभ्यता वास्तव में सरस्वती घाटी सभ्यता है और वेद उससे प्राचीन हैं, यह सभ्यता वेदों के आधार पर ही विकसित हुई थी।

लेखक ने अपनी इस बात को पर्याप्त से अधिक प्रमाणओं से पुष्ट किया है। उन्होंने यह बात मैक्समूलर और विलियम जोन्स की भांति हवाई कल्पना करते हुए नहीं लिख दी। इसके लिए उन्होंने ऋग्वेद का गंभीर अध्ययन किया और कथित सिंधु घाटी सभ्यता के उत्खनन से मिले पुरातात्विक प्रमाणों की सघन समीक्षा की है। सिंधु घाटी सभ्यता को सरस्वती घाटी सभ्यता कहने के कारणों को बताते हुए वे लिखते हैं, ”ऐशी स्थिति में इसे सिंधु-सरस्वती सभ्यता कहा जा सकता है। सरस्वती नाम इसलिए कि इस सभ्यता का विस्तार सिंधु से पश्चिम की अपेक्षा उसके पूर्व की ओर अधिक है।” सरस्वती नाम देकर प्रो. सिंह ने इस सभ्यता को न केवल एक नई पहचान दी है, बल्कि उन्होंने इसके द्वारा अनेक मिथकों को भी तोड़ा है। आमतौर पर सरस्वती नदी को वैदिककालीन नदी माना जाता है। यदि यह सरस्वती घाटी सभ्यता मान ली जाती है तो स्वाभाविक रूप से यह सभ्यता वैदिककालीन साबित हो जाएगी। साथ ही अभी तक के लिखित इतिहास में सरस्वती नदी की चर्चा कम ही होती है। इस नामकरण से इतिहास में सरस्वती नदी को भी उसका अपेक्षित स्थान मिल जाएगा। प्रो. सिंह द्वारा किया गया यह नामकरण काफी रोचक और अनूठा है। यह एक नामकरण इसे भारतीयता से जोड़ देता है। लेखक ने सिंधु घाटी सभ्यता के नए नामकरण के बाद उसे वैदिककालीन साबित करने के लिए ऋग्वेद की गहन समीक्षा की है। ऋग्वेद का उनका अध्ययन काफी प्रशंसनीय है। हालांकि महर्षि दयानंद, योगी अरविंद, करपात्री जी महाराज जैसे भारतीय परंपरा के विद्वानों की भींति उन्होंने यह तो स्वीकार नहीं किया है कि ऋग्वेद सृष्टि के आदि में प्रकट हुए और इस कारण उसमें मानव का इतिहास नहीं है, इसके विपरीत उन्होंने ऋग्वेद में आए नहुष, पुरुरवा, ययाति, मान्धाता आदि नामों को आधिदैविक न मान कर ऐतिहासिक ही माना है। उन्होंने ऋग्वेद के आधार पर भारत के लगभग दस हजार वर्ष का इतिहास लिखने का प्रयास किया है। इस प्रकार उन्होंने भारत के वर्तमान अकादमिक जगत में मान्य परंपरा का ही पालन किया है जो कि वेदों में इतिहास का होना स्वीकार करती है। परंतु उनकी विशेषता यह है कि उन्होंने स्वयं से ऋग्वेद का गंभीर अध्ययन किया है। वैदिक प्रमाणो के लिए वे किसी विदेशी लेखक या भाष्यकार पर निर्भर नहीं है। वेदमंत्रों का उनका अध्ययन अपना है और उसके अर्थों को उन्होंने अपनी अनुसंधानात्मक भाषाविज्ञानी दृष्टि से देखने और जानने का अभिनव तथा अभिनंदनीय प्रयास किया है।

इसलिए ऋग्वेद की प्रो. सिंह की यह नई व्याख्या अकादमिक जगत के लिए एक नई क्रांति की तरह ही है। निश्चित रूप से भारत के अकादमिक जगत के लिए यह पुस्तक एक मील का पत्थर साबित होगी। पुस्तक की भाषा काफी सरल है और आसानी से समझ में आती है। ऋग्वेद का इतना सरल और सुबोध भाष्य इसमें है कि सामान्य पाठक भी इसे पढ़ कर वेदों को समझ सकता है।

समीक्षक