बस्तर में गणेश प्रतिमायें और विवेचनायें

राजीव रंजन प्रसाद
लेखक सुप्रसिद्घ लेखक और साहित्यकार हैं।


बस्तर में गणेश प्रतिमाओं की अनंत कथायें है, उनकी सुन्दरता, शिल्प, कलात्मकता आदि से आप प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। ये सभी प्रतिमायें उपेक्षित हैं, इनपर बहुत कुछ लिखा-पढ़ा अथवा चर्चा में लाया नहीं गया है। मैने कांकेर से कोण्टा तक विस्तृत बस्तर संभाग के सातों जिले के हर परिक्षेत्र में किसी न किसी रूप में गणेश प्रतिमा देखी हैं, वह भी अनेक रूपों व आकारों में। कोई नृत्य करती प्रतिमा है तो कोई खड़ी मुद्रा में, कोई ध्यानस्थ गणेश की प्रतिमा है तो कोई किसी प्रचलित आसन में बैठी हुई, कहीं मोदक भक्षण करते गणेश दिखाई पड़ते हैं तो कहीं युद्ध मुद्रा में भी। बस्तर के प्रत्येक शिव मंदिर की द्वार शाखा यहां तक कि नारायणपाल के विष्णु मंदिर तक में गणेश प्रतिमा के दर्शन हो जाते हैं। कुछ भव्य और ज्ञात प्रतिमाओं में जगदलपुर, कुरुसपाल, कांकेर, बड़े-डोंगर, दंतेवाड़ा, बीजापुर आदि आदि स्थानों पर उनकी उपस्थिति है लेकिन अनेकों अज्ञात तथा अल्पचर्चित प्रतिमायें सम्पूर्ण बस्तर भर से प्राप्त होती रही हैं जो छठवीं से तेरहवीं सदी के बस्तर को अलग ही दृष्टिकोण से देखने के लिये बाध्य करती है।
बस्तर के नाग शासकों की निर्मितियां भव्य थीं और वे शेष भारत में प्राप्त होने वाली प्रतिमाओं व मंदिरों से कई मायनों में भिन्न भी रही हैं। बस्तर में वे शिव तथा शक्ति के समान रूप से उपासक प्रतीत होते हैं जैसा कि इतिहास से प्राप्त प्रमाण इशारा करते हैं। इस क्षेत्र में सप्तमातृकाओं की जितनी भी प्रतिमायें प्राप्त हुई हैं, सभी में अनिवार्य रूप से गणेश भी बनाये गये हैं, कतिपय स्थानों पर नवग्रहों के साथ भी गणेश दर्शाये गये हैं। बस्तर की गणेश प्रतिमायें संरक्षण के लिये पुरातत्व विभाग की लम्बे समय से प्रतीक्षा में हैं। मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं कि यदि केवल बारसूर और गढ़-धनौरा की भी पुरातत्व विभाग द्वारा खुदाई की जाये तो वहां सिरपुर से भी अधिक भव्य इतिहास दबा मिल सकता है, काश कभी पहल हो। इस आलेख के माध्यम से कुछ महत्वपूर्ण गणेश प्रतिमाओं पर एकचर्चा प्रस्तुत है।

ढोलकल के गणेश
लगभग अस्सी वर्ष पहले अंग्रेज भूवैज्ञानिक क्रूकशैंक ने पहली बार ढोलकल स्थल का जिक्र अपनी ‘जियोलॉजिकल रिपोर्ट ऑफ साउथ बस्तर में किया था। इसी दौर में बैलाडिला खदानों की खोज तथा चौदह लौह निक्षेपों की पहचान की गयी थी। ढाई फीट ऊंची विशाल गणपति की प्रतिमा तक पहुंचने के लिये दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय से पंद्रह कि.मी. दूर ग्राम फरसपाल से आगे चल कर पहले कोतवालपारा पहुंचना होता है। इस स्थान से अगला पड़ाव है ग्राम जंगपारा। यहां से आगे ढोलकल की पहाडिय़ों तक पहुंचा जाता है जहां तीन सौ मीटर ऊंची पहाड़ी की चोटी पर दुर्लभ विशालकाय गणपति की प्रतिमा स्थापित है। ढोलकल दो समानांतर पहाडिय़ां हैं जिनका आकार एक खड़े ढोल की तरह है। एक पर्वत शिखर पर गणेश प्रतिमा अवस्थित है तो दूसरी पहाड़ी पर वर्तमान में भग्नावशेष है जिसका जिक्र क्रूकशैंक ने सूर्य मंदिर के रूप में किया था। कहते हैं सूर्य की किरण सबसे पहले इस सूर्य मंदिर पर पड़ती थी और उसके पश्चत ही निकटवर्ती गांव रोशन होते थे। सूर्य प्रतिमा अब यहां उपलब्ध नहीं है। ढोलकल अपने इर्दगिर्द घिरे घने जंगलों और दुर्गमतम रास्तों के कारण लोगों की निगाह से बच गया। स्थानीय ग्रामीण अवश्य यहाँ आते रहे पूजा पाठ करते रहे। नक्सली आतंकवाद के दौर में ग्रामीणों ने भी इस स्थल पर पूजा पाठ करना छोड़ दिया और ढोलकल भुला दिया गया।
ढोलकल की गणेश प्रतिमा वास्तुकला की दृष्टि से अत्यन्त कलात्मक है। प्रतिमा में ऊपरी दांये हाथ में परशु, ऊपरी बांये हाथ में टूटा हुआ एक दंत, नीचे का दायां हाथ अभय मुद्रा में अक्षमाला धारण किए हुए तथा निचला बायां हाथ मोदक धारण किए हुए है। पर्यंकासन मुद्रा में बैठे हुए गणपति की सूंड बायीं ओर घूमती हुई शिल्पांकित है। प्रतिमा के उदर में सर्प लपेटे हुए तथा जनेऊ किसी सांकल की तरह धारण किये हुए अंकित है। गणपति की जनेऊ के रूप में सांकल का चित्रण सामान्य नहीं है। इस प्रतिमा में पैर एवं हाथों में कंकण आभूषण के रूप में शिल्पांकित है तथा सिर पर धारित मुकुट भी सुंदर अलंकरणों से सज्जित है। सरसरी निगाह से देखने पर ये प्रतिमा नवीं-दसवी शताब्दी की प्रतीत होती हैं। यह समय प्राचीन बस्तर की नाग सत्ता का था। इन स्थलों व यहां की तस्वीरों को गंभारता से देखने पर अनुमान लगता है कि आस पास किसी बड़े प्राचीन नगर की उपस्थिति अवश्यंभावी है। वह भव्य नाग-कालीन नगर रहा होगा या संभवत: कोई राजधानी जिस के निकट ढोलकल के शिखर पर सूर्य की पहली किरण पड़ती रही होगी एवं फिर नगर में उजियारा फैल जाता होगा। प्रथम-वंदनीय भगवान गणेश की इतनी प्रतिमायें बस्तर भर में नाग शासकों द्वारा बनवायी गयी हैं कि यहां भी यह उपस्थिति अनायास प्रतीत नहीं होती। वरिष्ठ आदिवासी नेता स्व. महेन्द्र कर्मा से दंतेवाड़ा में हुई मुलाकात के दौरान भी उनसे ढोलकल पर चर्चा हुई थी। उन्होंने इस स्थल में प्रचलित एक किंवदंती के विषय में बताया था जिसके अनुसार गणेश-परशुराम युद्ध के बाद गणेश जी के एक दांत के कट जाने सम्बन्धी मान्यता यहां से जोड़ी जाती है। ढोलकल में उपलब्ध मूर्ति में भी भगवन गणेश ने एक हाथ में कटा हुआ दंत ही थामा हुआ है। यद्यपि एक दांत थामे हुए गणेश जी की अनेक मूर्तियां हैं तथा बारसूर की गणेश मूर्तियों में भी ऐसी ही समानतायें हैं अत: इस मूर्ति को सीधे किसी दंत कथा से जोडऩा उचित नहीं किंतु यह अवश्य है कि इस दिशा में गंभीरता से कार्य करने की आवश्यकता है। बस्तर के अतीत में इतना कुछ छिपा हुआ है जो पिछड़ेपन को ले कर वर्तमान की प्रचलित धारणा को मिथक बना देता है अत: मेरी पुरातत्वविदों और इतिहासकारों से करबद्ध प्रार्थना है कि बस्तर पर प्राथमिकता से कार्य किया जाना चाहिये।
ढोलकल की गणेश प्रतिमा पिछले वर्ष तब चर्चा में आयी थी जब अचानक सोशल माध्यमों से यह खबर प्रसारित हुई कि ढोलकल प्रतिमा अपने स्थान से गायब है। शासन-प्रशासन ने स्थिति की गंभीरता को समझा और तत्काल ही वे विशेषज्ञों के साथ घटनास्थल के लिये रवाना हो गये थे। खोजबीन के बाद पहाड़ी के नीचे ही कई टुकड़ों में यह गणेश प्रतिमा प्राप्त हो गयी थी। यह आज भी सवाल बना हुआ था कि यह घटना किसका कृत्य हो सकता है? रायपुर से पुरातत्व के जानकार पद्मश्री अरुण शर्मा को ढोलकल घटना की जांच व उसके पुनर्निर्माण की संभावनाओं को तलाशने के लिये भेजा गया था। आरम्भिक जांच के बाद ही पता चल गया था कि पहले ढोलकल पर अवस्थित प्रतिमा को हथौड़े अथवा किसी भारी वस्तु से प्रहार कर तोडऩे की कोशिश की गयी। जब इसमें सफलता हाथ नहीं लगी तब सब्बल आदि से इसे धकेल कर पहाड़ी से नीचे गिरा दिया गया। यह इतिहास की हत्या का क्रूर प्रयास था।

दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा में विशाल गणेश
बहुत सी ऐतिहासिक महत्व की प्रतिमायें इसलिये अनकही रह जाती है क्योंकि वे किसी बड़ी लकीर के नीचे अवस्थित होती हैं। बस्तर में भव्य गणेश प्रतिमाओं की जब भी चर्चा होती है तो उसमें अग्रणी नाम युगल गणेश प्रतिमाओं, बारसूर और तत्पश्चात ढोलकल, फरसपाल का आता है। इन दोनों ही प्रतिमाओं से सुन्दर, बेहतर तराशी हुई साथ ही अधिक संरक्षित प्रतिमा दंतेवाड़ा में स्थित है और वह भी माँ दंतेश्वरी के मंदिर में गर्भगृह के ठीक बाहर, दाहिनी ओर के निकासी द्वार से लग कर। दंतेश्वरी मंदिर में पहुंचने वाले भक्तों के लिये आकर्षण तथा ध्येय दंतेश्वरी प्रतिमा ही रहती है अत: यह सुन्दर व विशाल गणेश प्रतिमा उपेक्षित रह जाती है। दंतेश्वरी मंदिर किसी भव्य संग्रहालय से कम नहीं है जिसके निर्माण का श्रेय तो चालुक्य शासक अन्नमदेव को जाता है किंतु भीतर अवस्थित अधिकतम प्रतिमायें नाग (760 – 1324 ई) अथवा नल (ईसापूर्व 600 – 760 ई.) कालीन हैं।
काले प्रस्तर से निर्मित यह गणेश प्रतिमा न केवल भव्य है अपितु भिन्न भी है। बैठी हुई मुद्रा में गणेश प्रतिमा की सूंड बांयीं ओर मुड़ी हुई तथा मोदक का भक्षण करती हुई उकेरी गयी है। मैं जितनी बार भी मंदिर गया हूं सर्वदा पूजित अवस्था में यह प्रतिमा होने के कारण इसकी बारीकियों की विवेचना अथवा अनुमापन प्राप्त नहीं हो सका। तथापि लगभग पांच फुट लम्बाई में यह प्रतिमा अवश्य होनी चाहिये। इस प्रतिमा में पैर एवं हाथों में कंकण आभूषण के रूप में शिल्पांकित है तथा सिर पर धारित मुकुट भी सुंदर अलंकरणों से सज्जित है। बस्तर में इस प्रतिमा सहित बहुतायत भव्यतम निर्माण नागों का है और उस काल का अधिकतम निर्माण शिव लिंग तथा गणेश प्रतिमायें व उनके मंदिर हैं। दंतेवाड़ा में स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर में स्थापित यह अल्पचर्चित प्रतिमा चर्चा मांगती है।

बारसूर की युगल गणेश प्रतिमायें
जन-मान्यता है कि दैत्येन्द्र वाणासुर की पुत्री उषा और उनके मंत्री कुभांड की कन्या चित्रलेखा अंतरंग सखियां थीं। इन दोनों के आराध्य देव गणेश थे। इनकी पूजा के लिये ही वाणासुर ने गणेश की दो विशाल प्रतिमाओं को एक ही स्थान पर स्थापित करवाया था। इतिहासकार इन दोनों ही गणेश प्रतिमाओं को बारहवी सदी में निर्मित निरूपित करते हैं। इस आधार पर यह तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि यह बस्तर के नाग युग की गौरव प्रतिमायें हैं। बारसूर के मंदिरों में पर्यटकों को सर्वाधिक आकर्षित करती हैं गणेश की यही विशालकाय दो प्रतिमायें। जो गणेश प्रतिमा अधिक विशाल है इसकी लम्बाई, चौड़ाई तथा मोटाई क्रमश: 230 सेमी, 190 सेमी तथा 130 सेमी है। इस आधार पर इसे विश्वभर में ज्ञात तीसरी सर्वाधिक विशाल गणेश प्रतिमा होने का गौरव प्राप्त है। लीलासन में विराजित इस आठ फुट की गणेश प्रतिमा की कई अन्य विशेषतायें भी हैं। प्रतिमा ने उपरी दाहिने हाथ में परशु, निचले हाथ में टंक, उपरी बायें हाथ में सर्प तथा निचले हाथ में मोदक धारण किया हुआ है। प्रतिमा ने करण्ड मुकुट, यज्ञोपवीत, कंकण तथा पादवलय धारण किया हुआ है। इस प्रतिमा से आकार में छोटी है गणेश की साथ ही स्थापित दूसरी प्रतिमा जिसकी लम्बाई, चौड़ाई तथा मोटाई क्रमश: 160 सेमी, 100 सेमी तथा 75 सेमी है। इस चतुर्भुजी प्रतिमा ने दायें उपरी हाथ में सर्प, दायें निचले हाथ में परशु, बायें उपरी हाथ में आयुध (खण्डित) तथा बायें निचले हाथ में मोदक धारण किया हुआ है। प्रतिमा ने करण्ड मुकुट, यज्ञोपवीत, कंकण तथा पादवलय धारण किया हुआ है। प्रतिमा के ठीक नीचे उनके आसन के अग्र भाग में मूषक भी अंकित किया गया है।
जितनी विशाल यह प्रतिमायें हैं इससे कहा जा सकता है कि नाग युगीन बस्तर मे यह बड़ा तीर्थस्थल रहा होगा। जैसे जैसे इसका महत्व बढ़ता गया अनेक तरह की दंतकथाओं ने प्रतिमा के साथ खुद को जोड़ लिया गया। हमे हमेशा से यह बताया गया कि धीरे धीरे प्रतिमा अपना आकार बढ़ा रही है। किसी भी प्रसिद्ध स्थान के साथ इस तरह की अनेक कहानियों का गढऩा-बुनना स्वाभाविक है। कभी जहां एक विशालकाय मंदिर रहे होंगे वहां आज उसके ध्वंसावशेष दूर दूर तक बिखरे पड़े हैं। सरसरी निगाह से अवशेषों को देखने पर यह जान पड़ता है कि यहां एक पूर्वाभिमुख मंदिर, एक पश्चिमाभिमुख मंदिर तथा एक लघुमंदिर रहा होगा। मंदिर के अवशेष इस तरह एक कोने में पड़े हुए हैं कि उन्हें अलग अलग से देख पाना या उनकी विस्तार से विवेचना कर पाना संभव नहीं है।

मामा-भांजा मंदिर की गणेश प्रतिमायें
गंग राजाओं का बस्तर में कितना और किस तरह का प्रभाव रहा यह विषय अभी किसी इतिहासकार ने नहीं छुआ है। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि नल राजाओं (ईसा पूर्व 600 से 760 ई. तक) की अशक्तता के कारण बिना किसी बड़े प्रतिरोध के गंग राजवंश जो कि जगन्नाथपुरी से अग्रसारित हुआ था ने दण्डक वन क्षेत्र में बाल सूर्य (वर्तमान बारसूर) नगर की स्थापना की। गंग-शासकों ने अनेकों मंदिर, तालाब बनवाये। आज का बारसूर ग्राम अपने खंडहरों को सजोए अतीत की ओर झांकता प्रतीत होता है। जंगल और ग्रामीण बस्तियों में सिमट कर रह गयी अतीत की यह राजधानी उन शासकों को तलाशती है, जिन्हें सभ्यता की इबारत लिखनी थी वे अपने पीछे आदिमता का साम्राज्य कैसे छोड़ गये? इसी प्रश्न के साथ बारसूर की गंगवंशीय प्रमुख विरासत अर्थात मामा-भांजा मंदिर पर बात करते हैं। मामा-भांजा मंदिर, यह नाम सुनने वालों को विचित्र लगता है। वस्तुत: इस मंदिर का नाम इससे जुड़ी दंतकथा के कारण है। कहते हैं कि गंगवंशीय राजा का कोई भांजा उत्कल देश से कारीगरों को बुलवा कर इस मंदिर को बनवा रहा था। मंदिर की सुन्दरता ने राजा के मन में जलन की भावना भर दी। इस मंदिर के स्वामित्व को ले कर मामा-भांजा में युद्ध हुआ। मामा को जान से हाथ धोना पड़ा। भांजे ने पत्थर से मामा का सिर बनवा कर मंदिर में लगवा दिया फिर भीतर अपनी मूर्ति भी रखवा दी। इस कथा के आलोक में यदि मंदिर की विवेचना की जाये तो यह मंदिर अपनी संरचना में, अवस्थित प्रतिमाओं की निर्मिति में, उनके अलंकरणों की प्रकृति में बस्तर के अन्य मंदिरों और प्राप्त प्रतिमाओं से समुचित भिन्नता रखता है।
बात गणेश प्रतिमाओं की हो रही है तो उस दृष्टिकोण से भी मामा भांजा मंदिर महत्व का है चूंकि यहां मंदिर के गर्भगृह में तथा द्वार शाखा पर गणेश प्रतिमा ही विद्यमान है। मंदिर की पश्चिमी भित्ति के सहारे ललितासन में द्विभुजी गणेश प्रतिमा स्थापित है। इस प्रतिमा का माप 44ङ्ग30ङ्ग12 सेंटीमीटर है। गणेश के दायें हाथ में परशु तथा बायें हाथ में मोदक पात्र विद्यमान है। प्रतिमा ने यज्ञोपवीत धारण किया हुआ है। इस प्रतिमा के बायी ओर चतुर्भुजी नरसिंह की प्रतिमा रखी हुई है। यद्यपि ये दोनों ही प्रतिमायें बाद में रखी हुई प्रतीत होती हैं किंतु इससे प्रतिमाओं का महत्व कदाचित कम नहीं हो जाता। गर्भगृह की द्वार शाखा के ललाट बिम्ब में चतुर्भुजी गणेश बैठे हुए प्रदर्शित हैं। इस प्रतिमा का अनुमाप 30ङ्ग21 से.मी. है। इस प्रतिमा में गणेश के उपरी दायें हाथ में परशु तथा निचला हाथ अभय मुद्रा में है इसी तरह उपरी बायें हाथ में गदा तथा निचले बायें हाथ में वे मोदक धारण किये हुए हैं। प्रतिमा के ठीक नीचे चलती हुई मुद्रा में मूषक अंकित किया गया है।

कांकेर के वीरानों में नष्ट होती भव्य गणेश प्रतिमायें
कांकेर आज बस्तर संभाग का उत्तरी हिस्सा है जो कभी एक स्वतंत्र रियासत हुआ करती थी। बात गणेश प्रतिमाओं की हो रही है अंत: यह बताना आवश्यक है कि कांकेर में विभिन्न शासन समयों में ऐसे शासक रहे जो शिव तथा शक्ति के उपासक रहे। चारों ओर विस्तारित अनेक मंदिरों में गणेश प्रतिमायें निरंतर देखने को मिलती रहती है तथा लगभग सभी शिव मंदिरों की द्वार शाखा पर तो गणपति विराजमान हैं ही। आज करप-रिसेवाड़ा तथा सिदेसर के त्रिभुजाकार क्षेत्र के मध्य की बात करते हैं जो कांकेर के इतिहास की दृष्टि से बड़े ही महत्व का है। तालाब के किनारे एक पक्का शिवमंदिर उपस्थित था जिसके विषय में कहा जाता है कि राजा भानुदेव के मंत्री वासुदेव ने इसका निर्माण करवाया था। बड़े बड़े आकार की पुरानी ईंटे अब नष्ट कर दी गयी हैं तथा उनसे ही वह नव-निर्मित शिवमंदिर बना प्रतीत होता है। यहां शिवलिंग को छोड़ कर जिसे मंदिर के गर्भगृह में स्थान मिल गया है सभी कुछ उपेक्षित तथा नष्ट होने की कगार पर था। बाहर की और अनेक खण्डित प्रतिमायें बेतरतीब रख दी गयी हैं जिनमें एक गणेश प्रतिमा भी है जो नष्टप्राय हो गयी है किंतु महत्व की है। इसी तरह कांकेर दुधावा मार्ग पर अवस्थित करप और रिसेवाड़ा दो ऐसी उपेक्षित विरासते हैं जो भव्य अतीत को आज भी अपने भीतर संजोये हुए हैं। दोनो ही शिव मंदिर हैं तथा आकार प्रकार और स्वरूप में बिलकुल एक जैसे हैं। संरक्षण की दृष्टि से भी ये दोनो ही मंदिर समान रूप से भगवान भरोसे हैं। यह मंदिर अत्यधिक एकांत में निकटतम बसाहट से पर्याप्त दूरी पर अवस्थित हैं। मंदिर के द्वार के दोनों ओर गणेश प्रतिमायें हैं। दाहिनी ओर उपस्थित गणेश प्रतिमा नृत्य मुद्रा में है और यह भी उल्लेखनीय है कि बस्तर में इस मुद्रा में पायी गयी प्रतिमायें गिनती की ही हैं। नृत्य करते गणेश ने बहुत ही अल्प वस्त्र धारण किये हुए हैं, न्यूनतम अलंकार धारण किये हुए हैं तथापि उन्होंने शस्त्र धारण किया हुआ है। इसके विपरीत बायीं ओर उपस्थित गणेश प्रतिमा सौम्य है, अलंकृत है, ललितासन मुद्रा में बैठी हुई मोदक भक्षण करती हुई उकेरी गयी है। मंदिर की द्वार शाखा पर भी गणेश उकेरे गये हैं। करप का मंदिर कांकेर से लगभग 20 किलोमीटर पर करप गांव में अवस्थित है। यह मंदिर कांकेर के सोमवंशी शासक कर्णराज (1184-1206 ई.) द्वारा निर्मित है। मंदिर के ठीक सामने तालाब तथा पीछे की ओर मुख्य सड़क है। मंदिर लगभग 6 मीटर की ऊंचाई लिये हुए है एवं मुख्य द्वार पर शीर्ष में एक गणेश प्रतिमा उकेरी गयी है। अब इसका सबसे दु:खद पहलू यह कि करप का मंदिर इसलिये सुरक्षित है चूंकि मंदिर के पीछे एक विशाल वृक्ष है जिसने इसे थाम रखा है।

चित्रकोट के निकट गणेश प्रतिमायें
नाग शासक अंतिम रूप से पराजित चक्रकोट (आधुनिक चित्रकोट और आसपास का क्षेत्र) में हुए थे जो कि एक समय उनकी राजधानी हुआ करती थी। नाग शासक सोमेश्वर देव (1069-1111 ई.) निर्मित नारायणपाल का मंदिर, इसी क्षेत्र में एक खेत से हाल ही में प्राप्त ऋषभदेव की भव्य प्रतिमा, नारंगी और इन्द्रावती नदियों का रम्य संगम और फिर शांत इन्द्रावती एकाएक निर्झर हो जाती है जिसे आज चित्रकोट जलप्रपात के नाम से हम जानते हैं, यह सब कुछ एक आदर्श राजधानी की ओर इशारा करता है। राजा हरिश्चन्द्र देव (1300-1324 ई.) अंतिम नाग शासक थे जिनके किले के अवशेष तथा काकतीय/चालुक्य आक्रांता आन्नमदेव से लड़ कर प्राण आहूत कर देने वाली राजकुमारी चमेली की आज भी समाधि चित्रकोट जलप्रपात से लग कर कुछ ही दूरी पर अवस्थित है। चित्रकोट जलप्रपात के ठीक सामने ही सड़क के दूसरी ओर लगभग दो सौ मीटर भीतर जाने पर नागकालीन प्राचीन शिवमंदिर के अवशेष प्राप्त होते हैं।
अगर बात इस क्षेत्र में प्राप्त गणेश प्रतिमाओं की करें तो वे दक्षिण बस्तर में प्राप्त प्रतिमाओं से भिन्न साथ ही अधिक उपेक्षित भी दिखाई पड़ती हैं। प्रतीत होता है कि काकतीय/चालुक्य शासकों (1324 – 1947 ई.) ने नाग निर्मितियों से राज्याश्रय हटा दिया था यही कारण है कि धीरे धीरे आसपास के प्राचीन शिव तथा गणेश मंदिर, जैन तथा बौद्ध प्रतिमायें या कि अन्यान्य धरोहरों पर समय मिट्टी डालता चला गया। इस स्थल पर कई गणेश प्रतिमायें मुझे दिखाई पड़ी जो किसी पेड़ के नीचे पीठ टिकाये, किसी खण्डहर से लग कर या खुले आसमान के नीचे पड़ी हुई थीं। कुछ गणेश प्रतिमायें बारीक तराशी हुई तो कुछ कच्ची कारीगरी और अनेक खण्डित अवस्था में मुझे यहां दिखाई पड़ी। मावली मंदिर के निकट ही प्राप्त एक गणेश प्रतिमा जो कि ललितासन मुद्रा में है उसकी सूंड विशिष्ठ तरीके से नब्बे डिग्री कोण पर पहले मुड़ कर फिर गोलाकार हो जाती है। इस प्रतिमा की विशेषता केवल सूंड ही नहीं अपितु कान भी हैं जो चौकोर आकृति में निर्मित हैं। शरीर के कई अंग, अंगवस्त्र तथा शस्त्र देख कर लगता है मानों किसी शिल्पकार ने नहीं अपितु ज्यामिति के किसी विशेषज्ञ ने यह गणेश प्रतिमा बनायी हो। फरसा, गदा, मोदक आदि धारण की हुई इस प्रतिमा की विशेषता यह भी है कि बस्तर के दक्षिण और उत्तर में प्राप्त अन्य प्रतिमाओं सदृश्य इसमें यज्ञोपवीत धारण नहीं कराया गया है। गणपति अत्यंत अल्प वस्त्र में हैं तथा बहुत ही सीमित आभूषण भी प्रतिमा में उकेरे गये हैं। इस प्रतिमा में गणेश को चलते हुए मूषक पर बनाया गया है।
यहां से कुछ आगे बढऩे पर कुरुषपाल के पास जो गणेश प्रतिमा प्राप्त हुई वह बेहतर तराशी हुई, कलात्मक तथा अलंकृत है। प्रतिमा में यज्ञोपवीत भी दर्शाया गया है तथा मूषक अपेक्षाकृत बहुत छोटा है जो पैरों के पास अंकित किया गया है। प्रतिमा पर समय से संघर्ष करने के चिन्ह विद्यमान हैं तथा वह अनेक कोण से घिसी हुई है। ये प्रतिमायें आज भले ही चर्चा में न हो, हमारी पीढ़ी इनकी कीमत न समझे लेकिन यदि इनका समुचित संरक्षण नहीं किया गया तो बस्तर के अरण्य क्षेत्र में एक समय विद्यमान गौरवशाली अतीत की वास्तविकताओं को हम इसी तरह क्षरित कर देंगे। नाग युगीन बस्तर की आखिरी राजधानी को पुरातत्ववेत्ताओं द्वारा सतह पर लाने की कोशिश करनी चाहिये।

गुमनाम गणेश प्रतिमायें, गुमरगुण्डा
गुमरगुण्डा से गीदम की ओर जाने वाले मार्ग के निकट के वीराने में अवस्थित है शिवानंद आश्रम। एक पर्वतीय टीले पर यह मंदिर की आकृति में बनाया जा रहा आश्रम नया निर्माण है अंत: पुरातात्विक महत्व की दृष्टि से यहां कुछ मिलने की मुझे अपेक्षा नहीं थी। मंदिर के सामने ही एक तालाब जिसमें कुछ कछुवे तैरते नजर आ रहे थे और दूसरी ओर घना जंगल प्रारम्भ होता था। इस तरह के आश्रमों की उपादेयता अवश्य मेरे अध्ययन का विषय थी जिसके लिये मैं यहां पहुंचा था। बहुत ही भव्य तरीके से किये जा रहे निर्माण को जिस टीले के पास किया जा रहा है वह मुझे पुरातात्विक महत्व का प्रतीत हुआ। आश्रम क्षेत्र की परिक्रमा करने के पश्चात यह निश्चित हो गया कि आस पास बहुत सी प्राचीन प्रतिमायें बिखरी पड़ी हैं। शंकर और गणेश आकृतियों में उकेरी गयी कुछ महत्वपूर्ण प्रतिमाओं को मंदिर के भीतर स्थान मिल गया है जबकि टाईल्स मढ़ी सीढिय़ों पर अनेक नाग प्रतिमायें लगा दी गयी हैं। विचित्र नाग प्रतिमायें समूचे दक्षिण बस्तर में दिखाई पड़ती हैं जिसमें पूछ के बल खड़े नाग-नागिन के जोड़ों के सर्वांग उनके फन तक आपस में इस तरह लिपटे होते हैं कि बीच बीच में किसी पत्ते जैसी आकृति दिखाई पड़ती है। जानकार कहते हैं कि छठी से ले कर बारहवी सदी के बीच निर्मित ये नाग प्रतिमायें अद्भुत हैं। विश्व में ऐसा अनुपम निर्माण और उनकी क्रूरतम उपेक्षा अन्यत्र देखने को नहीं मिलती, जहां एक समय के शासक रहे नागों के सभी निर्माण मटियामेट होने की कगार पर हैं।
इस स्थल पर दो भव्य, विशाल तथा गुमनाम गणेश प्रतिमाओं को देखने का अवसर प्राप्त हुआ। दोनो प्रतिमायें आकार में लगभग समान हैं लेकिन दोनो की सूंड की मुद्रा अलग, जिस प्रस्तर में उकेरे गये हैं उन प्रस्तरों का रंग अलग, अलंकरणों की प्रवृत्ति अलग दिखाई पड़ी। प्रतिमायें पूरी तरह सुरक्षित हैं केवल काले प्रस्तर से बनी गणेश प्रतिमा का आसन खण्डित है। लगभग ड़ेढ फिट की ये प्रतिमायें शोध व अध्ययन की आकांक्षी हैं तथा पुरातत्व विभाग को इनका त्वरित संज्ञान भी लेना चाहिये। दक्षिण बस्तर में गणेश की जितनी अधिक व जितने प्रकार की प्रतिमायें दृष्टिगोचर होती हैं वह भी अपने आप में रेखांकित किये जाने वाला तथ्य है।

चिंगीतराई की खण्डित गणेश प्रतिमा
चिंगीतराई का शिव मंदिर पर्यटन की दृष्टि से सुन्दर है तथा मनोरम स्थल पर निर्मित है। मध्य बस्तर की यह विरासर जगदलपुर कोण्टा मार्ग पर दरभा से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है। मंदिर के सामने ही एक तालाब है तथा आसपास कई छोटे बड़े टीले। मंदिर पर तो बहुत से विवरण प्राप्त हैं अंत: आज बात इसके ही निकट एक टीले पर स्थित कुछ प्रतिमाओं की जिसमें एक खण्डित गणेश प्रतिमा विशेष महत्व की है। मंदिर से लगभग पांच सौ मीटर की दूरी पर एक छोटी सी पहाड़ी शुरु होती है जिसके तलहटी में एक वृक्ष के नीचे भगवान गणेश की एक ढाई फिट की प्रतिमा विद्यमान है जो उपेक्षा के कारण खराब हो रही है। इस स्थल के ठीक सामने पहाड़ी पर चढऩे के पश्चात शिखर पर अनेकों छोटी- प्रतिमायें अवस्थित हैं जो किसी ढेर की तरह एक स्थान पर इक_ी दिखाई पड़ती हैं।
यह प्रकृति द्वारा सुरक्षित इतिहास का संग्रहालय भी अनूठा है क्योंकि यहां जो प्रतिमायें दिखाई पड़ती हैं उनमें गुप्तकालीन प्रतिमायें भी हैं, जैन धर्म से सम्बन्धित मूर्तियां भी हैं, भगवान बुद्ध से सम्बन्धित प्रतिमायें भी हैं, नलों के अवशेष भी हैं तो नाग शासकों की निर्मितियां भी मौजूद हैं। इस ढेर को देख कर यह भावुकता अवश्य होती है कि एक ओर तो हम इतिहास को पूर्वाग्रही बना रहे हैं और अपनी अपनी कुण्ठाओं को जिन्दाबाद-मुर्दाबाद में बदल चुके हैं वहीं समय हमारे ही अतीत पर मिट्टी की परतें निरंतर चढ़ाता जा रहा है। चिंगीरतई के निकट इस टीले पर जो गणेश प्रतिमा है वह लगभग मध्य से खण्डित हो कर दो फांक हो गयी है। सम्भवत: यह हमारी अपनी ही सोच और पूर्वाग्रहों का सांकेतक है जो सामाजिक दरारों को निरंतर चौड़ा देख रहा है, जब कि इतिहास की वास्तविकतायें तो इस पहाड़ी के टीले पर एक साथ मटियामेट हो रही हैं।

लघु गणेश प्रतिमा, इंजरम (कोण्टा)
युद्धरत बस्तर और विशेषरूप से नक्सलप्रभावित होने के कारण इंजरम, एर्राबोर या कोण्टा जैसी जगहों ने जो कुख्याति अर्जित की है वह मेरे आज के आलेख का हिस्सा नहीं है। रामायण में पुरातत्व तलाशने वाले लोगों के लिये भी शबरी का यह किनारा महत्व का हो सकता है क्योंकि यहां जो भी खण्डित और बिखरी हुई पुरारात्विक सम्पदायें मुझे प्राप्त हुई उनमें गरुड़ अथवा जटायु की एक प्रतिमा विशेष महत्व की है। यहीं पर मुझे एक ग्रामीण ने नदी के किनारे ही रखी हुई एक लघु गणेश प्रतिमा दिखाई। यह प्रतिमा सुरक्षित है, ग्रामीणों की निगरानी में है, यह बात किसी सु:खद आश्चर्य से कम नहीं है। काले पत्थर से निर्मित इस गणेश प्रतिमा ने मन में कई प्रश्न खड़े किये। प्रतिमा का आकार इतना छोटा है कि लगता है कभी किसी मंदिर के मुख्य द्वार का यह हिस्सा रही होगी। इस प्रतिमा की बनावट दक्षिण बस्तर में नाग कालीन अन्य विरासतों के समतुल्य ही है तथापि आसपास कोई पुरातात्विक महत्व का मंदिर दृष्टिगोचर नहीं होता। इन्जरम में ही इस प्रतिमा से कुछ दो सौ मीटर की दूरी पर लगभग सलामत हालत में एक पेड़ के नीचे छुकी हुई अवस्था में भैरवी की भव्य प्रतिमा व सप्तमातृकाओं को अंकित किये एक प्रस्तर फलक दिखाई पड़ता है। कुछ अन्य प्रतिमायें भी हैं यहां लेकिन वे पूर्णत: नष्ट हो गयी हैं। इंजरम को आज भी प्रतीक्षा है कि पुरातत्व विभाग इस ओर भी रुख करे और यहां का अतीत भी शब्द पा सके, तब तक तो विरासतों की उपेक्षा और उनके लाल-सलाम से ही संतोष कीजिये।

विष्णु मंदिर, नारायणपाल में गणेश
वैष्णव और शैव मतावलम्बियों के मध्य विभिन्न तरह के मतभेद एक लम्बे समय तक देखे गये हैं। अध्येताओं को यह सर्वदा स्पष्ट रहता है कि वैष्णव मंदिर अपनी बनावट और संरचना में कैसे होंगे तथा शैव मंदिरों में यह अवस्थिति कैसी होगी। नारायणपाल मंदिर बस्तर के सर्वाधिक संरक्षित तथा प्राचीनतम ऐतिहासिक धरोहरों में से एक है। ग्राम नारायणपाल बस्तर जिले के जगदलपुर-रायपुर राष्ट्रीय मार्ग से पैंतीस किलोमीटर की दूरी पर सोनारपाल नामक गांव से बायीं तरफ मुड़ कर इन्द्रावती नदी के दायें तट पर लगभग उन्नीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस मंदिर में विष्णु प्रतिमा स्थापित की गयी है। यह माना जाता है कि नाग शासक धारावर्ष की रानी विष्णु भक्त थी। उनकी ही प्रेरणा से विष्णु मंदिर का निर्माण कर नारायणपुर नाम का गांव अर्पित किया गया था जो बाद में नारायणपाल हो गया। इस मंदिर में गुण्डमाहेश्वरी के अभिलेख 1111 ई. के हैं जिसमें मंदिर के निर्माण के सम्बन्ध में विस्तृत विवरण दिया गया है।
नारायणपाल मंदिर में भव्य विष्णु प्रतिमा स्थापित है जिसके निचले दोनों हांथ खण्डित होने के पश्चात भी यह बहुत अच्छी स्थिति में सुरक्षित है। नारायणपाल मंदिर के संरक्षण के लिये तो पुरातत्व विभाग निश्चित रूप से सराहना की पात्र है। सामान्य परिस्थितियों से अलग हट कर इस मंदिर की एक अन्य विशेषता है द्वार पर तथा मंदिर की पृष्ठ दीवारों में गणेश प्रतिमा की अवस्थिति। ग्यारहवीं सदी में इस तरह का सहसम्बन्ध दिखाई पडऩा कोई सामान्य घटना नहीं कही जा सकती है।

संग्रहालय की आवश्यकता और गणेश
बारसूर में चन्द्रादित्य मंदिर के निकट एक संग्रहालय अवस्थित है। संग्रहालय तो नहीं कहना चाहिये, बहुत सी अद्भुत प्रतिमाओं का गोडाउन भर कहा जा सकता है। यहां कई गणेश प्रतिमायें जो बारसूर और आसपास के क्षेत्र से प्राप्त हुई हैं उन्हें रखा गया है। इस संग्रहालय में कंकालिन की प्रतिमा, भैरवी सहित कई अद्भुत व अनूठी देवी प्रतिमायें आदि भी संकलित हैं। इन प्रतिमाओं का वर्गीकरण किया जाना चाहिये व वैज्ञानिक तरीके से समुचित लेबल आदि लगा कर दर्शकों के लिये सार्वजनिक किया जाना चाहिये। दंतेवाड़ा में बड़े और कई वर्गों की प्रतिमाओं को प्रदर्शित करने योग्य वैज्ञानिक तरह से बनाये संग्रहालय की अतीव आवश्यकता है। प्रस्तुत गणेश प्रतिमा अभी अध्ययन मांगती है तथापि इसके खण्डित हो जाने के पश्चात भी अलंकरण और बनावट, विशेष तौर पर नाभि स्थल के निकट फन काटे सर्प की आकृति मंत्रमुग्ध अवश्य करते हैं। बस्तर के नाग शासकों ने अपनी प्रतिमाओं में, भवनों में तथा अलंकरणों में यथासम्भव और अधिकाधिक नाग का प्रयोग किया है।