खाद्य संरक्षण की भारतीय विधियाँ सुखौता और बडिय़ाँ

ममता रानी
लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।


मनुष्य का स्वभाव होता है आज से अधिक कल की चिंता करना। आज खा लिया तो कल क्या खाएंगे, कल के भोजन की व्यवस्था हो गई तो फिर अगले सप्ताह, फिर अगले महीने, फिर अगले साल, इसी चिंता में मनुष्य ने पहले भोजन संग्रह और फिर बाद में धन संग्रह करना प्रारंभ किया। यह चिंता आज इतनी बढ़ गई है कि पीढियों तक के लिए धन संग्रह करने की प्रवृत्ति पैदा हो गई है। रूपया-पैसा, सोना-चाँदी आदि तो फिर भी वर्षों तक सुरक्षित रहने की वस्तु हैं, परंतु अनाज, फल, सब्जियाँ आदि तो अधिक दिन तक सुरक्षित रखी नहीं जा सकतीं। अनाज तो फिर भी एकाध वर्ष सुरक्षित रख लिए जाएं, सब्जी और फल तो शीघ्र ही खराब हो जाते हैं। फल और सब्जियों का जीवन-चक्र छोटा होता है, वे शीघ्र ही सडऩे लगते हैं। ऐसे में अभाव की स्थिति भी इनकी उपलब्धता को बनाए रखने के प्रयास प्राचीन काल से लेकर आज तक मनुष्य करता ही रहा है। आज की भाषा में इसे ही हम खाद्य संरक्षण कहते हैं।

विज्ञान के विकास के आधुनिक युग में खाद्य संरक्षण के क्षेत्र में भी काफी प्रगति हुई है। आज की स्थिति तो यह है कि सभी सब्जियाँ वर्ष भर मिलने लगी हैं। गर्मियों में सेब तथा गाजर और सर्दियों में आम तथा कटहल भी मिलते हैं। केवल अनुकूल मौसम में मिलने वाले सब्जियों और फलों को आज के विज्ञान ने वर्षभर उपलब्ध करा दिया है। चाहे ये महँगे मिलें, पर मिलते हैं। इन्हें संग्रह करने के लिए कोल्ड स्टोरेज यानी शीत भंडारगृह बनाए गए हैं। ठंडे स्थान में रखने से फल और सब्जियों के सडऩे की गति घट जाती है। परंतु क्या उनकी गुणवत्ता वैसी ही बनी रहती है? इस पर लोगों का ध्यान नहीं जाता। दिखने में एकदम ताजे और बढिय़ा लगने वाले ये सब्जियां तथा फल हमारे स्वास्थ्य के लिए कितने लाभकारी होते हैं, यह एक प्रश्न हमारे सामने बना ही रहता है। इसीलिए आज के लगभग सभी डाइटिशियन यानी भोजन-विशेषज्ञ लोगों को यह सलाह देने लगे हैं कि हमें मौसमी फल और सब्जियाँ ही खानी चाहिए।

हमें यह ध्यान रखना होगा कि जिस प्रकार फ्रिज में रखी फल और सब्जियों की गुणवत्ता घट जाती है, ठीक उसी प्रकार कोल्ड स्टोरेज यानी शीत भंडारगृहों में रखे फल और सब्जियों की गुणवत्ता भी प्रभावित होती होगी। इनको खाने से हमें पोषण कम मिले तो भी चल जाएगा, परंतु यदि ये संरक्षित खाद्य पदार्थ हमें बीमार करने लगें, तो निश्चित ही चिंता का विषय होना चाहिए। शीत भंडारगृह केवल हमारे पर्यावरण के लिए ही नुकसानदेह नहीं है, यह हमारे स्वास्थ्य के लिए भी हानिकर है। पहले तो इन फल और सब्जियों को बड़ी मात्रा में उपजाने के लिए रासायनिक खाद और कीटनाशकों का बड़े परिमाण में प्रयोग किया जाता है, फिर इन्हें शीत भंडारगृहों में सुरक्षित रखा जाता है। कुल मिला कर ये संरक्षित फल और सब्जियाँ हमारे लिए पूरी तरह बीमारियों का घर बन जाती हैं।

ऐसे में हमें याद करना चाहिए अपने पूर्वजों द्वारा फल और सब्जियों को सुरक्षित रखने की परंपरा को। प्राचीन काल से ही हमारे देश में फल और सब्जियों को सुरक्षित रखने की परंपरा रही है। उसके लिए भिन्न-भिन्न उपाय भी अपनाए गए। परंतु उन उपायों से फल तथा सब्जियों की गुणवत्ता घटती नहीं थी, बढ़ती ही थी। आइए देखते हैं ऐसे ही कुछेक उपायों को।
सबसे अधिक सब्जियाँ हमें ठंड के मौसम में मिलती हैं और इसलिए जैसे ही ठंड समाप्त होकर बसंत ऋतु और उसके बाद गरमी आने वाली होती थी, घर-घर में मटर, फूलगोभी, बंदगोभी, ग्वारफली, भिंडी, करैला, मेथी, पालक, बथुआ, सहजन की फली आदि को संरक्षित करने के लिए एकत्र कर लिया जाता था।

सब्जियों को संरक्षित करने के दो तरीके थे। पहला था – सुखौता बनाना और दूसरा था – बडिय़ाँ बनाना। सुखौता यानी सब्जियों को आवश्यकतानुसार धूप अथवा छाया में सुखा कर रख लिया जाता था। बाद में उन्हें अलग-अलग तरीके से खाया जाता था। सुखाई हुई सब्जियों की पौष्टिकता घटती नहीं है, साथ ही वे स्वास्थ्य के लिए भी हानिकर नहीं होतीं। इसलिए पता नहीं, कबसे हमारे पूर्वज सुखौते बनाते आ रहे थे। सुखौता बनाने का तरीका भी बहुत ही आसान था। यहाँ सुखौता बनाने की कुछ विधियाँ दी जा रही हैं।

1. फूलगोभी तथा बंदगोभी – फूलगोभी तथा बंदगोभी के छोटे-छोटे टुकड़े कर लें। इन्हें नमक मिले पानी से अच्छी तरह धो लें। फिर इसे एक माला में गूँथ लें। इस माला को धूप में सुखाएं। 10-12 दिनों में यह सूख जाएगा। फिर इसे हवाबंद डिब्बे में भर कर रख लें। इसे जब भी पकाना हो, दो घंटों तक पानी में भिगो दें या फिर पानी में उबाल लें। फिर सब्जी बनाएं। इस सुखौते की सब्जी काफी स्वादिष्ट होती है।
2. ग्वारफली, भिंडी, करैला, कचरी आदि – इन सब्जियों को ठीक से धोकर साफ कर लें। ग्वारफली के दोनों छोर की डंडियों को तोड़ लें। भिंडी, करैला, कचरी आदि को पतला-पतला काट लें। फिर इन्हें कपड़े पर फैला कर धूप में सुखा लें। सूखने के बाद इन्हें भी हवाबंद डिब्बे में भरकर रख लें। इन सब्जियों के सुखौते को तेल या घी में तल कर भोजन के साथ खाएं।
3. बथुआ, पालक आदि के पत्तों को भी सुखा कर रखा जाता है। गर्मी के मौसम में इन्हें पानी में दो घंटे के लिए भिगो लें। फिर इनकी सब्जी बना सकते हैं।
खाद्य संरक्षण की एक और भारतीय विधि थी बडिय़ाँ बनाना। साधारणत: बडिय़ाँ दालों की बनती है। परंतु कई सारी बडिय़ों में सब्जियाँ भी बारीक काट कर मिला दी जाती थीं और इस प्रकार सब्जियों को संरक्षित किया जाता था। बडिय़ों को कई स्थान पर मंगौड़ी भी कहा जाता है क्योंकि अधिकांशत: बडिय़ाँ मूंग के दाल की होती हैं।


बडिय़ा बनाने की विधि
चना या मूंग या लोबिया या उड़द की दाल को रात में पानी में भिगो दें। सुबह धो कर मिक्सी में पीस लें। स्वादानुसार नमक, काली मिर्च, अजवाइन आदि डालकर एक घण्टा छोड़ दे। एक घण्टे के बाद दाल की पीठी में थोड़ा फर्मेंट हो जाए यानी उसमें खमीर उठ जाए तो फिर उसे हाथ से थोड़ा फेंट लें। एक प्लास्टिक सीट पर छोटी छोटी बडिय़ा बना कर डाल दें। इस मिश्रण में सब्जियाँ भी कद्दूकस कर डाली जाती हैं। उदाहरण के लिए मूली, गाजर, पेठा, खीरा यादि सब्जियों को कदूकस करके मिला दिया जाता है।
पेठे को केवल चने या उड़द की दाल में मिलाया जाता है और इससे बनी बडिय़ाँ थोड़ी खट्टी होती हैं। हरे कोमल पत्तो जैसे पालक बथुआ यदि डालकर भी बडियाँ बनायी जाती हैं। इसी प्रकार आलू, अलसी और साबूदाने की भी बडिय़ाँ बनाई जाती हैं। इन बडिय़ों को एक-दो दिन तेज धूप में सुखाकर हवाबन्द डब्बे में भरकर रख लें।

बडिय़ों की सब्जी कई प्रकार से बनाई जाती है। सबसे आसान और प्रचलित तरीका तो आलू के साथ बडिय़ों की सब्जी बनाना है। एक और तरीका है बडिय़ों का झोल बनाना। बडिय़ों के झोल को चावल के साथ खाया जाता है।

बनाने की विधि
बडिय़ां – 100 ग्राम
टमाटर – दो मध्यम आकार के
तेल – दो च मच
जीरा – एक च मच
हरी मिर्च – एक बारीक कटी
हींग – आवश्यकतानुसार
नमक, हल्दी पाउडर, धनिया पाउडर, गरम मसाला सभी आधा-आधा चम्मच
बडिय़ों को पहले एकदम हल्के तेल में भून लें। प्रेशर कूकर में दो च मच तेल डाल कर जीरा, हींग तथा मिर्च तड़काएं। इसमें बारीक काट कर टमाटर डालें। दो मिनट टमाटर को भूनने के बाद उसमें सभी मसाले और नमक डाल कर भूनें। जब मसाला तेल छोडऩे लगे तो उसमें बडिय़ाँ डाल दें। इसमें 200 मिली पानी मिला दें और बडिय़ों को पका लें। कूकर की गैस निकल जाने पर इसे लकड़ी की मथनी से घोट लें। बस बडिय़ों का झोल तैयार है। इसे चावल के साथ गर्म-गर्म परोसें।