हेमंत ऋतुचर्या (मार्गशीर्ष-पौष माह) 29 नवम्बर, 2012 से २7 जनवरी, 2013

वैद्य राहुल पाराशर
हेमंत शीतकालीन ऋतु है। इसका समयकाल आमतौर पर नवम्बर से दिसम्बर तक जाता है, लेकिन हाल के बरसों में मौसम में हो रहे लगातार बदलाव से इसके लक्षण कुछ देर से देखे जा रहे हैं। भारतीय महीनों के हिसाब से ये समय से ये मार्गशीर्ष से पौष तक का होता है। इसमें ठिठुरा देने वाली ठंड होती है। वैसे, माना जाता है कि ये देवताओ की प्रिय ऋतु है। इसे वर्ष का आभूषण भी कहा जाता है। जब ये चरम पर होती है सूर्य की किरणों का स्पर्श प्रिय लगने लगता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से इसे सबसे बेहतर समय माना गया है।
इस ऋतु में चन्द्रमा की शक्ति सूर्य की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली होती है। इसलिए इस ऋतु में औषधियाँ, वृक्ष, पृथ्वी की पौष्टिकता में भरपूर वृद्धि होती है व जीव जंतु भी पुष्ट होते हैं। इस ऋतु में प्रकृति भी शरीर व स्वास्थ्य की स्थिति को सुधारने में सहायता करती है। इस ऋतु में शरीर में कफ का संचय होता है तथा पित्तदोष का नाश होता है।
शीत ऋतु में स्वाभाविक रूप से जठराग्नि तीव्र रहती है, अत: पाचन शक्ति प्रबल रहती है। ऐसा इसलिए होता है कि हमारे शरीर की त्वचा पर ठंडी हवा और हवा और ठंडे वातावरण का प्रभाव बारंबार पड़ते रहने से शरीर के अंदर की उष्णता बाहर नहीं निकल पाती और अंदर ही अंदर इक_ी होकर जठराग्नि को प्रबल करती है। अत: इस समय लिया गया पौष्टिक और बलवर्धक आहार वर्षभर शरीर को तेज, बल और पुष्टि प्रदान करता है।
हेमंत ऋतु में खारा तथा मधुर रसप्रधान आहार लेना चाहिए। पचने में भारी, पौष्टिकता से भरपूर, गरम व स्निग्ध प्रकृति के घी से बने पदार्थों का यथायोग्य सेवन करना चाहिए। वर्षभर शरीर की स्वास्थ्य-रक्षा हेतु शक्ति का भंडार एकत्रित करने के लिए उड़दपाक, सालमपाक, सोंठपाक जैसे वाजीकारक पदार्थों अथवा च्यवनप्राश आदि का उपयोग करना चाहिए। इसके अलावा दशमूलारिष्ट, लोहासन, अश्वगंधारिष्ट अथवा अश्वगंधावलेह जैसी देशी व आयुर्वेदिक औषधियों का भी सेवन किया जा सकता है। बच्चों को कुमारकल्याणरस का सेवन करना चाहिए। मौसमी फल व शाक, दूध, रबड़ी, घी, मक्खन, म_ा, शहद, उड़द, खजूर, तिल, खोपरा, मेथी, पीपर, सूखा मेवा तथा चरबी बढ़ाने वाले अन्य पौष्टिक पदार्थ इस ऋतु में सेवन योग्य माने जाते हैं। हरी पत्तीदार सब्जियों को तेल में बनाना अच्छा रहता है। अंगार पर भुना बैंगन जिसे फिर तेल में पकाया गया हो, उष्णता के लिए अच्छा रहता है। कच्ची पतली मूली को तेल में बना कर खाना चाहिए। बाजरे की खिचड़ी भरपूर घी और गुड़ के साथ सेवन करना चाहिए। पीने में उष्ण जल का प्रयोग करें। प्रात:सेवन हेतु रात को भिगोये हुए कच्चे चने (खूब चबा-चबाकर खाये), मूँगफली, गुड़, गाजर, केला, शकरकंद, सिंघाड़ा, आँवला आदि कम खर्च में सेवन किये जाने वाले पौष्टिक पदार्थ हैं।
मूँगफली की फसल इन्हीं दिनों आती है, अत: नई मूँगफली उपलब्ध होती है। नई मूँगफली में दूधिया मीठापन होती है। इसमें दूध जैसा उंचे दर्जे का प्रोटीन, शुद्ध घी जैसी चिकनाई और अंडे जैसी उष्मा होते हुए भी अपेक्षाकृत यह शीघ्र पच जाती है। जो लोग शरीर को मोटा-तगड़ा और मजबूत बनाने के लिए अंडे-मांस का सेवन कर नाना प्रकार की व्याधियों को गले लगाते हैं, उन्हें मूँगफली का सेवन करना चाहिए। रात को सोते समय दूध अवश्य पीना चाहिए। यदि दूध न मिले, रात को सोते समय 25-25 ग्राम देसी चने व गुड़ खूब चबा-चबा कर खाएं और मुंह साफ कर सो जाएं।
इस ऋतु में बर्फ अथवा फ्रिज का पानी, रूखे-सूखे, कसैले, तीखे तथा कड़वे रसप्रधान द्रव्यों, वातकारक और बासी पदार्थ, एवं जो पदार्थ आपकी प्रकृति के अनुकूल नहीं हों, उनका सेवन न करें। शीत प्रकृति के पदार्थों का अति सेवन न करें। हलका भोजन भी निषिद्ध है। इन दिनों में खटाई का अधिक प्रयोग न करें, ताकि कफ का प्रकोप और खाँसी, दमा, नजला, जुकाम जैसी व्याधियाँ न हों। ताजा दही, छाछ, नींबू आदि का सेवन कर सकते हैं। भूख को मारना या समय पर भोजन न करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है क्योंकि शीतकाल में अग्नि के प्रबल होने पर पौष्टिक और भारी आहाररूपी ईंधन नहीं मिलने पर यह बढ़ी हुई अग्नि शरीर में उत्पन्न धातु (रस) को जलाने लगती है और वात कुपित होने लगता है। अत: उपवास भी अधिक नहीं करने चाहिए। प्रतिदिन प्रात:काल दौड़ लगाना, शुद्ध वायुसेवन हेतु भ्रमण, शरीर की तेलमालिश, व्यायाम, कसरत व योगासन करने चाहिए। शरीर की चंपी करवाना एवं यदि कुश्ती अथवा अन्य कसरतें करना लाभप्रद है। तेल मालिश के बाद शरीर पर उबटन लगाकर स्नान करना हितकारी होता है। तेल मालिश से शरीर में कफ और वात का शमन होता है, जिससे जोड़ों का दर्द, गैस की समस्या और कफजन्य विकार नहीं होते। उसके बाद शरीर का पसीना सुखा कर ठंडे या गुनगुने गर्म जल से स्नान करके मोटे तौलिये से शरीर को खूब रगड़कर पोंछना चाहिए। त्वचा की रूक्षता दूर करने के लिए मलाई या शहद को नींबू के रस में मिलाकर लगाएं।
प्रात:काल सूर्य की किरणों का सेवन करें। पैर ठंडे न हों, इस हेतु जूते पहनें। बिस्तर, कुर्सी अथवा बैठने के स्थान पर कम्बल, चटाई, प्लास्टिक अथवा टाट की बोरी बिछाकर ही बैठें। सूती कपड़े पर न बैठें। कमरे एवं शरीर को थोड़ा गर्म रखें। सूती, मोटे तथा ऊनी वस्त्र इस मौसम में लाभकारी होते हैं। ठंडी हवा से बचें। स्कूटर, मोटरसाइकिल जैसे खुले वाहनों की बजाय बस, रेल, कार-जैसे वाहनों से ही सफर करने का प्रयास करें।
हेमंत ऋतु में बड़ी हरड़ का चूर्ण और सोंठ का चूर्ण समभाग मिलाकर प्रात: सूर्योदय के समय अवश्य पानी में घोलकर पी जायें। दोनों मिलाकर 5 ग्राम लेना पर्याप्त है। इसे पानी में घोलकर पी जायें। यह उत्तम रसायन है। लहसुन की 3-4 कलियाँ या तो ऐसे ही निगल जाया करें या चबाकर खा लें या दूध में उबालकर खा लिया करें। गरिष्ठ खाद्य पदार्थों के सेवन से पहले अदरक के टुकड़ों पर नमक व नींबू का रस डालकर खाने से जठराग्नि अधिक प्रबल होती है। इस ऋतु में सर्दी, खाँसी, जुकाम या कभी बुखार की संभावना भी बनी रहती है। ऐसा होने पर निम्निलिखित उपाय करने चाहिए।
सर्दी-जुकाम एवं खाँसी मिटाने के उपाय
सुबह तथा रात्रि को सोते वक्त हल्दी-नमक वाले ताजे भुने हुए एक मु_ी चने खायें, किंतु खाने के बाद कोई भी पेय पदार्थ, यहाँ तक कि पानी न पियें। भोजन में घी, दूध, शक्कर, गुड़ एवं खटाई तथा फलों का सेवन बन्द कर दें। सर्दी-खाँसी वाले स्थायी मरीजों के लिए यह सस्ता प्रयोग है।
=भोजन के पश्चात हल्दी-नमकवाली भुनी हुई अजवायन को मुखवास के रुप में नित्य सेवन करने से सर्दी-खाँसी मिट जाती है।
=अजवाइन का धुआँ लेना चाहिए। अजवाइन की पोटली से छाती की सेंक करनी चाहिए। मिठाई, खटाई एवं चिकनाईयुक्त चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।
=प्रतिदिन मुखवास के रूप में दालचीनी का प्रयोग करें।
=दो ग्राम सोंठ, आधा ग्राम दालचीनी तथा 5 ग्राम पुराना गुड़, इन तीनों को कटोरी में गरम करके रोज ताजा खाने से सर्दी मिटती है।
=सर्दी-जुकाम अधिक होने पर नाक बंद हो जाती है, सिर भी भारी हो जाता है और बहुत बेचैनी होती है। ऐसे समय में एक पतीले में पानी को खूब गरम करके उसमें थोड़ा दर्दशामक मलहम, नीलगिरि का तेल अथवा कपूर डालकर सिर व तपेली ढँक जाय ऐसा कोई मोटा कपड़ा या तौलिया ओढ़कर गरम पानी की भाप लें। मिश्री के बारीक चूर्ण को नसवार की तरह नाक से सूँघें।
=स्थायी सर्दी-जुकाम एवं खाँसी के रोगी को 2 ग्राम सोंठ, 10 से 12 ग्राम गुड़ एवं थोड़ा घी एक कटोरी में लेकर उतनी देर तक गर्म करना चाहिए जब तक कि गुड़ पिघल न जाय। फिर सबको मिलाकर सुबह खाली पेट रोज गरम-गरम खा ले। भोजन में मीठी, खट्टी, चिकनी एवं गरिष्ठ वस्तुएँ न ले। रोज सादे पानी की जगह पर सोंठ की डली डालकर उबाला गया पानी ही गुनगुना-गर्म हो जाय तब पियें। इस प्रयोग से रोग मिट जायेगा।
=सर्दी के कारण होते सिरदर्द, छाती का दर्द एवं बेचैनी में सोंठ का चूर्ण पानी में डालकर गर्म करके पीड़ावाले स्थान पर थोड़ा लेप करें। सोंठ का चूर्ण शहद में मिलाकर थोड़ा-थोड़ा रोज चाटें। मूँग, बाजरी, मेथी एवं लहसुन का प्रयोग भोजन में करें। हल्दी को अंगारों पर डालकर उसकी धूनी लें तथा हल्दी के चूर्ण को दूध में डालकर पियें।
=वायु की सूखी खाँसी में अथवा पित्तजन्य खाँसी में, खून गिरने में, छाती की कमजोरी के दर्द में, मानसिक दुर्बलता में तथा नपुंसकता के रोग में गेहूँ के आटे में गुड़ अथवा शक्कर एवं घी डालकर बनाया गया हलुआ विशेष हितकर है। वायु की खाँसी में गुड़ के हलुए में सोंठ डालें।
=खून गिरने के रोग में मिश्री-घी में हलुआ बनाकर किशमिश डालें। मानसिक दौर्बल्य में उपयोग करने के लिए हलुए में बादाम डालें। कफजन्य खाँसी तथा श्वास के दर्द में गुनगुने पानी के साथ अजवाइन खिलाने से लाभ होता है, कफोत्पत्ति बंद होती है। पीपरामूल, सोंठ एवं बहेड़ादल का चूर्ण बनाकर शहद में मिलाकर प्रतिदिन खाने से सर्दी कफ की खाँसी मिटती है।
बुखार मिटाने के उपाय
बुखार आने पर एक दिन उपवास रखकर केवल उबला हुआ पानी पीने से बुखार गिरता है। मोंठ या मोंठ की दाल का सूप बनाकर पीने से बुखार में राहत मिलती है। उस सूप में हरा धनिया तथा मिश्री डालने से मुँह अथवा मल द्वारा निकलता खून बंद होता है।
=पानी में तुलसी एवं पुदीना के पत्ते डालकर उबालें। नीचे उतार कर 10 मिनट ढँककर रखें। फिर उसमें शहद डालकर पीने से बुखार में राहत मिलती है और शरीर की शिथिलता दूर होती है।
=पीपरामूल का 1 से 2 ग्राम चूर्ण शहद के साथ लेकर फिर कुछ देर बाद गर्म दूध पीने से मलेरिया कम होता है।
=5 से 10 ग्राम लहसुन कलियों को काटकर, तिल के तेल अथवा घी में तलकर, सेंधा नमक डालकर रोज खायें। इससे मलेरिया का बुखार दूर होता है।
=सौंफ तथा धनिया के काढ़े में मिश्री मिलाकर पीने से पित्तज्वर का शमन होता है।
=हींग तथा कपूर से बनायी गयी गोली (हिंगकपूर वटी) की एक-दो गोली लेकर, अदरक के रस में घोंटकर, रोगी की जीभ पर लगायें-रगड़ें। रोगी अगर दवा पी सके तो यही दवा पिये। इससे नाड़ी सुधरेगी और बुखार मिटेगा।