भारतीय ज्ञान परंपरा और स्मार्ट सिटी का शुभ बनना

भारतीय ज्ञान परंपरा और स्मार्ट सिटी का शुभ बनना

वैदिक सभ्यता की चर्चा प्राय: होती रहती है। वैदिक सभ्यता को लेकर लोगों को कल्पना है कि ऋषि लोग पर्णकुटी में रहते थे, कन्दमूल फल खाते थे उनके लम्बे-लम्बे बाल होते थे क्योंकि हजामत करने के लिए उनके पास उस्तरे नही होते थे, वे  गाय और बकरियां पालते थे इस तरह वनवासी वेश में रहना उनकी मजबूरी थी। अर्ध वन्य स्थिति में रहकर वे दुनिया की ओर देखते थे। लोगों का मानना है  कि ऋषिगण अग्नि, वायु, सूर्य, पर्जन्य आदि को देखकर तथा इनकी आराधना में जो लिखा गया, वही वैदिक सूक्तियों के रूप में प्रसिद्ध है। मैक्समुलर जैसे लोगों ने अपनी विद्वता दिखाते हुए यहां तक कह दिया कि वेदों में गड़ेरियों के गीतों के अलावा कुुछ नहीं है। लेकिन वैदिक सूक्तों का अगर गम्भीर अध्ययन किया जाए तो वेदों के प्रति देखने की वर्तमान सोच बदल जाएगी। सच तो यह है कि वैदिक सूक्तों से हमें जो ज्ञान मिलता है वह उच्च समाज की अवस्था में ही होना सम्भव हैं।
 उदाहरण के लिए वशिष्ठ ऋषि ने कहा है कि ” मा अहं मृण्मये गृहं गमम् ” ( ऋ0 79/89/1) ”में मिट्टी के घर में जाकर नही रहूँगा।” जो मिट्टी के घर में रहना नहीं चाहता वह पत्तों तथा घास फूस से बनी कुटिया में कैसे रह सकता है, यह विचार  करने योग्य बात है। महर्षि वशिष्ठ  के कथन से स्पष्ट होता है कि वह कच्चे नही अपितु पक्के मकानों में रहना चाहते है। ऐसे ही दूसरे मंत्र में कहा गया है कि बृहन्तं मानं सहस्त्रद्वार गृंह जगम्।(ऋ0 7/88/5) अर्थात् बड़े बड़े पत्थरों से निर्मित हजार द्वार वाले घर में जाकर हम रहेंगे। हमें रहने के लिए स्थाई बने हुए मकान चाहिए। इसका कारण यही है कि वशिष्ठ ऋषि के आश्रम में हजारों छात्र पढ़ते थे। वे झोपडिय़ों में कैसे रहते यानि कच्चे मकानों में इतने छात्र कैसे रहते? महर्षि के कथनानुसार 200-300 कमरों वाले मकान की बात हो रही है। उन्होंने  यहां तक कहा कि दूसरों के घर में हम नही रहेंगे। पुत्रहीन घर में नहीं रहेंगे। पुत्र-पौत्र जिस घर में है ऐसे घर में रहेंगे। इस प्रकार महर्षि वशिष्ठ के अनुसार ऋषियों के मकान  पक्के होते थे। वास्तुशास्त्र में भी कहा कि क्षत्रिय घर की अपेक्षा ब्राहमण घर बहुत बड़ा होता था। कुछ विद्वान लिखते है कि ऋषि तप करने के लिए बैठते थे तो उन पर दीमक अपना घर बना लेते थे। केवल जल पीकर तथा कन्दमूल खा कर वे अपना जीवन यापन करते थे। ऐसे असत्य वर्णन मानने योग्य नही हैं। ये मनगढ़न्त विवरण प्राचीन भारतीय वैभव तथा समृ़िद्व को कम कनके आंकने तरीका है।
 महाभारत के लेखक महर्षि व्यास ने बताया है कि जगद् दु:ख वाद का उपदेश शत्रुराष्ट्र में करके उनको अम्युदय के मार्ग से निवृत्त करना चाहिए। इस प्रकार का उपदेश अपने राष्ट्र में कभी नही करना चाहिए। जहां निराशावादी विचारों को परोसने का काम होता है, वह राष्ट्र कभी उन्नत नही  हो सकता है सच तो यह है कि भारत में  दीनता की पूजा कभी नही रही अपितु समृद्वि की है शक्ति की पूजा की रही है ज्ञान साधना की परम्परा भारत की रही है। हम पाते हैं कि महाभारतकाल में देश में तकनीकी अपने चरम पर रही है।
 स्मार्ट सिटी की चर्चा बड़े जोर शोर से हो रही है। शासन के इस प्रयास की सराहना की जानी चाहिए। इस तरह के विकास में अपने देश की ज्ञान-विज्ञान परंपरा भी काफी सहायक हो सकती है। वास्तु वास्तव में नगर रचना का ही विज्ञान है। आवश्यकता इस बात की है, कि इसे अंधविश्वास मानकर हिकारत से देखने की बजाए इस के प्रति विज्ञानपरक दृष्टि रखी जाए । तभी हम भारतीय ज्ञान परंपरा का सम्मान भी कर पाएंगे और स्मार्ट सिटी के विचार को शुभ भी बना पायेंगे।