परम उपयोगी है रुद्राक्ष

डॉ. पवन सिन्हा

आध्यात्मिक गुरु एवं प्रख्यात ज्योतिषाचार्य

भारतीय संस्कृति में रुद्राक्ष का बहुत महत्व है। रूद्र के अक्ष अर्थात् रूद्र की आंख से निकले अश्रु बिंदु को रुद्राक्ष कहा गया है। आपने साधु-संतों को रुद्राक्ष की माला पहने या रुद्राक्ष की माला से जप करते हुए देखा होगा। ज्योतिष विज्ञान के अनेक जानकार भी समस्या के निवारण के लिए रुद्राक्ष पहनाते हैं। अनेक रोगों के लिए भी रुद्राक्ष की माला बिना जाने पहन लेते हैं या फिर इसका मजाक उड़ाते हैं। दरअसल रुद्राक्ष है क्या? क्या है इसका महत्व? वेद पुराणों में इसका स्थान कहां है? यह जानना बेहद जरूरी है।

रुद्राक्ष को भारत में बेहद पवि़त्र माना जाता है। शिव पुराण में रुद्राक्ष के 38 प्रकार बताए गए हैं। इसमें कत्थई रंग के 12 प्रकार के रुद्राक्षों की उत्पति सूर्य के नेत्रों से, श्वेत रंग के 16 प्रकार के रुद्राक्षों की उत्पति चंद्र के नेत्रों से तथा कृष्ण वर्ण वाले 10 प्रकार के रुद्राक्षों की उत्पत्ति अग्नि के नेत्रों से मानी जाती है, ये ही इसके 38 भेद हैं। शिव पुराण में रुद्राक्ष के महत्व पर लिखा गया है कि संसार में रुद्राक्ष की माला की तरह अन्य कोई दूसरी माला फलदायक और शुभ नहीं है।

विज्ञान के मुताबिक छोटे या एकमुखी रुद्राक्ष में डेरिकोलिन मेटाफास्फिडान एवं मेटासिन्थेसिन सिप्रोमाइड प्रचुर मात्रा में और अति शुद्ध अवस्था में पाया जाता है। इसके ऊपर क्रेमलिन की परत रहती है, जिसके हटते ही प्रकाश की किरण इसके फास्फिडान एवं सिप्रोमाइड पर पड़ती है। क्लोरोप्लास्ट से फोटोसिथेसिस की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है और इसकी ऊर्जा वायुमण्डल से मिलने लगती है। रुद्राक्ष के अन्दर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक शक्ति होने के कारण यह मष्तिष्क और विचार दोनों को मजबूत करता है।

चिकित्सा विज्ञान की बात करें तो रुद्राक्ष के उपयोग से स्नायु रोग, स्त्री रोग, गले के रोग, रक्तचाप (ब्लड प्रेशर), मिरगी, दमा, नेत्र रोग, सिर दर्द आदि कई बीमारियों में लाभ होता है। रुद्राक्ष के फल पेड़ पर लगते हैं। ये पेड़ दक्षिण एशिया में मुख्यत: जावा, मलेशिया, ताइवान, भारत एवं नेपाल में पाए जाते हैं। भारत में ये असम, अरूणाचल प्रदेश और देहरादून में पाए जाते हैं। रुद्राक्ष के फल से छिलका उतारकर उसके बीज को पानी में गलाकर साफ किया जाता है और रुद्राक्ष निकाला जाता है।

अब अगर धार्मिक आख्यानों से हटकर रुद्राक्ष की उपयोगिता पर विचार करें तो बात थोड़ी और साफ हो जाएगी। रुद्राक्ष को शिव से या साधना से जोडऩे में बड़ा हाथ रुद्राक्ष की उपयोगिता का भी है। रुद्राक्ष का पेड़ हिमालय की अति दुर्गम पहाडिय़ों पर मिलता है। यही वह जगह है जहां सन्यासी, योगी, शिव भक्त ध्यान साधना करते है। शैव संप्रदाय या हठयोग साधना बेहद कठिन मानी जाती है, इसे सिद्ध होने में कई साल लग जाते हैं। पूरी साधना तक साधक को हिमालय में रहना पड़ता है, इस कठिन साधना में शरीर में शक्ति का होना अति आवश्यक है, साधना में भूख-प्यास कम से कम लगे यह भी बड़ा महत्वपूर्ण है। यही कारण है जिसकी वजह से सन्यासी और साधना करने वाले योगियों ने रुद्राक्ष के महत्व को जाना। रुद्राक्ष एक दवाई है जिसे खाने से योगी तंदुरूस्त महसूस करता है, उसकी रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ जाती है जिसके कारण ठंडे प्रदेश में भी साधक बीमार नहीं पड़ता। रुद्राक्ष का कच्चा फल खाने का दूसरा फायदा यह बताया जाता है कि उससे प्यास और साथ ही भूख भी कम होती जाती है। योगी को बार-बार पानी की तलाश में भटकना नहीं पड़ता जिससे वह साधना में लीन रह पाता है।

भारत में रुद्राक्ष का सिर्फ धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व नहीं है बल्कि इसका ज्योतिषीय महत्व भी है। शिव के अंश के तौर पर ज्योतिषियों ने खगोलीय गणना के हिसाब से हर मुख वाले रुद्राक्ष का अलग-अलग महत्व बताया है। शिव पुराण में स्वयं शिव ने सभी रुद्राक्षों का अलग-अलग महत्व बताया है। एकमुखी रुद्राक्ष को शिव ने अपना ही रूप बताया है और इसे भोग और मोक्ष रूपी फल देने वाला माना है। इस रुद्राक्ष को आक्षेय तिथि को अभिमंत्रित करके पूजा में रखने से लक्ष्मी के नहीं रूठने और घर में शांति आने की बात कहीं गई है।

शिव ने दोमुखी रुद्राक्ष को देवेश्वर कहा है। इसे कामनाओं की प्राप्ति वाला बताया है। तीन मुखी रुद्राक्ष को शिव साधना और पूर्ण विद्या का फल देने वाला बताया है और इसे आलसी और निकृष्टतम व्यक्ति में भी पुरूषार्थ की ज्वाला भर देने वाला कहते हैं, वही पांच मुखी रुद्राक्ष को शिव पुराण में कालाग्निरूद्र रूप वाला और श्रापों से मुक्तिदायक और मनोवांछित फल देने वाला बताया गया है। छह मुखी रुद्राक्ष को शिव पुराण में के पु़त्र कार्तिकेय स्वरूप कहा गया है। इसे दाहिने हाथ पर बांधने से पापमुक्ति का फल मिलता है। सात मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से दरिद्र के भी ऐश्वर्यशाली होने की बात कही गई हैं। आठ मुखी रुद्राक्ष को शिव पुराण में अष्टमूति भैरव कहा गया हैं। इसे अल्पायु दोष और अकाल मृत्यु दोष से मुक्ति देने वाला बताया गया है। नौ मुखी रुद्राक्ष को बाएं हाथ में धारण करने से दुर्गा जी की सिद्धी प्राप्त होती है। जबकि दस मुखी रुद्राक्ष को विष्णु रूप माना जाता है। यह कामनाओं की पूर्ति में मदद करने वाला कहा गया है। ग्यारह मुखी रुद्राक्ष को शिव पुराण में रूद्र रूप वाला बताया गया है। इसको धारण करने से मनुष्य सर्वत्र विजयी होता है। बारह मुखी रुद्राक्ष को प्रतिष्ठा और पद के लिए अनुपम बताया गया है। तेरह मुखी रुद्राक्ष विश्वदेवों का स्वरूप माना गया है, इसको धारण करने वाले मनुष्य को सभी प्रकार के सौभाग्य प्राप्त होने की बात कही गई ह़ै। चौदह मुखी रुद्राक्ष को शिव की उपाधि वाला बताया गया है। यह सभी प्रकार के पापों को नाश ही नहीं करता अपितु मोक्षदायिनी भी है।

हमारे सभी देवताओं-ऋषियों को उस समय की प्रकृति के रहस्य यानी गुण-दोष मालूम थे, इसीलिए वो उचित वस्तु का सेवन करते, उसका उपयोग करते थे। आज हम इन्हीं वस्तुओं की पूजा करते हैं, जो स्वाभाविक भी है। अब जानिए कि रुद्राक्ष से कैसे बड़े-बड़े रोग ठीक होते हैं। अनेक अनुसंधानों से ये स्पष्ट हो गया है कि रुद्राक्ष द्वारा उपचार भी किया जाता था और आज भी यह उपचार संभव है।

वर्ष 1985 में डॉक्टर एससी गुप्त ने दिखाया कि रुद्राक्ष का पाउडर खाने से उच्च रक्तचाप का इलाज होता है। महाराष्ट्र के वसंतराव वैद्य ने बताया कि जब रुद्राक्ष को पानी में डाला जाता है। तो जल का विद्युतीय गुण बदल जाता है। वाराणसी के डॉक्टर सुहास रॉय ने रुद्राक्ष पर अनुसंधान किया। उनके अनुसंधान ने यह बात सिद्ध किया कि रुद्राक्ष में विद्युत चुंबकीय (इलेक्ट्रो मैग्नेटिक) गुण होते हैं। जब रुद्राक्ष को हदय के ऊपर रखा जाता है तो वह धड़कनों को स्थिर करता है। रक्त संचार और हदयगाति को नियंत्रित कर शरीर के चारों तरफ एक विद्युत चुंबकीय क्षेत्र बना देता है। विशेषकर हदय के आस-पास रुद्राक्ष इस विद्युत चुंबकीय क्षेत्र का इस्तेमाल शरीर में रक्त के संचार को सुचारू रूप से चलाने में करता है। रुद्राक्ष नैसर्गिक शामक है।

कुछ अनुसंधानों में तो रुद्राक्ष को उम्र का प्रभाव रोकने वाले गुणों वाला बताया गया है। एक मुखी या चार मुखी रुद्राक्ष को दूध में लेने से अद्भुत रूप से मानसिक शक्ति बढ़ती है। चार मुखी रुद्राक्ष की माला बाजू पर बांधने से भी मानसिक शक्ति बढ़ती है। रुद्राक्ष को हदय के लिए अद्भुत औषधि माना जाता है। इसलिए डेज मेडिकल लेबोरेट्री ने इस रुद्राक्ष का रोड्रिक्स नाम से कैप्सूल बनाया है, जो रक्तचाप हृदय की समस्या, तनाव, अवसाद आदि बीमारियों की चिकित्सा में प्रयोग किया जाता है।

चौदह मुखी रुद्राक्ष की माला पुरूष या स्त्री द्वारा धारण करने में उत्तम संतान की प्राप्ति होती है और गृहस्थ जीवन भी अच्छा होता है। काले, ग्यारह मुखी तथा चौदह मुखी रुद्राक्ष की माला को पेट पर बांधने से बार-बार हो जाने वाला गर्भपात रूक जाता है व उच्च कोटि की संतान उत्पन्न होती है।

रुद्राक्ष को रात में जल में डाल दें, प्रात: यह जल पीने से शरीर स्वस्थ होता है और हृदय मजबूत होता है। गुरू या बुजुर्ग द्वारा दिए जाने वाला रुद्राक्ष अद्भुत रूप से रक्षा करता है। इसका कोई मोल नहीं दिया जा सकता। ऐसा रुद्राक्ष जिससें धागा डालने का स्थान स्वत: ही बना होता है, शरीर को बहुत मजबूत करता है। दो मुखी रुद्राक्ष बुध के समस्त दोषों को दूर करता है। भारतीय संस्कृति के वेद-पुराणों में जो कुछ भी लिखा गया है, वह सब वैज्ञानिक आधार की कसौटी पर कसा हुआ है। समय रहते हम उस ज्ञान को समझें और उससे लाभ उठाएं अन्यथा विदेशी हमारे शिव, हमारे शिव के रुद्राक्ष का महत्व जब हमें समझाने लगेंगे तो शर्मसार होने के सिवा हमारे पास कोई और विकल्प न बचेगा।