उत्तम संतान : सावधानियां व उपाय

उत्तम संतान : सावधानियां व उपाय

डॉ. नितिन अग्रवाल

लेखक प्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्य हैं।

हम बच्चे के विकास के लिए सब कुछ करने के लिए तैयार रहते हैं। परंतु यह सब कुछ हम करते हैं उसके पैदा होने के बाद। आयुर्वेद का भारतीय विज्ञान हमें बताता है कि यदि यह चिंतन हम थोड़ा पहले यानी कि गर्भधारण से भी पहले से करना शुरू कर दें तो वह सब कुछ हासिल किया जा सकता है और काफी कम मेहनत और कम खर्च में।

आज संतान की योजना बनाने में आर्थिक पक्ष खासा महत्वपूर्ण हो गया है। लगभग सभी नवदंपत्ति विवाह एवं संतान की योजना बनाते समय अपनी आर्थिक स्थिति का विशेष ध्यान रखते हैं। उन्हें लगता है कि विवाह करने और संतान को जन्म देने में पैसे की बड़ी भूमिका है। पैसे की भूमिका है भी परंतु साथ ही अन्य भी कई विषय महत्वपूर्ण होते हैं जिन पर ध्यान नहीं दिया जाता। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि लोग स्वास्थ्य पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देते कि वे विवाह और संतान उत्पन्न करने के लिए पूरी तरह स्वस्थ हैं क्या? इस पर विचार नहीं किया जाता है कि क्या हम एक स्वस्थ और अच्छा बच्चा पैदा करने लायक स्वस्थ हैं? यह ठीक है कि शारीरिक रूप से दंपत्ति संतान पैदा करने योग्य होंगे, बच्चा भी हो जाएगा, परंतु वह प्रतिभावान, स्वस्थ, बुद्धिमान और तेजस्वी हो ही, यह आवश्यक नहीं होता।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अध्ययन के अनुसार 33 में से एक बच्चे को जन्म के साथ होने वाली कोई न कोई बीमारी होती ही है। यानी दुनिया में प्रतिवर्ष 32 लाख बच्चे इस प्रकार की बीमारी से ग्रस्त होते हैं और 27 लाख बच्चे जन्म लेते ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं। छोटे-छोटे बच्चों को एलर्जी हो जाती है। बच्चों में मधुमेह होने लगा है। अस्थमा भी सामान्य बीमारी हो गई है। लीवर की समस्या और पीलिया भी बच्चों को होने वाली आम बीमारी है। ये बीमारियां पौष्टिक भोजन प्राप्त करने वाले बच्चों को भी हो रही हैं। बच्चों में अत्यधिक सक्रियता, चंचलता, चिढ़, मंदबुद्धिता आदि मनोवैज्ञानिक विकृतियां भी पैदा होने लगी हैं। इसी प्रकार बच्चों में भावनात्मक असंतुलन का बढऩा भी एक समस्या बन रहा है। इन सबके अनेक कारण होंगे, परंतु इसका एक प्रमुख कारण है माता-पिता का पूरी तरह स्वस्थ नहीं होना।

हम बच्चे के विकास के लिए सब कुछ करने के लिए तैयार रहते हैं। उन्हें अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलाते हैं, अच्छे से अच्छा भोजन देते हैं, परंतु यह सब कुछ हम करते हैं उसके पैदा होने के बाद। उससे पहले हम सोचते भी नहीं है कि वह कैसा हो। आयुर्वेद का भारतीय विज्ञान हमें बताता है कि यदि यह चिंतन हम थोड़ा पहले यानी कि बच्चे के जन्म, बल्कि गर्भधारण से भी पहले से करना शुरू कर दें तो वह सब कुछ हासिल किया जा सकता है और काफी कम मेहनत और कम खर्च में। बाद में बहुत कुछ नहीं किया जा सकता और कुछ करने में खर्च बहुत होता है। यदि बच्चा पढ़ाई में कमजोर है तो है। आप बहुत कुछ नहीं बदल सकते।

यज्ञ और वैदिक विज्ञान ने हमें एक स्वस्थ, बुद्धिमत्तापूर्ण, निरोगी और आनंदित संतान पाने का रास्ता बताया है। जब हमें अंदर से खुशी होती है, उसे आनंद कहते हैं। इसके लिए आयुर्वेद में संस्कारों का वर्णन किया गया है। हमारे शास्त्रों में अनेक संस्कारों का वर्णन किया गया है, जिनसे यह सारा कुछ प्राप्त किया जा सकता है। संतान पैदा करने का संयोग नहीं होना चाहिए बल्कि यह हमारी योजना से होना चाहिए। बच्चे का विकास, उसका स्वास्थ्य महत्वपूर्ण है। जीवन उसको जीना है और उसके लिए ही हम सब कुछ करने वाले हैं। तो पहले से ही इसकी योजना बनाएं। संतान उत्पन्न करना एक जिम्मेदारी है, पुण्य कर्म है। हमें बच्चे में सारे गुण चाहिए होते हैं। हमारी चाहत होती है कि हमारा बच्चा स्वस्थ, बलशाली, बुद्धिमान, निरोगी, सभ्य और सुसंस्कृत हो। परंतु इसके लिए हमें एक कार्य योजना बनानी होगी। यह योजना भारतीय विज्ञान के आधार पर बनाई जा सकती है।

भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जिनमें प्रयासपूर्वक श्रेष्ठ संतति का जन्म हुआ। हमने राजा दशरथ की कहानी सुनी है। उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए पुत्र कामेष्टि यज्ञ किया था जिससे उन्हें श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न जैसी संतानें हुईं। राजा दिलीप की कथा भी काफी प्रसिद्ध है जिन्हें वीर्यदोष के कारण संतान नहीं हो पा रहा था। उन्होंने नन्दिनी गाय की सेवा की और अंतत: उन्हें महाप्रतापी राजा रघु जैसी संतान मिली। इसी प्रकार अभिमन्यु की कथा आती है कि उसने गर्भ में ही चक्रव्यूह का भेदन करना सीख लिया था। इन कथाओं का एक ही भाव है कि हम संतान की योजना बनाएं और श्रेष्ठ संतान को जन्म दें।

आयुर्वेद में सोलह संस्कारों का वर्णन है। हम उसे करते हैं। हालांकि आज हम उसका अर्थ भूल गए हैं और कई कारणों से उन पर से हमारा विश्वास उठ गया और धीरे-धीरे हमारे प्रचलन से बाहर हो गए। परंतु श्रेष्ठ संतान पाने में संस्कारों विशेषकर गर्भाधान, पुंसवन और सीमंतोन्नयन संस्कार का बहुत महत्व है। गर्भाधान संस्कार से पहले स्त्री और पुरूष दोनों को ही तैयारी करनी चाहिए। आमतौर पर समाज में यह धारणा प्रचलित है कि गर्भ तो स्त्री को धारण करना है इसलिए केवल उसके स्वास्थ्य की जांच होनी चाहिए, पुरूष को इससे कोई लेना-देना नहीं है। यह गलत धारणा है।

पुरूष चाहे कितना ही दूर भी क्यों न हो, उसके आचार-विचार का असर गर्भ पर पड़ता ही है। मानसिक तनाव, चिड़चिड़ापन, गुस्सा आदि मानसिक विकृतियों को दूर करना चाहिए। साथ ही पुरूष का वीर्य भी शुद्ध और पुष्ट होना चाहिए। इसलिए हमारे शास्त्रों ने पुरूष के लिए भी गर्भाधान से पहले शारीरिक-मानसिक शुद्धि करने का विधान किया है। वीर्य में कोई दोष न भी हो तो भी उसकी गुणवत्ता बढ़ाने के उपाय किए जाने चाहिए। इससे ही बच्चे का पूरा भविष्य निश्चित होने वाला है। इसके लिए ब्रह्मचर्य का विधान किया गया है। ब्रह्मचर्य अर्थात् वासनारहित शारीरिक संपर्क हो। सात्विक वृत्ति से और संयम के साथ यज्ञ भाव से इसमें प्रवृत्त हों।

इसी प्रकार स्त्रियों को भी अपने शरीर को शुद्ध और पुष्ट करना चाहिए। अनेक प्रकार के स्त्री रोग होते हैं जैसे कि श्वेत प्रदर, संक्रमण, गर्भाशय की अशुद्धि आदि। इन्हें दूर कर लेना चाहिए। इन रोगों के बावजूद संतान तो हो सकती है परंतु वह हमारी इच्छानुसार स्वस्थ और बुद्धिमान नहीं होगी। इसलिए स्त्री भी अपने शरीर और मन की पूरी शुद्धि करे। स्त्रियों को अच्छा साहित्य पढऩा चाहिए। माता के ऊपरी वातावरण का भी काफी प्रभाव पड़ता है। इसलिए घर का वातावरण अच्छा रखें। आमतौर पर घर के लोग बच्चे की चिंता करते हैं, परंतु बच्चे को लाने वाली स्त्री की चिंता नहीं करते। इससे बच्चा भी अच्छा नहीं होगा।

इसकी चिंता अवश्य की जानी चाहिए। इसलिए पूरे वातावरण को सकारात्मक, रचनात्मक और आनंददायी बनाएं। इससे बच्चा स्वस्थ होने के साथ-साथ संस्कारी भी होगा। अच्छे हार्डवेयर के साथ-साथ अच्छा साफ्टवेयर भी होना चाहिए। इसके लिए आपने यदि अभी ध्यान नहीं दिया तो फिर बाद में आपके हाथ में कुछ भी नहीं रहेगा।

उत्तम संतान के लिए एक और आवश्यकता है – तनाव से बचें। तनाव गर्भस्थ बच्चे पर बहुत ही नकारात्मक असर डालता है। तनाव से बच्चे में मानसिक शारीरिक समस्याएं हो सकती हैं। कई बार हम पाते हैं कि बच्चा जन्म से ही कुछ चीजों के प्रति एलर्जिक है। ऐसा दो कारणों से होता है। एक तो बच्चे के जन्म से पहले माता-पिता का शरीर टाक्सिन यानी कि विषैले पदार्थों से युक्त रहा होगा या फिर वे काफी तनाव में रहे होंगे। इसलिए हमें अपने आहार-विहार में परिवर्तन लाना चाहिए, इसे आयुर्वेद के निर्देशानुसार ठीक करना चाहिए। इससे न केवल हमारे शरीर से विषैले पदार्थों की शुद्धि होगी, बल्कि हमारा तनाव भी दूर होगा और हम एक स्वस्थ बच्चे का निर्माण कर पाएंगे।

कुछेक जड़ी-बूटियां हैं जिनका सेवन करने से हम अच्छी संतान को जन्म दे सकते हैं। एक प्रमुख औषध है शतावर। शतावर महिलाओं के पूरे शारीरिक तंत्र को मजबूत बनाता है। विशेषकर उनके प्रजनन तंत्र को पुष्ट करता है। गर्भ को स्थिर करता है। इस पर अनेक शोध किए गए हैं और इसके उपयोग को साबित किया जा चुका है। स्त्रियों के हारमोन गतिविधियों को भी संतुलित करता है। ऐसी ही दूसरी औषधि है अशोक। रामायण में इसका उल्लेख है कि सीता इसके नीचे रह कर ही स्वयं की रक्षा कर पाई थी। यह एक संकेत हैं कि अशोक महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी है। यह भी गर्भ को स्थिर करता है। एक अन्य औषधि है पुत्रजीवक है। इसका नाम पुत्रजीवक है परंतु यह पुत्रजीवक है परंतु इसका पुत्र से कोई लेना देना नहीं है। यह गर्भस्थापन के लिए उपयोगी है। शिवलींगी के बीजों के साथ इसे लिया जाता है। यह स्त्री बंध्यत्व को दूर करता है। एक अन्य औषधि है एलोवेरा यानी कि घृतकुमारी। यह खून को साफ करता है, गर्भाशय को मजबूत करता है। चेहरे पर एक चमक लाता है।

पुरूषों के लिए एक महत्वपूर्ण औषधि है अश्वगंधा। यह शरीर और मस्तिष्क में संतुलन स्थापित करती है। शारीरिक मानसिक क्षमता बढ़ाती है। वीर्य और अन्य धातुओं को पुष्ट करती है। मूसली, कौंच और शिलाजीत, ये तीन औषधियां ऐसी हैं जो पुरूषों के लिए काफी लाभकारी है। ये पूरे शरीर को हृष्ट-पुष्ट करता है।

माता-पिता के साथ साथ शिशु के लिए भी कुछ अच्छी औषधियां बताई गई हैं। शिशु का अच्छे शारीरिक विकास के लिए अश्वगंधा देना चाहिए। उनके रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए गिलोय का सेवन करवाएं। इससे वे बीमार कम पड़ेंगे और बीमार पड़ेंगे भी तो जल्द ठीक होंगे। बच्चों के बौद्धिक व मानसिक विकास के लिए उन्हें शंखपुष्पी और ब्राह्मी का सेवन करवाएं।

ये औषधियां समस्या को तो दूर करती ही हैं, परंतु जिन्हें कोई समस्या नहीं है, यदि वे इनका सेवन करें तो उनके लिए भी काफी उपयोगी हैं। ये उनके तंत्र को और सशक्त और सक्षम बनाती हैं जिससे संतान का जन्म उनके लिए सुखद प्रक्रिया हो जाता है। ये केवल औषधियां नहीं हैं, ये भोजन का पूरक हैं। यही आयुर्वेद की विशेषता है कि यदि आपको कोई बीमारी है तो इसकी औषधियां आपका इलाज करेंगी, परंतु यदि आपको कोई बीमारी नहीं है तो ये आपके स्वास्थ्य को बनाए रखने में सहायता करेंगी और अंतत: आपके अंगों को युवा बनाए रखेंगी। इसलिए आयुर्वेद के अनुसार ये औषधि भी हैं, रसायन भी हैं और भोजन का पूरक भी हैं।

अच्छी संतान पाने के लिए एक और आवश्यकता है पंचकर्म। पंचकर्म हमारे शरीर की शुद्धि करता है। जैसे हम अपनी गाड़ी की सर्विसिंग करवाते हैं, पंचकर्म हमारे शरीर की सर्विसिग करता है। यह हमें वर्ष में एक या दो बार करवा लेना चाहिए। हम बीमार हों या नहीं, इसे करवाना हमारे लिए लाभदायक है। रोग-प्रतिरोधन, स्वास्थ्य की देखभाल और रोगों के इलाज तीनों के लिए पंचकर्म करवाना चाहिए। जो दंपत्ति उत्तम संतान चाहते हैं, उन्हें तो अवश्य ही पंचकर्म करवाना चाहिए।

इस प्रकार यदि हम पंचकर्म द्वारा शरीर की शुद्धि, आहार-विहार के नियोजन से शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल, आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों के सेवन से शरीर व मन की पुष्टि और संस्कारों द्वारा शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक ऊर्जा को पुष्ट करेंगे तो निश्चित ही उत्तम संतान को जन्म दे पाएंगे।