राष्ट्र की शक्ति के बल पर निर्भर होती है आपकी आर्थिक उन्नति

राष्ट्र की शक्ति के बल पर निर्भर होती है आपकी आर्थिक उन्नति

प्राच्य विद्या यानी कि प्राचीन भारतीय शास्त्रों में उल्लिखित विज्ञान। सवाल उठता है कि क्या प्राचीन भारतीय शास्त्रों में कोई विज्ञान है भी क्या? आम तौर पर आज का पढ़े-लिखे लोगों का मानना तो यही है कि भारतीय संस्कृत ग्रंथ केवल हवाई बातें करते हैं, जिनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता। वहां, पर्वत उड़ाए जाते हैं, समुद्र सुखाए जाते हैं, स्वर्ग-नरक की बातें होती हैं, बिना सिर के या फिर विचित्र शरीर वाले राक्षसों और अस्वाभाविक शक्तियों वाले देवताओं का वर्णन मात्र है। परंतु क्या यह सही है? यदि यह सही है तो व्यापार के नाम पर भारत को लूटने आए यूरोपीय लोग भारत के संस्कृत ग्रंथों की पाण्डुलिपियां यूरोप क्यों लेते गए? क्यों नासा में संस्कृत ग्रंथों पर शोध किया जाता है? वास्तव में सच क्या है? क्या आज भारतीय संस्कृत ग्रंथों पर इस दृष्टि से शोध किए जाने की कोई आवश्यकता है? क्या इन ग्रंथों में छिपे विज्ञान को जानने का कोई लाभ भी है? इन्हीं प्रश्नों को लेकर भारतीय धरोहर के सह संपादक रवि शंकर ने प्रसिद्ध समाजविज्ञानी और ज्योतिषि एस्ट्रो अंकल पवन सिन्हा जी से बातचीत की। प्रस्तुत हैं उसके मुख्य अंश

कहा और माना जाता है कि भारत की परंपरा में काभी ज्ञान-विज्ञान रहा है, परंतु आज इसका स्रोत यूरोप है। क्या आपको लगता है कि भारत की ज्ञान परंपरा पर शोध किए जाने की कोई आवश्यकता है?

पहली बात तो हमें समझनी चाहिए कि हम आखिर बारंबार भारत, भारतीयता, भारतीय धरोहर, प्राचीन ज्ञान, वेद, वेदांत आदि की चर्चा क्यों कर रहे हैं। यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। दरअसल राष्ट्रहित का विषय आजकल काफी अलग मामला हो गया है। पांच सौ या हजार वर्ष पुराने मामले की तरह नहीं रह गया है। आज हम एक परस्पर निर्भर विश्व में रह रहे हैं जिसका आधार आर्थिक है और आर्थिक उन्नति के बहुत सारे आयाम होते हैं। इसका एक आयाम है राष्ट्र की शक्ति। राष्ट्र की शक्ति के बल पर ही आपकी आर्थिक उन्नति निर्भर होती है। राष्ट्र की शक्ति के अनेक आधार होते हैं। इसका एक महत्वपूर्ण आधार है कि कौन सा देश विश्व को कितना प्रभावित कर सकता है। प्रभावित करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है संस्कृति की। उस देश की संस्कृति, परंपराएं और इतिहास के आधार पर ही देश के लोगों में आत्मविश्वास और गर्व की अनुभूति बढ़ती है और वे दूसरे देश के समाजों और सरकारों को प्रभावित कर सकते हैं। इससे देश की उन्नति होती है। इसीलिए हमें बार-बार भारत और भारतीयता कहने की आवश्यकता है क्योंकि हमें अपने आप को श्रेष्ठ बनाना होगा पूरे विश्व को प्रभावित करके अपना विकास करने के लिए।

अभी तक की स्थिति यह है कि हम यह कहते रहे हैं कि फलां पुराण में यह लिखा है, फलां वेद में यह लिखा है और हम बहुत महान थे। लेकिन जब बारिकी से पूछा जाता था तो अधिकांश लोगों को वस्तुनिष्ठ और प्रमाण सहित बातें पता नहीं होतीं। वे यह तो कह देते हैं कि हमारे पास इतनी उन्नत कलाएं थीं, परंतु उसके प्रमाण उन्हें पता नहीं होते। यह कैसे पता चले, यह एक मुद्दा है। यह पता चलेगा शोध करने से। यह पता चलेगा गहन चिंतन करके चीजों को ढूंढने से। उदाहरण के लिए हमने मान लिया कि हमारे यहां का आयुर्वेद काफी उन्नत था। लेकिन इतना कहने मात्र से तो इसे स्वीकारा नहीं जाएगा। भारत की युवा जनता वैज्ञानिक और तर्कपूर्ण बात ही स्वीकारती है। तो इस बात को जानने के लिए हमें शास्त्रों को देखना पड़ेगा, उसमें वर्णित औजारों को देखना पड़ेगा, उनको छापना और दिखाना पड़ेगा। तब हम दुनिया को कह सकेंगे कि ये इतना उन्नत है और हम श्रेष्ठ थे। एक और उदाहरण है रामसेतु का। जब रामसेतु तोडऩे की समस्या आई तो लोगों ने कहा कि रामसेतु से छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह धर्मसम्मत नहीं है। यह भगवान राम के प्रति हमारी आस्था के विरूद्ध है। इस पर कहा गया कि राम तो कल्पना हैं, राम तो थे ही नहीं और रामसेतु तो है ही नहीं, ये तो कोरल की चट्टानें मात्र हैं। इससे समस्या यह हो गई कि विज्ञान को स्वीकार करें या अपने पुराणों में वर्णित वर्णनों को मानें। इससे 1990 के बाद की वैश्वीकरण की अर्थव्यवस्था को देखने वाले हमारे युवा इसे नहीं मान रहे थे। यहीं पर शोध काम आता है। यदि हमने रामायण को उपग्रहों और ज्योतिष की सहायता से राम के काल को सिद्ध किया होता तो, इस पर सवाल खड़े नहीं हो पाते। इसलिए यह कहने मात्र से नहीं चलेगा कि हमारी संस्कृति दस हजार या एक लाख साल पुरानी है। जबानी जमाखर्च का युग नहीं है, हमें इनके ठोस प्रमाण देने होंगे। इसलिए यदि हमें भारत, भारतीयता, हिंदू धर्म, सनातन परंपरा को इस युग के बच्चों और विश्व को बताना है तो इस पर शोध करना ही होगा।

 

एक सवाल यह भी खड़ा किया जाता है कि अपने शास्त्रों में वैज्ञानिक कही जाने वाली कोई बात है भी या नहीं। कहा जाता है कि अपने शास्त्रों में केवल हवाई बातें हैं, वैज्ञानिक तथ्य नहीं।

मैं यह मानता हूँ कि हमारे ग्रंथों में वैज्ञानिक बातें हैं। लेकिन उन्हें जानने के लिए एक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। इसमें प्रारंभ में परेशानी होगी। मुझे इस नए दृष्टिकोण को प्रतिपादित करने में परेशानी होती है, आस्था और भावुकता के नाम पर बहुत विरोध झेलना पड़ता है। इसमें दो बातें हैं। एक बात तो तय है कि हमारे पौराणिक परंपराएं हैं जो श्रुति और स्मृति पर आधारित हैं। लेकिन उनमें ग्रहों और नक्षत्रों की चाल दी हुई है। उससे आप उस युग का आकलन कर सकते हैं। यह आज आसान हो गया है। नासा में एक विश्वविद्यालय है जिसमें एक शोध किया गया था। शोधकर्ता राधाराजन एक भारतीय ही हैं। उन्होंने यह शोध किया था कि कृषि का जन्म किस तिथि को हुआ था। उसके प्रमाण ढूंढे गए थे और मिल भी गए थे। ऐसे ठोस कार्य किए जा सकते हैं, लेकिन यह तब किया जा सकता है जबहमें यह स्पष्ट रूप से पता हो कि कौन से पुराण तथ्यपरक हैं और कौन से पुराण केवल कहानियां हैं। यह सही बात है कि बहुत से पुराण केवल भावुकतापूर्ण कहानियों से भरे हुए हैं। 1969 में डा. एस राघवन ने शोध करके श्रीकृष्ण के जन्म की तिथि, किस तिथि को महाभारत का युद्ध शुरू हुआ था आदि बताया था। उनके बाद डा. नाराहरि हुए, जो इस शोध को और आगे बढ़ा रहे हैं। इसमें समस्या यह है कि करने वाले तो भारतीय हैं, परंतु सारे साधन अंग्रेजी या अमेरिकन हैं। फिर भी उन्होंने गीता और महाभारत का आधार लेकर ग्रहों की विवेचना की है। यहां हमें ज्योतिष का आधार लेना पड़ेगा। नक्षत्रों, ग्रहों आदि की जो विवेचना की गई है, उसके आधार पर पौराणिक घटनाओं की सही तिथियां हमें प्राप्त हो सकती हैं। जैसे 18 जुलाई, 3156 ईसापूर्व में कृष्ण पैदा हुए थे। इस तरह की सटीक जानकारी उन तिथियों की मिल सकती है।

दूसरी बात है कि हम पुराणों को न मानें। कुछेक वेद आधारित पुराणों को छोड़ कर शेष पुराणों को बिल्कुल नहीं माना जाना चाहिए। वेद आधारित पुराणों या आर्ष ग्रंथो को यदि हम पढ़ते हैं तो उनमें केवल चरित्र का ही वर्णन नहीं है, बल्कि उस युग की सामाजिक व राजनीतिक स्थिति का भी उल्लेख पाया जाता है। हम यदि रामायण को देखें तो बाल्मिकी रामायण में उस युग की पूरी भौगोलिक रचना दी गई है। लव कहां के राजा बने, कुश कहां के राजा बने, भारत कितना बड़ा था आदि। इस प्रकार से जब हम रामायण के भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक पक्षों का भी अध्ययन करेंगे, तो हमें ठोस जानकारियां मिलने लगती है। जैसे ऋषि आत्रेय का वर्णन आता है। वे अग्नि की पूजा करते थे। वे फारस चले गए थे। आज जो पारसी धर्म पैदा हुआ है, वह ऋषि आत्रेय के प्रभाव में ही हुआ। पारसी भी अग्निपूजक हैं। उनका ग्रंथ अवेस्ता ऋग्वेद से मिलता-जुलता है। इसलिए मैं मानता हूँ कि हमारे पास बहुत सारे सूत्र हैं, परंतु धर्मांधता उसे देखने नहीं देती। अगर धर्म को समझने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाए जाने की आवश्यकता है। हमने आर्यभटीयम् की उपेक्षा कर दी थी। एक गुजराती सेठ ने उसे छापा तो हमें उनके बारे में सारी जानकारी मिली। इसमें 196 श्लोक हैं और उसमें पूरे ब्रह्मांड का वर्णन कर दिया गया है। वे चंद्रगुप्त मौर्य के काल के हैं। उससे उस काल के सामाजिक, आर्थिक स्थिति का पूरा आकलन मिल गया।

 

इस शोध के साधन क्या हो सकते हैं? इस शोधकार्य में दृष्टिकोण के अलावा और किन साधनों की आवश्यकता पड़ेगी?

हमें चार व्यवस्थाओं का ठीक से पता लगाना है। सामाजिक व्यवस्था, राजनीतिक व्यवस्था, आर्थिक व्यवस्था, प्रशासनिक व्यवस्था और पांचवा विषयगत यानी कि दर्शन, आयुर्वेद आदि व्यवस्था। इसका प्राथमिक आधार हैं वेद। दूसरा आधार है वेदांत। तीसरा आधार है वेदांत की कथाएं। चौथा हैं आर्ष ग्रंथ। बहुत सारे पुराण तो भटकाने वाले हैं। उन्हें उठाकर एक ओर रख देना चाहिए। परंतु कुछ बहुत प्रामाणिक हैं। जैसे कि शतपथ ब्राह्मण हैं, वाग्भट्ट हैं, सुश्रुत संहिता है, चरक है, चार्वाक दर्शन है, गौड़पाद दर्शन है आदि आदि। फिर महाभारत है। महाभारत तीन चरणों में लिखी गई है। महाभारत का मूल चरण तो जय है जिसे वेदव्यास ने लिखा है। जय के आगे न पढ़ें। पढऩा ही हो तो वैशम्पायन ऋषि का उसमें जो जोड़ा गया है, उसे पढ़ लें। महाभारत के एक लाख श्लोक तो बहुत बाद में लिखे गए हैं। जय को यदि हम पढ़ेंगे तो उस समय की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्थाएं एकदम साफ-साफ पता चल जाएंगी। एक बार हम उन व्यवस्थाओं को समझने लगें तो बहुत सारी चीजें स्पष्ट होती चली जाएंगी। जैसे कि हमें संगीत पर कुछ पढऩा है तो वामदेव को पढ़ेंगे। वामदेवाचार्य ने संगीत पर इतना अधिक कार्य किया है कि उनको पढऩे से कला का उस समय का पूरा इतिहास मिल जाएगा और हम उसे सामाजिक व्यवस्थाओं से जोड़ सकते हैं। इस प्रकार से इन ग्रंथों की सहायता से हम भारतीय विज्ञान को समझ सकते हैं लेकिन यहां एक सावधानी भी रखनी होगी।

यह सावधानी है अंग्रेजों की परिपाटी को समझ करके औऱ उसके प्रभाव से मुक्त हो कर शोध करना। अंग्रेजों ने एक परिपाटी विकसित की थी। वह परिपाटी थी भारत को संपेरों का, भूखे-नंगों का देश सिद्ध करना। इससे वे भारत के बढ़े-लिखे तबके को अपने प्रभाव में लेना चाहते थे जो कि उस समय लगभग 28 प्रतिशत था। हम पाते हैं कि राष्ट्रीय आंदोलन में भी बुद्धिजीवियों का एक बहुत बड़ा वर्ग अंग्रेजों के प्रभाव में था। देश का समृद्ध वर्ग लगभग अंग्रेजों के प्रभाव में था, उनके विरोध में केवल देश का किसान वर्ग था जो कि तब तक अंग्रेजों की लूट के कारण भूखा-नंगा हो चुका था। तो अंग्रेजों और उनकी परिपाटी के विद्वानों ने जो शोध किए, उसे हड़प्पा तक सीमित करके छोड़ दिया। उनके अनुसार 500 ईसा पूर्व से पहले भारत कोई इतिहास था ही नहीं। वे तो वेदों को भी केवल 300-400 ईसापूर्व की रचना मानते हैं। वे इतने अतार्किक हैं कि यदि मेगास्थनीज ने कोई चीज लिखी ही नहीं तो उनके लिए भारत में वह चीज थी ही नहीं। इस प्रकार अन्य विदेशी यात्रियों की भी बात है। वास्तव में भारत इतना बड़ा देश रहा है कि कोई एक यात्री यहां के बारे में सारी बातें लिख ही नहीं सकता। फिर हरेक यात्री की अपनी एक दृष्टि होती है। उसके अनुसार ही वह चीजों को देखता और उसका वर्णन करता है। वे आते ही अपने हिसाब से थे। उदाहरण के लिए अंग्रेज मानते हैं कि सरस्वती नदी थी ही नहीं। विंन्सेंट स्मिथ जैसे इतिहासकारों के आधार पर शोध करेंगे तो सरस्वती को नकार देंगे। जबकि महाभारत में वर्णन है कि सरस्वती की पूजा करो वरना वह मर जाएगी। यह उन्होंने 3130 ईसा पूर्व के आस-पास कहा था कि सरस्वती की रक्षा करो वरना यह मर जाएगी। ऐसा हुआ भी। 1900 ईसा पूर्व के बाद सरस्वती नदी लुप्त हो गई। आज हम भक्तिभाव से सरस्वती को देवी बना कर उनकी पूजा किए जा रहे हैं। इसलिए हमें यह सावधानी रख कर शोध करना होगा कि पाश्चात्य इतिहासकारों के दर्शन को अलग रख कर हमें शोध करना होगा।

 

इसमें एक समस्या और भी है। हमारे सारे ग्रंथ संस्कृत में हैं और आज के शोध व विज्ञान की भाषा अंग्रेजी है। शोधकर्ता और वैज्ञानिक संस्कृत से परिचित नहीं हैं और संस्कृतवेत्ता अंग्रेजी से अनभिज्ञ हैं। ऐसे में शोध कैसे हो?

इसमें बहुत मेहनत किए जाने की आवश्यकता है। इसका कोई छोटा रास्ता नहीं है और यह बहुत जल्दी नहीं होने वाला है। जब हम शोध करें तो वैदिक संस्कृत को जानने वाले आचार्य, राजनीतिशास्त्र के विद्वान, चिकित्साविज्ञानी, एंथ्रोपोलोजी के विशेषज्ञ और पुरातात्वविज्ञानी इतिहासकारों की एक टोली बनानी होगी। इस टोली को बना कर ही शोध करना होगा। तभी चीजें साफ होंगी।

 

सामान्यत: एक बात कही जाती है कि आज जो अनुसंधान हो चुके हैं, उन्हें ही हम अपने ग्रंथों में से ढूंढ कर दिखाते रहते हैं कि वेदों में या पुराणों में यह विज्ञान है। यदि उनमें वास्तव में विज्ञान का वर्णन है तो कोई नया मौलिक शोध क्यों नहीं करते जो कि आज का विज्ञान भी नहीं ढूंढ पाया है?

दो प्रकार के शोधार्थी होते हैं। एक मौलिक शोधार्थी होते हैं और दूसरे उपलब्ध सूत्रों पर अपने विचार प्रकट करते हैं। भारत में एक कमी आ गई है कि भारतीय विश्वविद्यालयों में 1970 की राजनीतिक स्थितियों पर ही शोध कराते हैं। क्या होना चाहिए के 300 पन्नों के शोध में 200 पन्नों में तो केवल क्या हुआ है यही लिखा होता है। यह भारतीय मानस की समस्या है। इसे दूर करना होगा। इस प्रवृत्ति को देश का युवा ही दूर कर सकता है। उन्हें यदि थोड़ा प्रोत्साहन दिया जाए तो वे इस बाधा को पार करके मौलिक शोध भी प्रस्तुत कर सकते हैं। ह्व