मानव सरोवर सर्वोत्कृष्ट आध्यात्मिक स्पन्दनों से युक्त परम पवित्र

पुनीत मानसरोवर :मानव सरोवर सर्वोत्कृष्ट आध्यात्मिक स्पन्दनों से युक्त परम पवित्र सर्वप्रसिद्ध अति प्रचीन गरिमामय एवम् मनमोहक सरोवरराज है। एस सी बर्नाड ने लिखा है, च्भूगोल जगत् के सर्वप्रथम ज्ञात सरोवर में मानसरोवर ही सर्वप्रथम है। हिंदू पुराणों में भी मानसरोवर अति प्रसिद्व है। जिनेवा सरोवर के प्रति किसी सभ्य मनुष्य के ह्दय में प्रशंसा के भाव उठने के कई शताब्दी पहले ही यह सरोवर अलौकिक प्रसिद्धि प्राप्त कर चुका था। इतिहास के प्रादुर्भाव के पहले ही यह परम पुनीत सरोवर ंबन चुका था और चालीस लाख वर्षों से अब तक वैसा ही रहता चला आया है।ज्
यह मानसरोवर गंभीर और प्रशांतभाव से दो महान रजतमय पर्वतों के बीच में जडे हुए महोज्जवल नीलमणि या पिरोजा पत्थर की भाँति उत्तर में श्री कैलास और दक्षिण में गुरला मांधातर पश्चिम में रावणहृद और पूर्व में कई छोटी पहाडिय़ों के मध्य में अवस्थित है।
इसका तरंग-पूर्ण वक्षस्थल अस्तकालीन सूर्य की प्रोज्वल स्वर्ण रश्मियों और सान्ध्य आकाश के आनंददायक चित्र-विचित्र रंगों को प्रतिबिंबित करता हुआ तथा तरंगरहित प्रशांत निर्मल नीलोदक का तल उदयकालीन सूर्य की रश्मियों एवम् पूणर््िामा के चन्द्रमा की रजत किरणों की प्रतिबिम्बित करता हुआ अपनी अलौकिक प्रतिभा, शोभा तथा सम्मोहक सौंदर्य को वह मानसरोवर तन्मय करनेवाले अपने उच्चकोटि के आध्यात्मिक स्पंदनों से चंचल से भी चंचल मन को एकाग्र कर देता है तथा अपने साथ लय मिला सकनेवालों को अनायास ही तन्मय और समाधिस्थ कर देता है। इसी कारण लाखों की संख्या में न केवल भारतवासी प्रत्युत अन्य प्राच्य और पाश्चात्य देशों के निवासी भी इस पुनीत मानसरोवर के दर्शन के लिये लालायित रहते हैं। समुद्रतल से 14650 फीट की स्वर्गीय ऊॅचाई पर 54 मील की विशाल विस्तार 200 वर्गमीलों में साम्राज्य वैभव के साथ तिब्बती अधित्यका रूपी एक विस्तृत पालने में फैला हुआ है। इसके पवित्र तट पर आठ बौद्ध मठ हैं जिनमें भिक्षु लोग जीवनपर्यंत निर्वाण प्राप्ति के लिये प्रयत्न करते रहते हैं। मानसरोवर के महत्व को पूर्णरूप से जानने एवम् उसके सौंदर्य को देख कर आनंद लूटने के लिये कम से कम सरोवर के तीर पर बारह महीने निवास करना चाहिये। जिन्होने मानसरोवर को एक बार भी नहीं देखा है, उनके लिये प्रत्येक ऋतु में होने वाले परिवर्तनों को निकट में रहकर देखनेवालों के आनंद की कल्पना करना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है। तथापि शीतकाल में सरोवर के जमते समय एवम् बंसत में पिघलते समय स्वच्छ नीलोदक के रूप में उसका दृश्य सचमुच अद्वितीय और रोमंाचोत्पादक होता है।
बहुधा सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य तो वर्णनातीत होते है। कुशल चित्रकार अपने चित्रों से या भावुक कवि अपनी भावमयी कविता से सौंदर्य का केवल आंशिक वर्णन करने में समर्थ हो सकता है। इन अपार सांैदर्य से मुग्ध होकर अपने अपार आनंद की अनुभूति को अल्प योग्यता द्वारा व्यक्त करने का प्रयास मात्र गं्रथकार का उद्देश्य है।