उत्तम संतान भारतीय विज्ञान

aआयुर्वेद ने हमेशा से ही बहुप्रजा से सुप्रजा यानी कि ढेरों संतान से उत्तम संतान को महत्व दिया है तथा इसकी प्राप्ति के लिये विभिन्न विधि, नियमों का वर्णन किया है जिससे गर्भविकृति कम होकर अच्छी सुदृढ़ संतान उत्पन्न हो। इन सब का पालन अगर किया जाये तो केवल आपकी संतान ही नहीं, सारा समाज, सारा देश गुणसंपन्न व्यक्तियों से भरा-पूरा और स्वस्थ रहेगा, तथा हमारी अगली पीढिय़ां भी उत्तम ही होंगी।
इक्कीसवी सदी हमारे लिये आधुनिकता के साथ साथ स्वास्थ्य की कई गंभीर समस्याएँ भी बटोर लाई है। उसमें मुख्यत: दो गंभीर समस्याएँ है जिसका परिणाम आगे चलकर अगली पीढ़ी में भी उतर आता है। पहली समस्या है गर्भ की जन्मजात स्वास्थ्य समस्याएं जो लगभग 3 से 5 प्रतिशत नवजात शिशुओं में पाये जाते है। इसका मूलकारण है बीजदोष यानी कि पुरूष के शुक्र यानी कि वीर्य का कमजोर होना। कई प्रकार की व्याधियां जैसे कि कैंसर (जिसमें से15 प्रतिशत कैंसर के मामलों मेंं आनुवांशिकता कारण दिखाई देता है), मधुमेह, हृदय रोग, संधिवात, आमवात और अन्य कई रोगों में बीजदोष मुख्य कारक है।
दूसरी गंभीर समस्या है बंध्यत्व या बांझपन। यह तो अब आधुनिक स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ भी मानने लगे हैं कि देर से शादी देश में बांझपन की बड़ी वजह बनती जा रही है। महिलाओं द्वारा खुद के पैर पर खड़ा होना, आर्थिक संबल और कामकाजी होने की वजह से अब महिलाएं 30 वर्ष की उम्र के बाद शादी को प्राथमिकता देने लगी हैं, जिससे उनके लिए कई तरह की समस्याएं पैदा हो रही हैं। इसमें स्तन कैंसर से लेकर बांझपन तक की समस्याएं शामिल हैं। करियर बनाने और पढ़ाई के चलते ज्यादातर युवतियॉं देर से शादी करना पसंद करती हैं। देर से शादी होने से गर्भाधान में भी देरी होती है, जिससे स्त्री और बच्चों दोनों को कई समस्याएँ होती है।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के विशेषज्ञों के अनुसार देर से शादी की वजह से पुरुषों की प्रजनन शक्ति या कहें शुक्राणु कमजोर पडऩे लगते हैं और उसमें गति भी नहीं रह जाती है, जिससे गर्भ ठहरने में बाधा और कमजोर बच्चों की पैदाइश एक बड़़ी समस्या है। 25 के बाद ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती जाती है त्यों-त्यों बच्चे पैदा होने की संभावना घटती चली जाती है। अधिक उम्र में शादी बांझपन का बहुत बड़ा खतरा बन कर सामने आ रही है। इससे गर्भ में ठहरे बच्चे में जीन संबंधी विकृतियाँ ज्यादा होने लगी हैं। साथ ही देर से हुई शादी में गर्भ में ठहरे बच्चे के गिरने का खतरा भी बहुत अधिक रहता है। टेस्ट ट्यूब बेबी विशेषज्ञों के पास देर से शादी करने वाले दंपत्ति ही अधिक पहुँच रहे हैं। दिल्ली के एक टेस्ट ट्यूब बेबी सेंटर के क्लिनिकल शोध में इसकी बहुत हद तक पुष्टि हुई है। क्लिनिक में बच्चे की चाहत लेकर पहुंचने वाले दंपत्तियों में से 35 से 40 फीसदी पुरूषों के वीर्य में शुक्राणुओं की मात्रा कम पाई गई है। इनके शुक्राणुओं की क्षमता में 30 फीसदी तक कमी देखी गई। इनमें अधिकांश ऐसे पुरूष हैं जो बीपीओ, कॉल सेंटर, मार्केटिंग, मेडिकल रिप्रजेंटेटिव और जनसंपर्क के क्षेत्र में काम करने वाले लोग हैं।
हालांकि, बंध्यत्व जैसी वैश्विक समस्या का आधुनिक चिकित्सा प्रणाली ने भी कुछ हद तक उपाय खोज लिया है, जैसे कि आइ बी एफ , आइ सी एफ इत्यादि। इन्ही तकनीकों का सहारा लेकर विश्व में बहुत सारे टेस्ट ट्यूब बेबियों का जन्म हो रहा है। यह भी एक तथ्य है कि टेस्ट ट्यूब बेबी विशेषज्ञों के पास देर से शादी करने वाले दंपत्ति ही अधिक पहुँच रहे हैं। हालाँकि टेस्ट ट्यूब बेबी के लिए भी अधिक उम्र में हुई शादी अनुकूल साबित नहीं हो रही है। परंतु ये टेस्ट ट्यूब बेबियाँ भी क्या ठीक हैं? क्या इनसे मनुष्य का काम चल सकता है? हाल ही में हुए शोधों से पता चलता है कि इस तरह से जन्मे बच्चों की प्रजनन क्षमता प्राय: कम रहती है। साथ ही उनको मैटेबोलीक असंतुलन जैसे कि मधुमेह, उच्च रक्तचाप तथा अस्थमा जैसी बीमारियाँ होने की आशंका अधिक होती है। हमने नपुंसकता जैसी समस्या पर कुछ हद तक विजय तो पा लिया, लेकिन क्या ऐसी अस्वस्थ पीढ़ी को जन्म देना उचित है? क्या हम आयुर्वेद का जो उद्दीष्ट है सुप्रजा यानी कि उत्तम संतति का निर्माण, उसे कोसों दूर तो नहीं छोड़ आये हैं?
आइए, इन सभी गंभीर सवालों का उत्तर प्राचीन आयुर्वेद शास्त्र में खोजने की कोशिश करते है। आयुर्वेद के दो ही प्रयोजन हैं-
1. स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम्
2. आनुरस्य विकार प्रशमनम्
आयुर्वेद में स्वस्थ शब्द की व्याख्या बहुत ही व्यापक रूप से की गई है। आयुर्वेद के अनुसार जिसके दोष, धातु, मल तथा अग्नि प्राकृत स्थिति में हो, जिसकी आत्मा, इंद्रिय और मन प्रसन्न हो और जो अपनी इंद्रियों से अर्थों का उचित रूप में ग्रहण करने में समर्थ हो, वही स्वस्थ कहलाता है। जब सुप्रजा यानी कि उत्तम संतान की बात होती है, तब स्वस्थ की यही व्याख्या आयुर्वेद में मानी जाती है। इसके साथ ही सुगठित शरीर, रूपवान, सात्विक वृत्ति, दीर्घायु, आरोग्य तथा संततियुक्त होना आदि उत्तम संतति के छह लक्षण बताये गए हैं। अगर इस प्रकार की उत्तम संतति की कामना की जाए तो विभिन्न संस्कार, गर्भिणी की उचित परिचर्या का पालन तथा विभिन्न औषधियों का सेवन करना आवश्यक हो जाता है।
आयुर्वेद में इन सभी बातों पर गहराई से प्रकाश डाला गया है। विवाह किससे और किस वय में करना चाहिए, इससे ही इसकी शुरुआत होती है। इसलिए संतान की इच्छा रखने वाले पुरुष को अपने से भिन्न गोत्र की स्त्री से (अतुल्य गोत्र) विवाह करना चाहिए। समान गोत्र में उत्पन्न संतान की बुद्धि बल, आयु उत्तम नहीं होती। पुत्रोत्पत्ति के लिए सबसे उत्तम वय स्त्री के लिए सोलह से इक्कीस वर्ष तथा पुरुष के लिए बीस से अठ्ठाईस वर्ष है।
आयुर्वेद ने चार गर्भोत्पादक भाव बताये है।
1. ऋतु – स्त्री का ऋतुकाल
2. क्षेत्र – स्त्री का गर्भाशय
3. अम्बू – गर्भ का पोषण करने वाला उत्तम अन्नरस
4. बीज – शुद्ध शुक्र (पुरुष बीज) और शुद्ध आर्तव (स्त्री बीज)
शुद्ध शुक्र तथा शुद्ध आर्तव के साथ साथ अन्य 3 कारकों का भी उतना ही महत्व है। ये चारों घटक जब प्राकृत अवस्था में योग्य समय पर एकत्रित हो जाते है तो निश्चित ही गर्भोत्पत्ति होती है।
ऋतु याने स्त्री का गर्भधारण योग्य काल रजोदर्शन के पहिले तीन दिनों को छोड़कर चौथे दिन से अगले बारहवें दिन तक माना गया है। बाकी दिनों में गर्भाधान की संभावना कम ही रहती है।
इसी ऋतुकाल में जब सक्षम और स्वस्थ बीजों का संयोग होकर वह गर्भाशय में संस्थापित होगा तो उपरोक्त छह गुणों से युक्त गर्भ विकसित होगा। गर्भ वास्तव में छह भावों से बनता है। ये छह भाव हैं, मातृज, पितृज, आत्मज, रसज, सात्म्यज और सत्वज। इन सभी छह भावों का प्राकृतावस्था में होना स्वस्थ तथा गुणवान संतान होने के लिए आवश्यक है। प्रशस्त बीज (स्त्री/पुरुष दोनों के), सात्विक आहार- विहार, सात्विक आत्मा और सात्विक मन, ये उत्तम संतान के लिए आवश्यक घटक है। ये भाव कहीं ना कहीं गर्भ के अंग-प्रत्यंग निर्माण (मातृज तथा पितृज भाव), उसके मानस प्रकृति (सत्वज,रसायन भाव) तथा उसकी कार्यक्षमता (रसज, आत्मज, सात्म्यज भाव) पर अपना प्रभाव डालते हैं। इन सारे भावों को आयुर्वेद में वर्णित चिकित्सा तथा आहार-विहार व गार्भिणी परिचर्या आदि से हम और भी उत्कृष्ट बना सकते हैं।
शुद्ध उत्तम स्त्री व पुरुष बीज के साथ ही गर्भ के लिए हितकर वातावरण तथा माता और पिता से खास कर माता (गर्भिणी में) अपेक्षित मानासिक तथा शारीरिक बदलाव हम आयुर्वेदिक चिकित्सा से ला सकते है।
इसलिए गर्भाधान से पहले शोधन की आवश्यकता बताई गई है। कुछ कुलकी आनुवांसिक व्याधियां माता-पिता के आनुवांशिक दोषों के कारण होती है। आधुनिक विज्ञान ने इन विकारों का कारण माता-पिता के गुणसूत्रों में रचनात्मक विकृति बताया है। यह बात सच है कि बीज, आत्मकर्म, आशय, काल तथा तथा आहार के विपरीत होने से गर्भ में विकृति आ जाती है। पंचकर्म शोधन चिकित्सा से इन विकृत गुणसूत्रों का अगले पीढ़ी में संक्रमण होना हम रोक सकते है। पंचकर्म चिकित्सा गुणसूत्रों के दोष को सुधारने करने का काम करती है। धातुओं को विशुद्ध करके बीज की गतिशीलता को बढ़ाने का काम शोधन से होता है। इसलिए गर्भाधान संस्कार से पहले वमन, विरेचन, बस्ति, नस्य तथा रक्तमोक्षण ये पांचों उपक्रमों द्वारा शरीर का शोधन करना आवश्यक है।
शरीर शोधन के पश्चात प्रशस्त धातु यानी कि उत्तम वीर्य की उत्पत्ति के लिए रसायन चिकित्सा जरुरी है। इसलिए त्रिफला, हरड़, अश्वगंधा, बला जैसे रसायन द्रव्यों के सेवन से सप्त धातु पोषण और उत्तम शुक्र की प्राप्ति होगी। शोधन तथा रसायन चिकित्सा के पश्चात् जब पति-पत्नी गर्भ की इच्छा से प्रेरित होकर संकल्प करके पवित्र अंलकरण से शुभ तिथि पर शुभ नक्षत्र पर सहवास करें तो गर्भाधान व गर्भस्थापन हो जाता है। इन उपायों से माता का सात्विक बल बढ़ता है जिसका असर होनेवाली संतति पर भी होने से गर्भ में भी सत्व गुण की उत्तम अभिव्यक्ति होने लगती है, उसमें सात्विक गुण उभर आते है। गर्भाधान के पश्चात गर्भिणी परिचर्या में बताए हुए आहार विहार का पालन करना चाहिए।
गर्भिणी आहार
गर्भ रसज भी है। गर्भ की वृद्धि, उसके बल, वर्ण, बुद्धि, स्थिति, वृत्ती ये सभी रसज भाव हैं। रस यानी आहार रस। गर्भिणी जो आहार लेती है, उसके आहार-रस से गर्भ का पोषण होता है। गर्भिणी के योग्य आहार से गर्भ के सप्तधातु का पोषण अच्छा होता है। गर्भिणी परिचर्या में वर्णित सुपाच्य, मधुर, शीतल दूध, घृत, दही युक्त आहार तथा शतावरी, गोक्षुर आदि विशिष्ट औषधियों से सिद्ध यवागु (दलिया) के सेवन से गर्भ का शारिरिक तथा मानसिक पोषण होता है। पोषक आहार से कुपोषण से होने वाली जन्मजात विकृतियां उत्पन्न नहीं होती। इसी के साथ गर्भिणी को अति अम्ल, अति मधूर, लवण कटु, तिक्त तथा कसाय रसों का सेवन करने से मना किया गया है। इनके सेवन से गर्भ में विभिन्न विकृतियां उत्पन्न होती है।
गर्भ में सत्व गुण की वृद्धि
गर्भ का सत्व तीन कारकों पर निर्भर है।
1. गर्भ के माता पिता के सत्वपर
2. गर्भिणी के आसपास के परिस्थिती पर
3. गर्भिणी के आहार विहार पर
गर्भाधान के पहले तथा उसके पश्चात् भी गर्भ में हृदय की उत्पत्ति होती है। पांचवे तथा छठे महीने में गर्भ में बुद्धि तथा इद्रियों का विकास होता है। तब गर्भ संवेदना को महसूस कर सकता है, सुन सकता है। गर्भिणी को इस समय अच्छी बातों व अच्छे शाों को सुनना चाहिए तथा सौमनस्य अवस्था में रहना चाहिए। सौमनस्य याने शांत या पवित्र अवस्था में रहना गर्भधारण की सभी औषधियों तथा कर्मों में श्रेष्ठ माना गया है।
इसके विपरीत अशांत, चिंताग्रस्त रहना, अपवित्र वातावरण यानी दौमनस्य में रहना गर्भ के लिए हानिकारक है। इसलिए इस अवस्था में गर्भसंस्कार मंत्रोंच्चारण का इसी 4 महिने में दौहद्र उत्पन्न होते है। गर्भ में चेतना जागृत होने गर्भ इच्छाएं प्रकट करता है। इन दौहृदो को दबाने से गर्भ तथा माता के सत्व में विकृति उत्पन्न हो सकती है। ये दौहृद गर्भ के लिए उपयुक्त रहता है। इस प्रकार यथोचित पोषण से गर्भ की संपूर्ण वृद्धि होने के पश्चात योग्य समय पर गर्भ का निष्क्रमण यानी प्रसव होता है।
प्रसव पश्चात् गर्भ परिचर्या
इस प्रकार गर्भ के जन्म पश्चात् भी उसकी रोगप्रतिकार क्षमता बढ़ाने के लिए तथा उसके बल व मेधावर्धन के लिए मधु तथा घृत के साथ सुवर्ण चूर्ण का प्राशन कराने के लिए कहा है। इसके साथ संतति के आयुष्य धारणाशक्ति शरीर बल तथा बुद्धिवर्धन के लिए क्रमश: निम्न योग दिये जाते हैं। इनमें हर एक योग उन उन भावों की वृद्धि करता है।
1. सुवर्ण चूर्ण, कोष्ठ, मधु, वच
2. ब्राह्मी, शंखपुष्पी, मधु, घृत व सुवर्ण चूर्ण
3. शंखपुष्पी, मधु, घृत, सुवर्णचूर्ण व वच
4. सुवर्णचूर्ण, कड़ीपत्ता, श्रवेतदूर्वा, मधु और घृत
इनसे संतति में उत्तम गुण, उत्तम बल, उत्तम मेधा तथा उत्तम बुद्धि का विकास होता है। इस तरह आयुर्वेद ने सर्वदा बहुप्रजा से सुप्रजा यानी कि ढेरों संतान से उत्तम संतान ेको महत्व दिया है तथा इसकी प्राप्ति के लिये विभिन्न विधि नियमों का वर्णन किया है जिससे गर्भविकृति का प्रमाण कम होकर अच्छी सुदृढ़ संतान उत्पन्न हो।
इन सब का पालन अगर किया जाये तो केवल आपकी संतान ही नहीं, सारा समाज, सारा देश गुणसंपन्न व्यक्तियों से भरा-पूरा और स्वस्थ रहेगा, तथा हमारी अगली पीढ़ीयां भी उत्तम ही होगीं।