उत्तम संतति में सहायक है वास्तु का ज्ञान

भारत में अग्रणी वास्तु विशेषज्ञ के रूप में विख्यात वास्तुशास्त्री खुशदीप बंसल पंजाब के रहने वाले हैं। 1989 में इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग की पढ़ाई करते समय उन्हें ध्यान में आया कि कुछ उपकरण प्रयोगशाला के एक खास कोने में पूरी तरह से काम करते हैं, जबकि विपरीत कोने में वे बिल्कुल काम नहीं करते। इस प्रकार, मानव मन और मशीनों पर अंतरिक्ष और पृथ्वी निर्मित ऊर्जा के प्रभाव में उनकी रुचि पैदा हुई। 1992 में, संयुक्त राज्य अमेरिका में एक आकर्षक सॉफ्टवेयर कंपनी में नौकरी करने की बजाय, वे मध्य भारत में एक गुरुकुल में प्रामाणिक तरीके में वास्तुशास्त्र को पढऩे के लिए चले गए। गुरुकुल में उन्होंने वास्तु में अपने सहज कौशल को और निखारने के साथ-साथ सांख्य योग और ज्योतिष का अतिरिक्त ज्ञान भी प्राप्त किया। सांख्य योग आयुर्वेद, योग और वास्तुशास्त्र का आधार है। भारतीय विज्ञान और इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग के ज्ञान के साथ श्री खुशदीप ने इमारतों में राजनीतिक शक्तियों की वृद्धि और गिरावट तथा व्यापारिक घरानों की विकास और विफलताओं के पीछे के रहस्यों की खोज शुरू कर दी। संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप में गहन शोध करने के कारण उन्होंने यह पता लगा लिया था कि पृथ्वी ऊर्जा और अंतरिक्ष के किस प्रकार के संयोजन के कारण ये राजनीतिक और व्यापार की दृष्टि से इतने शक्तिशाली देश बन गए हैं। 1997 में श्री खुशदीप ने भारतीय संसद भवन में में नए बने पुस्तकालय भवन में एक महत्वपूर्ण वास्तु दोष ढूंढ निकाला। उस दोष के कारण भारत सरकार निरंतर अस्थिर हो रही थी। इस दोष को बाद में ठीक किया गया। श्री खुशदीप ने 10,000 से प्रायोगिक महावास्तु के मामलों का अध्ययन प्रलेखित किया है और इसके परिणामों के आधार पर वैज्ञानिक महावास्तु प्रक्रिया विकसित किया है। वास्तु शास्त्र के वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए और वास्तु प्रक्रिया के मानकीकरण के लिए, 2001 में बुंदेलखंड विश्वविद्यालय ने उन्हें विज्ञान में डाक्टरेट की मानद डिग्री से सम्मानित किया है। संप्रति वे वरिष्ठ महावास्तु सलाहकारों, आर्किटेक्टों, इंटीरियर डिजाइनरों और प्रबंधन विशेषज्ञों की एक टीम के साथ कार्यरत हैं। खुशदीप बंसल से भारतीय धरोहर के सह संपादक रवि शंकर ने उत्तम संतान के निर्माण में वास्तु की भूमिका पर बातचीत की। प्रस्तुत है उसके प्रमुख अंश

घर में अच्छी संतान का जन्म हो, इसमें घर के वास्तु की क्या भूमिका है?
अच्छी संतान के लिए वास्तुशास्त्र में काफी स्पष्ट निर्देश मिलते हैं। परंतु मैं इस बात को मूल से शुरू करना चाहूंगा। वास्तुशास्त्र मूल रूप से प्रारंभ में केवल मंदिरों और राजाओं के महलों में प्रयुक्त होता था। वहां कोई बंधन नहीं होता था। राजा को घर बनाना हो तो साधनों की क्या कठिनाई हो सकती थी। पुराने समय में यह जरूरी था कि राजा के घर जो संतान हो वह उसका योग्य उत्तराधिकारी बन सके। इसलिए यह सारा ज्ञान वहां तक सीमित रहा। आम आदमी तक ये बातें पहुंची ही नहीं। वास्तु के अनुसार पितरों का पक्ष मजबूत होने से ही वंश वृद्धि संभव है, अन्यथा नहीं। ज्योतीषीय दृष्टि से भी वहीं से सारी बात शुरू होती है कि अगर पितृ दोष है तो वंश वृद्धि नहीं होगी। मेडिकली सभी चीजें सही होने के बाद भी संतान नहीं होती है। वास्तु में दक्षिण-पश्चिम दिशा पितरों की मानी गई है। अत: यदि अच्छी संतान चाहिए तो दक्षिण-पश्चिम को सुरक्षित करना होगा। सुरक्षित करने का अर्थ है कि घर का वह हिस्सा कटा हुआ, धंसा हुआ, दबा हुआ या बढ़ा हुआ न हो। वहां शौचालय न हो, रसोई न हो। पितृ स्थान की जो व्यक्ति प्रयत्नपूर्वक रक्षा करता है, उसकी हमेशा वंश वृद्धि होती है।
इस दिशा के अलावा कुछ द्वार की स्थितियां बताई गई हैं।अगर दरवाजा किसी कोण विशेष और दिशा विशेष में होगा तो पुत्ररत्न की प्राप्ति होगी, ऐसा वास्तुशास्त्र में वर्णन पाया जाता है। इसके अतिरिक्त शयन कक्ष की भी दिशा निश्चित की गई है। उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम किसी भी दिशा में शयन कक्ष हो सकता है परंतु प्रत्येक दिशा में उसके कुछ अंश यानी कि उपदिशाओं का निषेध है कि वहां शयन कक्ष नहीं होना चाहिए। सामान्यत: चार दिशाएं हैं और चार ही उपदिशाएं (चार कोणों में) मानी गईं हैं। परंतु वास्तु में इन आठ दिशाओं को भी सोलह दिशाओं में बांटा गया है। ऐसी ही कुछ उपदिशाओं के बारे में निर्देश है कि यदि वहां शयन कक्ष होगा तो संतति में बाधा होगी।
क्या आपने ऐसे निर्देशों का प्रत्यक्ष अनुभव भी किया है? क्या इस पर कोई शोध या अनुसंधान हुआ है कि वास्तव में आज ऐसा पाया जाता है कि नहीं?
बिल्कुल। इसमें हमने प्रायोगिक रूप से देखा है कि दक्षिण-पश्चिम और दक्षिण के बीच की दिशा में शयन कक्ष होने पर लगातार गर्भापात होता है। तो दक्षिण-दक्षिण-पश्चिम दिशा में शयन कक्ष या लगातार बैठने का स्थान नहीं होना चाहिए। इसी प्रकार हमने एक नवीनतम शोध में पाया है कि जिन घरों की रसोई में ग्रेनाइट पत्थर लगा होता है और यदि गृहिणी स्वयं खाना बनाती हो, तो उसे समस्या होती है। हमने यह पाया है कि ग्रेनाइट पत्थर पर चूल्हा रखने पर उसकी क्वाट्र्ज संरचना के कारण स्त्रियों के पेड़ू की मांसपेशियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और उस कारण से गर्भ नहीं ठहरता। यह हमारे द्वारा किए गए नवीनतम शोध से पता चला है।
संतान होने के अलावा क्या वास्तु में होने वाली संतान के गुणों को संवर्धित करने के भी उपाय बताए गए हैं?
हां बिल्कुल। होने वाली संतान कैसी होगी, उसका मन कितना विकसित होगा, इन सब विषयों पर भी वास्तुशास्त्र के ग्रंथ अनेक निर्देश देते हैं। जैसे यदि माता-पिता का शयन कक्ष दक्षिण दिशा में हो और वहीं गर्भाधान हुआ हो तो बच्चा वात रोग से ही पीडि़त होगा। उसे पित्त के रोग नहीं होंगे। इसी प्रकार यदि गर्भाधान और उसके बाद माता उत्तर दिशा के कमरे में सोती रही हो तो बच्चे को पित्त के रोग ही होंगे। तो होने वाले बच्चे को कौन से रोग होंगे और उसका मानसिक विकास कैसा होगा, यह दिशाओं के आधार पर वास्तु में बताया गया है। इसी के तहत एक और बात बताई गई है कि सामान्य प्रसव के लिए आखिरी तीन महीने में गर्भवती स्त्री को दक्षिण-पश्चिम में सोना चाहिए।
मैंने इसका प्रयोग अपने घर में करके देखा है। मेरी चाची जब गर्भवती थीं तो डाक्टर ने कुछ जटिलता बताई थी और कहा था कि ऑपरेशन करना पड़ेगा। वे उस समय उत्तर दिशा में सोती थीं। मैंने उन्हें दक्षिण-पश्चिम में सोने के लिए कहा। वे वहां सोने लगीं और दिनोंदिन उनकी स्थिति में सुधार होने लगा। बाद में प्रसव भी सामान्य हुआ। परंतु वो बच्चा काफी दिनों तक गैस से पीडि़त रहा। इसी प्रकार मेरी अपनी पत्नी को सातवें महीने में ही प्रसव कराने की स्थिति आ गई थी। लगातार ब्लीडिंग हो रही थी। वह वो दिन था जिस दिन पूरे देश में गणेशजी दूध पी रहे थे। नागपुर होने के कारण सभी इसमें व्यस्त थे। हम काफी घबरा गए थे। डाक्टर ने भी जवाब दे दिया था। ऐसे में पत्नी ने मुझे कुछ उपाय करने को कहा। तब मैंने सोचना शुरू किया। मैंने देखा कि पत्नी अस्पताल के जिस कमरे में भरती थी, वह पूरब में था। मैंने आग्रह करके उसे दक्षिण-पश्चिम के कमरे में उसे स्थानांतरित करवाया। उस कमरे में जाते ही ब्लीडिंग बंद हो गई। बाद में प्रसव भी सामान्य हुआ। इसलिए मैं कह सकता हूँ कि यह एक प्रत्यक्ष विज्ञान है।
जैसा कि आपने बताया कि वास्तु पहले महलों और मंदिरों में प्रयोग होता था जहां असीमित साधन व जमीन हुआ करता था। ऐसे में आज के नगरीय व महानगरीय जीवन जहां लोग 25-50 गज के छोटे-छोटे मकानों में रहने के लिए विवश हैं, में वास्तु कितना उपयोगी है?
मैंने तो 10-10 गज के भी घरों में लोगों को रहते देखा है। इसलिए हमने वास्तुशास्त्र के नियमों को निर्धारित करने वाले तर्कों को समझने की कोशिश की। हमने इस पर अधिक शोध किया कि यदि यह कहा गया है कि दक्षिण-पूरब में ही रसोई होनी चाहिए तो क्यों? अपनी पुस्तक एलकेमी की 45 शक्तियां में मैंने वास्तुशास्त्र के नियमों के आधार की व्याख्या की है। जब आप उन तर्कों को जान लेते हैं तो फिर स्थान की बाध्याताएं समाप्त हो जाती हैं। स्थान छोटा हो तो भी उसके उपाय उन तर्कों के आधार पर किए जा सकते हैं। अब घर छोटा हो या बड़ा आप वास्तु का पूरा लाभ ले सकते हैं। हमने हजारों घरों में इनका प्रयोग किया है और लोगों को लाभ हुआ है।
क्या इसे एक उदाहरण से समझाएंगे। जैसे कहा है कि आग्नेय दिशा यानी कि दक्षिण-पूरब में देवताओं का स्थान नहीं होना चाहिए। इसके पीछे क्या कारण है?
ऐसा तो कहीं कहा ही नहीं गया है। आग्नेय में रसोई होना चाहिए और इशान में देवताओं का स्थान होना चाहिए, यह कहा है। अब हमने यह जानने की कोशिश की कि ऐसा विधान क्यों हैं। देखिए पंचतत्व अलग-अलग दिशाओं में रहते हैं। जैसे ही कोई स्थान घेरा जाता है, कोई घर बनता है, प्राकृतिक रूप से पंचतत्व अपने-अपने स्थानों में स्थित हो जाते हैं। वे सूक्ष्म रूप में होते हैं। उनका स्थूल रूप नहीं होता यानी कि जल तत्व स्थित है तो बिना कुंआ बनाए वहां से पानी भर लाएंगे, ऐसा नहीं है। परंतु उनका गुणधर्म वहां स्थित होता है। मेरे गुरूजी कहा करते हैं कि ये अनुभूतसंज्ञक होते हैं। अनुभव किए जाते हैं। जैसे कि लौंग की तासीर गर्म होती है, यह कैसे पता चलता है? रासायनिक दृष्टि से तो इसे व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। तासीर अनुभव होती है पर रसायनशास्त्र तो तासीर नहीं बताता। वास्तव में तासीर किसी भी पदार्थ का सूक्ष्म गुण है जिसका आधुनिक रसायनशास्त्र अध्ययन नहीं कर सकता। ये बातें निघंटु में लिखी हैं, परंतु निघंटु ने इसका निर्धारण कैसे किया? इन सूक्ष्म गुणों का निर्धारण भारतीय ऋषियों ने कैसे किया, इस पर हमने शोध किया और पता लगाया।
इन तत्वों की प्राकृतिक स्थापना के आधार पर घर में कौन सी चीज कहां होनी चाहिए, यह निश्चित किया जाता है। वास्तु के नियम इसी आधार पर बने हुए हैं। दक्षिण-पूर्व दिशा में अग्नि तत्व स्थित होता है, इसलिए वहां रसोई होनी चाहिए। अग्नि की जगह अग्नि से संबंधित, जल की जगह जल से संबंधित, वायु की जगह वायु से संबंधित गतिविधियां हों तो प्रकृति के साथ सामंजस्य बैठ जाता है और उससे लाभ होता है। सही तत्व की दिशा में उससे संबंधित वस्तु या गतिविधि का होना संतुलन स्थापित करता है।
यदि किसी कारण से ऐसा करना संभव नहीं हो तो फिर क्या करना चाहिए?
हमने इसका समाधान ढूंढा है और उसका आधार बिल्कुल वही है जो आयुर्वेद में निदान का है। आयुर्वेद में जो विधि बताई है, हम उसका ही पालन करते हैं। जैसे कि आयुर्वेद सबसे पहले लक्षणों की बात करता है। फिर उसका निदान और फिर उसकी औषधि। इसी प्रकार हमने वास्तु में विधि विकसित की। पहले समस्या का अध्ययन करते हैं। फिर उस समस्या से संबंधित दिशा पहचानी जाती है। फिर उस दिशा में उसके लक्षण मिलते हैं। उसके उपाय किए जाते हैं। उदाहरण के लिए मान लीजिए एक व्यक्ति कहता है कि उसका मन स्थिर नहीं है, विचलित है, तो केवल उत्तर-पूर्व को देखना होता है। वहां क्या रखा है, यह व्यक्तिगत बातचीत से पता चल जाता है। यदि वह कहता है कि उसका मन अव्यवस्थित है, ढेर सारे विचार आते रहते हैं तो हम उसे कहते हैं कि आपके उत्तर-पूर्व में ढेर सारी पत्रिकाएं और पुराने अखबार रखे हैं। उन्हें हटा दो और फिर बताओ। वे उसे हटाते हैं और फिर बताते हैं कि मन एकदम निर्मल हो गया।
हम इसका प्रशिक्षण भी देते हैं तो यही कहते हैं कि कौन सी चीज गलत रखी है, यह सोचने की बजाय केवल समस्या पर ध्यान दो। कोई भवन क्या भाव दे रहा है, यह व्यक्ति की बातचीत से पता चलेगा। फिर उससे संबंधित दिशा में जाएं। वहां उससे संबंधित वस्तु रखिए। एक और उदाहरण है। एक माँ ने कहा कि बच्चे का पढऩे में मन नहीं लगता। क्यों नहीं लगता, यह पता नहीं। मैंने पूछा कि जब वो पढऩे बैठता है तो दिमाग में क्या आता है? खेलना-कूदना आता है, टीवी आता है, इंटरनेट आता है, वीडियो गेम आते हैं, कामिक्स आते हैं, क्या आता है? कुछ तो आता होगा न। मस्तिष्क खाली तो रह नहीं सकता। माँ ने इनमें से कोई भी चीज कही तो हम उसे कहते हैं कि पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम में बच्चे के खेलने का सामान रखा है, उसको वहां से हटा कर बच्चे की किताबें रख दो। इसका कारण यह है कि जब वह पढऩे के लिए बैठता है, तो उसका मस्तिष्क अपने वातावरण से प्रभावित होता है। दिशा विशेष पढ़ाई में ध्यान लगाने में सहायक होती है। उस दिशा में जो भी चीज रखी होगी, पढ़ाई के समय बच्चे का ध्यान उसी ओर जाएगा। जब आप हजारों स्थानों पर इस प्रभाव को जांच लेते हैं तो यह नियम बन जाता है। मैं तो विदेशों में भी व्याख्यान दैता हूँ। वहां भी उन्हें कहता हूँ कि इन लक्षणों का मिलान कर लें और यदि यह सभी घरों में सही निकले तो यह विज्ञान है न? हम इसके पीछे के न्यूटोनियन सिद्धांतों को नहीं खोजेंगे। वह एक भिन्न दृष्टिकोण है। हमारा दृष्टिकोण अलग है। दोनों के आधार भी अलग हैं। इसके पूरे आधारों को जानना होगा, तभी आप इसे समझ पाएंगे। उनके आधारों में इसे व्याख्यायित करना तो ठीक नहीं होगा। मैंने इस पर काम किया है और आज मेरे पास तर्क भी है, डाटा भी है। मैं कुछ बताता हूँ तो आप उसे जांच लें। स्वयं देख लें। यह विशुद्ध विज्ञान है। इसमें एक प्रतिशत की भी गलती नहीं है। आधुनिक विज्ञान में तो कभी भी सौ प्रतिशत की बात नहीं कर सकते। हम सौ प्रतिशत की बात करते हैं।