जरूरी है,शिक्षा का भारतीयकरण

आज ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो काफी निष्ठापूर्वक शिक्षा के काम में जुटे हुए हैं, परंतु मैं साहसपूर्वक यह कहना चाहती हूं कि ऐसे सभी लोग वास्तव में यूरोपीय शिक्षा को ही मजबूत और दृढ़ कर रहे हैं। शिक्षा में आमूल-चूल परिवर्तन की बात की जाती है,

परंतु जबसे देश में शिक्षा का राष्ट्रीयकरण शुरू हुआ तबसे ही इस विषय पर दुविधा की स्थिति बनी हुई है। 1757 से 1857 के सौ वर्षों में अंग्रेजों का राज्य भली प्रकार से स्थापित हो गया था और उसी कालावधि में यूरोपीय शिक्षा भी स्थापित हो गई थी। इसी समय देश के यूरोपीकरण को प्रतिष्ठित करने के सफल प्रयास भी होते रहे। उसके बाद शिक्षा के राष्ट्रीयकरण के प्रयास शुरू हुए। 1866 में श्री अरविंद के नाना श्री राजनारायण वसु ने इस दिशा में जब कोशिशें शुरू की तब तक अंग्रेजी शिक्षा यहां दृढ़मूल हो गई थी। यानी अंग्रेजी शिक्षा के दृढ़मूल होने के बाद राजनारायण वसु, स्वामी दयानंद, श्रीअरविंद, स्वामी विवेकानंद, स्वामी श्रद्धानंद और आर्य समाज के सभी लोग और रवींद्रनाथ ठाकुर जैसे लोग शिक्षा के राष्ट्रीयकरण या भारतीयकरण का प्रयास करते रहे। आज भी शिक्षा के क्षेत्र में कई संगठन व व्यक्ति इस काम में लगे हुए हैं। परंतु यूरोप ने या अंग्रेज सरकार ने देश में जो बातें यूरोपीय वैशिष्ट्य के साथ स्थापित की थीं, इन सभी प्रयासों में उनको चुनौती देने का प्रयास नहीं किया जा रहा है।