स्वाभिमानी भारत समर्थ भारत

स्वाभिमानी भारत समर्थ भारत

कभी इंडिया शाइनिंग तो कभी भारत निर्माण जैसे नारों से भारत की विकासगाथा की कहानी देशवासियों को सुनाई जाती है। अति समृ़द्ध रहे प्राचीन भारत की छवि लोगों के मनों में अंकित कर दी जाए तो शायद इंडिया शाइनिंग और भारत निर्माण जैसे नारे भी समझ में आएं। भारत गांवों का देश है, जब तक गांव समृद्ध नहीं होता किसान समृद्ध नहीं होता, खेतों में काम करने वाले मजदूर समृद्ध नहीं होते, तब तक इन नारोंं का कोई मतलब नहीं रह जाता। भारत के प्राचीन ऋषि वैज्ञानिकों ने असली भारत की विकास गाथा लिख कर छोड़ी है जो हमारे किए का प्रमाण भी हैं और प्रेरणा का भी काम करती हैं। यहां के लोग तो इन प्रमाणों को स्वीकार करते हैं और अब यदा-कदा प्रेरणा भी प्राप्त करते हैं किन्तु सरकारों की उदासीनता के कारण प्राचीन आधारों का सहारा लेकर समृद्ध नहीं हो पा रहे हैं। गाय, गांव और गंगा यहां की विकास गाथा के किरदार रहे हैं। इन्हीं के कारण भारत की चमक दुनिया भर में देखी जाती थी। प्राचीन समृद्ध भारत के कारण दुनियाभर के व्यवसायी यहां अपना व्यापार चमकाने आते थे और सरकारों के द्वारा इन्ही को उपेक्षित किया जा रहा है। भारत में गाय का महत्व केवल जीवन को खुशहाल बनाने तक सीमित नही है, इससे आगे गाय को मोक्ष प्रदायिनी भी कहा गया है।
हम पहले विचार कर लें कि वह कौन सी आवश्यकताएं है जिनसे लोगों का जीवन स्तर बेहतर होता है, लोग सुखी और सम्पन्न होते हैं। भारत में कहावत है तन्दुरुस्ती हजार नियामत यानि स्वास्थ्य से बढ़कर कुछ भी नहीं। आयुर्वेदाचार्यों का मत है कि गाय के दूध और घी का सेवन अकेले ही सम्पूर्ण जीवन के स्वास्थ्य की गारंटी देता है। यदि दूध और घी भारतीय गाय का है तो मनुष्य स्वस्थ रहेगा, यह स्वाभाविक है। हजारों करोड़ों की औषधियों में होने वाला अनावश्यक व्यय भी नहीं होगा, साथ ही कार्यक्षमता बढऩे के कारण श्रम से होने वाला उत्पादन भी बढ़ेगा जो समाज और देश को समृद्ध बनाएगा। गाय के मूत्र और गोबर का अर्थशास्त्र भी व्यक्ति को समृद्ध बनाने की ओर इशारा करता है। रासायनिक खादों से बढ़ा हुआ कृषि उत्पादन अब कम होने लगा है। वह समय भी अब कभी भी आ सकता है जब खेतों में पर्याप्त उत्पादन न हो सके तब क्या होगा? उपाय एक ही है अधिक से अधिक गौ पालन। आज आवश्यकता है कि कृषकों को गोबर की खाद बनाने का प्रशिक्षण दिया जाए ताकि किसान अपने खेतों को पुन: उर्वर बना सकें। रासायनिक कीटनाशकों ने खेतों के कीड़े मारने के साथ लोगों के स्वास्थ्य का भी नाश किया है। बाजार से कीटनाशक खरीदने में होने वाले व्यय से किसान को बचाया जा सकता है।
भारत सरकार और राज्य सरकारें अपना मन बना लें कि किसान को खुशहाल बनाना है तो इसके लिए जरूरी है कि बीज, कीटनाशक रासायनिक खादों के लिए ऋण लेने वाले किसान ऋण मुक्त रहें, परम्परागत बीजों का सुधार और गोबर की खाद से हमेशा हमेशा के लिए भूमि उर्वर रहे और इसका एक ही रास्ता है कि भारत में गौवध बन्द हो ताकि भारतीय गायों को बचाया जा सके। गायों के दूध को बढ़ाने के प्रयास भी शासन के द्वारा हों। देश में गौविश्वविद्यालय स्थापित किए जाएं, जहां गोवंश आधारित तकनीकें विकसित की जाएं। क्षेत्रानुसार गोवंश नस्ल सुधार केंद्र खड़े किए जाएं। इन सब कामों के लिए रासायनिक खादों और डीजल पर दिए जाने वाले अनुदानों को बंद करके उसका पैसा खर्च किया जाना चाहिए। इससे गोवंश का जो विकास होगा, उससे कुछ ही समय में न तो रासायनिक खादों की जरूरत रह जाएगी और न ही कृषि के लिए डीजल की। इससे अनुदान का खर्च तो स्वत: ही बच जाएगा। खुशहाल देश का खुशहाल किसान का नारा ही देश को वैतरणी पार कराएगा।
भारत में कहावत है तन्दुरुस्ती हजार नियामत यानि स्वास्थ्य से बढ़कर कुछ भी नहीं। आयुर्वेदाचार्यों का मत है कि गाय के दूध और घी का सेवन अकेले ही सम्पूर्ण जीवन के स्वास्थ्य की गारंटी देता है। यदि दूध और घी भारतीय गाय का है तो मनुष्य स्वस्थ रहेगा, यह स्वाभाविक है। हजारों करोड़ों की औषधियों में होने वाला अनावश्यक व्यय भी नहीं होगा, साथ ही कार्यक्षमता बढऩे के कारण श्रम से होने वाला उत्पादन भी बढ़ेगा जो समाज और देश को समृद्ध बनाएगा। गाय के मूत्र और गोबर का अर्थशास्त्र भी व्यक्ति को समृद्ध बनाने की ओर इशारा करता है।