हिंद स्वराज हिन्दुस्तान की दशा

महात्मा गांधी


अंग्रेजी न्याय व्यवस्था में वकीलों की काफी अहम् भूमिका है। परंतु स्वयं वकील रहे महात्मा गांधी वकीलों को न्याय देने में बड़ा अवरोध मानते हैं। वे वकीलों को देश की गुलामी का एक कारण मानते हैं। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक हिन्द स्वराज में उन्होंने वकीलों से देश को मुक्त कराने की बात कही है। यहां प्रस्तुत है हिन्द स्वराज का वह अंश


पाठक : आप कहते हैं कि दो आदमी झगड़ें, तब उसका न्याय भी नहीं कराना चाहिये। यह तो आपने अजीब बात कहीं।

संपादक : इसे अजीब कहिये या दूसरा कोई विशेषण लगाइये, पर बात सही है। आपकी शंका हमें वकील-डाक्टरों की पहचान कराती है। मेरी राय है कि वकीलों ने हिन्दुस्तान को गुलाम बनाया है। हिन्दू-मुसलमानों के झगड़े बढ़ाये हैं और अंग्रेजी हुकूमत को यहां मजबूत किया है।

पाठक : ऐसे इलजाम लगाना आसान है, लेकिन उन्हें साबित करना मुश्किल होगा। वकीलों के सिवा दूसरा कौन हमें आजादी का मार्ग बताता? उनके सिवा गरीबों का बचाव कौन करता? उनके सिवा कौन हमें न्याय दिलाता? देखिये, स्व. मनमोहन घोष ने कितनों को बचाया? खुद एक कौड़ी भी उन्होंने नहीं ली। कांग्रेस, जिसके आपने ही बखान किये हैं, वकीलों से निभती है और उनकी मेहनत से ही उसमें काम होते हैं। इस वर्ग की आप निंदा करें, यह इन्साफ के साथ गैर इन्साफ करने जैसा है। वह तो आपके हाथ में अखबार आया इसलिए चाहे जो बोलने की छूट लेने जैसा लगता है।

संपादक : जैसा आप मानते हैं वैसा ही मैं भी एक समय मानता था। वकीलों ने कभी कोई अच्छा काम नहीं किया, ऐसा मैं आपसे नहीं कहना चाहता। मि. मनमोहन घोष की मैं इज्जत करता हूं।

उन्होंने गरीबों की मदद की थी यह बात सही है। कांग्रेस में वकीलों ने कुछ काम किया है, यह भी हम मान सकते हैं। वकील भी आखिर मनुष्य हैं और मनुष्य जाति में कुछ तो अच्छाई है ही। वकीलों की भल मानसी के जो बहुत से किस्से देखने में आते हैं, वे तभी हुए जब वे अपने को वकील समझना भूल गये। मुझे तो आपको सिर्फ यही दिखाना है कि उनका धंधा उन्हें अनीति सिखाने वाला है। वे बुरे लालच में फंसते हैं, जिसमें से उबरने वाले बिरले ही होते हैं।

लोग दूसरों का दुख दूर करने के लिए नहीं, बल्कि पैसा पैदा करने के लिए वकील बनते हैं। वह एक कमाई का रास्ता है। इसलिए वकील का स्वार्थ झगड़े बढ़ाने में है। यह तो मेरी जानी हुई बात है कि जब झगड़े होते हैं तब वकील खुश होते हैं। मुखतार लोग भी वकील की जात के है। जहां झगडे नहीं होते वहां भी वे झगड़े खड़े कऱते हैं। उनके दलाल जोंक की तरह गरीब लोगों से चिपकते हैं और उनका खून चूस लेते हैं। वह पेशा ऐसा है कि उसमें आदमियों को झगड़े के लिए बढ़ावा मिलता ही है। वकील लोग निठल्ले होते हैं।

आलसी लोग ऐश आराम करने के लिए वकील बनते हैं। यह सही बात है। वकालत का पेशा बड़ा आबरूदार पेशा है, ऐसा खोज निकालनेवाले भी वकील ही हैं। कानून वे बनाते हैं, उसकी तारीफ भी वे ही करते हैं। लोगों से क्या दाम लिये जायं, यह भी वे ही तय करते हैं और लोगों पर रोब जमाने के लिए आडंबर ऐसा करते हैं मानो वे आसमान से उतर कर आये हुए देवदूत हों!

वे मजदूर से ज्यादा रोजी क्यों मांगते हैं? उनकी जरूरतें मजदूर से ज्यादा क्यों हैं? उन्होंने मजदूर से ज्यादा देश का क्या भला किया है? क्या भला करनेवाले को ज्यादा पैसा लेने का हक है? और अगर पैसे के खातिर उन्होंने भला किया हो, तो उसे भला कैसे कहा जाय? यह तो उस पेशे का जो गुण है वह मैंने बताया। लेकिन वकीलों से बड़े से बड़ा नुकसान तो यह हुआ है कि अंग्रेजों का जुआ हमारी गर्दन पर मजबूत जम गया है। आप सोचिये। क्या आप मानते हैं कि अंग्रेजी अदालतें यहां न होती तो वे हमारे देश में राज कर सकते थे? ये अदालतें लोगों के भले के लिए नहीं है। जिन्हें अपनी सत्ता कायम रखनी है वे अदालतों के जरिये लोगों को बस में रखते हैं। लोग अगर खुद अपने झगड़े निबटा लें तो तीसरा आदमी उन पर अपनी सत्ता नहीं जमा सकता।

इस बात को अलग रखें। हकीकत तो यही दिखानी है कि अंग्रेजों ने अदालतों के जरिये हम पर अंकुश जमाया है और अगर हम वकील न बनें तो ये अदालतें चल ही नहीं सकतीं। अगर अंग्रेज ही जज होते, अंग्रेज ही वकील होते और अंग्रेज ही सिपाही होते, तो वे सिर्फ अंग्रेजों पर ही राज करते। हिन्दुस्तानी जज और हिन्दुस्तानी वकील के बगैर उनका काम चल नहीं सका। वकील कैसे पैदा हुए, उन्होंने कैसी धांधली मचाई, यह सब अगर आप समझ सकें, तो मेरे जितनी ही नफरत आपको भी इस पेशे के लिए होगी।

अंग्रेजी सत्ता की एक मुख्य कुंजी उनकी अदालतें हैं और अदालतों की कुंजी वकील हैं। अगर वकील वकालत करना छोड़ दें और वह पेशा वेश्या के पेशे जैसा नीच माना जाय तो अग्रेंजी राज एक दिन में टूट जाय। वकीलों ने हिन्दुस्तानी प्रजा पर यह तोहमत लगवाई है कि हमें झगड़े प्यारे हैं और हम कोर्ट कचहरी रूपी पानी की मछलिया हैं।

जो शब्द मैं वकीलों के लिए इस्तेमाल करता हूं, वे ही शब्द जजों को भी लागू होते है। ये दोनों मौसेरे भाई हैं और एक दूसरे को बल देनेवाले हैं।