१ एकड़ से१० लाख कमाने का सपना


संजीव शर्मा

मैंने भी बचपन में ऐसे ही सपने देखे थे, जैसे सभी देखते हैं। मेरा सपना था कि मैं एक छोटा-सा कारखाना चलाऊं और इसी सपने को साकार करने के लिए मैंने आई टी आई, दिल्ली से पढाई की और गांव में ही एक मेटल फेब्रिकेटर का कारोबार प्रारंभ किया। मेरा गाँव निसुरखा बुलन्दशहर जिले में है। शहर से दूर होने के कारण मेरा कारोबार बहुत अच्छा चला। इतना अच्छा कि मैं गांव से शहर को सामान देने लगा। लगभग 15 साल काम चला लेकिन अचानक लोहे का मूल्य 29 रुपया से 48 रुपया हो गया। इस अचानक बढ़ोत्तरी से मुझे काफी घाटा हुआ। मेरे चार लाख रुपए डूब गए। इसी समय घर में बँटवारा हो गया। माता-पिता ने मुझे अलग कर दिया वो भी तिहाई की जमीन यानी दो एकड़ खेत और कच्ची मिट्टी का बना एक मकान देकर। कच्चे मकान में मैं रहता था, बारिस में ऊपर से भी पानी और नीचे से भी पानी। पूरी रात पति-पत्नी बैठ कर काटते थे। दो बेटे थे लेकिन उनके मन में नौकरी करने का विचार था। पर मेरा मन खेती से समझौता करने का नहीं था। मैंने जैविक खेती शुरू की जिसे करने पर हालात और बिगड़ते चले गए। दो साल पूरी मेहनत के बाद भी परिणाम निराशाजनक थे, ऊपर से कर्ज हो गया और परिवार का खर्च बढ़ रहा था।
इसी परेशानी की हालत में एक कार्यक्रम में एक महानुभाव से मेरी भेंट हुई। उन्होंने मुझे शून्य बजट खेती के बारे में बताया और मैने उसी समय घर आकर खेतों में जीवामृत का प्रयोग करना शुरू किया। उस पहले साल में ही 240 कुंतल प्रति एकड़ की उपज हुई। साथ ही उसमें 60 कुंतल कच्ची हल्दी और प्याज की फसल भी ले पाया। फिर क्या था, मेरा हौसला बढऩे लगा। लेकिन अभी भी मेरे ऊपर कमरतोड़ कर्ज था। मैं एक दिन खेत पर अकेला बैठा था जब मेरे मन में विचार आया कि मैं किसी और उत्पाद पर काम करूँ। जैसे कि बाबा रामदेव जी योग को बेच रहे हैं। पैसा तो मेरे पास नहीं था। फिर मन में विचार आया कि सिरका बनाता हूँ। पहले सभी अपने घरों में सिरका रखते थे, पर अब कोई नही रखता। मैंने कुछ मित्रो से बात की सिरके को लेकर तो सभी ने कहा कि अब गन्ने का शुद्ध सिरका कहाँ मिलता है। इससे प्रेरित होकर मैंने सिरके का काम करना शुरू किया। पहले मैंने 400 लीटर गन्ने का सिरका बनाया जो छह माह में बिक गया। उसके बाद देवबन्द भायला में आयोजित सुभाष पालेकर जी के शिविर में जाने का मौका मिला।
फिर क्या था फिर मैंने गुड़ तथा शक्कर भी बनाना शुरू किया। तब मेरा गुड़ 50 रुपए किलो बिकता था। तीन साल यह सब काम चलता चला। इस समय तक गुड़ मैं पड़ोस के गाँव में बनवाता था। फिर 10 जनवरी 2016 को अपना गुड़ बनाने का एक छोटा कोल्हू लगा लिया। आज मेरा गुड़ 80 रूपये किलो घर से ही बिकता है। मेरा सिरका 80 रुपया लीटर और दाल, हल्दी-पाउडर, गेंहूं बंशी, देशी अरहर, देशी चावल आदि सारी वस्तुएं घर से ही मिल जाती हैं। इसके बाद मेरे मन में गोबर गैस संयंत्र बनवाने का विचार आया।
मैंने पता किया तो जानकारी मिली कि बीस हजार रुपए में बनेगा जिसमें 8000 हजार सब्सिडी मिलेगी, लेकिन मेरे पास तो 8000 भी नही थे। तब मैंने 3000 रुपये लागत में एक गोबर गैस संयंत्र बनाया जो पिछले तीन साल से बिना किसी मेंटिनेंस के सफलतापूर्वक चल रहा है। मेरा इस साल का दो एकड़ जमीन का कुल बिक्री छह लाख के लगभग है। मैं साल में 35 से 40 कुंतल गुड़ जिसका मूल्य 80 प्रति किलो, 200 किलो हल्दी पाउडर 200 रुपए किलो, 300 किलो दालें, 15 कुंतल गेंहूं 40 रूप किलो बेच लेता हूँ। मेरी एक आरोग्य वाटिका भी है जिसमे 60 से 70 प्रकार की चीजें लगी हैं। फल, सब्जी, मसाले और कुछ ओषधीय पौधे भी लगे हैं।
अब सब कुछ अच्छा है बड़ा बेटा दिल्ली में रहकर सीएस की पढ़ाई कर रहा है। छोटा बेटा अपने पास कृषि से 11 वीं की पढ़ाई कर रहा है और खेती में भी हाथ बटाता है। मेरा आगे का लक्ष्य एक एकड़ में 10 लाख कमाने का है जो जल्दी ही पूरा होगा।