स्वाइन फ्लू और आयुर्वेद

वैद्य राम अचल


स्वाइन फ्लू भी नजला जुकाम विषाणु परिवार का एक नया सदस्य है, जिसकी संरचना सुअर को होने वाले जुकाम के वाइरस जैसी होती है। इसलिए इसे स्वाइन फ्लू (सूअर प्रतिष्याय) कहा गया है। अमेरिका वैज्ञानिकों ने 2009 में इस विषाणु को पहचान कर इसे एच-1 2009 नाम दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने नई महामारी कहा है, क्योंकि 2009 से लेकर 2010 तक इसे कई देशों में पाया गया जिससे लगभग 17 हजार लोगों की मौत होने की पुष्टि हुई। एक पक्ष यह भी है कि हो कसता है यह संक्रमण पहले भी रहा हो, मौते होती रही हो, पर 2009 से अध्ययन के बाद इसके आंकड़े एकत्र किए है।
यह वाइरस कुछ प्रोटीन से आवृत रहता है जो इसके संक्रमण को फैलाने में सहायक होते है। इन प्रोटीनों का नाम हिमोग्लूग्लेटिम व न्यूरामिनिटेस है। इन्ही की संरचना सूअर के विषाणुओं के प्रोटीन जैसी होती है। जिसके आधार पर इसका नामकरण किया गया है। स्वाइन फ्लू के बारे में यह भ्रांति है कि सूअर या मुर्गे के संपर्क में आने या उसका मांस खाने से इस रोग का संक्रमण हो जाता है। यह पूर्णत गलत है। यह रोग हवा के माध्यम से फैलता है। संक्रमित व्यक्ति या पशु पक्षी के संम्पर्क, छीकने, खांसने से श्वांस नली में इसके विषाणु प्रवेश कर जाते है। संक्रमित व्यक्तियों द्वारा प्रयोग किये गए तौलिऐ आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए। शुरूआत में ऐसी अवधारणा थी कि अधिक लोग इस रोग से तेजी से प्रभावित हो रहे है, क्योंकि लोगों में इस रोग के प्रति प्रतिरोधी क्षमता का विकास नहीं हुआ था। सभी प्रकार के जुकाम के रोगियों में 0.5 से 1 प्रतिशत रोगियों में गंभीर लक्षण दिखने पर स्वाइन फ्लू की आशंका हो सकती है। विशेष रूप से 6 माह से छोटे बच्चे, गर्भवती महिलाएं, हृदय, गुर्दे, मधुमेह व टीबी आदि के रोगियों 65 साल से अधिक उम्र के लोगों अर्थात् कमजोर रोग प्रतिरोधी क्षमता वाले लोगों को इस रोग के संक्रमण की संभावना अधिक रहती है।

इस रोग में तेज ज्वर, खांसी, गला खराब होना, सिर दर्द, शरीर दर्द, छींक, सांस लेने में कष्ट होता है जैसा सामान्य नजले जुकाम में होता है, पर श्वांस में कष्ट इसकी गंभीरता का सूचक है।

आयुर्वेद में प्रतिश्याय (जुकाम फ्लू) बाह्य विक्षोभक द्रव्य के कारण होता है। सामान्यतः बाह्य श्वांस तंत्र (नाक) स्थित वात पित्त, कफ, बाह्य विक्षोभक द्रव्य को नष्ट कर देते हैं, पर जब ये कमजोर पड़ते हैं तो विकृत हो जाते हैं। देहाग्नि मंद हो जाती है। आम दोष बढ़ जाता है। यह दोष अधिक समय तक रहने पर अंततः श्वांस तंत्र को प्रभावित कर गंभीर स्थिति उत्पन कर देता है। यह स्थिति स्वाइन फ्लू की हो सकती है। इसे त्रिदोषज या सन्निपातज प्रतिश्याय की श्रेणी में रख सकते हैं।
स्वाइन फ्लू से बचाव ही इसकी उत्तम चिकित्सा है। आधुनिक चिकित्सा ने 2010 में इसका वैक्सीन (टीका) खोज लिया था जो अब उपलब्ध है। इसे छह माह से लेकर पूरी उम्र के लोगों को लगाया जा सकता है। यह चार साल तक इस रोग से सुरक्षित रख सकता है। इसके अलावा जुकाम होने पर विश्राम करे, भीड़ से बचे, खांसते छींकते समय तौलिया का प्रयोग करें। यदि कोई अन्य व्यक्ति भी छींकता खांसता है तो अपना बचाव करें। साफ सफाई का ध्यान रखें। स्कूल कार्यस्थल या बाजार जाना बंद कर दें। सीलन, धूल, धुंऐ व दूषित वातावरण से बचें।

इसमें प्रारम्भिक चिकित्सा प्रतिश्याय की करनी चाहिए। औषधीय तरल का प्रयोग विशेष रूप से करना चाहिए। जैसे हल्दी, लहसुन, सौंठ, गुढ, दूध, गुर्च कालीमिर्च, हरसिंगार व अहुसा का काढा दिन में 2-3 बार देना चाहिए। योग्य चिकित्सा की देख-रेख में संजीवनी, बटी, लक्ष्मीविलासरस, त्रिभुवनकीर्तिरस, आरोग्यवर्धिनी बटी, आनन्दभैरवरस का प्रयोग करना चाहिए। कलिंगादितैल, अणुतैल आदि तैल का नस्य प्रयोग भी लागदायक होता है।