स्वस्थ रह कर उठाएं वर्षा का आनंद

स्वस्थ रह कर उठाएं वर्षा का आनंद

डॉ. नितिन अग्रवाल
वरिष्ठ आयुर्वेदाचार्य एवं प्रबंध निदेशक, ब्लिस आयुर्वेदा

वर्षा ऋतु में बीमारियां तेजी से फैलती हैं। इसके दो प्रमुख कारण हैं। सबसे पहली बात तो यह है कि वर्षा ऋतु में नमी काफी बढ़ जाती है। नमी के बढऩे से वातावरण में बैक्टीरिया तथा वायरस काफी बढ़ जाते हैं और उनका तेजी से विकास होने लगता है। दूसरी बात यह है कि पानी का स्थान-स्थान पर जमाव होने लगता है। पानी के जमाव से मच्छरों के प्रजनन स्थल भी बढ़ जाते हैं। मच्छरों के बढऩे के साथ-साथ इस पानी के जमाव के दूसरे दुष्परिणाम भी होते हैं। यह जमा हुआ गंदा पानी हमारे पेयजल स्रोतों को प्रदूषित कर देता है। इसे पीने से भी हमें संक्रमणजन्य बीमारियां हो जाती हैं। वर्षा ऋतु की जितनी भी प्रमुख बीमारियां हैं, जैसे कि हैजा, पेचिश, उलटी-दस्त, आंत्र ज्वर (टॉयफॉयड), पीलिया, हेपेटाइटिस आदि लीवर की बीमारियां, ये सभी पानी के संक्रमण से ही फैलती हैं। खाद्य संक्रमण (फूड प्वॉयजनिंग) आदि भी होता है। आँखों में होने वाला फ्लू भी इसके कारण होता है। इसके अलावा फफूंदीय संक्रमण (फंगल इन्फेक्शन) से दाद, खाज, खुजली आदि चर्म रोग भी होते हैं।
इन पारंपरिक बीमारियों के अलावा आज कुछ नई बीमारियां भी हो रही हैं। मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया, ये तीनों ही मच्छरजनित बीमारियां हैं। इनमें से मलेरिया तो पुरानी बीमारी है, परंतु डेंगू तथा चिकनगुनिया इधर के वर्षों में ही देखी गई है। पहले डेंगू का प्रकोप फैला था और अब चिकनगुनिया का भी प्रकोप बढ़ गया है। ये सारी बीमारियां वर्षा ऋतु में एकदम से बढ़ती हैं।
वर्षा ऋतु का आनंद उठाना हो तो स्वस्थ रहना आवश्यक है। स्वस्थ रहने के लिए सबसे पहले अपने घर और उसके आस पास की सफाई पर ध्यान देना चाहिए। विशेषकर पानी को एक जगह ठहरने या सडऩे न दें, उसका समुचित प्रबंधन करें। इसके लिए हम स्वयं भी सजग होना होगा।
दूसरी सावधानी यह रखें कि उमस के कारण शरीर में जो पसीना और चिपचिपापन बढ़ता है, उसके कारण होने वाले संक्रमण से बचें। इसके लिए अच्छा यह रहेगा कि रात को सोने से पहले गुनगुने पानी से स्नान करें। स्नान के जल में नीम की पत्तियां डाल लें या फिर नीम साबुन का भी प्रयोग कर सकते हैं। किसी अच्छे आयुर्वेदिक या कीटाणुनाशक साबुन का भी प्रयोग किया जा सकता है। मुलतानी मिट्टी का भी प्रयोग कर सकते हैं। इससे बहुत प्रकार के बैक्टीरिया तथा वायरस के संक्रमण से बच जाएंगे। आमतौर पर लोग समझते हैं कि सुबह तो स्नान कर लिया है, परंतु दिन भर की भागदौड़ के बाद शरीर में जो पसीना-गंदगी एकत्र हुई है, उसके साथ सोना ठीक नहीं। इसलिए सोने से पहले अवश्य नहा लें, विशेषकर यदि आप पसीने और धूल-धक्कड़ की स्थिति से गुजरे हों।
दूसरी सावधानी पीने के पानी के बारे में रखना चाहिए। इन दिनों भूजल भी प्रदूषित हो जाता है। कुएं, हैंडपंप आदि का जल भी साफ नहीं रहता। इनकी सफाई का भी ध्यान रखना आवश्यक है। यदि यही पानी पीने के लिए उपलब्ध हो तो फिर उसे उबाल कर ठंडा करके ही पिएं। कुएं के पानी में चूना तथा फिटकरी मिला कर उसके उपचार करने की परंपरा रही है। यदि वह किया है तो फिर आप कुएं की पानी को सीधा भी पी सकते हैं। परंतु यदि ऐसा नहीं कर पाएं तो पानी को उबाल लेने से भी वह शुद्ध हो जाता है।
वर्षा ऋतु में भीगने का एक अलग ही आनंद है। किन्तु एक सावधानी अवश्य रखिए। बारिश में भीगिए परंतु उसके बाद स्नान अवश्य कर लें। यह भी ध्यान रखें कि यदि आप रास्ते में नहीं हैं तो बारिश शुरु होते ही भीगने न जाएं। बारिश के प्रारंभ में पानी में काफी कुछ प्रदूषण रहता है। वह पानी अम्लीय भी होता है, उसमें सल्फ्युरिक एसिड वगैरह घुला होता है। उससे हमारी त्वचा तथा कपड़े दोनों खराब हो सकते हैं। इसलिए प्रयास यही करें कि शुरुआती बारिश में भीगने से बचें। 10-15 मिनट की बारिश हो चुकने के बाद ही भीगें। भीगने के बाद नहा अवश्य लें। गीले कपड़ों में बिल्कुल भी नहीं रहें। कई बार बारिश में भीगने के बाद कपड़े बदन पर ही सूख जाते हैं तो हम उसे नहीं बदलते, यह भी ठीक नहीं है। चाहे वे कपड़े सूख गए हों, लेकिन उनमें वायरस के संक्रमण की आशंका काफी बढ़ जाती है। इसलिए कपड़े भी अवश्य बदलें।
वर्षा ऋतु में सूर्य की रौशनी यानी कि धूप का अधिक सेवन भी ठीक नहीं होता। वह भी नुकसान करता है। दिन में सोना भी ठीक नहीं है, इससे कफ बढ़ता और अनपच बढ़ता है। अधिक थकावट वाले कार्यों से भी बचना चाहिए। व्यायाम सामान्यत: जितनी मात्रा में करते हैं उससे कम करना चाहिए। आयुर्वेद की दृष्टि से जठराग्नि आदि सभी अग्नियां कमजोर हो जाती है और चयापचय की स्थिति जल्दी बिगड़ जाती है। इससे रोगप्रतिरोधक क्षमता तथा पाचन दोनों ही कमजोर हो जाते हैं। परिणामस्वरूप शरीर की सामान्य ताकत अन्य ऋतुओं की तुलना में कम होती है। शरीर का तेज भी घट जाता है।
इन दिनों वात दोष बढ़ जाता है इसलिए बारिश के मौसम में मधुर, लवण और अम्लीय पदार्थों का सेवन अच्छा रहता है। ताजा और गरम भोजन का सेवन अच्छा रहता है। भोजन में चिकनाई अर्थात घी आदि का सेवन अवश्य करना चाहिए। भूखा रहने से बचना चाहिए और भूख से अधिक न खाएं इसका भी ध्यान रखना चाहिए। गरम पानी का सेवन करें। उसमें शहद और नींबू का रस मिला कर लें तो और भी अच्छा रहेगा। शहद का सेवन वर्षा ऋतु में लाभकारी रहता है। वातशामक है, ताकत देता है और रोगप्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाता है। आमतौर पर यह माना जाता है कि शहद को गरम करके नहीं लेना चाहिए। आयुर्वेद में शहद को गर्म करना विष के समान माना गया है। यह सही भी है। शहद को 60 डिग्री सेंटिग्रेड से अधिक गर्म करने से वह नुकसान करेगा। परंतु गुनगुने पानी का तापमान इससे काफी कम होता है। शरीर के अंदर का तापमान ही 40 डिग्री होता है। इसलिए गुनगुने पानी में शहद लेने से कोई नुकसान नहीं है। पित्त भी शीघ्र बढ़ जाता है। इसलिए खान-पान का विशेष ध्यान रखें।
सामान्यत: बारिश में पकौडिय़ां आदि खाना अच्छा लगता है। पकौडिय़ां आदि खाना ठीक भी है, परंतु ध्यान रखें कि स्वाद-स्वाद में अधिक न खा जाएं। सीमित मात्रा में खाएंगे तो वात का शमन होगा, परंतु अधिक खा लेंगे तो पित्त बिगड़ जाएगा। कच्ची सब्जियां तथा सलाद आदि न खाएं तो बेहतर है। खाना ही हो तो उन्हें ठीक से धोकर ही खाना चाहिए। सलाद आदि का सेवन रात्रि में तो करना ही नहीं चाहिए। आयुर्वेद के अनुसार वर्षा ऋतु में पका हुआ खाना ही खाना चाहिए। दही, आइसक्रीम जैसी चीजों को न खाएं, छाछ पी सकते हैं लेकिन वो भी दिन में ही रात्रि में नहीं। पुराना अनाज भी काफी लाभकारी होता है। जौ के आटे को गेंहूं के आटे में मिला कर उसकी रोटी खाएं।
इसके साथ ही जितनी भी अग्निवर्धक चीजें हैं, उनका सेवन करना चाहिए। अदरक पर काला नमक डाल कर उस पर थोड़ा नींबू का रस डाल कर सेवन करें। इससे अग्नि तेज होती है। अग्नि तेज होगी तो खाना ठीक से पचेगा। इससे बीमारियों से बचे रहेंगे। भोजन के बाद गरम पानी का सेवन अच्छा रहता है। भोजन में या उससे पहले फल का जूस आदि भी नहीं लें। गन्ने का रस गरमी में तो ठीक है, परंतु बारिश में उससे भी बचना चाहिए। इसी प्रकार गरमी के फलों, तरबूज, खरबूज, खीरा आदि को या तो नहीं लें या फिर सावधानी से लें। इससे दस्त हो सकते हैं।
वर्षा में हल्दी का सेवन किया करें। या तो दूध में ले लें या फिर पिसी हल्दी को अलग से सब्जी के ऊपर छिड़क कर खाएं। मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया से बचाव के लिए गिलोय और आँवले का सेवन करना चाहिए। इनका रस मिल जाए तो अच्छा है। अन्यथा गिलोय की टहनी को पानी में उबाल कर प्रतिदिन चाय की तरह उस पानी को पीएं। इसमें काली मिर्च तथा अदरक थोड़ा सा मिला सकते हैं। इसमें मीठा मिला सकते हैं। शहद भी मिला सकते हैं। इससे यह और भी लाभकारी हो जाएगा। शरीर की ताकत को बढ़ाने के लिए अश्वगंधा का सेवन करें। अश्वगंधा का कैप्सुल भी आता है। उसे ले सकते हैं। विटामिन बी काम्पलेक्स भी ले सकते हैं। यदि यह सब सावधानी रखी तो मच्छर कितना भी काटे आप इन बीमारियों से बचे रहेंगे। कुछ बने-बनाए योग भी आते हैं। जैसे हम भी इम्यूनोब्लिस के नाम से एक दवा बनाते हैं जिसे लेने से ये सारे लाभ होते हैं।
यदि दस्त हों तो कुटजधनवटी का सेवन करें। हल्का सा भी पेट खराब हो तो ले लें। तुरंत लाभ होगा। विटामिन बी भी लेना चाहिए। सुदर्शनधन वटी लेंगे तो ज्वर से बच जाएंगे। बच्चों को भी पन्द्रह दिनों तक एक गोली सुदर्शनधन वटी प्रतिदिन दे देना चाहिए। इससे वे रोगों से बचे रहेंगे।
बारिश में मन स्वाभाविक रूप से प्रसन्न होता है। इतनी सावधानियां रखीं तो हम स्वस्थ रह कर बारिश का पूरा आनंद ले पाएंगे। इस प्रसन्नता में कोई भी रोग बाधा नहीं बन पाएगा।