स्वच्छ कैसे होगी गंगा?

स्वच्छ कैसे होगी गंगा?

आनंद कुमार
लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

प्रयाग नाम वाली पांच अलग अलग जगहें पास पास ही हैं। इनमें सबसे पहला है विष्णु प्रयाग। बद्रीनाथ के सतोपंथ से चली अलकनंदा नदी विष्णु प्रयाग में धुली गंगा से मिलती है। यहाँ से आगे बढऩे पर अलकनंदा थोड़ी दूर बाद मंदाकिनी से मिलती है और ये दूसरी जगह नन्द प्रयाग कहलाती है। इस से आगे बढ़ें तो अलकनंदा फिर से पिंडर गंगा से मिलती है और उसे कर्ण प्रयाग कहते हैं। थोड़ा और नीचे आने पर अलकनंदा केदारनाथ से निकली मन्दाकिनी से मिलती है, जिसे रूद्र प्रयाग कहा जाता है। इस से भी आगे जाकर गंगोत्री के गोमुख से निकली भागीरथी नदी आकर अलकनंदा से मिलती है। इस जगह को देव प्रयाग कहा जाता है।
यहाँ से आगे अलकनंदा और भागीरथी का कोई अलग अलग अस्तित्व नहीं रहता, यहाँ से आगे ये नदी गंगा कहलाती है। तकनीकि रूप से जब हम गंगा की बात करते हैं तो ये गोमुख में गंगोत्री ग्लेशियर से 12769 फीट की ऊंचाई पर निकलती है। भारत के मैदानी हिस्सों में करीब 2525 किलोमीटर का सफऱ करके बांग्लादेश में बंगाल की खाड़ी में जा मिलती है। कितना पानी इस से बहता है, उसके हिसाब से देखें तो ये दुनियां की तीसरी सबसे बड़ी नदी है। ये नदी कम से कम 140 मछलियों की प्रजातियों और नब्बे उभयचर जंतुओं का घर है। इसके अलावा इसमें गंगा डॉलफिन भी होती है। वर्ष 2007 के आंकड़ों के मुताबिक ये नदी दुनियां की पांचवी सबसे ज्यादा प्रदूषित नदी थी।
करीबन आठ सौ किलोमीटर पार करने के बाद, रामगंगा के गंगा में मिल जाने पर इलाहाबाद के पास यमुना गंगा से मिलती है। इसे त्रिवेणी संगम कहते हैं, मान्यता थी कि गंगा-यमुना-सरस्वती तीन नदियाँ यहाँ मिलती थी। कई साल तक इतिहासकारों ने इसे मिथक घोषित किया। बाद में सैटॅलाइट से लिए चित्रों और अन्य सबूतों के आधार पर ये तय हो पाया कि सरस्वती सचमुच कि नदी थी और जिसे आज घाघरा-झज्झर बेसिन कहते हैं, वहीँ बहती थी। इस संगम को प्रयाग कहा जाता है, ये वो छठा प्रयाग है जिसे आम तौर पर लोग जानते पहचानते हैं। यहाँ भी यमुना नदी, गंगा से बड़ी है। यमुना से आने वाला 104000 क्यूबिक फीट प्रति सेकंड पानी यहाँ गंगा में मिलता है। संगम का करीब 59 प्रतिशत पानी यमुना का होगा।
यहाँ से आगे जब गंगा बहती है तो वो मैदानी क्षेत्र में है। उसका वेग बहुत कम हो जाता हो ऐसा नहीं है, लेकिन फिर भी वो अपेक्षाकृत शांत होती है। गंगा का वेग बनारस पहुंचकर कम होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि नदी की दिशा वहां घूमती है। बनारस पहुंचकर पूर्व की और बह रही गंगा दक्षिण से उत्तर की तरफ मुड़कर बह रही होती है और इसी से उसकी गति घट जाती है।
इसी को आप धार्मिक मान्यताओं में देख सकते हैं। भागीरथ जब गंगा को लेकर आते हैं तो वो बालिका है, अपने पूरे वेग में उत्साह से भरी पूरी, जब शिव उसे रोकते हैं तो वो किशोरी है, बंधनों को मानने के लिए आसानी से तैयार नहीं होती, शांतनु से विवाह और भीष्म के जन्म के समय वो युवती है, उसके बाद से लगातार वो माता के स्वरुप में है।
मैदानी भागों की गंगा भी इसी माता के स्वरुप में होती है। उसमें वेग नहीं, स्नेह और पोषण छलकता है। सन 1918 से 36 के दौर में अंग्रेजों ने वेग देखकर ये मान लिया था कि कितना भी कूड़ा कचरा इसमें डालो ये बहा ले जायेगी, लेकिन वाराणसी के इलाकों में जब शहरों से कचरा इसमें जाना शुरू हुआ तो इसका वेग उतना होता ही नहीं कि ये सब बहा ले जाए। इसकी सफाई के लिए भी जो काम हुए वो अजीब से रहे। पहले तो केंद्र और राज्य की इसमें 70:30 की हिस्सेदारी रही, बाद में कांग्रेस की सरकार ने (यू.पी.ए. काल में ) इसे 50:50 भी कर डाला। नतीजा ये रहा कि दोनों केंद्र और राज्य कहते रहे कि उन्होंने अपने हिस्से की सफाई कर दी है, उधर गंगा मैली होती रही।
मोदी सरकार के कार्यकाल में बहुत ज्यादा काम हुआ हो ऐसा भी नहीं है लेकिन हाँ प्रदुषण फ़ैलाने वालों की पहचान का काम किया गया है। आश्चर्यजनक रूप से इसमें 118 शहर ही नहीं आते, गंगा को प्रदूषित करने वालों में 1649 ग्राम पंचायत भी हैं। गंगा की सफाई में जुटे एन.जी.ओ. में से एक बड़ी संख्या साधुओं की चलाई हुई है। उनमें से ज्यादातर आधुनिक मानकों पर पढ़े लिखे भी नहीं माने जायेंगे। लगातार के अभ्यास ने उन्हें ये सिखा दिया है कि क्या किया जाना चाहिए। लगभग सबका मानना है कि गंगा की धारा को ‘निर्मलÓ ही नहीं ‘अविरल’ भी होना चाहिए। जबरन पानी को रोका जाना गंगा को नुकसान पहुंचाता है।
अभी के हिसाब से उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड और पश्चिम बंगाल मिलकर 7300 मिलियन लीटर कचड़ा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रतिदिन गंगा में बहाते हैं। इन राज्यों को मिला दें तो इनका सामथ्र्य करीब 3300 मिलियन लीटर कचड़े को परिशोधित करने का ही है, यानि 4000 मिलियन लीटर विष प्रतिदिन गंगा में जा रहा है। पंजाब के गावों में एक बाबा बलबीर सिंह सींचेवाल काम किया करते हैं। उन्होंने हाल में ही काली बेइन नदी को पूरी तरह सिर्फ गाँव वालों और अपने काम से साफ़ कर के दोबारा जीवित कर डाला है। जो नदी लगभग सूख चुकी थी, वो अब दोबारा बहती है।
गंगा की सफाई भी अकेले सरकार के बस का रोग नहीं है। जनता का प्रयास, जनता की भागीदारी, किसी भी किस्म का कचड़ा नदी में डालने के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाई जानी होगी। मेरी नहीं सरकार की जिम्मेदारी, साधू कुछ करते क्यों नहीं, जनता की मानसिकता में सुधार जैसे एक दुसरे पर जिम्मेदारी को गेंद की तरह फेंकने वाली हरकत की वजह से गंगा मैली हुई जाती है।
सन 1854 में ब्रिटिश शोषणकाल में ही हरिद्वार में गंगा पर बाँध बना और इसी वक्त से नदी की धारा धीमी पडऩी शुरू हो गई। करीब सौ साल बाद, यानि आजादी के वक्त जब फरक्का बर्रागे बना तो उस समय भी इरादा था कि नदी का पानी भागीरथी नदी में डाला जायेगा। नतीजा ऐसा कुछ हुआ नहीं, उल्टा गंगा का पानी खारा होने लगा और आस पास की खेती योग्य भूमि भी खराब होने लगी। इसके अलावा बांग्लादेश और भारत के संबंधों में इस बाँध को लेकर खूब कड़वाहट आई। इसके वाबजूद निकट भविष्य में सरकार गंगा पर 300 बाँध बनाने की योजना बना रही है। ये स्थिति तब है जब पर्यावरण सुरक्षा के लिहाज से 34 बांधों को ग्रीन पैनल की रिपोर्ट में हटा देने, ना बनाने का स्पष्ट निर्देश है।
गंगा की सफाई के लिए अप्रैल 1986 में ही राजीव गाँधी सरकार ने ‘गंगा एक्शन प्लान’ की शुरुआत की थी। नौ सौ करोड़ यानि करीब हज़ार करोड़ के फण्ड से शुरू हुई इन योजनाओं का कोई नतीजा नहीं निकलने पर इसे 31 मार्च 2000 को वापिस ले लिया गया। अब नमामि गंगे नाम की महत्वाकांक्षी योजना के साथ मोदी सरकार ने करीब बीस गुना रकम के साथ इस योजना को फिर से शुरू किया है। गंगा की धारा का जो भी हो, फण्ड ‘अविरल’ बहते आ रहे हैं। वैसे गंगा की धारा का क्या हो रहा है ये जानना भी कोई ख़ास मुश्किल नहीं है। सन 1780 से गंगोत्री ग्लेशियर लगातार सिकुड़ रहा है। 1971 के बाद से ये गति और तेज हुई, पच्चीस साल में ये करीब 850 मीटर पीछे जा चुकी है जिसमें से 76 मीटर सिर्फ 1996 से 1999 के बीच घटा है।
गंगा की धारा को अविरल रखने के लिए हरिद्वार में अवैध खनन रुकवाना जरूरी था। इसके लिए आमरण अनशन करते हुए स्वामी निगमानन्द सरस्वती की मृत्यु हो गई। जून 2011 में उनकी अनशन करते हुए मौत होने पर उनके ही आश्रम के स्वामी शिवानन्द अनशन पर बैठ गए 25 नवम्बर 2011 को स्वामी शिवानन्द अनशन पर ही थे। आखिर थक हार कर सरकार ने अवैध खनन रुकवाने के लिए प्रशासन को आदेश दिया। अभी के प्रयासों की स्थिति ये है कि हाल में ही एक आर.टी.आई. के जवाब में प्रधानमंत्री कार्यालय ने बताया है कि पहले दो साल के लिए जारी हुए 3700 करोड़ रुपये के फण्ड में से बीस प्रतिशत अभी इस्तेमाल नहीं हुआ। इन योजनाओं का फायदा क्या हुआ है? फायदा ये हुआ है कि 1986 में सरकारी अफसर बताते थे कि भीषण प्रदुषण फ़ैलाने वाले उद्यमों की संख्या 764 है, आज 2017 में भी सरकारी हिसाब से ऐसे उद्यमों की गिनती 764 ही है, ना बढ़ी है ना घटी है।
थोड़े मतभेद भी हैं, जैसे केन्द्रीय प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड कहता है गंगा में तीस नालियाँ मिलती हैं, जो प्रदुषण फैलाती हैं। उत्तर प्रदेश प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड के हिसाब से मानें तो ऐसी डेढ़ सौ नालियाँ हैं जो गंगा में प्रदूषित कचड़ा गिराती हैं। राज्य और केंद्र के अधिकारीयों के आपसी समन्वय की स्थिति ये है कि एक मामले की सुनवाई में जस्टिस स्वतंत्र कुमार कह चुके हैं कि आपके जैसे अधिकारी जनता का पैसा बर्बाद करने और बैठ कर कुर्सियां तोडऩे के अलावा कुछ नहीं करते।
आज गंगा के किनारे करीब 40 करोड़ लोग रहते हैं और उनका जीवन सीधे या फिर परोक्ष रूप से गंगा पर निर्भर है। वल्र्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी प्रयास (गंगा एक्शन प्लान 1 और 2) लगातार प्रदूषण की समस्या पर गौर करते रहे, मगर इनका नतीजा कुछ भी नहीं निकला। अभी तक की जांच के आधार पर ये माना जाता है कि गंगा में जाने वाले कचड़े का करीब 80 फीसदी शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के मल-मूत्र होता है। औद्योगिक कचड़ा दुसरे स्थान पर आता है, यानि वो बीस फीसदी से कम होगा। गौर करने लायक है कि मल-मूत्र को सीधे गंगा में बहा देने के बदले उसका परिशोधन उसे खाद में बदलना उसे फायदेमंद, कीमती चीज़ बना देगा। किन्हीं अज्ञात कारणों से इस दिशा में ज्यादा काम नहीं हुआ है। सीवर नेटवर्क जो करीब 3600 किलोमीटर से ज्यादा होना चाहिए था, वो अभी करीब 1060 किलोमीटर के लगभग ही है। सवा तीन सौ मिलियन लीटर प्रतिदिन के बदले अभी करीब ढाई सौ मिलियन लीटर प्रतिदिन ही परिशोधित होता है।
एक चीज़ और जो ध्यान में आती है वो ये है कि कई बार संस्थानों को अदालती कारवाही तक करनी पड़ी है। जानकारी लेने के लिए मुक़दमे करना समझ में आता है, लेकिन काम करने का आदेश अगर अदालत भी दे तो भी उसे पूरा तो उसी अधिकारी को करना है जो पहले से उसी काम के लिए नियुक्त है। ऐसे में अगर ‘मंशा’ ही काम करने की ना हो तो कैसे कोई सुधार हो सकता है? मोदी सरकार ने 2020 तक साफ़ सुथरी गंगा देने का वादा कर रखा है। जल संसाधन मंत्री उनसे भी दो कदम आगे थे, उन्होंने 2018 में ही काम पूरा कर देने का दावा (वादा का उल्टा) ठोक रखा है। अब घड़ी तो किसी के लिए रूकती नहीं मंत्री जी, तो 2017 आधा बीत गया है। अभी भी लगता है गंगा, 2018 या 2020 तक साफ होगी?