सुभाष पालेकर : असली हरित क्रांति का जनक

सुभाष पालेकर : असली हरित क्रांति का जनक

स्वाधीनता के बाद जब खेती के विकास के नाम पर देश में चहुँ ओर खेती की लागत बढ़ाई जा रही थी, एक व्यक्ति खेती को फिर से शून्य लागत पर लाने के सपने देख रहा था। देश के सभी कृषि विज्ञानियों को मात देते हुए उसने न केवल अपना सपना सच किया बल्कि हजारों लाखों किसानों की आँखों में फिर से सपने सजा दिए। केवल सपने ही नहीं सजाए, तो उन्हें सच करके भी दिखाया। देश की वास्तविक हरित क्रांति की ओर ले जाने वाले वे व्यक्ति है सुभाष पालेकर।
सुभाष पालेकर एक भारतीय कृषक एवं कृषि विशेषज्ञ हैं। उन्होंने ‘शून्य बजट आध्यात्मिक कृषि’ के बारे में अभ्यास किया है और कई पुस्तकें लिखी है। उन्होंने शून्य बजट प्राकृतिक जिसे आध्यात्मिक कृषि भी कहा जाता है, की तकनीक पर काम किया है। इस तकनीक में खेती करने के लिए न तो किसी भी रासायनिक कीटनाशक का उपयोग किया जाता और न ही बाजार से अन्य औषधियां खरीदने की आवश्यकता पड़ती है। उन्होंने भारत में इस विषय पर कई कार्यशालाओं का आयोजन किया है। उन्हें वर्ष 2016 का भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया है।
महाविद्यालय जीवन के दौरान, जब वह आदिवासी क्षेत्रों में काम कर रहे थे, तब उन्होंने देश की जीवनशैली और सामाजिक संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने जंगलों में प्रकृति प्रणाली का अध्ययन किया। जंगल में किसी भी मानवीय हस्तक्षेप और सहायता को न देख कर वह हैरान रह गए। वहाँ हर साल आम, बेर, इमली, जामुन, शरीफा, नीम, मोह के बड़े पेड़ों पर बहुत फल आते थे। उन्होंने जंगल के वृक्षों के प्राकृतिक विकास पर अनुसंधान शुरू किया। वर्ष 1986-88 के दौरान उन्होंने जंगली वनस्पतियों का भी अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि जंगलों में एक स्व-विकसित, स्वयं पोषित और पूरी तरह से आत्मनिर्भर प्राकृतिक व्यवस्था विद्यमान है। वहां एक पारिस्थितिकी तंत्र है, जिससे वनस्पतियों का विकास होता है। उन्होंने इस प्राकृतिक व्यवस्था का अध्ययन किया और वर्ष 1989 से 1995 के दौरान जंगल की उन प्राकृतिक प्रक्रियाओं का अपने खेत पर परीक्षण करके देखा। इन छह वर्षों के शोध कार्य के दौरान उन्होंने 154 अनुसंधान परियोजनाएँ पूर्ण की। इसके बाद, ‘शून्य बजट प्राकृतिक कृषि’ की तकनीक आरंभ की, जिसका प्रचार उन्होंने कार्यशालाओं, तथा सेमिनार के माध्यम से किया और इस विषय पर मराठी, हिंदी, अंग्रेजी, कन्नड़, तेलुगु, तमिल भाषाओं में अपनी पुस्तकें लिखीं। देशभर में किसानों के द्वारा स्थापित कृषि के हजारों मॉडल विकसित किए।
वर्ष 1996-98 से उन्हें पुणे, महाराष्ट्र से प्रकाशित ‘बलीराजा’ मराठी कृषि पत्रिका की संपादकीय टीम में शामिल किया गया, लेकिन आंदोलन की गति को बढ़ाने के लिए वर्ष 1998 में उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। उन्होंने कृषि के बारे में मराठी में 20 अंग्रेजी में 4 और हिन्दी में 3 पुस्तकें लिखी। मराठी में लिखी गई पुस्तकों का सभी भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया जा रहा है। उनके आंदोलन ने मीडिया के जरिए राजनेता, किसानों का ग्रामीण अर्थव्यवस्था की वास्तविक समस्याओं के प्रति ध्यान आकर्षित किया। वे मानते हैं, अब शून्य बजट प्राकृतिक कृषि के अलावा किसानों की आत्महत्याओं को रोकने का और कोई विकल्प नहीं है। उनका यह भी विश्वास है कि इंसान को जहरमुक्त भोजन उपलब्ध करने का एक ही तरीका है, शून्य बजट प्राकृतिक कृषि।
भारत के महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, गुजरात राज्यों के 30 लाख किसान शून्य बजट प्राकृतिक कृषि कर रहे हैं। कर्नाटक राज्य ने उन्हें वर्ष 2005 में एक क्रांतिकारी संत बसवराज के नाम पर दिया जाने वाला पुरस्कार श्री मृग राजेन्द्र मठ, चित्रदुर्ग द्वारा ‘बसवश्रीÓ पुरस्कार से सम्मानित किया था। वर्ष 2007 में उन्हें श्री रामचद्रपुरमठ, शिमोगा कर्नाटक द्वारा भारतीय पशु संवर्धन के लिए ‘गोपाल गौरव पुरस्कार’ भी प्रदान किया गया था।
शून्य बजट प्राकृतिक खेती क्या है?
शून्य बजट प्राकृतिक खेती देसी गाय के गोबर एवं गौमूत्र पर आधारित है। एक देसी गाय के गोबर एवं गौमूत्र से एक किसान तीस एकड़ जमीन पर शून्य बजट खेती कर सकता है। देसी प्रजाति के गौवंश के गोबर एवं मूत्र से जीवामृत, घनजीवामृत तथा बीजामृत बनाया जाता है। इनका खेत में उपयोग करने से मिट्टी में पोषक तत्वों की वृद्धि के साथ-साथ जैविक गतिविधियों का विस्तार होता है। जीवामृत का महीने में एक अथवा दो बार खेत में छिड़काव किया जा सकता है। जबकि बीजामृत का इस्तेमाल बीजों को उपचारित करने में किया जाता है। इस विधि से खेती करने वाले किसान को बाजार से किसी प्रकार की खाद और कीटनाशक रसायन खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है। फसलों की सिंचाई के लिये पानी एवं बिजली भी मौजूदा खेती-बाड़ी की तुलना में दस प्रतिशत ही खर्च होती है ।
असफल है जैविक खेती
सुभाष पालेकर वर्तमान में प्रचलित जैविक कृषि को भी सही नहीं मानते। कृषि वैज्ञानिकों एवं इसके जानकारों के अनुसार फसल की बुवाई से पहले जो वर्मीकम्पोस्ट और गोबर खाद खेत में डाली जाती है, इसमें निहित 46 प्रतिशत उडऩशील कार्बन हमारे देश में पडऩे वाली 36 से 48 डिग्री सेल्सियस तापमान के दौरान खाद से मुक्त हो वायुमंडल में निकल जाता है। इसके अलावा नायट्रस, ऑक्साइड और मिथेन भी निकल जाती है और वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों के निर्माण में सहायक बनती है। हमारे देश में दिसम्बर से फरवरी केवल तीन महीने ही ऐसे है, जब तापमान उक्त खाद के उपयोग के लिये अनुकूल रहता है। इसलिए इस तरह के खादों से किसान को लाभ होने की बजाय हानि ही होती है।
वर्मीकम्पोस्ट खाद बनाने में इस्तेमाल किये जाने वाले आयातित केंचुओं को भूमि के उपजाऊपन के लिये हानिकारक मानने वाले श्री पालेकर बताते है कि दरअसल इनमें देसी केंचुओं का एक भी लक्षण दिखाई नहीं देता। आयात किया गया यह जीव केंचुआ न होकर आयसेनिया फिटिडा नामक जन्तु है, जो भूमि पर स्थित काष्ट पदार्थ और गोबर को खाता है। जबकि हमारे यहां पाया जाने वाला देशी केंचुआ मिट्टी एवं इसके साथ जमीन में मौजूद कीटाणु एवं जीवाणु जो फसलों एवं पेड़-पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं, उन्हें खाकर खाद में रूपान्तरित करता है। साथ ही जमीन में अंदर बाहर ऊपर नीचे होता रहता है, जिससे भूमि में असंख्यक छिद्र हो जाते हैं, जिससे वायु का संचार एवं बरसात के जल का पुनर्भरण हो जाता है। इस तरह देसी केंचुआ जल प्रबंधन का सबसे अच्छा वाहक है। साथ ही खेत की जुताई करने वाले हल का काम भी करता है ।
शून्य बजट प्राकृतिक खेती जैविक खेती से भिन्न है तथा ग्लोबल वार्मिंग और वायुमंडल में आने वाले बदलाव का मुकाबला एवं उसे रोकने में सक्षम है। इस तकनीक का इस्तेमाल करने वाला किसान कर्ज के झंझट से भी मुक्त रहता है। एक अनुमान के अनुसार अब तक देश में करीब 40 लाख किसान इस विधि से जुड़े हुये हैं।