सिमरिया धाम में लगेगा महाकुंभ

सिमरिया धाम में लगेगा महाकुंभ

श्याम किशोर सहाय
लेखक लोकसभा टी.वी. के संपादक हैं।

यह सुनकर आपको थोड़ा आश्चर्य हो सकता है कि रामेश्वरम में कुछ वर्ष पूर्व कुंभ उत्सव मनाया गया था। देश के अलग-अलग पौराणिक स्थलों पर कुंभ उत्सव के पुनर्जागरण अभियान के तहत हुए इस आयोजन में अन्य कुंभ मेलों की भाँति भारी भीड़ नहीं थी। लाखों की तुलना में यहां कुछ हजार लोग ही थे। लेकिन जितने भी लोग इसमें सहभागी हुए, उन्हें इस अभियान का हिस्सा बनने का गर्व था।
यह अभियान प्रारंभ किया था बिहार में बेगुसराय के निकट स्थित सिमरिया धाम के स्वामी चिदात्मन जी महाराज ने। इस बात के काफी प्रमाण मिलते हैं कि वैदिक युग में बारह स्थानों पर कुंभ की परंपरा थी। आगम शास्त्र में शामिल चौंसठ यामलों में एक रुद्रयामलतंत्र में बारह कुंभ स्थलियों का वर्णन स्पष्ट रूप से मिलता है। दूसरे कई पुराणों और शास्त्रों में भी इसका वर्णन है। विष्णु पुराण में उल्लेख है – ‘देवानां द्वादशहोभिर्भत्र्येद्वादशवत्सरै: जायंते कुंभ पर्वाणि तथा द्वादश संख्ययाÓ।
विदेशी आक्रमणों और दूसरे कई कारणों से यह परंपरा लुप्त हो गयी। बीते लगभग छह वर्षों से इन सुप्त कुंभ स्थलियों के पुनर्जागरण का अभियान चल रहा है। बिहार के मिथिलांचल इलाके के बेगूसराय जिले में गंगा के मनोरम तट पर स्थित सिमरिया से यह अभियान प्रारंभ हुआ। बद्रीनाथ, जगन्नाथपुरी, द्वारका और रामेश्वरम में यह आयोजन सफलतापूर्वक किया जा चुका है।। इस प्रकार चार परंपरागत स्थानों के अतिरिक्त पाँच अन्य स्थानों पर भी कुंभ मेले के आयोजन की देश में शुरुआत हो चुकी है। इसी कड़ी में इस वर्ष सिमरिया में महाकुंभ का आयोजन होने वाला है। सिमरिया को समुद्र मंथन की पौराणिक घटना के केन्द्र स्थल के रूप में जाना जाता है। सिमरिया में इससे पूर्व भी कुंभ का आयोजन किया जा चुका है। सबसे पहले इन सुप्त कुंभ स्थलियों के पुनर्जागरण का विचार सिमरिया में गंगा पुत्र और फलाहारी बाबा के नाम से प्रसिद्ध स्वामी चिदात्मन जी महाराज के मन में आया। उनके इस पावन विचार को बिहार के दरभंगा स्थित कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विवि के विद्वत परिषद ने प्रस्ताव पारित कर सहर्ष सहमति दी। अन्यान्य विश्व विद्यालयों के वेदाचार्य, ज्योतिषाचार्य और विद्वानों ने अपना समर्थन दिया। देश भर के इतिहासकारों, समाजशास्त्रियों और बुद्धिजिवियों ने इस पहल को ऐतिहासिक करार दिया। कई पंचांगों में विधिवत रूप से इसका उल्लेख आने के बाद द्वादश कुंभ अभियान ने अब समाज के मानस में अपना एक स्थायी स्थान बना लिया है।
दरअसल ज्योतिष में कुंभ एक योग है। सूर्य, चंद्रमा और वृहस्पति के विशेष राशियों में आने पर कुंभ योग बनता है। राशियां बारह हैं, महीने बारह हैं और आदित्य यानी सूर्य भी बारह हैं। इस तरह से वर्ष भर में अलग-अलग महीने में सूर्य देव अलग-अलग राशियों में पूरे एक महीने के लिए रहते है। वृहस्पति बारह वर्ष में सूर्य का एक चक्कर लगाते हैं। इस तरह से बारह अलग-अलग वर्ष अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग महीनों में कुंभ का योग बनता है। इस दृष्टि से महीने, राशियां और आदित्य बारह हैं तो कुंभ भी बारह होने चाहिए।
वैदिक युग में ऐसा था भी। पराधीनता के काल में कई परंपराएं लुप्त हुईं तो कुंभों का भी लोप हो गया। एक समय तो सभी कुंभ लगभग लुप्तप्राय थे। बाद में जगदगुरू शंकराचार्य के प्रभाव में हिन्दूओं के संगठन और दशनामी परंपरा के गठन के बाद इन कुंभ मेलों का पुराना स्वरूप लौट पाया। फिर भी बारह में से केवल 4 कुंभ मेलों को ही स्थापित किया जा सका। शेष आठ कुंभ मेलों के विषय में कह दिया जाता था कि वो स्वर्ग में लगते है। लेकिन किसी ये यह बताने का कष्ट नहीं किया कि स्वर्ग है कहां।
जिस समुद्र मंथन की चर्चा हर पौराणिक ग्रंथ में मिलती है उस स्थान की भी स्पष्ट पहचान अभी तक कहीं नहीं थी। शोध में यह बात साफ हो गयी है कि बिहार में स्थित मिथिलांचल की धऱती ही समुद्र मंथन की केन्द्रीय स्थली थी। सिमरिया से कुछ किलोमीटर की दूरी पर ही मंदार पर्वत और वासुकीनाथ धाम स्थित है। कहते हैं मंदार को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बना कर ही समुद्र मंथन किया गया था। मिथिलांचल के इलाके में ऐसे और भी प्रमाण मिलते हैं जिससे यह साबित होता है कि इसी भूभाग पर समुद्र मंथन हुआ था।
प्रश्न उठता है कि क्या वहां समुद्र था? दरअसल यह घटना बहुत पहले की है। कहा जाता है कि हिमालय का उद्भव समुद्र से हुआ है। हिमालय के शिखर पर ऐसे जीवाश्म मिले हैं जो समुद्र के अंदर पाए जाने वाले जीवों के है। इसी आधार पर कहा जा सकता है कि किसी समय इस हिस्से में समुद्र अवश्य रहा होगा। वैसे भी मिथिलांचल और सिमरिया से बंगाल की खाड़ी की दूरी बहुत अधिक नहीं है। अमृत मंथन का केंद्र रहे इसी पावन सिमरियाधाम में इस वर्ष तुला की संक्रांति में महाकुंभ का आयोजन होने वाला है। इस महाकुंभ की तैयारी अभी से शुरू हो चुकी है।
मिथिलांचल की पवित्र तीर्थनगरी के रूप में विख्यात सिमरिया गंगा घाट इन दिनों स्वर्गलोक में तब्दील हो गया है। एक माह तक चलनेवाले राजकीय कल्पवास मेले को लेकर सिमरिया गंगा घाट में अद्भुत छटा देखने को मिल रही है। इसी का नतीजा है कि गंगा घाट के किनारे बालू के ढेर पर कल्पवासियों के द्वारा बनाये गणे पर्णकुटीर में आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा है। सैकड़ों की संख्या में गंगा के किनारे बने इस पर्णकुटीर में अमीर व गरीब सभी एक समान दिखाई पड़ रहे हैं। 26 अक्तूबर से कल्पवासी अहले सुबह से हर-हर गंगे के जयघोष के बीच कल्पवासी गंगा में डुबकी लगा कर अपने को धन्य समझेंगे। सिमरिया में कल्पवास मेला कोई नयी बात नहीं वरन यह वैदिक काल से ही चला आ रहा है। इस कल्पवास मेले की जानकारी देते हुए सिमरिया सिद्धाश्रम के प्रमुख स्वामी चिदात्मन जी महाराज कहते हैं कि वेदांग ज्योतिष के आधार पर ब्रह्मा जी का एक दिन एक कल्प माना गया है। जो व्यक्ति वैदिक विधि से कल्पवास में रह कर स्नान, पूजन, यज्ञ, दान आदि करते हैं, तो ब्रह्माजी के एक दिन में किये गये कार्य के पुण्य के अधिकारी होते हैं। ब्रह्माजी का एक दिन चौदह मनुओं का काल कहा गया है।
कल्पवास वर्ष का तीन महीना कार्तिक, माघ और वैशाख विशिष्ट माना गया है। मिथिलांचल की अंतिम सीमा सिमरिया नाम से विख्यात रही है। इसके पूर्व अमृत वितरण के समय इसका नाम सामृता पड़ा और अमृत वितरण के पहले आगम व निगम के अनुसार इसका नाम शालमणि वन था।
सिमरिया में न सिर्फ उत्तरवाहिनी गंगा हैं वरन गंगा का संगम है। इसलिए इस धरा धाम पर आदि कुंभ स्थली सिमरिया धाम का सतयुग से ही अर्थात वैदिक युग से ही कल्पवास के लिए विशिष्ट स्थान रहा है। विदेह कुल में भी सिमरिया की ख्याति देश-विदेश में थी। कलियुग में इस स्थान की महत्ता में थोड़ी कमी आयी परंतु स्वतंत्रता के बाद इस स्थान का गौरव दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है। इसी का नतीजा है कि प्रत्येक वर्ष कल्पवास मेले में आस्था का सैलाब पूरे कार्तिक मास में देखने को मिलता है। बेगूसराय के अलावा दरभंगा, समस्तीपुर, मधुबनी, सीतामढ़ी, लखीसराय, शेखपुरा, मुंगेर समेत अन्य जगहों से बड़ी संख्या में कल्पवासी यहां पहुंचते हैं और बालू के ढेर पर गंगा किनारे रह कर एक माह तक हर-हर गंगे के बीच गंगा में डुबकी लगा कर माँ गंगा का आशीर्वाद लेते हैं।
सिमरिया कल्पवास मेले की बढ़ती महत्ता और दिन-प्रतिदिन लोगों में इस मेले के प्रति बढ़ रही आस्था के कारण राज्य सरकार ने वर्ष 2006 में इस कल्पवास मेले को राजकीय मेले के रूप में घोषित किया था। इसके बाद से इस कल्पवास मेले में आनेवाले कल्पवासियों की तमाम सुविधाओं का ख्याल शासन और प्रशासन के द्वारा किया जाता है।
हालांकि राजकीय मेले के बाद जो सिमरिया का जो विकास होना चाहिए, वह अभी तक नहीं हो पाया है। इस मेले की महत्ता तब बढ़ गयी, जब 2011 में यहां अर्धकुंभ लगा। इस दौरान यहां लाखों लोगों ने अलग-अलग तिथियों में गंगा स्नान कर इस आयोजन को सफल बनाया था। वर्ष 2017 का वर्ष सिमरिया के लिए ऐतिहासिक साबित होगा, जब महाकुंभ में सिमरिया में आस्था का जनसैलाब स्नान के लिए उमड़ पड़ेगा। इस कुंभ का वर्ष पूर्व से ही घोषित किया जा चुका है।
सिमरिया गंगा तट पर पर्णकुटीर में कल्पवासियों की भक्ति से पूरा इलाका भक्तिमय हो गया है। पर्णकुटीर से निकल रहे अमृतवाणी और साधु-संतों के प्रवचन को लेकर सिमरिया गंगा घाट स्वर्गलोक में तब्दील हो गया है। सबसे मनोरम छटा संध्या के समय में देखने को मिलती है। काफी दूर तक बिजली की जगमगाती रोशनी से सराबोर कल्पवासियों के पर्णकुटीर एवं गंगा के किनारे कल्पवासियों के द्वारा आरती व दीप यज्ञ की अद्भुत छटा देखने को मिलती है। राजेंद्र पुल से होकर गुजरनेवाले लोग इस दृश्य को देख कर भाव-विभोर हो उठते हैं।
कई लोग तो कुछ समय के लिए सिमरिया गंगा घाट में रुक कर इस मनोरम दृश्य का अवलोकन कर लेते हैं। राजकीय मेला घोषित होने के बाद से राज्य सरकार के निर्देश पर जिला प्रशासन हर संभव कल्पवासियों को तमाम सुविधाएं मुहैया कराने का दावा करती हैं। इसे धरातल पर उतारने का सकारात्मक प्रयास भी किया जाता है। इसके बाद भी कल्पवासी प्रशासनिक सुविधा से खिन्न दिखाई पड़ते हैं।
इसका प्रमुख कारण है कि कल्पवासियों की कार्तिक माह में जिस तरह की उपस्थिति होती है और कल्पवास करनेवाले लोगों के परिजनों का पूरे माह तक आना-जाना जारी रहता है। उसके मुताबिक सिमरिया गंगा घाट में एक भी सुविधासंपन्न धर्मशाला नहीं है। इसके अलावे कल्पवासियों को उपलब्ध कराये जानेवाले सामान के दाम मनमाने तरीके से लिए जाते हैं। पूर्व में कल्पवासियों के लिए निर्धारित मूल्य तालिका बनाया जाता था, जिसका इन दिनों पालन नहीं हो पाता है। नतीजा है कि कल्पवासियों को मंहगी दर पर सामान की खरीदारी करनी पड़ती है। इस दिशा में जिला प्रशासन को ठोस पहल करने की जरूरत है।