सच्च और खरा गाँधीवादी अनुपम मिश्र

सच्च और खरा गाँधीवादी अनुपम मिश्र

प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज
लेखक गांधी विद्या संस्थान,
वाराणसी के निदेशक हैं।

अनुपम मिश्र नहीं रहे। वे एक सच्चे और खरे गाँधीवादी थे। उनके जैसा कोई व्यक्ति गाँधीवादियों के बीच स्वाधीनता प्राप्ति के बाद से आज तक नहीं हुआ। गाँधी जी के नाम से जुड़े जितने भी श्रेष्ठ गुण हैं- सत्यनिष्ठा, अहिंसा, सदाचार, देशभक्ति, धर्मनिष्ठा, लोकनिष्ठा, भारतीय समाज की ज्ञान-परम्परा और मूल्य-परम्परा के प्रति गहरा आदर और श्रद्धा तथा प्रमाण-भावना, सबके प्रति आत्मीय व्यवहार, सत्ता और सम्पत्ति की धमक में न आना, पदविहीन और धनविहीन छोटे से छोटे व्यक्ति के साथ अत्यन्त सम्मान और आत्मीयता के साथ संवाद तथा पदस्थ और धनवान बड़े से बड़े व्यक्ति के साथ निर्भय रहकर सच्ची बात कहना तथा पूरे सम्मान के साथ उनका पक्ष सुनना – ये सभी बातें जैसी अनुपम मिश्र पायी जाती थीं, वैसा सत्तर वर्ष से कम आयु के किसी भी गाँधीवादी में दूर-दूर तक देखने को नहीं मिलती।
एक ऐसे दौर में जब गाँधीवाद के नाम पर प्रायः कम्युनिस्ट विचारों का खोखला दोहराव करने वाले लोग शासन द्वारा प्रदत्त विविध सुविधाओं को भोग रहे हैं, अनुपम मिश्र इन सबसे अलग पूरी तरह भारतीय और संस्कारी तथा तपस्वी व्यक्ति थे। उनके जैसी सादगी में जीने वाला और फिर भी सुरुचि तथा सौन्दर्य संवेदना से भरपूर व्यक्ति वैसे भी विरले ही होते हैं।
अनुपम ने संस्कृत मेें एम.ए. किया था। वे संस्कृत साहित्य के अच्छे अध्येता थे। इसके साथ ही श्रेष्ठ कवि भवानीप्रसाद मिश्र के सुपुत्रा होने के कारण वे हिन्दी साहित्य और हिन्दी काव्य से भलीभाँति परिचित थे तथा उसकी बारीकियों के भी जानकार थे। भारत की ज्ञान परम्परा में सम्पूर्ण निष्ठा रखते हुए अनुपम युवावस्था के आरम्भ में समाजवादी युवजन सभा से जुड़े। उन दिनों मैं भी समाजवादी युवजन सभा का सदस्य था। बनवारी और अनुपम घनिष्ठ मित्रा थे। दिल्ली विश्वविद्यालय के पुषराज, मिथिलेश चतुर्वेदी आदि अनेक लोग उन दिनों युवजन सभा के सक्रिय सदस्य थे।
कुछ समय बाद सम्भवतः पिताजी के प्रभाव से और घर के परिवेश से अनुपम गाँधी जी का अध्ययन करने लगे और वे पूरी तरह गाँधी जी के विचारों में रंग गये। उन्होंने जब अपने पैतृक क्षेत्रा मालवा में आधुनिक कृषि और सिंचाई की मूर्खतापूर्ण भरमार के असर से मालवा की मिट्टी को, विशेषकर होशंगाबाद क्षेत्रा के गाँव-गाँव के खेतों और गाँवों की गलियों को जरूरत से ज्यादा पानी के कारण दलदली सी होते देखा तो वे चौंक गये और उन्होंने मिट्टी बचाव अभियान छेड़ा। इसके बाद वे परम्परागत खेती, कृषि प्रबन्ध, भूमि प्रबन्ध, जल प्रबन्ध, वन प्रबन्ध और समाज-प्रबन्ध के सभी रूपों का गहराई से अध्ययन करते चले गये। यह अध्ययन स्वाभाविक ही केवल पुस्तकीय नहीं हो सकता था। उन्होंने होशंगाबाद क्षेत्रा के अनेक गाँवों का बार-बार अध्ययन किया, सयाने लोगों से बात की और साथ ही पवारखेड़ा सहित अन्यत्रा कार्यरत आधुनिक कृषि विशेषज्ञों, भू संरक्षण अधिकारियों और सिंचाई विभाग के अधिकारियों से भी कई बार बातें कीं। इससे उनके समक्ष यह स्पष्ट हो गया कि आधुनिक खेती के सरकारी विशेषज्ञ बहुत कम जानते हैं और जितना जानते हैं, उसे भी अपनी सरकार को बताने से डरते हैं। वे केवल ऊपर से आये हुक्म को बजाना जानते हैं। यह देखकर अनुपम को गहरा आघात भी लगा और आश्चर्य भी हुआ।
तब तक हम सब लोग भारत के लोकतंत्रा मेें गहरी श्रद्धा रखने के कारण यही मानते थे कि सरकार हमारी है, हमारे कल्याण और उत्कर्ष के लिए काम करती है और हमारे ज्ञान तथा हमारे मूल्यों और हमारी भावनाओं की प्रतिनिधि है। परन्तु इन अध्ययनों के बाद यह लगने लगा कि विधायिका के लिए प्रतिनिधियों का चयन भले मतदाता के रूप में हम लोग करते हैं, परन्तु कार्यपालिका और न्यायपालिका ब्रिटिश भारतीय अर्थात् यूरो-क्रिश्चियन और सोवियत ढाँचे के विचित्रा सम्मिश्रण से संचालित है और यह सम्मिश्रण विशेषकर श्री जवाहरलाल नेहरू ने अन्य यूरो-भारतीय अधिकारियों के साथ विमर्श कर रचा है। इसमें भारत की ज्ञान परम्परा को पिछड़ी और बासी तथा दमन और रूपान्तरण के योग्य माना जाता है तथा यूरोप और सोवियत संघ की मिश्रित नकल करते हुए शासकों द्वारा इच्छित दिशा में भारत की भूमि, भवन, भाषा, भोजन और भूषा- सभी को रूपान्तरित करने की योजना से प्रचण्ड क्रियाशीलताएँ चल रही हैं।
वस्तुतः हम लोग डॉ. राममनोहर लोहिया से आकृष्ट इसीलिए हुए थे कि संसोपा के घोषणापत्रा में स्वदेशी भाषा, भूषा, भवन और भोजन पर आग्रह रहता था और उसे ही आगे बढाना भारत सरकार का कर्त्तव्य है, यह घोषित किया जाता था। समता का अर्थ अन्याय और विषमता की समाप्ति है, यूरोप का अनुकरण नहीं, क्योंकि यूरोप स्वयं अत्यन्त विषम और अन्यायपूर्ण व्यवस्था से भरा हुआ है। डॉ. लोहिया इस बात को बार-बार कहते थे। परन्तु 1967 में लोहिया जी के जाने के बाद उनकी वह भाषा बोलने वाला कोई भी व्यक्ति समाजवादी आन्दोलन में उभर कर नहीं आया। इसीलिए अनुपम और हम सभी लोग ऐसे समाजवाद से दूरी का अनुभव करने लगे। इसी प्रक्रिया में अनुपम गाँधी विचार और कर्म में डूबते चले गये।
अनुपम प्रत्येक काम बहुत साफ-सुथरे ढंग से करते थे। सुरुचि और परिष्कार उनके स्वभाव में था। संयमित और मर्यादित जीवन, सात्त्विक भोजन- यह सब उनका स्वभाव था। इसीलिए इन बातों के प्रति कभी कोई सजगता भी उन्हें आवश्यक नहीं लगी। वे अनायास ही ऐसा जीवन जी रहे थे। वे इन विषयों पर कभी कोई भाषण नहीं देते थे, बात भी नहीं करते थे। जीते थे और जीना सिखलाते थे।
भवानीप्रसाद मिश्र, जिन्हें उनके घर के लोग और हम सब लोग मन्ना कहते थे, एक गौरवशाली और सात्त्विक पिता थे। उन्होंने बड़े दुलार से परन्तु साथ ही संयमपूर्ण जीवन पर आग्रह के साथ सबको पाला। अनुपम में ये संस्कार गहरे थे। जब अनुपम गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान में गाँधी मार्ग के सम्पादन में सहायक का कार्य करने लगे तो धीरे-धीरे उन्होंने पूरे काम को ऐसे सँभाल लिया, कि मन्ना निश्चिन्त हो गये और वे केवल कतिपय विशिष्ट रचनाओं को पसन्द कर अनुपम को दे देने के अतिरिक्त शेष सब बातें अनुपम पर छोड़कर प्रसन्न रहने लगे। बाद में गाँधी मार्ग के सम्पादक मण्डल में मैं स्वयं और श्री जैनेन्द्र कुमार जैसी विभूतियाँ भी शामिल हुईं, दार्शनिक श्री रंगनाथ रामचन्द्र दिवाकर तथा श्री राधाकृष्ण तो थे ही। परन्तु हम सभी ने पाया कि केवल यदाकदा एक-दो सुझावों के अतिरिक्त हमारे पास करने के लिए कुछ नहीं था। क्योंकि अनुपम सारा ही काम सँभालते थे। इसीलिए बाद में उन्हें ही सम्पादन का सम्पूर्ण दायित्व दे दिया गया। मेरे पास तो एक ही काम बचा। अनुपम के कहने पर अथवा कभी-कभी दिवाकर जी या राधाकृष्ण जी के कहने पर कोई विशेष लेख लिख देना। वह भी इसलिए कि जब कभी गाँधी मार्ग के किसी विशेषांक की योजना बनती, तो अनुपम उस विषय में पहले आगे बढ़कर कोई भी सुझाव नहीं देते थे और यह काम सम्पादक मण्डल को ही करना पड़ता था। विचार-विमर्श के क्रम में वे अवश्य अनेक अनूठे सुझाव देते थे, जिससे उनकी प्रतिभा का प्रमाण मिलता था।
सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन में अनुपम ने भी सक्रिय भाग लिया। परन्तु शासन का ध्यान उनके पिता की ओर था, इसलिए अनुपम के विरुद्ध कभी वारण्ट नहीं जारी हुआ। अन्यथा उन दिनों दमन की जो स्थिति थी, उसमें अनुपम का जेल जाना सुनिश्चित ही था। आपातकाल के दिनों में जहाँ दिल्ली के अधिकांश लेखक और कवि संजयवादी हो गये थे, भवानीप्रसाद मिश्र की ही तरह अनुपम भी अविचलित रहे। उन्होंने भूमिगत रूप से सक्रिय अनेक लोगों की यथासम्भव सहायता की। गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान में ऐसे लोगों को दो-चार दिन के लिए रुकने की सुविधा राधाकृष्ण जी ने मौखिक रूप से दे रखी थी, इस कार्य का संयोजन अनुपम बहुत कुशलता से करते थे।
जे.पी. जब गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान में रुकते थे तो लिखा-पढी के बहुत सारे काम राधाकृष्ण जी अनुपम को भी सौंप देते थे। अनुपम शान्त रहकर दिया गया काम कुशलता से करते थे। जब अज्ञेय ने एवरीमेन्स का सम्पादन जे.पी. के कहने पर सँभाला, तो प्रभाष जोशी के साथ अनुपम ने भी उसमें काफी काम किया। उन दिनों प्रभाष जोशी गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान में ही रहते थे और अनुपम अपने पिता के साथ गाँधी स्मारक निधि के आवास में रहते थे।
अनुपम को साहित्य, रंगकर्म और फिल्मों की भी गहरी समझ थी। वे अनेक विदेशी फिल्मों के विषय में जानते थे। परन्तु उनकी निष्ठा भारत के लोक जीवन में होने के कारण वे भारत की मिट्टी और खेती तथा भूमि, जल और वन के प्रबन्धन से जुड़े कामों के अध्ययन में आगे बढ़ते गये। धीरे-धीरे वे पर्यावरण के विशेषज्ञ बन गये। राधाकृष्ण जी के कहने पर उन्होंने पर्यावरण कक्ष का दायित्व सँभाला। इस दायित्व को सँभालते हुए भी वे गाँधी मार्ग के सम्पादन का काम पूर्ववत करते रहे और दोहरे और बल्कि तिहरे काम करते हुए भी वे वेतन इकहरा ही लेते रहे। यह केवल अनुपम ही कर सकते थे। देश के सभी अंचलों में उनका प्रवास इन्हीं अध्ययनों के लिए होता था। विदेश भी वे इसी काम से गये। धीरे-धीरे न केवल भारत बल्कि यूरोप और अमेरिका के भी अनेक पर्यावरण आन्दोलनों और उसमें लगे व्यक्तियों से उनके आत्मीय सम्बन्ध बन गये। भारत में चल रहे ऐसे सभी कामों की जानकारी अनुपम को रहती थी और वे उसमें यथाशक्ति सहयोग देते थे। उन्होंने अनेक प्रतिभाएँ चुनीं और उनको आगे बढाया।
जब विज्ञान और पर्यावरण केन्द्र के श्री अनिल अग्रवाल और सुश्री सुनीता नारायण ने भारत के पर्यावरण पर पहली रिपोर्ट तैयार की तो उसमें भी अनुपम का विशेष योगदान था और उसी क्रम में अनिल जी ने उस रिपोर्ट को हिन्दी में तैयार करने का दायित्व सँभालने का अनुरोध अनुपम से किया। काम बहुत महँगा और खर्चीला तथा श्रमसाध्य था। अनुपम ने उसे खुशी से सँभाल लिया। इसके अनुवाद और सम्पादन तथा संवर्धन और परिष्कार में अनेक चुने हुए लोगों का साथ अनुपम ने बड़ी कुशलता से लिया। साथ ही रिपोर्ट की प्रस्तुति को सुन्दर और सुरुचिपूर्ण बनाने के लिए अनुपम ने दिलीप चिंचालकर का भी सहयोग प्राप्त कर लिया। बाद में दिलीप तो उस काम में डूब ही गये। अनुपम की पत्नी मंजुश्री भी उस काम में पूरी तरह उनकी सहयोगी रहीं। इसके साथ ही ज्योति वाघ और शीना जैसे अपने कनिष्ठ सहयोगियों को भी उन्होंने इस काम में प्रशिक्षित किया और दक्ष बनाया। सहयोगियों को माँजना कोई अनुपम से सीखे। उनके व्यवहार में कभी भी अपने बड़े होने का कोई भाव भी नहीं रहता था जबकि उन दिनों अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उनकी ख्याति हो गयी थी।
राजस्थान में जल संग्रह और जल प्रबन्धन की महान तथा सुदीर्घ परम्परा के विषय में व्यवस्थित अध्ययन के लिए अनुपम ने राजस्थान के सभी महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों का अनेक बार भ्रमण किया और इसके परिणामस्वरूप उनकी प्रसिद्ध पुस्तक राजस्थान की रजत बूँदें सामने आयी। इस प्रक्रिया में वे अनेक बार मुझे भी अपने साथ ले गये और महलनुमा बावड़ियाँ तथा उनके निर्माताओं के वंशजों को देखकर तथा उनकी प्रतिभा जानकर मैं आश्चर्यचकित रह गया। उन्होंने अनेक गजधरों और बावड़ी निर्माताओं से भेंट की, जिनमें कुछ में मैं भी साथ था और अनुपम ने बड़े प्रेम से उनसे इस निर्माण की पूरी प्रक्रिया पूछी, जो आधुनिक अभियांत्रिकी के पूर्व भारत में विद्यमान अनूठी, अद्वितीय और अतिउत्कृष्ट अभियांत्रिकी का प्रमाण है। इन्हें बनाने वाले सबसे पहले अपने चित्त में ही सारा नक्शा बना लेते हैं। जब हमने इनमें से एक से पूछा कि क्या आप कोई नक्शा वगैरह निर्माण के पूर्व बनाते हैं, तो उन्होंने माथे पर हाथ ले जाकर कहा- सारा नक्शा यहाँ रहता है।
कैसे बूूँद-बूँद कर प्राप्त करने वाले दुर्लभ जल को राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके के लोग जतन से संचित करते हैं और कैसे उस खारे पानी के इलाके में मीठे पानी के गहरे स्रोत सुलभ हो जाते हैं, यह हमने उसी प्रक्रिया में जाना। परम्परागत जल प्रबन्धन का गहुत गहराई से अध्ययन अनुपम ने किया और उसे फिर उतनी ही सुन्दरता से और सुगम भाषा में पूरे अर्थ गौरव के साथ प्रस्तुत किया। यह अनुपम के लेखन की अद्वितीय विशेषता है। इस विषय में वे अपने पिता के सच्चे और श्रेष्ठ उत्तराधिकारी हुए।
देशभर में परम्परागत रीति से तालाब कैसे बनते थे, उनमें सम्पूर्ण समाज का कैसा योगदान रहता था और कैसे राजा तथा अन्य बड़े लोग भी उसमें एक सहज सहभागी के रूप में ही सम्मिलित होते थे, इसका सुन्दर वर्णन अनुपम ने आज भी खरे हैं तालाब में किया है। उत्तराखण्ड के लोग किस प्रकार वहाँ जल प्रबन्धन करते हैं और कैसे दुर्गम इलाके में भी पानी को सँभाला जाता है, इसका भी अनुपम ने विस्तार से अध्ययन और वर्णन किया है। किस प्रकार वहाँ छोटी सिंचाई योजनाएँ और विद्युत योजनाएँ ही सफल होंगी तथा टिकेंगी, इसे भी उन्होंने विस्तार से लिखा था। टिहरी बाँध के खतरे बताने वाले लोगों में वे अग्रणी थे।
देश के अनेक वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों के काम से सम्पूर्ण देश को परिचित कराने में उनकी भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। स्वयं दिल्ली में परम्परागत जल प्रबन्धन कैसा था, इसके अध्ययन के लिए उन्होंने एक सक्षम टोली बनायी थी। ऐसे अच्छे कामों में अभी भी समाज का कैसा सहयोग प्राप्त होता है, इसके अनेक उदाहरणों में से दिल्ली का जुड़ा एक उदाहरण है।
जब यमुना तट पर स्थित अखाड़ों और मन्दिरों से सहयोग लेने अनुपम और उनकी टोली गयी, तो उनमें से एक अखाड़ा मास्टर चन्दगीराम का भी था, जो कुश्ती में विश्वविजेता थे। अनुपम वहाँ सुबह ही पहुँचे। चन्दगीराम जी ने व्यायाम रोककर उनका स्वागत किया और थोड़ी ही देर में कन्धे पर गमछा डालकर उनके साथ यह कहते हुए चल दिये कि- इस पुण्य कार्य में मुझसे जो भी सहयोग हो सकेगा और जिस-जिस से बात करनी होगी, मैं खुशी-खुशी करूँगा।
अनुपम को इसीलिए समाज पर बहुत भरोसा था। वे कभी निराशा या उदासी की बातें नहीं करते थे। देश के इतने अधिक लोगों के कामों की उन्हें जानकारी थी और वे इन्हें देश में फैलाने का काम भी इतना अधिक करते थे कि आश्चर्य होता था। ऊपर से वे कहते थे कि- अपन तो बस डाकिया हैं। इधर की डाक उधर पहुँचाते रहते हैं।
उनकी सरलता और निश्छलता अनूठी थी। देश में गाँधीवादी हों या कोई अन्य, जहाँ भी कोई अच्छा काम होता था और उन्हें इसकी जानकारी मिलती थी, तो वे उसके बारे में देश को बताना चाहते थे और अपनी शक्ति भर बताते थे। गाँधी मार्ग में ऐसे कामों का निरन्तर प्रकाशन होता रहता था।
उनके ही परामर्श पर राजेन्द्र सिंह ने अलवर में काम शुरू किया। उस काम में उन्होंने अनेक प्रकार से सहायता की और उस काम के विषय में श्री धर्मपाल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री सुदर्शन जी सहित अनेक लोगों को जानकारी दी। ये लोग अनुपम जी की ही जानकारी के कारण वहाँ गये। उस काम को बढाने में अनुपम ने बड़ी मेहनत की।
ऐसे ही प्रयास वे देश के अनेक क्षेत्रों में करते रहे। जयपुर के पास चाकसू में जब श्री शरद जोशी ने कुछ प्रयास किया तो उसमें भी अनुपम ने भरपूर सहयोग दिया। फरहत को भी उन्होंने काफी आगे बढाया। अनेक अन्तर्राष्ट्रीय आयोजनों में स्वयं जाने के स्थान पर वे नये लोगों को भेजते थे।
इतनी सारी व्यस्तताओं के बीच वे निजी सम्बन्धों का भी सुन्दरता से और बहुत अच्छे ढंग से निर्वाह करते थे। उनके सम्बन्धियों का भी विशाल दायरा था और कोई न कोई दिल्ली आता ही रहता था। सभी के रुकने और सत्कार के विषय में वे सजग रहते। मंजुश्री इस अर्थ में उनके लिए अनन्य और श्रेष्ठ सहयोगिनी थीं। वे भी अपने पति के ही समान सात्त्विक और संस्कारी हैं तथा जबलपुर के संस्कार सम्पन्न नायक परिवार से आयी हैं। उनके बेटे शुभम में भी संस्कारों की ऐसी ही श्रेष्ठता है। अनुपम की माताजी भी सभी अतिथियों का समुचित ध्यान रखती थीं। उनके भाई और बहनों में भी पारिवारिक संस्कारों की गहरी छाप है।
निजी तौर पर वे मुझे प्रायः अपने व्यवहार से अभिभूत कर देते थे। एक दिन अचानक वे एक सुन्दर और अनूठा-सा खिलौना लेकर मुझे बिना बताये दिल्ली में मेरे घर आ पहुँचे। पता चला कि वे बेटे के लिए इसे लाये हैं। उसे चलाकर भी दिखाया। बेटा महीनों तक उस खिलौने से उल्लास के साथ खेलता रहा। अनुपम जैसे अत्यन्त व्यस्त व्यक्ति के द्वारा सम्बन्धों का यह निर्वाह चकित कर देने वाला था।
दिल्ली में अनुपम, बनवारी, राजीव, पुखराज और मैं एक मण्डली की तरह थे। हम लोगों ने बहुत सारे काम एक साथ किये और सैकड़ों बैठकें, गोष्ठियाँ आदि भी कीं। उन सभी की याद अनुपम के जाने के बाद मन को भिगा रही है। उनका व्यक्तित्व सचमुच बेजोड़ था और उनकी सात्त्विकता नमन के योग्य है।