संसार का सर्वाधिक संगठित समाज है हिन्दू

हिंदू समाज विश्व का सबसे संगठित समाज है हांलाकि आज भारत में तरह-तरह के ऐसे संगठन उत्पन्न हो गए हैं जो हिंदू समाज की मुख्य समस्या उसका असंगठित होना बताते हैं। इन संगठनों के इस विचार के पीछे स्वयं हिंदू समाज के विषय में उनका अज्ञान तो है ही, विश्व के विषय में भी गहरा अज्ञान है। पता नहीं चलता कि वह संसार के किस समाज से हिंदू समाज की तुलना करके उसे असंगठित बताते हैं।

विश्व के जितने भी समाज हैं उन से तुलना करके देखिए तो इस समय ईसाइयत और इस्लाम सबसे बड़े होने का दावा करते हैं जबकि ईसाईयत के संगठन का यह हाल है कि उसमें 50 से अधिक महत्वपूर्ण पंथ एक दूसरे के खून के प्यासे रहे हैं और उनके झगड़ों से समाज को बचाने के लिए ही सेकुलर स्टेट की धारणा से यूरोप का प्रत्येक नेशन स्टेट संगठित हुआ। तब भी यूरोप का प्रत्येक नेशन स्टेट ईसाईयत के किसी न किसी पंथ को अपना राजधर्म घोषित करता है, उसे विशेष राजकीय संरक्षण देता है और वहां की शिक्षा तथा न्याय व्यवस्था उसी पंथ के अनुशासन में चलती है। उदाहरण के लिए इंग्लैंड में प्रोटेस्टेंट ईसाई धर्म है, स्पेन और इटली में कैथोलिक ईसाई धर्म है ,अन्य अनेक देशों में लूथेरियन ईसाइयत राजधर्म है और कई में व्तजीवकवग ईसाइयत राजधर्म है। प्रत्येक देश की न्याय व्यवस्था और शिक्षा में संबंधित इसाई पंथ का ही आधिपत्य है। यही कारण है कि 50 से अधिक नेशन स्टेट में ईसाइयत बंटी हुई है और उनकी परस्पर भिन्न भिन्न मान्यताएं हैं।

इसी प्रकार मुस्लिम समाज में भयंकर विषमता है और इस्लाम का इतिहास ही अलग अलग कबीलों के खूनी झगड़े का इतिहास है जिसमें एक कबीला दूसरे कबीले को पूरी तरह सफाया कर डालने के लिए तत्पर रहा है। केवल लूट के माल में यानी माल ए गनीमा में और अन्य समाजों के प्रति क्रूरता और कठोरता के उन्माद के विषय में विभिन्न मुस्लिम पंथों में आम सहमति है। परंतु आपसी व्यवहार में वहां भयंकर विषमता है और ऊंच नीच है। यह बात भारत के शिक्षित समाज को या तो पता नहीं है, या हमारे नेता और संचार माध्यम जानबूझकर इसे छुपाते हैं।

जहां तक हिंदू समाज की बात है, इसकी एकता के विस्तार पर बात करने से पहले वर्तमान स्थिति पर एक नजर डाल लेना उचित होगा। 1947 ईस्वी के बाद भारत की हर पार्टी ने अंग्रेजों के बनाए कानून को ही भारत में लागू करने को अपना कर्तव्य घोषित कर रखा है जबकि संसार के प्रत्येक समाज में और संपूर्ण विश्व में यह सर्वानुमति है कि कानून का आधार प्रत्येक समाज में उस समाज की मान्यताएं और प्रथाएं होती हैं परंतु हमारी पार्टियां हिंदू समाज की प्रथाओं और मान्यताओं को भारत के कानून का कोई आधार नहीं मानती

इस विशेष स्थिति को ध्यान में रखकर समक्ष भारत की समाज व्यवस्था को देखना होगा। भारत की परंपरागत समाज व्यवस्था में यह मान्य रहा है कि सार्वभौम नियमों के अंतर्गत प्रत्येक समूह की व्यवहार संबंधी कुछ अपनी मान्यताएं और परंपराएं होती हैं और उस समूह में उनका ही पालन उचित है परंतु इन सभी मान्यताओं और परंपराओं का सार्वभौम नियमों अर्थात धर्म से अनुशासित होना आवश्यक है।

न्याय की व्यवस्था के लिए जाति पंचायत और खाप पंचायतें तथा ग्राम पंचायतें अनादिकाल से कार्यरत हैं तथा अपने समाज के आचरण के विषय में नियम बनाने का अधिकार इन पंचायतों को ही प्राप्त है। उन मर्यादाओं का अतिक्रमण न हो, केवल यह देखना राज्य का कर्तव्य माना जाता था।

जातियों और संप्रदायों में सुविभक्त हिंदू समाज संसार का सबसे संगठित और व्यवस्थित समाज है। इसकी स्वाभाविक इकाइयों को मान्यता न देकर उनको कोई विकार अथवा विकृति प्रचारित कर फिर नए रूपों में इसे संगठित करने का प्रयास के केवल विफलता और बिखराव को जन्म देता है और जन्म देगा। इस सामान्य से तथ्य को वर्तमान संगठन नहीं समझते।

जातियां कुलों का यानी परिवारों का समूह हैं और जाति व्यवस्था में एकमात्र विकृति उंच नीच की आई जिसे समाज ने सहज दूर कर दिया है। इसके बाद जाति नैसर्गिक ईकाई है और अपनी पहचान का आधार है, यूरोप में भी जन्म तथा हैसियत के आधार पर अनेक वर्ग बने हैं और भारी विषमतायें हैं। नागरिकों के जो नए संगठन बनते हैं उनमे भी बड़े छोटे के अनेक स्तर मान्य होते हैं और वे संगठन ही हैं। तब जाति नमक स्वाभाविक संगठन में क्या दोष है, यह बताने में लोग असमर्थ हैं।

अगर जाति की भावना प्रतिस्पर्धा देगी तो फिर विविध संगठनों में भी घोर प्रतिस्पर्धा संभव है। पार्टियों की गलाकाट प्रतिस्पर्धा सर्व विदित है, स्पष्ट नहीं है कि आपत्ति अनुचित व्यवहार से है या किसी संगठन के अस्तित्व से अनुचित व्यवहार पर अंकुश के लिए स्वयम संगठन का अस्तित्व नहीं नकारा जा सकता इसीलिए जाति के नाम पर अनुचित भेद व्यव्हार की आशंका से जाति का निषेध अनुचित है। वह एक ट्राइड एंड ट्रस्टड संगठन है। हमने इतनी सरलता से उंच नीच की भावना को दण्डनीय अपराध घोषित कर दिया। यही प्रमाण है कि यह भावना गहरी नहीं है।

शेष विषमतायें तो स्वयम राज्य कर्ता वर्ग में हैं और भीषण हैं। प्रथम से चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों का भेद भयंकर है। प्रथम में भी दर्जनों स्तर हैं। इनके निरंतर समाधान करते रहना पड़ता है।