शिक्षा की वैदिक दृष्टि

प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज
लेखक वरिष्ठ विचारक हैं।


कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा के अंतर्गत तैत्तिरीय आरण्यक के सातवें आठवें और नवम अध्याय को तैत्तिरीय उपनिषद कहा जाता है। इसमें से सातवें अध्याय को उपनिषद में शिक्षा वल्ली के रूप में स्मरण किया जाता है। इस शिक्षा वल्ली का प्रथम अनुवाक मंगलाचरण की तरह है। इसके उपरांत द्वितीय अनुवाक में ऋषि कहते हैं कि हम शिक्षा की व्याख्या करेंगे। तीसरे अनुवाक में वे इसका प्रयोजन बताते हैं कि इससे गुरु और शिष्य दोनों का ब्रह्मवर्चस और ब्रह्म तेज बढ़ेगा, यशस्वी होंगे और शिक्षा के द्वारा लोकों के विषय में, ब्रह्मांड की ज्योतियों के विषय में, सभी प्रकार की विद्याओं के विषय में, विश्व की समस्त प्रकार की प्रजाओं के विषय में तथा शरीर और उसके स्थूल,सूक्ष्म तथा कारण इन सभी रूपों के विषय में और इस प्रकार लोक, प्रजा, ज्योति, विद्या और जीवात्मा के समस्त स्तरों और रहस्यों के विषय में वर्णन करेंगे।

आगे इसी अध्याय में नौवे अनुवाक में बताते हैं कि स्वाध्याय और प्रवचन के मुख्य फल हैं – ऋत अर्थात कॉस्मिक यानी ब्रह्मांडीय व्यवस्था के नियमों का ज्ञान, सत्य का ज्ञान और सत्य पालन की सामथ्र्य, तप की शक्ति, आंतरिक शांति की सामथ्र्य, इंद्रिय निग्रह की सामथ्र्य, वेदों के पठन पाठन की सामथ्र्य, योग्य संतान प्रजनन की सामथ्र्य, कुटुंब की वृद्धि (प्रजाति) की सामथ्र्य, मनुष्यों के लिए आवश्यक समस्त व्यवहार की सामथ्र्य, यज्ञ की सामथ्र्य और अतिथियों की यथायोग्य सेवा की सामथ्र्य।
समस्त ज्ञान प्रदान कर आचार्य 11 वें अनुवाक में अनुशासन देते हैं –

”सदा सत्यनिष्ठ रहना, इसमें प्रमाद नहीं करना। धर्ममय ही आचरण करना, इसमें प्रमाद नहीं करना। शुभ कर्मों में कभी प्रमाद मत करना। देव कार्य और पूर्वजों की परंपरा को आगे ले जाने के कार्य में कभी चूक नहीं करना तथा संतति परंपरा गतिमय रखना। ऐश्वर्य की साधना में कभी प्रमाद मत करना और स्वाध्याय तथा ज्ञान विस्तार में कभी चूक नहीं करना। माता, पिता, आचार्य और अतिथि को देवतुल्य मानना (विद्या, आयु, तप और आचरण में श्रेष्ठ व्यक्ति जब घर पर बिना आमंत्रण आ जाएँ, तो वे ही अतिथि कहलाते हैं। आजकल के गेस्ट या मेहमान को अतिथि नहीं कहते।)। जो निर्दोष कर्म हैं, उनका ही आचरण करना। हमारे भी जो सुचरित हैं, अच्छे आचरण हैं, उनका ही अनुसरण करना, अन्य आचरणों का नहीं। जो श्रेष्ठ विद्वान आयें, उन्हे आसन देना, विश्राम देना और श्रद्धापूर्वक दान देना। विवेकपूर्वक संकोच सहित अपनी आर्थिक स्थिति के अनुरूप दान देना चाहिए। जब जहां कोई दुविधा या शंका हो, तो उत्तम विचार वाले सदाचारी से परामर्श कर कर्तव्य का निश्चय करना। यही आदेश है। यही उपदेश है।”

शिक्षा वल्ली के बाद आगे ब्रह्मानन्द वल्ली है और भृगु वल्ली है। शिक्षा वल्ली में वर्णित पुरुषार्थों को सम्पन्न कर चुके व्यक्ति में ही ब्रह्मानन्द की साधना और ज्ञान की सामथ्र्य आती है, अन्य में नहीं। वस्तुत: ब्रह्मानन्द का संबंध परा विद्या से है। तृतीय मुंडक में द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया वाला प्रख्यात मंत्र है जो आत्मा और परमात्मा संबंधी प्रभावशाली विवेचना है। इसलिए योग विद्या ही परा विद्या का मूल आधार है जिसके अनंत भेद या रूप संभव हैं। अत्यंत प्राचीन काल से भारत में यह ज्ञान था कि ज्ञान अनंत है। ब्रह्मानन्द वल्ली के आरंभ में ही उपनिषद मंत्र है – सत्यं ज्ञानं अनंतं ब्रह्म। ब्रह्म सत्य हैं, ज्ञान हैं, अनंत हैं। इसीलिए यहाँ विद्या के अनंत रूप सहज विद्यमान हैं। आयुर्वेद से लेकर योग तक प्रत्येक ज्ञान शाखा में ज्ञान के अनंत रूप वर्णित हैं।

इसीलिए विविध पंथ यहाँ सहज स्वीकृत हैं परंतु उन सबका एक सामान्य आधार है, जो सार्वभौम है, यह भी प्रारम्भ से ज्ञात है। ये सार्वभौम नियम या आधुनिक यूरोपीय पदावली में कहें तो सार्वभौम मूल्य हैं। ये ही सामान्य धर्म या सार्वभौम धर्म और मानव धर्म कहे गए हैं। अहिंसा अर्थात् किसी भी प्राणी या प्रकृति के किसी भी तत्व के प्रति द्रोह और द्वेष का सर्वथा अभाव, सत्य, संयम, अन्य के वस्तुओं के प्रति गिद्धदृष्टि नहीं रखना, मर्यादित भोग और उसके लिए मर्यादित संग्रह – ये पाँच सार्वभौम यम या मूल्य हैं। इनके सर्वमान्य आधार के साथ व्यक्ति, समूह, समाज और राष्ट्रों की अपनी विशेषताओं का सतत् संवर्धन ही अपरा विद्या का विस्तार है और जिन उपकरणों से अर्थात मन और बुद्धि की जिस सामथ्र्य से यह सब ज्ञान होता है, उस आत्मसत्ता के मूल स्वरूप का ज्ञान परा विद्या है।

जब किसी समाज में आत्मसत्ता के स्वरूप का ज्ञान रखने वाले श्रेष्ठ लोग होंगे और वे सम्मानित होंगे, तब वहाँ सभी मानस संरचनाएं, ( मेंटल या इंटेलेक्चुअल कान्स्टृक्ट) मर्यादित मान्य होंगी क्योंकि यह ज्ञात होगा कि वे परमार्थ रूप में अंतिम सत्य नहीं हैं, वे सब सापेक्ष सत्य हैं और परिवर्तनशील सत्य हैं। इसीलिए व्यक्ति, कुल, गोत्र, वर्ण, क्षेत्र, आदि सब से परे जो मूल तत्व है, उसके ज्ञान की साधना को परा विद्या कहा गया और उसके ज्ञाता ही सर्वमान्य रहे। इस प्रकार प्रारम्भ से ही भारत में परा और अपरा दोनों विद्याओं की साधना परंपरा प्रवाहित है और शिक्षा वही है जो इन दोनों का ज्ञान दे।

इसमें से परा का मूल ज्ञान सबको आवश्यक है, अत: योग और ध्यान की किसी न किसी पद्धति के द्वारा आत्मस्वरूप का ज्ञान सबके लिए सर्वोपरि मान्य रहा। जबकि अपने संस्कारों और सामथ्र्य तथा प्रतिभा के अनुरूप अपरा विद्या के किस एक या कतिपय अनुशासनों में दक्षता को स्वधर्म माना गया। अत: सामान्य धर्म और स्वधर्म, दोनों का ज्ञान प्रत्येक विद्यार्थी को कराना शिक्षा का भारतीय लक्ष्य है।

यहाँ कुछ और आधारभूत तथ्य स्मरण कर लेना चाहिए। समस्त शिक्षा वृद्ध संवाद है अर्थात ज्ञान की किसी न किसी शाखा या अनुशासन में उत्कर्ष प्राप्त अपने पूर्वज लोगों के द्वारा जो ज्ञान प्रदान किया गया, प्रस्तुत किया गया, उसे नयी पीढ़ी को देना ही शिक्षा का मूल आधार है। वही शिक्षा है। इस प्रकार किसी भी समाज की सम्यक शिक्षा वह है जो सर्वप्रथम अपने ही समाज और राष्ट्र में हुए ज्ञानियों के द्वारा प्रस्तुत, निरूपित और व्याख्यायित ज्ञान के स्वरूप को ठीक-ठीक नयी पीढ़ी को प्रदान करे। अर्थात् अपने वृद्धों से संवाद करें। परंतु वर्तमान में 1947 ईसवी के बाद से जो लोग शासन में रहे, उन्होंने शिक्षा के नाम पर यूरोप और बाद में संयुक्त राज्य अमेंरिका के जो कुछ अनुशासनों में वृद्धि प्राप्त या उत्कर्ष प्राप्त ज्ञानी लोग हैं, उनसे ही भारत के विद्यार्थियों का संवाद बलपूर्वक कराया।

उदाहरण के लिए इतिहास में, राजनीति शास्त्र में, अर्थशास्त्र में, समाजशास्त्र में, मानस शास्त्र यानी मनोविज्ञान में और शब्दशास्त्र, भाषा शास्त्र आदि में यूरोप के सयाने लोग, वृदध लोग क्या क्या कहते रहे हैं और क्या कह रहे हैं, उसे ही भारत के विश्वविद्यालयों में मूल रूप से पढ़ाया जाता है और मात्र शोभा या अलंकार की भांति एकाध भारतीय विद्वानों के भी अंश उस विषय में प्रस्तुत कर दिए जाते हैं। इसका अर्थ है कि भारत के सभी विद्यार्थियों को शासन के द्वारा यूरोप के और बाद में संयुक्त राज्य अमेरिका के वृद्धों से संवाद करने को विवश किया जाता है। यह तो शिक्षा के प्रयोजन से रहित शिक्षा हुई। शिक्षा का मूल प्रयोजन है सर्वप्रथम अपने समाज और राष्ट्र के वृद्धों से विद्यार्थियों का संवाद कराना। उनके ज्ञान को उन्हें प्रदान करना। इतिहास, पुराण, गणित, ज्योतिष, विज्ञान, आयुर्वेद, योगशास्त्र सहित समस्त भारतीय दर्शन शास्त्र, व्याकरण, भाषा शास्त्र आदि सभी रूपों में सबसे पहले अपने देश के ज्ञानियों को जानना आवश्यक है। फिर यूरो-अमेरिकी विद्वानों को भी अवश्य वे जानें।

अपरा विद्या के प्रत्येक अनुशासन में सर्वप्रथम विद्यार्थियों को अपने ही राष्ट्र और अपने ही समाज के वृद्धों के द्वारा जाने गए और प्रस्तुत किए गए ज्ञान को जानना चाहिए तथा सर्वप्रथम अपने ही वृद्धों से संवाद करना चाहिए। इसके बाद जैसा हमारे वृद्धों ने निर्देश दिया है, सारे संसार के भी वृद्धों से ज्ञान प्राप्त करना सहज स्वाभाविक है। अपनों से संवाद न करके केवल बाहरी वृद्धों के ज्ञान को जानना तो शिक्षा के प्रयोजन को नष्ट करना है। अत: भारतीय शिक्षा वही है जो सर्वप्रथम इतिहास में, अर्थशास्त्र में, राजनीति शास्त्र में, मानस शास्त्र में, मनोविज्ञान सहित प्रत्येक मानविकी अनुशासन में भारत का ज्ञान नयी पीढ़ी को प्रदान करे। भारत के शास्त्र ज्ञान को, भारत के महान ज्ञानियों के ज्ञान को अपने विद्यार्थियों तक पहुंचाएं। यही भारतीय शिक्षा का मूल लक्ष्य है।

भारत में ज्ञान की अनंत शाखाएं हैं और उनका अत्यधिक विस्तार है। अत: जिसमें अपने संस्कार और प्रतिभा और रुचि के कारण विशेष गति हो, उस अनुशासन में विशेष ज्ञान प्रदान किया जाना चाहिए और यूरोप या संयुक्त राज्य अमेंरिका सहित विश्व के अन्य देशों के भी वृद्धों का ज्ञान यदि संबंधित विषय में प्राप्त हो सके तो और अच्छा है। परंतु शिक्षा के मूल में अपने राष्ट्र और अपने समाज के वृद्धों के ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना ही आधार बनना चाहिए। यही भारतीय शिक्षा का लक्ष्य है।

वैसे भी समस्त विश्व में शिक्षा का मूल लक्ष्य और प्रयोजन यही है। आखिर यूरोप में और संयुक्त राज्य अमेंरिका में भी प्रत्येक विद्यार्थी को सर्वप्रथम अपने ही ज्ञानवृद्धिप्राप्त सयानों का ज्ञान ही प्रदान किया जाता है। भारत में इतने महान ज्ञानी हुए हैं, इतिहास संबंधी, राजनीति शास्त्र संबंधी, वित्तशास्त्र संबंधी अथवा मानसशास्त्र संबंधी या धर्मशास्त्र संबंधी उन महान भारतीय ज्ञानियों के ज्ञान को तो यूरोप के किसी भी देश में प्रारंभ में विद्यार्थियों को नहीं पढ़ाया जाता। यहां तक कि बाद में भी कुछ यदि पढ़ाया जाता है तो उनकी अपनी व्याख्याओं के साथ पढ़ाया जाता है, उनके अपने दृष्टिकोण से पढ़ाया जाता है। भारतीय ऋषियों के दृष्टिकोण को यथावत किसी भी यूरोपीय देश में अथवा संयुक्त राज्य अमेंरिका में किसी भी अनुशासन में नहीं पढ़ाया जाता। जिन क्षेत्रों में भारतीय ऋषि और भारतीय गुरुजन सर्वश्रेष्ठ मान्य है, उन क्षेत्रों में भी पहले हमारा ज्ञान वहाँ विद्यार्थियों को नहीं दिया जाता। क्योंकि सर्वत्र शिक्षा का मूल प्रयोजन अपने ही पूर्वजों के ज्ञान को नई पीढ़ी को प्रदान करना है। भारत में भी शिक्षा के इसी सार्वभौम प्रयोजन के अनुरूप शिक्षा प्रदान की जानी आवश्यक है।

हमारे जिस परंपरागत शैक्षणिक ढांचे को अंग्रेजों ने बलपूर्वक तथा योजना पूर्वक तोड़ा और फिर 15 अगस्त 1947 ईस्वी के बाद उस परंपरा गत शिक्षा के ढांचे को टूटा फूटा और बिखरा ही रहने दिया गया, उसे फिर से नए उत्साह के साथ प्रामाणिक रूप में रचे जाने की आवश्यकता है। वस्तुत: शिक्षा के लक्ष्य ज्ञानी लोग ही तय कर सकते हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तत्वावधान में भारत के श्रेष्ठ विद्वानों का एक वृहद निकाय व्यापक विचार-विमर्श करें और वेदों उपनिषदों पुराणों महाकाव्यों आदि के परंपरागत विद्वानों तथा अन्य सभी ज्ञान धाराओं के मुखिया लोगों और ज्ञानी लोगों और भारतीय कला रूपों तथा शिल्प परंपराओं के ज्ञानी और हुनरमंद व्यक्तियों तथा अन्य समूहों के प्रतिनिधियों का एक समवाय हो और उसमें शिक्षा के नए स्वरूपों के विषय में सर्व अनुमति के आधार पर एक प्रामाणिक स्वरुप विकसित किया जाए।

हमारी ज्ञान परंपराएं विराट और विविध हैं। उनके प्रतिनिधियों के संवाद से राष्ट्रीय शिक्षा के लक्ष्य का निर्धारण का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा। इस विषय में राजनेताओं और प्रशासकों को स्वयं अपने स्तर पर निर्णय लेने का हठ नहीं करना चाहिए क्योंकि वे इन विषयों के अधिकारी विद्वान नहीं हैं। राजनीति शास्त्र या विधिशास्त्र अथवा प्रशासनिक शास्त्र में उनका कोई योगदान अवश्य हो सकता है परंतु ज्ञान के अन्य विराट क्षेत्रों में राजपुरुषों और प्रशासकों का कोई निर्णायक योगदान नहीं हो सकता। भारतीय शिक्षा सदा ही परंपरा से शिक्षक केंद्रित यानी आचार्य केंद्रित रही है और उसे पुन: आचार्य केंद्रित ही किए जाने की आवश्यकता है।

शिक्षा को शिक्षक के स्थान पर प्रशासक और मंत्रालय के सचिव तथा मुखिया लोग तय करें, यह तो अंग्रेजी काल से चला था और यह परंपरा भारत की ज्ञान परंपरा को नष्ट करने वाली प्रमाणित हुयी है। भारतीय शिक्षा के स्वरूप और लक्ष्यों का निर्धारण भारत के ज्ञानियों के द्वारा ही हो, ऐसी व्यवस्था करना शासन का कर्तव्य है। ऐसी समृद्ध शिक्षा परंपरा का पुन: उत्कर्ष ही भारतीय शिक्षा के लक्ष्य होने चाहिए।