शराब से बुरा जंक फूड का नशा

वैद्य भगवान सहाय शर्मा
लेखक बाल रोग विशेषज्ञ हैं।


वर्तमान में पाश्चात्य जीवन शैली के अन्धानुकरण के कारण भोजन सम्बन्धी आदतों में बहुत अधिक बदलाव देखने को मिल रहा है। परिणामत: युवा पीढ़ी जीवनशैली जन्य रोगों यथा उच्च रक्तचाप, डायबिटीज टाइप टू, मोटापा, अनिद्रा, डिप्रेशन (मानसिक अवसाद) आदि के शिकार होती नजर आ रही है।

जंक फूड का प्रचलन आज बालकों और युवा वर्ग में नशे का रूप ले चुका है। इसका कारण है टेलीविजन पर आने वाले इनके व्यावसायिक विज्ञापन जो बालकों के अपरिपक्व मन पर अधिक प्रभाव डालते है। दूसरा कारण इन खाद्य पदार्थो में डाला जाने वाला फ्लैवरिंग एजेन्ट है जो खाने वाले को इसका आदी बना देता है। उसे बारंबार वही फ्लेवर खाने की इच्छा होने लगती है। इसकी आदत ऐसी पड़ती है कि बच्चा ऐसी चीजों को भूख से अधिक मात्रा में खाने लगता है, भले ही वह फ्लेवर उसके स्वास्थ के लिए कितना ही हानिकारक हो। जैसे चाइनीज भोज्य पदार्थ मंचुरियन तथा चाऊमीन आदि में एक अजीनोमोटो नामक फ्लैवरिंग एजेन्ट मिलाया जाता है। अजीनोमोटो भी खाने वाले को उसका आदी बना देता है परन्तु यह एक प्रकार का विष है जिसका अधिक मात्रा में प्रयोग स्वास्थ्य के लिए घातक हो सकता है।

तीसरा कारण लोगों को इन पदार्थो के दुष्प्रभाव के विषय में जानकारी नही होना भी है। अधिकांश लोगों को अजीनोमोटो सरीखे पदार्थों का नुकसान पता ही नहीं है। चौथा कारण है सर्वत्र इनकी उपलब्धता। आयुर्वेदीय दृष्टि से ये सभी जंक फूड अजीर्णकारक यानी कि पचने में भारी हैं। ये सबसे पहले पाचन शक्ति को कमजोर करते हैं। शरीर में भोजन का समुचित पाचन नही होने से पेट में आम (अनपचा भोजनावशेष) बनने लगता है जिसे आयुर्वेद में सभी प्रकार के रोगों का कारण माना गया है।

दुनिया में फास्ट फूड का प्रचलन 19वीं सदी से आरम्भ हुआ। नाम से ही पता चलता है कि ये व्यावसायिक दृष्टि से अधिकाधिक लाभ कमाने के लिए बनाये जाने वाले वे भोज्य पदार्थ हंै जो कम समय एवं कम लागत में पाक कौशल से बनाये जाते हैं। इनमें विभिन्न प्रकार के रंग, फ्लेवर तथा रासायनिक तत्वों का मिश्रण मानको से कही अधिक किया जाता है जिससे ये दिखने में आकर्षक तथा स्वाद में अपेक्षाकृत अधिक तीखे-मीठे-खट्टे होते हैं जो अपरिपक्व मानसिकता वाले लोगों को अधिक आकर्षित करते हैं। भले ही ये भोजन की मूल अवधारणा पोषण की पूर्ति नही करते है। इसलिए इसे जंकफूड भी कहा जाता है।

जंक फूड शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम मिचेल जैकब ने 1972 में ऐसे भोज्य पदार्थों के लिए किया था जिनमें पोषक तत्व या तो सर्वथा नहीं होते हैं अथवा अत्यल्प मात्रा में होते हैं। इन्हें हाई केलोरी फूड भी कहा जाता है। नमकीन स्नैक्स जैसे चिप्स, कुरकुरे, वेफर्स, पीजा, बर्गर, मैगी, मैक्रोनी, पास्ता, नूडल्स, फ्रेन्चफ्राई, कार्बोनेटेड कोल्ड-ड्रिंक्स आदि प्रचलित जंक फूड हैं। ये मुख्यत: मैदा, आलू, चीज आदि पदाथों से बने हुए होते है। इनमें संतृप्त वसा (सेचुरेटेड फैट और ट्रांसफैट), नमक तथा शर्करा का अनुपात खाद्य मानकों से अधिक होता है। संतृप्त वसा शरीर के लिए हानिकारक होती है और इससे ये विशेषकर बालकों और युवा वर्ग में पाचन सम्बन्धी विकार एवं अन्य गम्भीर रोग उत्पन कर रहे हैं। इनमें प्रयुक्त अतिरिक्त नमक, सार और फ्लैवरिंग पदार्थ आंतों की श्लैष्मा कला को क्षतिग्रस्त करते हुए पाचन प्रक्रिया को बाधित करते है। फलस्वरूप भोजन के प्रति बालकों में अरूचि (भूख में कमी), उदर शूल, कब्ज, अम्ल पित्त, अतिसार वमन आदि रोग भयावह रूप से बढ़ रहे हैं।

दूसरी ओर इनमें फल-सब्जियों तथा रेशे (फाइबर) आदि आवश्यक पोषक तत्वों का अभाव होता है। अत: इन्हें खाने से बच्चे का पेट तो भर जाता है परन्तु उनमें एन्जाइम, विटामिन्स तथा खनिज लवण (माइक्रो न्यूट्रीएंट्स) आदि की कमी होने के कारण कुपोषणजन्य रोग जैसे कि भार में कमी, खून की कमी, एकाग्रता का अभाव, हमेशा सुस्ती का बने रहना, थकावट, कैल्सियम की पूर्ति नही होने से हड्डियों के रोग तथा दांतों का कमजोर होना, अस्थमा, हाथ-पैर या सारे शरीर में दर्द बने रहना, बार बार खाँसी-सर्दी व जुकाम-बुखार का होना आदि रोग बढ़ रहे हैं।

जंक फूड अधिक समय तक टिकाऊ रहें और दिखने में आकर्षक हों, इसलिए इन्हें खूब तला जाता है। इससे इनमें ट्रांसफैट की मात्रा बढ़ जाती है। ये ट्रांसफैट खून में अच्छे कोलेस्ट्रोल (एचडीएल) को कम करते है तथा खराब कोलेस्ट्रोल (एलडीएल) को बढ़ा देते हैं। परिणामस्वरूप कम उम्र में ही बच्चे ह्रदय रोग, डायबिटीज टाइप टू तथा मोटापा आदि अनेकानेक भयानक रोगों का शिकार हो रहें है। सोडियम की मात्रा अधिक होने से आज युवा उच्च रक्तचाप के शिकार अधिक देख रहे हैं। इनमें रेशों (फाइबर) की मात्रा कम होने से बच्चों को कब्ज होने लगा है तथा आज बाल रोग ओ. पी. डी. में इनकी संख्या बढ़ती जा रही है।

इस भयावह स्थिति से उबरने के लिए आज स्वस्थ जीवन शैली के साथ-साथ पूर्णत: प्राकृतिक खानपान को अपनाना अनिवार्य हो गया है। आयुर्वेद में शरीर का अस्तित्व ही आहार से माना है। आचार्यो ने भोजन के सभी छह रसों मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय के सेवन का निर्देश किया है ताकि शरीर के लिए आवश्यक सभी तत्त्वों की पूर्ति हो सके और शरीर पूरी तरह उर्जावान रहे।

आयुर्वेद को संक्षेप में हितभुक्, मितभुक् तथा ऋतभुक् के सूत्र से प्रतिपादित किया जा सकता है। अर्थात् भोजन में स्वाद की बजाय उसके हितकारी स्वरूप पर ध्यान देना चाहिए। भोजन थोड़ा अर्थात् भूख से आधा ही करना चाहिए तथा ऋतु के अनुसार भोजन में परिवर्तन करते रहना चाहिए।

जंक फूड का यह नशा बच्चों को अधिक नुकसान पहुँचा रहा है क्योंकि सोलह वर्ष तक की आयु के बच्चे के धातु (शरीरिक मानसिक सौष्ठव के कारण) अपरिपक्व होते हैं। इस अवस्था तक बच्चों को समुचित पोषक पदार्थ लेते हुए स्वास्थ्य को ठीक रखने और अच्छा बनाने का प्रयास करना चाहिए। ताकि वे युवावस्था में स्वस्थ रहते हुए आने वाली चुनौतियों का सामना कर सकें। कहा गया है बालक राष्ट्र की धरोहर एवं भविष्य है। यदि ये शारीरिक रूप से अक्षम हुए तो राष्ट्र की प्रगति सम्भव नही हैं।