वेदों में पर्यावरण-संतुलन का महत्व

papapaआचार्य जयकान्त
लेखक भारतीय शास्त्रों के मर्मज्ञ हैं।

वेदों में जल, पृथ्वी, वायु, अग्नि, वनस्पति, अन्तरिक्ष, आकाश आदि के प्रति असीम श्रद्धा प्रकट करने पर बल दिया गया है। ऋषियों के निर्देशों के अनुसार जीवन व्यतीत करने पर पर्यावरण असन्तुलन की समस्या उत्पन्न नहीं हो सकती। इनमें हुए अवांछनीय परिवर्तनों के कारण आज जल-प्रदूषण, वायु-प्रदूषण, मृदा-प्रदूषण की समस्याएँ चारों ओर व्याप्त हैं।

पर्यावरण-सन्तुलन से तात्पर्य है जीवों के आसपास की समस्त जैविक एवं अजैविक परिस्थितियों के बीच पूर्ण सामंजस्य। इस सामंजस्य का महत्त्व वेदों में विस्तारपूर्वक वर्णित है। वेदों में जल, पृथ्वी, वायु, अग्नि, वनस्पति, अन्तरिक्ष, आकाश आदि के प्रति असीम श्रद्धा प्रकट करने पर अत्यधिक बल दिया गया है। तत्त्वदर्शी ऋषियों के निर्देशों के अनुसार जीवन व्यतीत करने पर पर्यावरण असन्तुलन की समस्या ही उत्पन्न नहीं हो सकती। इनमें हुए अवांछनीय परिवर्तनों के कारण आज जल, वायु और भूमि के प्रदूषण की समस्या चारों ओर व्याप्त हैं।
जल जीवन का प्रमुख तत्त्व है। इसलिए, वेदों में अनेक स्थानों पर उसके महत्त्व पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है। ऋग्वेद के पहले अध्याय के तेइसवें सूक्त में जल का वैशिष्ट्य बताया गया है। जल में औषधीय गुण विद्यमान रहते हैं। इसीलिए कहा गया कि जल में अमृत है अतः इसकी शुद्धता-स्वच्छता को बनाए रखना चाहिए।
अथर्ववेद के पृथ्वीसूक्त में जलतत्त्व पर विचार करते हुए उसकी शुद्धता को स्वस्थ जीवन के लिए नितान्त आवश्यक माना गया है। इसी सूक्त में कहा है कि जल-सन्तुलन से ही भूमि में अपेक्षित सरसता रहती है, पृथ्वी पर हरीतिमा छायी रहती है, वातावरण में स्वाभाविक उत्साह दिखाई पड़ता है एवं समस्त प्राणियों का जीवन सुखमय तथा आनन्दमय बना रहता है। जल के साथ-साथ सभी ऋतुओं को अनुकूल रखने का वर्णन भी वेदों में मिलता है। ऋग्वेद में स्पष्टतया उल्लिखित है कि वायु में जीवनदायिनी शक्ति है। इसलिए, इसकी स्वच्छता पर्यावरण की अनुकूलता के लिए परम अपेक्षित है। वेदों में वायु की स्तुति की गई है, जिससे जीवों का निरन्तर सम्यक् विकास होता रहे।
यजुर्वेद के छत्तीसवें अध्याय के अट्ठारहवें मंत्रा में कहा गया है कि प्राणियों के प्रति सहृदयता का परिचय देना ही जीवन का सही लक्षण है। आज जिसे पारिस्थितिकी – तन्त्रा कहते हैं, उसमें भी तो रचना तथा कार्य की दृष्टि से विभिन्न जीवों और वातावरण की मिली-जुली इकाई का ही स्वरूप-विश्लेषण किया जाता है।
लोकोक्ति है कि ‘जब तक सांस, तब तक आस’ परन्तु जब सांस ही जहरीली हो जाए, तब उससे जीवन की आशा क्या की जा सकती है? वस्तुतः सांस की सार्थकता वातावरण की मुक्तता में निहित है। आज वातावरण मुक्त है कहाँ? मुक्त वातावरण का अर्थ है आवश्यक गैसों की मात्रा में सन्तुलन का बना रहना। चूँकि पादप एवं जन्तु दोनों ही वातावरण-सन्तुलन के प्रमुख घटक हैं, इसलिए दोनों ही का सन्तुलित अनुपात में रहना परमावश्यक है। वेदों में वृक्ष-पूजन का विज्ञान है। इसके विपरीत, आज पेड़-पौधों की निर्ममतापूर्वक कटाई से वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा में अतिशय वृद्धि हो रही है। इससे तापमान अनपेक्षित मात्रा में बढ़ता जा रहा है, जो पर्यावरण के लिए संकट का सूचक है।
निस्सन्देह प्रकृति-विज्ञान में असन्तुलन उपस्थित करना विनाश को आमन्त्राण देना होता है। ध्यान रहे कि नदी जब भी बहेगी, सन्तुलन के दो कगारों के बीच से ही बहेगी। उसमें व्यवधान पड़ा नहीं कि वह भंवर बना डालती है, किनारों को झकझोरने लगती है, तटबँध को तोड़ देना चाहती है। फिर तो व्यापक स्तर पर जल-प्लावन शुरू हो जाता है, बाढ़ का प्रकोप बढ़ जाता है, जीवन के अस्त-व्यस्त हो जाने
का अशोभनीय दृश्य उपस्थित हो जाता है। इतना ही नहीं, कभी-कभी तो समुद्र भी अपनी सीमा छोड़ने लगता है और सम्पूर्ण पृथ्वी पाताल में लय हो जाती है। अतएव, यदि महाविनाश से बचना है, तो प्राकृतिक सन्तुलन को बिगाड़ने की चेष्ट कभी नहीं की जानी चाहिए। जल की तरह ही हवा में अवरोध उत्पन्न होने से बवण्डर खड़ा हो जाता है, तूफान आ जाता है, उसके प्रचण्ड आघात से घर-मकान, वन, उपवन, ग्राम-नगर सब-के-सब धराशायी हो जाते हैं। धरती की शोभा नष्ट हो जाती है। वस्तुतः पर्यावरण-सन्तुलन के महत्त्व-प्रतिपादन के लिए ही वेदों में अनेक स्थलों पर जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि आदि का स्तवन किया गया है।
ऋग्वेद में अग्नि को पिता के समान कल्याण करनेवाला कहा गया है। वेद का शुभारम्भ ही ‘अग्नितत्त्व’ के स्तवन से होता है, जो सफल जीवन का निर्माता है। अग्नि को स्वयं आगे आकर समस्त परिवेश का हित करने वाला, सामाजिक संगठन का सच्चा संचालक तथा शुभदायक माना गया है। ऋग्वेद के पहले ही मंत्रा में अग्नि का यह स्तवन समाज में सन्तुलन और त्याग का महत्त्व प्रतिपादित करता है। त्याग से ही समाज में सन्तुलन बना रहता है। त्याग की भावना भी स्वयं प्रेरित होनी चाहिए ऐसा न होने पर स्वार्थ की प्रवृत्ति बढ़ती है और कटुता उत्पन्न हो जाती है, जो असन्तुलन का मूल कारण होती है।
वेदों में पर्यावरण-सन्तुलन का महत्त्व अनेक प्रसंगों में वर्णित है। महान वेदज्ञ महर्षि यास्क ने अग्नि को पृथ्वी-स्थानीय, वायु को अन्तरिक्ष स्थानीय एवं सूर्य को द्युस्थानीय देवता के रूप में महत्त्वपूर्ण मानकर सम्पूर्ण पर्यावरण को स्वच्छ, विस्तृत तथा सन्तुलित रखने का भाव व्यक्त किया है।
इन्द्र भी वायु का ही एक रूप है। इन दोनों का स्थान अन्तरिक्ष में अर्थात् पृथ्वी तथा अकाश के बीच है। द्युलोक से अभिप्राय आकाश से ही है। अन्तरिक्ष से ही वर्षा होती है और आँधी-तूफान भी वहीं से आते हैं। सूर्य आकाश से प्रकाश देता है पृथ्वी और औषधियों के जल को वाष्प बनाता है, मेघ का निर्माण करता है। उद्देश्य होता है पृथ्वी को जीवों के अनुकूल बनाकर रखना। परन्तु, अग्नि केवल पृथ्वी पर नहीं है, वह अन्तरिक्ष और आकाश में भी है।
अन्तरिक्ष में विद्युत के रूप में और द्युलोक-आकाश से सूर्य-रूप में भी अग्नि ही है। पृथ्वी पर तो वह है ही। अभिप्राय यह कि ये सब एकसूत्रा में सम्बद्ध हैं। यही प्राकृतिक अनुकूलता है। पर्यावरण-सन्तुलन का अन्यतम निदर्शन है। आज हिंसा से विश्वपर्यावरण प्रदूषित हो रहा है, उससे कर्म में असन्तुलन उपस्थित हो गया है। इससे बचने के लिए वेद-प्रतिपादित सात्त्विक भाव अपनाना पड़ेगा। ऋग्वेद के दूसरे अध्याय के ग्यारहवें सूक्त के चौथे मंत्रा में कहा गया है कि सम्पूर्ण पृथ्वी, सम्पूर्ण परिवेश शुद्ध रहे, नदी, पर्वत, वन, उपवन सब स्वच्छ रहें, गाँव, नगर सबको विस्तृत और उत्तम परिसर प्राप्त हो, तभी जीवन का सम्यक् विकास हो सकेगा।
पर्यावरण को स्वच्छ व सुन्दर रखने का आग्रह सिर्फ भावनात्मक स्तर पर किया गया हो, ऐसी बात नहीं है। वैज्ञानिक अनुसन्धान के सन्दर्भ में भी सात्विकता की भावना से अनुप्राणित होकर गहरे मानवीय सम्बन्ध की स्थापना पर पर्याप्त बल दिया गया है। उदाहरणार्थ, ऋग्वेद के पहले मंडल के 164वें सूक्त में वैज्ञानिक अनुसन्धान की प्रक्रिया में भी सूर्य को पिता, पृथ्वी को माता और किरण-समूह को बन्धु के समान आदर देने का स्पष्ट निर्देश है। आज तो गलत प्रतिस्पर्धा के कारण विश्व का पर्यावरण विषाक्त बनता जा रहा है। कोल्ड स्टोरेज एवं वातानुकूलन के प्रयास पारिस्थितिकी के लिए अभूतपूर्व संकट उत्पन्न कर रहे हैं।
वेद का स्पष्ट निर्देश है कि लोग प्रकृति के प्रति सदा पूर्ण श्रद्धा रखें और आनन्दमय जीवन व्यतीत करने के निमित्त उससे पर्यावरण की अनुकूलता प्राप्त करते रहें। शुक्ल यजुर्वेद का शाश्वत सन्देश है – पवन मधुर, सरस व शुद्ध तथा गतिशील रहे, सागर मधुर वर्षण करे। ओज प्रदान करने वाली अन्नादि वस्तुएँ भोजन के बाद मधु के समान सुकोमल बन जाएँ। रात के साथ-साथ दिन भी मधुर रहे। पृथ्वी की धूल से लेकर अन्तरिक्ष तक मधुर हों। न केवल जीवित मनुष्यों का, अपितु पितरों का जीवन भी मधुमय रहे। सूर्य मधुमय रहें, गायें मधुर दूध देने वाली हों। निखिल ब्रह्माण्ड मधुमय रहे।