वेदमंत्रों के उच्चारण-प्रकार : पदपाठ

इस लेख में हम वेदों के पदपाठ के बारे में जानेंगे। वेदमंत्रों का सस्वर पाठ ‘पदपाठ’ कहा जाता है। वेद की संहितापाठ की परम्परा के अनुसार स्वरवर्णों की सन्धि का विच्छेद करके वैदिक मन्त्रों का सस्वर पाठ पदपाठ कहा जाता है। स्वर के सम्बन्ध के अनुसार पद के ग्यारह प्रकार होते हैं। शिक्षा-ग्रन्थों में कहा गया है— नव पदशय्या एकादश पदभक्तयः।

वेदमन्त्रों का पदपाठ पुण्यप्रदा सरस्वती देवनदी का स्वरूप है। पदपाठ करने से सरस्वती के स्नान का फल प्राप्त होता है— पदमुक्ता सरस्वती (याज्ञवल्क्यशिक्षा)।

तैत्तिरीय आदि अनेक शाखाओं में संहिता के प्रत्येक पद का पद पाठ में साम्प्रदायिक उच्चारण है। ऋग्वेद में भिन्न पदगर्भित पदों में अनानुपूर्वी संहिता को स्पष्ट पदस्वरूप देकर पढ़ा जाता है। शुक्लयजुर्वेद की शाखाओं में प्रातिशाख्य के नियमों के अनुसार एकाधिक बार आए हुए विशेष पदों को पदपाठ में विलुप्त कर दिया जाता है। शास्त्रीय परिभाषा में ऐसे विलुप्त पदों को गलत्पद और ऐसे स्थल के पाठ को संक्रम कहा जाता है।

पदपाठ में प्रत्येक पद को अलग करने के साथ यदि कोई पद दो पदों के समास से बना हो, तो उसे माध्यान्दिनीय शाखा में इतिकरण के साथ दोहरा करके स्पष्ट किया जाता है। प्रातिशाख्य के नियमों के अनुसार कतिपय विभक्तियों में तथा वैदिक लोप, आगम, वर्णविकार, प्रकृतिभाव आदि में भी ‘इतिकरण’ के साथ पद का मूल स्वरूप स्पष्ट किया जाता है।

पदपाठ में स्वर वर्णों की सन्धि का विच्छेद तथा अवग्रह आदि विशेष विधियों के प्रभाव से यह पाठ, संहिता से भी अधिक कठिन हो जाता है। इन नियमों के कारण ही यह पदच्छेद नहीं है, किन्तु पदपाठ कहा जाता है।